कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १२२
जड पंच मिलै जेहि देह करी, करनी लखु धौं धरनीधरकी ।
जनकी, कहु, क्यों करिहै न सँभार, जो सार करै सचराचरकी ॥
तुलसी ! कहु राम समान को आन है, सेवकि जासु रमा घरकी ।
जगमें गति जाहि जगत्पतिकी, परवाह है ताहि कहा नरकी । २७।
भला, उस धरणीधरकी लीला तो देखो, जिसने पाँच जड
तत्त्वोंको मिलाकर यह देह बनायी है । इस प्रकार जो चराचरकी
सँभाल करता है, कहो भला, अपने भक्तोंकी सँभाल वह क्यों
न करेगा । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं—हे तुलसीदास !
बतलाओ तो, रामके समान दूसरा कौन है, जिसके घरकी किंकरी
लक्ष्मी हैं; इस संसारमें जिसे उस जगत्पतिका ही भरोसा है,
वह मनुष्यकी क्या परवा करेगा ?
जग जाचिअ कोउ न, जाचिअ जौं, जियँ जाचिअ जानकीजानहि रे।
जेहि जाचत जाचकता जरि जाइ, जो जारति जोर जहानहि रे ॥
गति देखु विचारि बिभीषनकी, अरु आनु हियँ हनुमानहि रे ।
तुलसी ! भजु दारिद-दोष-दवानल, संकट-कोटि-कृपानहि रे २८
संसारमें किसीसे (कुछ) माँगना नहीं चाहिये । यदि
माँगना ही हो तो जानकीनाथ ( श्रीरामचन्द्रजी) से मनहीमें
माँगो, जिनसे माँगते ही याचकता (दरिद्रता, कामना) जल
जाती है जो बरबस जगत्को जला रही है। विभीषणकी दशाका
विचार करके देखो और हनुमान्जीका भी स्मरण करो । गोसाईं-
जी कहते हैं कि हे तुलसीदास ! दरिद्रतारूपी दोषको जलानेके
लिये दावानलके समान और करोड़ों संकटोंको काटनेके लिये
कृपाणरूप श्रीरामचन्द्रजीको भजो ।