सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

कृपा-पाथनाथ लोकनाथ-नाथ सीतानाथ
तजि रघुनाथ हाथ और काहि ओड़िये ॥२५॥
महाराजकी यह रीति है कि जिस याचकको अपनाते हैं
उसके दोष, दुःख और दरिद्रताको दरिद्र ( क्षीण ) करके छोड़ते
हैं । जिनका नामरूप कल्पवृक्ष चारों फलों ( धर्म, अर्थ, काम,
मोक्ष ) का देनेवाला है, गोसाईंजी कहते हैं, उन्हें त्याग कर बबूल
और रेंड कौन रोपे ? राजाओंसे याचना कौन करे ? और देश-
विदेश घूमनेका कष्ट कौन भोगे ? जो प्रसन्न होकर बहुत बढ़कर
देंगे तो एक दमड़ीसे अधिक न देंगे, कृपाके समुद्र, लोकपालोंके
स्वामी सीतानाथ श्रीरामचन्द्रजीको छोड़कर और किसके आगे
हाथ फैलाया जाय ?
जाकें बिलोकत लोकप होत, बिसोक लहैं सुरलोग सुठौरहि ।
सो कमला तजि चंचलता, करि कोटि कला रिझवै सुरमौरहि ॥
ताको कहाइ, कहै तुलसी, तूँ लजाहि न मागत कूकुर-कौरहि ।
जानकी जीवनको जनु है जरि जाउ सो जीह जो जाचत औरहि २६
जिसकी दृष्टिमात्रसे मनुष्य लोकपाल हो जाता है और
देवतालोग सुन्दर शोकरहित स्थानको प्राप्त कर लेते हैं, वह
लक्ष्मी ( अपनी स्वाभाविक ) चञ्चलता त्याग कर करोड़ों उपायों-
से विष्णुरूप श्रीरामचन्द्रजीको रिझाती है; गोसाईंजी कहते हैं
कि तू उनका कहलाकर कुत्तेको दिया जानेवाला टुकड़ा ( तुच्छ
भोग ) माँगनेमें लज्जित नहीं होता । जानकीजीवन ( श्रीरामचन्द्र-
जी ) का सेवक होकर भी जो दूसरेसे माँगता है, उसकी जीभ
जल जाय ।