कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १२६
जो तजि देहको गेहको नेहु, सनेहसों रामको होइ सबेरो ॥३५॥
गोसाईंजी कहते हैं—जो पुरुष शरीर और घरकी ममता-
को त्याग कर जल्दी-से-जल्दी स्नेहपूर्वक भगवान् रामका हो
जाता है, वही मेरी माता है, वही पिता है, वही भाई है, वही स्त्री
है, वही पुत्र है और वही हितैषी है तथा वही मेरा सम्बन्धी,
वही मित्र, वही सेवक, वही गुरु, वही देवता, वही स्वामी और
वही सेवक (अर्थात् वही सब कुछ) है। अधिक कहाँतक
बनाकर कहूँ, वह मुझे प्राणोंके समान प्रिय है।
रामु हैं मातु, पिता, गुरु, बंधु, औ संगी, सखा, सुतु, स्वामि, सनेही
रामकी सौंह, भरोसो है रामको, राम रँग्यो, रुचि राच्यो न केही॥
जीअत रामु, मुएँ पुनि रामु, सदा रघुनाथहि की गति जेही।
सोई जिए जगमें 'तुलसी' नतु डोलत और मुए धरि देही ॥३६॥
श्रीरामचन्द्र ही मेरी माता हैं, वे ही पिता हैं तथा वे ही
गुरु, बन्धु, साथी, सखा, पुत्र, प्रभु और प्रेमी हैं। श्रीरामचन्द्र-
की शपथ है, मुझे तो रामका ही भरोसा है, मैं रामहीके रंगमें
रँगा हुआ हूँ, दूसरेमें रुचिपूर्वक मेरा मन ही नहीं लगता।
गोसाईंजी कहते हैं—जिसे जीते हुए भी रामसे ही स्नेह है
और जो मरनेपर भी रामहीमें मिल जाता है, इस प्रकार सदैव
जिसे रामका ही भरोसा है, वही संसारमें जीता है, नहीं और
सब तो मरे हुए ही देह धारण किये डोलते हैं।
रामप्रेम ही सार है
सियराम-सरूपु अगाध अनूप बिलोचन-मीननको जलु है।
श्रुति रामकथा, मुख रामको नामु, हिएँ पुनि रामहिको थलु है॥