कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ११६
साँचौ सेवकाई हनुमान की सुजानराय,
रिनियाँ कहाए हौ, बिकाने ताके हाथ जू ॥
तुलसी-से खोटे खरे होत ओट नामही कीं,
तेजी माटी मगहू की मृगमद साथ जू ।
बात चलें बातको न मानिबो विलगु, बलि,
काकीं सेवाँ रीझि कै नेवाजो रघुनाथ जू ? ॥१९॥
हे नाथ ! आपने कृपा करके अपने आगे पड़ी शिलको तथा
किरात, भीलनी, सुग्रीव और केवल सिर नवानेसे ही राक्षस
बिभीषणको अपना लिया । हे सुजानशिरोमणि ! सच्ची सेवा तो
आपकी हनुमान्जीने की, जो आप उनके ऋणी कहलाये और
उनके हाथ बिक गये । तुलसीके समान दम्भी भी आपके नामकी
ओट लेनेसे ही सच्चे हो जाते हैं, जैसे रास्तेकी मिट्टी कस्तूरीके
संसर्गसे बहुमूल्य हो जाती है । इस प्रसंगपर यदि मैं कोई बात
पूछूँ तो बुरा न मानियेगा । हे रघुनाथजी ! मैं आपकी बलि जाता
हूँ, भला, आपने किसकी सेवासे रीझकर कृपा की है ? [अर्थात्
आपने अपनी कृपालुतासे ही अपने सेवकोंको बढ़ाया है, किसीने
भी ऐसी सेवा नहीं की जिससे आप रीझ सकें ।]
कौसिककी चलत, पषानकी परस पाय,
टूटत धनुष बनि गई है जनककी ।
कोल, पसु, सबरी, बिहंग, भालु, रातिचर,
रतिनके लालचिन त्रापति मनककी ॥
कोटि-कला-कुसल कृपाल नतपाल ! बलि,
बातहू केतिक तिन तुलसी तनककी ।