कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)
Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary
महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा
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178 Appendix II
उप नो हरिमः सुतम् XXIII. १०.२७. RV. 8.93.31.
उपप्रयन्तो अध्वरम् XI. ३.९. RV. 1.74.1.
XXII. १.८. RV. 1.74.1.
उप प्रियं पनिप्रतम् IX. ६.५. RV. 9.67.29.
उपवक्ता जनानाम् XXVIII. ५.१४. RV. 4.9.5.
उप वां जिह्वा घृतमाचरष्यत VII. २.१८. (ŚŚ. 2.4.3.)
उपसद्याय मीळहुषे VIII. ९.१२;२१. RV. 7.15.1.
उपहूता देवा अस्य सोमस्य पवमानस्य विचक्षणस्य मक्ष उप XII. ७.२. (ŚŚ. 6.8.14.)
मां देवा ह्वयन्तामस्य सोमस्य पवमानस्य विचक्षणस्य मक्षे
मनसा त्वा भक्षयामि वाचा त्वा भक्षयामि प्राणेन त्वा
भक्षयामि चक्षुषा त्वा भक्षयामि श्रोत्रेण त्वा भक्षयामि
उभावपापश्व X. ४.१. (ŚŚ. 5.17.10.)
उरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् XXI. ५.१२. RV. 6.19.1.
उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान् XXV. ७.९;३८. RV. 6.47.8.
XXIX. ५.१५. RV. 6.47.8.
उशिजो जग्मुरभि तानि वेदसा XX. २.१८. RV. 3.60.1.
उषासानक्ता बृहती सुपेशसा XXIV. ४.९. RV. 10.36.1.
ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये X. ३.२. RV. 1.36.13.
ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेत् XXV. २.१०. RV. 4.13.2.
ऊर्ध्वो अग्निः सुमतिं वस्वो अश्रेत् XXVI. १२.२९. RV. 7.39.1.
ऊर्ध्वो नः पाहांहसो नि केतुना X. ३.२. RV. 1.36.14.
ऋजुनीती नो वरुणः XXVI. ६.९. RV. 1.90.1.
ऋभुर्विभ्वा वाज इन्द्रो नो अच्छ XXIII. ६.१०. RV. 4.34.1.
एकमेकं सुशस्तिभिः XXVI. १५.७. RV. 1.20.7.
एतायामोप गव्यन्त इन्द्रम् XXI. ३.१४. RV. 1.33.1.
एति प्र होता व्रतमस्य मायया XX. २.२८. RV. 1.144.1.
एदं बर्हिर्न षीदत XXIV. २.११. RV. 2.41.13.
एन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः XXVI. ८.७. RV. 1.52.1.
एन्द्र याहि हरिभिः XXV. ७.२४. RV. 8.34.1.
एन्द्र याह्युप नः परावतः XXIII. १०.१७. RV. 1.130.1.
एमा अगन्न् रेवतीर्जीवधन्याः XII. २.२१. RV. 10.30.14.
एवा वन्दस्व वरुणं बृहन्तं IX. ४.१२. RV. 8.42.2.
एवा हि देवाः XXIII. ५.१७. RVKh. 5.4.10.
एवा हि पूषन् XXIII. ५.१५. RVKh. 5.4.10.
Page 179
Appendix II 179
एवा हीन्द्र XXIII. ५.१३. RVKh. 5.4.10.
एवा ह्यग्न XXIII. ५.१०. RVKh. 5.4.10.
एवा ह्यसि वीरयुः XXIII. ५.२६. RV. 8.92.28.
एवा होवा XXIII. ५.६. RVKh. 5.4.10.
एष प्र पूर्वीरव तस्य चम्रिषः XXV. ७.३. RV. 1.56.1.
ओजः सहः सह ओजः स्वः III. ७.९. (ŚŚ. 1.1.39.)
ओमासश्चर्षणीधृतः XXVI. ६.१३. RV. 1.3.7.
क ईं व्यक्ता नरः सनीळाः XXIII. ३.१५. RV. 7.56.1.
कतम ऊती अभ्या ववर्त्तति XX. २.२१. RV. 10.64.1.
कतरा पूर्वी कतरापरायोः XXIII. ११.१३. RV. 1.185.1.
कथा देवानां कतमस्य यामनि XX. २.२०. RV. 10.64.1.
XXI. ३.२३. RV. 10.64.1.
कद्वित्था नृंः पात्रं देवयताम् XXIV. ४.४. RV. 1.121.1.
कदू न्वस्याकृतम् XXIV. ७.२. RV. 8.66.9.
कद्ध नूनं कद्यप्रियः XXVI. १.१७. RV. 8.7.31.
कन्नव्यो अतसीनाम् XXIV. ५.१८. RV. 8.3.13.
कपूथ्नरः कपूथमुद्घातान XXX. ५.२८. RV. 10.101.12.
कया त्वं न ऊत्या XXVII. ५.१. RV. 8.93.19.
कया नश्चित्र आ भुवत् XXVII. ५.१. RV. 4.31.1.
कया मती कुत एतास एते XXVI. ५.५. RV. 1.165.1.
कया शुभा सवयसः सनीळाः XIX. ४.१. RV. 1.165.1.
XXIV. ५.११. RV. 1.165.1.
XXV. ३.१;
१०.२३. RV. 1.165.1.
XXVI. ५.१. RV. 1.165.1.
कश्छन्दसां योगमा वेद धीरः XI. ९.११. RV. 10.114.9.
का राघदोत्राश्विना वाम् VIII. ७.८. RV. 1.120.1.
किमु श्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन XIX. ४.२६. RV. 1.161.1.
XXI. ५
180 Appendix II
कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीम् VIII. 5.१७. RV. 4.4.1.
को नु वां मित्रावरुणावृतायन् XXIII. 6.१३. RV. 5.41.1.
क्राणा यदस्य पितरा मंहनेष्ठाः XXIII. 11.२४. RV. 10.61.1.
कस्य वीरः को अपश्यदिन्द्रम् XXI. 3.११. RV. 5.30.1.
XXIV. 5.१०. RV. 5.30.1.
XXVI. 8.५. RV. 5.30.1.
क्षयं पावकशोचिषः XXVI. 14.३०. RV. 3.11.7.
क्ष्मया वृधान ओजसा XXVI. 9.१५. (ŚŚ. 10.10.8.)
गणानां त्वा गणपतिं हवामहे VIII. 7.९. RV. 2.23.1.
IX. 6.११. RV. 2.23.1.
गवामिव श्रियसे शृङ्गमूत्तमम XXI. 3.३०. RV. 5.59.3.
गायत् साम नभन्यं यथा वेः XXIV. 5.१२. RV. 1.173.1.
XXVI. 13.१५. RV. 1.173.1.
गायन्ति त्वा गायत्रिणः XXIV. 6.७. RV. 1.10.1.
गिरः समझ्छे विदथेष्व्वाभुवः XIX. 6.३९. RV. 1.64.1.
गीर्भिर्वृधं वृषभं चर्षणीनाम् XXV. 5.१८. RV. 6.18.1.
182 Appendix II
तद् रूपा मिनन् तदपा एक ईयते XXV. ७.२३. RV. 2.13.3.
तनूषु शूराः सूर्यस्य सातौ XXV. २.१३. RV. 7.30.2.
तनूष्वप्सु सूर्ये XXV. ५.८. RV. 6.46.4.
तंतमिद् राधसे महे XX. ५.२. RV. 8.68.7.
तं त्वा यज्ञेभिरीमहे XXIII. २.१. RV. 8.68.10.
तपो ष्वग्ने अन्तराँ अमित्रान् VIII. ५.१५. RV. 3.18.2.
तमस्य द्यावापृथिवी सचेतसा XXVI. ४.९. RV. 10.113.1.
तमस्य राजा वरुणस्तमश्विना IX. ८.८. RV. 1.156.4.
तमिन्द्रं वाजयामसि XXIII. ५.३७. RV. 8.93.7.
तमीळिष्व यो अर्चिषा XXV. 14. १५. RV. 6.60.
अरुषस्य नू सहः":
"XX. 4.५. RV. 6.8.1."
"XXI. 3.२६. RV. 6.8.1."
Let's check "पृथिव्यास्त्वा नाभौ सादयाम्यदित्या उपस्थे":
"VI. 9.९. VS. 2.11."
Let's check "प्र ऋभुभ्यो दूतमिव वाचमिष्ये":
"XXIII. 3.४. RV. 4.33.1."
Let's check:
"प्र षोडसा धायसा सस्र एषा" or "प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा"?
Look at the first letter: is it 'क्ष' or 'ष'?
In Devanagari, 'क्ष' in this font: look at "पृक्षस्य" above. In "पृक्षस्य", 'क्ष' has the loop at the top left, going down and looping, then the vertical line.
Now look at "प्र क्षोदसा":
Wait, does it have 'क्षो' or 'षो'?
Wait! Look at the top of that letter: it has a loop with a small curled loop like 'क', then loop down, then vertical line with 'ो' matra. That is 'क्षो'!
Wait, RV 7.95.1 is: "प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा सरस्वती
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186 Appendix II
TS. 1.8.22.1.
प्र ते महे विदथे शंसिषं हरी XXV. ६.१. RV. 10.96.1.
प्रत्यस्मै पिपीषते XXIII. ५.२४. RV. 6.42.1.
XXVIII. ६.१. RV. 6.42.1.
प्रत्येता वामा सूक्तार्यं सुन्वन् यजमानोऽब्रवीत् XIII. ६.१८. (ŚŚ. 7.6.6.)
प्रत्वक्षसः प्रतवसो विरप्शिनः XX. २.२६. RV. 1.87.1.
प्र देवत्रा ब्रह्मणो गातुरेतु XII. १.११. RV. 10.30.1.
प्र देवं देववीतये VIII. १.१८. RV. 6.16.41.
प्र देवं देव्या धिया IX. २.५. RV. 10.176.2.
प्र देव्येतु सूनृता XX. ५.१९. RV. 1.40.3.
प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी ऋतावृधा XX. २.१५. RV. 1.159.1.
XXII. २.१. RV. 1.159.1.
प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिः XXIII. ३.४. RV. 7.53.1.
प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिः XV. २.१९. RV. 1.40.5.
प्र नो राया परीणसा XXI. ३.४. RV. 5.10.1.
प्रबाबधान XXVI. १२.३६. RV. 7.95.1.
प्र बाहूवा सिसृतं जीवसे नः XVIII. ९.२०. RV. 7.62.5.
प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त XXVI. ७.२१. RV. 7.42.1.
प्र बर्हीतुं सदनादृतस्य XXV. २.१५. RV. 7.36.1.
प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये XXX. ६.२०. RV. 1.57.1.
प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचः XXVI. १३.१७. RV. 1.101.1.
प्र यज्यवो मरुतो भ्राजदृष्टयः XXIII. ११.३७. RV. 5.55.1.
XXV. ४.११. RV. 5.55.1.
प्र यद् वसिष्ठमभिषं XXVI. ६.२०. RV. 8.7.1.
प्र यन्तु वाजास्तविषीभिरग्नयः XXIII. ३.१७. RV. 3.26.4.
प्रयाजान् मे अनुयाजाँश्च केवलान् I. ३.१०. RV. 10.51.8.
प्र ये शुष्मन्ते जनयो न समयः XXI. २.१८. RV. 1.85.1.
प्र व इन्द्राय बृहते XXVII. ३.१५. RV. 8.89.3.
प्र वः पान्तं रघमन्यवोऽन्धः XXIV. ४.४. RV. 1.122.1.
प्र वः शुक्राय मानवे भरध्वम् XII. ४.१६. RV. 7.4.1.
XXVI. ५.१. RV. 7.4.1.
प्र वः स्पळक्ऋत्स्रुविताय दावने XXI. ३.२९. RV. 5.59.1.
प्र बां मरन् मानुषा देवयन्तः IX. ३.१५. RV. 10.13.2.
प्र वां महि द्यवी अभि XXVI. १४.४. RV. 4.56.5.
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Appendix II 187
प्र वीरया शुचयो दद्रिरे वाम् XXVI. ५.४. RV. 7.90.1.
प्र वो देवायाग्नये XX. २.३. RV. 3.13.1.
XXII. १.१२. RV. 3.13.1.
XXIV. १.१९. RV. 3.13.1.
XXV. २.३०. RV. 3.13.1.
प्र वो यज्ञेषु देवयन्तो अचंन् XXVI. ५.१२. RV. 7.43.1.
प्र शर्धाय मारुताय स्वभानवे XXII. २.१८. RV. 5.54.1.
प्र शुक्रैतु देवी मनीषा XXIII. ३.४. RV. 7.34.1.
प्र सम्राजो असुरस्य प्रशस्तिम् XXIII. ३.१२. RV. 7.6.1.
प्र सोता जीरो अध्वरेष्वस्थात् XXVI. १२.७. RV. 7.92.2.
प्रस्थायेन्द्राग्निभ्यां सोमं वोचतोपो अस्मान् ब्राह्मणान् XXVIII. ५.३०. (ŚŚ. 7.6.3.)
ब्राह्मणा ह्वयध्वम्
प्राचं यज्ञं चकृम XXVI. 11.२. RV. 3.1.2.
प्राणं मे पाहि प्राणं मे जिन्व स्वाहा त्वा सुभव सूर्याय XII. 5.२. (ŚŚ. 6.8.1.)
प्राणो मे प्राणेन दीक्षताम् VII. ६.१६. (ŚŚ. 5.4.1.)
प्राणो मे प्राणेन दीक्षतां स्वाहा VII. ६.५.
प्रातः प्रातःसावस्य XIII. २.३. RVKh. 5.7.4.1.
प्रातर्भक्षु धियावसुर्जगम्यात् XXII. ५.१३. RV. 1.58.9.
प्रातर्यावभिंरा गतम् XXVIII. ६.११. RV. 8.38.7.
प्रातर्यावाणा प्रथमा यजध्वम् VIII. २.१५. RV. 5.77.1.
प्रेतां यज्ञस्य शंभुवा IX. ३.८. RV. 2.41.19.
XXVI. ७.४. RV. 2.41.19.
प्रेदं ब्रह्म वृत्रतूर्येष्वाविथ XXIII. ५.३१. RV. 8.37.1.
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः VIII. ४.९. RV. 1.40.3.
IX. ५.११. RV. 1.40.3.
XX. ५.१८. RV. 1.40.3.
प्रैते वदन्तु प्र वयं वदाम XXIX. १.८. RV. 10.94.1.
बण्महाँ असि सूर्य XXV. ५.७. RV. 8.101.11.
बृहदचं विभावसो XXIV. १.२१. RV. 5.25.7.
बृहदिन्द्राय गायत XXVII. ३.१५. RV. 8.89.1.
बृहद् वदन्ति मदिरेण मन्दिना XXIX. १.११. RV. 10.94.4.
बृहद् वदेम विदथे सुवीराः VIII. २.५. RV. 2.23.19.
बृहद्वयो हि मानवे XXIV. ५.२. RV. 5.16.1.
बृहस्पतिः पुरएता ते अस्तु VII. १२.१३. AV. 7.8.1.
188 Appendix II Appendix II 189
XXVI. ४.१. RV. 6.19.1.
TS. 1.2.3.3. XXV. ६.७. RV. 4.16.4.
बृहस्पतिर्ब्रह्मा VI. ७.११. TS. 2.6.9.3. महि ज्योति रुरुचुर्यद वस्तोः XXIII. ६.७. RV. 4.56.1.
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्तात् VIII. ५.१०. AV. 4.1.1. मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे VIII. १.१३. RV. 1.22.13.
KS. 16.15. मही द्यौः पृथिवी च नः XXVI. ५.३. RV. 1.22.13.
ब्रह्मणा ते ब्रह्मयुजा युनज्मि XXIX. ५.१५. RV. 3.35.4. XXVI. ४.१७. RV. 6.32
? Wait, it looks like ४५. or ४४.? It is .४५. (or .४४.? wait, 5 is ५, 4 is ४: ४५. No, wait, in यो जात एव प्रथमो मनस्वान् XXII: 5.४१. Yo dasam: XXII: 5.४५.? or 5.४२.? Wait, in XXII: 5.४२. or 5.४५.? Ah, it looks like ४५. or ४४.? Wait, line 51 is XXI. 4.१७., line 52 is XXII. 5.४५. Wait, or 5.४२.? It has a loop at top and tail down: in Devanagari, ५ is usually loop at left, top curve. Wait, ४ is ४. What is that digit? It's ४५. or ४२. or ४४.? Actually looks like '४५.').
Line 55: "यो राया वजी" -> वजी or वज्री? It has a small stroke below व: 'वज्री'!
Line 58: "रथस्तिचक्रः" -> 'रथस्त्रिचक्रः' or 'रथस्तिचक्रः'? It's 'रथस्त्रिचक्रः' - wait, look closely: 'रथस्त्रिचक्रः', there is a tri (त्र): 'स्त्रि'. Wait, let's zoom in on line 58:
'र', 'थ', 'स्ति'? There is
Page 192
| Pratīka | Chapter & Section | Citation |
|---|---|---|
| 192 | Appendix II | |
| वाचीन्द्रायाोक्यं देवेभ्यः | XIV. 4.१९. | (ŚŚ. 8.21.3.) |
| वाजयन्तः पुरंध्या | XXIII. 6.२. | RV. 3.62.11. |
| वाजिन्तमाय सह्वासे सुप्रित्य | XXI. 3.३३. | RV. 10.115.6. |
| वातापेहेवनश्रुतः | XXVII. 8.३. | (TA. 3.3.1.) |
| वामं नो अस्त्वर्यमन् वामं वरुण शंस्यम् | XXVI. 9.८. | RV. 8.83.4. |
| वाममद्य सवितर्वाममु श्वः | XXIII. 6.५. | RV. 6.71.6. |
| वायवा याहि दर्शंत | XIV. 6.१८. | RV. 1.2.1. |
| विभ्राड् बृहत् पिबतु सोम्यं मधु | XXV. 4.१. | RV. 10.170.1. |
| वि यत् पवित्रं धिषणा अतन्वत | VIII. 6.१४. | (ŚŚ. 5.9.16.) |
| वि रश्मिभिः ससृजे सूर्यो गाः | XXV. 2.१६. | RV. 7.36.1. |
| विरोकिणः सूर्यस्येव रश्मयः | XXV. 8.११. | RV. 5.55.3. |
| विश्वजिते धनजिते स्वजिते | XXV. 6.९. | RV. 2.21.1. |
| XXVI. 13.३६. | RV. 2.21.1. | |
| विश्वभ्राड् भ्राजो महि सूर्यो दृशे | XXV. 4.१. | RV. 10.170.3. |
| विश्वानरस्य वस्पतिम् | XX. 3.११. | RV. 8.68.4. |
| विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः | IX. 3.१७. | RV. 5.81.2. |
| विश्वाहा त्वा सुमनसः सुचक्षसः | XXV. 4.५. | RV. 10.37.7. |
| विश्वे देवा ऋतावृधः | XXVI. 9.११. | RV. 6.52.10. |
| विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे | XVI. 4.१४. | RV. 6.52.13. |
| विश्वे देवास आ गत | XXVI. 6.१४; 14.१४. | RV. 2.41.13. |
| विश्वे देवास आ गत शृणुता म इमं हवम् | XXIV. 2.१०. | RV. 2.41.13. |
| विश्वेभिः सोम्यं मधु | XIV. 7.२०. | RV. 1.14.10. |
| विश्वो देवस्य नेतुः | XX. 3.२०. | RV. 5.50.1. |
| XXII. 3.२०. | RV. 5.50.1. | |
| वि षू मुञ्चा | XXIX. 1.१२. | RV. 10.94.14. |
| विष्णुर्योनिं कल्पयतु | VIII. 7.१३. | RV. 10.184.1. |
| वि सूर्यो मध्ये अमुचद् रथं दिवः | XXV. 4.३. | RV. 10.138.3. |
| वृषा केतुर्यजतो द्यामशायत | XXII. 4.९. | RV. 10.92.1. |
| वृष्णे शर्धाय | XXII. 4.१०. | RV. 1.64.1. |
| वृष्णे शर्धाय सुमखाय वेधसे | XIX. 6.३८. | RV. 1.64.1. |
| XX. 4.९. | RV. 1.64.1. | |
| वेदिशदे प्रियघामाय सुष्टुते | XXV. 8.१३. | RV. 1.140.1. |
| वैश्वानराय धिषणामृतावृधे | XIX. 6.३४. | RV. 3.2.1. |
Page 193
| Pratīka | Chapter & Section | Citation |
|---|---|---|
| Appendix II | 193 | |
| XX. 6.१७. | RV. 3.2.1. | |
| XXI. 5.१५. | RV. 3.2.1. | |
| XXII. 6.२१. | RV. 3.2.1. | |
| XXV. 8.९. | RV. 3.2.1. | |
| वैश्वानराय पृथुपाजसे विपः | XX. 2.२३. | RV. 3.3.1. |
| XXI. 2.१२. | RV. 3.3.1. | |
| XXII. 2.१५. | RV. 3.3.1. | |
| वैश्वानरो अजीजनत् | XXVI. 9.१४. | (ŚŚ. 10.10.8.) |
| वैश्वानरो न ऊतये | XXVI. 6.१७. | AV. 6.35.1. |
| व्रजं च विष्णुः सखिवां अपोर्णुते | IX. 6.९. | RV. 1.156.4. |
| शतं भूमीरूत स्युः | XXII. 5.२५. | RV. 8.70.5. |
| शं नो भव चक्षसा शं नो अह्ना | XXV. 4.१२. | RV. 10.37.10. |
| शान्तिरसि | VI. 9.१५. | MS. 4.9.27. |
| शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे | XXII. 5.३०. | RV. 7.32.19. |
| शुक्रं ते अन्यद् यजतं ते अन्यत् | VIII. 6.३. | RV. 6.58.1. |
| शृङ्गाणीवेच्छृङ्गिणां सं ददृश्रे | X. 3.२२. | RV. 3.8.10. |
| शोंसामो दैव | XIV. 4.२; ९. | TS. 3.2.9.5. |
| शोंसावो | XIV. 4.१. | (ŚŚ. 7.9.1.) |
| शौशोसामो दैव | XIV. 4.१६. | |
| श्येनो न योनिं सदनं धिया कृतम् | IX. 6.११. | RV. 9.71.6. |
| श्रवद् व इन्द्रः शृणवद् वो अग्निः | XXVIII. 5.२८. | (ŚŚ. 7.6.3.) |
| श्रायन्त इव सूर्यम् | XXV. 5.४. | RV. 8.99.3. |
| श्रुधी हवमिन्द्र मा रिषण्यः | XXIII. 2.४. | RV. 2.11.1. |
| श्रोत्रं मे श्रोत्रेण दीक्षताम् | VII. 6.२०. | (ŚŚ. 5.4.1.) |
| श्रोत्रं मे श्रोत्रेण दीक्षतां स्वाहा | VII. 6.९. | |
| षड्शितिरस्य वङ्कयः | X. 7.१२. | (ŚŚ. 5.17.1.) |
| षण्मासो दक्षिणादित्यः षळुदङ्ङेति सूर्यः | XIX. 2.२०. | |
| सं रश्मिभिस्ततनः सूर्यस्य | XXV. 9.१३. | RV. 7.2.1. |
| संवत्सर इदमद्या व्यख्यत् | XIX. 6.२७. | RV. 1.161.13. |
| संसीदस्व महां असि | VIII. 5.१४. | RV. 1.36.9. |
| सखायः सं वः सम्यञ्चम् | XXI. 4.३. | RV. 5.7.1. |
| सखायो मा रिषण्यत | XXIII. 10.१३. | RV. 8.1.1. |
| सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वीः | XXIV. 7.७. | RV. 6.34.1. |
| सत्रा वृषञ्छठर आ वृषस्व | XVII. 3.३३. | RV. 10.96.13. |
2.2."
Wait, look at the digit for khanda: ६.१४. - wait, is it ६ or ७?
In Devanagari 6 is ६. In line 1 it is ६.१४.
- Line 2:
"संददस्वान् रयिमस्मासु दीदिहि"
"XIX. ६.४३. RV. 2.2.6." (Wait, is it ६.४३ or ७.४३? It is ७.४३: notice the horizontal line at top and hook down? No, look at line 1: ६.१४, line 2: ७.४३, wait, line 1 has an open top with loop to the right (६). Line 2 has a wavy top (७)! Wait, let's look at VII in Line 28: VII. १२.२०. The ७ in line 4: ७.२५. The ७ in line 6: ७.२०. The ७ in line 12: ७.२५. The ७ in line 23: ७.३५. The ७ in line 27: ७.२. The ७ in line 34: ७.७.
Wait, let's compare:
Line 1: XIX. ६.१४. (६ has a loop on the left and goes down to the right).
Line 2: XIX. ७.४३. (Wait, look at the first digit: ७
Appendix III 197
APPENDIX III
ALPHABETICAL INDEX
OF THE REPEATED PASSAGES IN KB
अ
अक्षरभाजो देवताः करोति । XIV. 3. २८; XVIII. 4. २६.
अग्निर्वै मृत्युः । XIII. 3. ४; ९.
अत्वरमाण इव हि प्रतिकाममन्नमद्यान्मति । XV. 4. १५; 5. ३९.
अथ पुरोरुचमथोभे तृचे । XXIV. 2. ३; ४.
अथ बृहद्रथन्तरयोर्योनी शंसति । XXV. 4. ९; 5. १०.
अथ य एनं द्वेष्टि VI. 2. ५; १७; २९; ४१; 3. ९; २१; ३३.
अथ यत् प्रथमजं गां ददाति । IV. 10. १; V. 2. २१.
अथ यत् सप्तदश सामिधेन्यः सद्धन्तावाज्यभागौ विराजौ V. 4. ५; 7. ८; 10. १०.
संयाज्ये तस्योक्तं ब्राह्मणम् ।
[L
Page 198
198 Appendix III
अस्यैव सर्वस्यास्यै । II. २. ३; III. ३. १९; 9. ९; VIII.
२. ४; XVI. 4. ९; XVII. 1. १४;
XIX. २. ३२; XXIII. ३. ३१;
XXVIII. 6. ४.
आ
आ चतुर वै द्वन्द्वं मिथुनं प्रजननं प्रजायत्यै । III. 11. ६; VII. 12. २; XXIX. 3.
२४.
आत्मा वै यजमानस्य पुरोळाशः । XIII. 4. १४; 5. २४.
आत्मा सूक्तं यदन्त रात्मंस्तद्बिभित् । XV. 4. २८; XVI. 4. २९.
आवद् वै प्रथमस्याह्नो रूपम् । XX. २. १२; २५; XXII. 1. १५; १८;
२. १७; XXVI. 6. ८; १२; १५; १९.
आहुतीनां प्रतिष्ठित्यै । XIII. 5. १९; XIV. 3. ३५; XV. 1.
१४; ३४; 4. २३; 6. ३२; XVI. 2.
११; 4. २०; 9. २३; 10. ३७;
XVIII. 4. ३२; 5. १०; XXVIII.
6. १५; 8. २०; XXIX. 2. १४; 8.
२३; XXX. 1. १६; 8. ३१; 9. २६.
इ
इति नु व्यूळ्हे । XXII. 1. ११; ३. ११; 5. १६; XXIII.
4. ११; 6. २६.
इत्याग्निमारुतसूक्तानि । XXV. 8. १५; XXVI. 6. २६; 9. २४;
14. ३६.
इत्येतस्याह्नः सूक्तानि । XXV. 8. १६; XXVI. 6. २७; 9.
२५; 14. ३७.
इन्द्राग्नी वै सर्वे देवाः । XII. 8. २; XVI. 10. २.
इमानेव तल्लोकानाप्नोति । III. 10. ३; IV. 7. १४; 10. १३;
VIII. 10. ५.
उ
उक्तं पदविग्रहणस्य ब्राह्मणम् । XV. २. ९; XVI. 3. ७.
उक्थशा इत्यध्वर्युः । XIV. 4. ५; १२; २०.
उत्तरेण विराजोऽर्धर्चेन वषट्करोति । XIV. 3. ३२; XV. 6. २९.
उपांशु वै रेतः सिच्यते । I. २. २६; III. 11. ९; VIII. 3. ९;
XVI. 5. १६; XIX. 2. ३९; 3. ३०.
Page 199
Appendix III 199
ए
एकस्या वै श्रीः । XVIII. 7. २; XXIX. 5. २०.
एकादशाक्षरा त्रिष्टुप् । X. 3. १०; XXVI. 13. ५२.
एतत्पितृवच्छ्रुतो वै पितरः V. 8. २१; 9. २.
एतद् वा आर्भुकं कर्म यत् प्रजापतिसंमितम् । VIII. 2. १०; १३; X. 9. २१; २४;
XVI. 4. १३.
एतद् वा आर्भुकं कर्म यद् रूपसमृद्धम् । XX. 2. ८; ३. १०; 5. १०; XXI. 1.
१४; 3. १०; 4. १०.
एताभिर्वै देवाः सर्वा अष्टीराप्नुवत । III. 10. २५; IX. 4. ५; XVII. 3.
१३; XIX. 3. १४; XXX. 5. २६.
एतावान् वै संवत्सरो यदेष त्रयोदशो मासः । XIX. 1. २६; XXV. 10. २.
एति वा वै प्रेति वा प्रायणीयरूपम् । XXIII. 3. ५; १९; २६; XXVI.
4. १३.
एषा हि तस्य दिक् प्रज्ञाता । VII. 7. १४; २३; ३०.
ऐ
ऐतीव वा अन्तं गत्वा । XXVI. 10. ८; १९; 12. ५; 14. १८.
ऐन्द्रं हि त्रैष्टुभं माध्यंदिनं सवनम् । XV. 1. ३२; 4. २१; XXIX. 2. ७;
१२.
ऐन्द्रो हि यज्ञक्रतुः । XXVIII. 3. ११; २८; 6. ६.
क
कद्रवच्छृ हि तत् इयात् । XX. 5. २२; ३१; 6. ११; १६; XXI.
4. १५; 5. १२; २१; XXII. 5. २८;
३३; 6. २७; XXIII. 10. ७; २६;
३१; 11. १२; १७; २२; २८; ३६;
XXVI. 10. ९; १४; २०; 12. ६;
११; १७; २३; ३४; ३९; 13. ८;
१४; २५; ३५; ४२; 14. १०; १९;
२८; ३४.
कया शुभा सवयसः सनीळा इति मरुत्वतीयम् । XXV. 3. १; XXVI. 5. १.
कर्तपत्यमेव तज्जीयते प्र वा मीयत इति ह स्माह । XVI. 9. १३; XXV. 13. १३.
को वै प्रजापतिः । XXIV. 4. २०; 5. १३; 8. १०;
XXIX. 4. ६.
क्षत्रं सोमः । VII. 12. २२; X. 8. २०.
[Page 200]
200 Appendix III
क्षत्रयशसस्यावरुद्ध्यै । XII. 10. १२; २३; ३५.
क्षियतीव वा अन्तं गत्वा । XXVI. 12. १६; 14. २७; ३३.
ग
गायत्रं गायत्रतृतीयसवनो ह्येष त्र्यहः । XXVI. 6. २५; 9. १३; २३; 14. २०;
३५.
गायत्रं गायत्रप्रातःसवनो ह्येष त्र्यहः । XXII. 1. १०; 3. १०; 5. १५.
गायत्रं गायत्रमध्यन्दिनो ह्येष त्र्यहः । XXIII. 2. ४८; 5. ४०; 10. ३२.
गायत्रमग्रेऽच्छन्दः । X. 8. १७; XIV. 3. ९; XXVIII.
5. ७.
गायत्रमध्यंदिनो ह्येष त्र्यहः XXIII. 2. १७; 4. ३४; 10. ९.
गायत्रीः शंसति । XV. 2. १०; XVI. 3. ८; XVII. 3. १.
गायत्रो वा अग्निरगायत्रच्छन्दाः । I. 2. २२; III. 2. २७; XIX. 2. ३५.
च
चतुराहावानि शस्त्राणि । XXVIII. 8. १३; XXX. 8. ३०.
चतुर्विंशतिर्वै संवत्सरस्यार्धमासाः । IX. 6. २१; XIX. 5. ८.
चतुष्टयं वा इदं सर्वम् । II. 2. २; III. 3. १८; 9. ८; XIX. 2.
३१; XXVIII. 6. ३.
चतुष्ट्या वै पशवः । XVI. 4. ३; 10. ९; १६; २३; XXVI.
5. २९; XXVIII. 8. १५; XXIX.
8. १४; XXX. 8. ७; २२; 9. १५.
छ
छन्दांसि वै देविकाः । XIX. 4. ६; १०.
ज
जागतं वै तृतीयमहः । XXII. 5. १९; ३९.
जागतो वा एष य एष तपति । XXV. 3. ३१; 6. १३.
जातवद् वै चतुर्थस्याह्नो रूपम् । XXI. 1. १०; १६; १८; 2. ३; ६; ८;
११; १७; १९; २१; XXIII. 2. १५.
ज्योतिरेष य एष तपति । XXV. 2. २८; 8. १९.
त
तं ज्योतिः सन्तं ज्योतिरित्याह । II. 6. २; १३.
ततवद् वै सप्तमस्याह्नो रूपम् । XXVI. 4. ११; 6. २४.
तत् तृतीयस्याह्नो रूपम् । XX. 5. ६; XXII. 6. २०.
[Page 201]
Appendix III 201
तत् प्राजापत्यं रूपम् । XXIII. 7. ४; 9. १०; २४; 11. ६;
XXIX. 7. ९; १२.
तत् संपन्नम् । XXVII. 3. १४; १६; 4. ६; १३.
तत् सर्वेण सर्वमाप्नोति य एवं वेद । XXV. 12. ३; 13. १७.
तथा ह यजमानः सर्वमायुरस्मिंल्लोक एत्याप्नोत्यमृतत्व- XIII. 4. १७; 7. ११; XIV. 5. ५.
मक्षितिं स्वर्गे लोके ।
तथा ह यजमानात् पशवोऽनुत्क्रामुका भवन्ति । II. 4. १७; VIII. 8. २७; XI. 2. २८;
6. १३.
तयो एवैतद् यजमान एताभिरेव सर्वा अष्टीरश्नुते । III. 10. २६; IX. 4. ६; XVII. 3. १४.
तयो एवैतद् यजमाना एताभिरेव सर्वा अष्टीरश्नुवते । XIX. 3. १५; XXX. 5. २७.
तदन्तरिक्षलोकमाप्नोति । XI. 2. ७; XVIII. 2. ४.
तदन्तरूपम् । XXIII. 11. २५; XXVI. 10. ६; ११;
१७; 12. ३; ८; १४; २०; २६; ३१;
13. ५; ११; 14. १६; २५; ३१.
तदमुंल्लोकँमाप्नोति । XI. 2. ९; XVIII. 2. ६.
तदिमंल्लोकमाप्नोति । XI. 2. ५; XVIII. 2. २.
तदुक्थ्यं संतिष्ठते । XXVI. 9. २६; 14. ३८.
तदु ह स्माह कौषीतकिः । II. 9. १; VII. 6. १०; XI. 8. ५;
XXII. 2. १०; XXIII. 8. ८;
XXV. 9. ७; XXVI. 4. १७.
तदेतस्याह्नो रूपम् । XIX. 6. ९; १६; २१; २५; २९; ३३;
३७; ४१; ४५; XXII. 3. १६; १९;
4. ४; 5. १४; XXIII. 1. २१; ३३;
4. ३२; 5. ३९; 6. ३; २४; XXV.
- १४; 2. ८; ११; १४; १७; 3. ४;
२०; 4. २; ८; ११; २०; 5. २;
५; ७; ९; २१; 6. ४; 7. ४; ३२; 8.
२; ४; ८; १०; १२; 9. ६; १४.
तदेनं स्वेन रूपेण समर्धयन्ति । XXV. 1. १७; 3. १२; २६; २९.
तदेनत् स्वेन छन्दसा समर्धयति । XXII. 5. ४०; XXIII. 2. २६; 9.
२०; XXV. 1. २१; 3. ३२; 12. १०.
तदेवैतदशून्यं करोति । VI. 8. ४; ७.
तद् देवस्य सवितुर्वार्थं महदिति सावित्रम् । XXI. 2. १; 5. १; XXII. 4. १.
तद् यथोपप्रयाय स्वर्गस्य लोकस्य नेदीयस्तायां वसेदेवं तत् । VII. 11. ३; VIII. 3. ६; XXIII. 3. ११.
202 Appendix III
तद् यद् देविकाभ्यो हवींषि निर्वपन्ति । XIX. 4. ७; ११.
तद् राथन्तरं रूपम् । XX. 2. १९; २२.
तद् रूपेण कर्म समर्धयति । XX. 2. ७; 3. ९; 5. ९; XXI. 1. १३;
3. ९; 4. ९.
तन्नक्षत्रियां विराजमाप्नोति । V. 4. ७; 7. १०; 10. १२.
तन्वस्य निदानम् । XXII. 1. ३; 3. ३; 5. ३; XXIII. 4. २.
तन्मिथुनं प्रजात्यै रूपम् । XXVI. 4. २२; 7. २७; 12. ४६;
XXVII. 4. २.
तमब्रवीत् कथा माभ्यायच्छसीति VI. 1. १६; 2. १०; २२; ३४; 3. २;
१४; २६; ३८.
तमेवारभ्य स्वस्ति स्वर्गँल्लोकमेति । II. 9. ४; ७.
तमेवैतदुदवसंस्थं कुर्वन्ति । V. 9. १५; २७.
तमेवैतेनानुशंसति । XVI. 3. १३; ३६; 7. १२.
तस्मा अजुहवुः । VII. 7. ९; १७; २६.
तस्मादावन्ति च प्रवन्ति च चतुर्थेऽहन्त्सूक्तानि शस्यन्ते प्राय- XXIII. 3. ६; २७.
णीयरूपेण ।
तस्मादेना आरतं शंसेत् । XV. 4. १४; 5. ३८; XVI. 8. ४.
तस्माद्धीमे प्राणा विष्वञ्चो वान्तो न निर्वान्ति । VII. 10. १०; XVII. 2. १४.
तस्य तदेवान्तरूपं यत् सोदर्कम् । XXIII. 11. ३८; ४०; XXVI. 13. १८.
तस्य तदेवान्तरूपं यद् भूतानुवादि यो दासं वर्णमधरं गुहा- XXI. 4. १७; XXII. 5. ४५.
करिति ।
तस्य नानुवषट्करोति । XVI. 1. १२; 2. ३१.
तस्य मध्ये निविदं दधाति । XV. 4. ३; 5. २७.
तस्या अजुहवुः । VII. 7. ३३; 8. ३.
तस्यां ह्येषां मनांस्योतानि भवन्ति । X. 9. ११; १३.
तस्यैतानि छन्दोरूपाणि । XXII. 1. ४; 3. ४; 5. ४; XXIII. 1.
१४; 4. ४; XXV. 1. ९.
तां पञ्च गायत्र्योऽनुवर्तन्ते । XV. 4. २५; XVI. 4. २२.
ता वा उभय्यस्त्रिष्टुब्जगत्यः शस्यन्ते । XXV. 3. ७; 5. २२.
ता वै चतस्रो भवन्ति । XIX. 2. ३०; XXVIII. 6. २.
तिष्ठतीव वा अन्तं गत्वा । XX. 5. ३०; XXIII. 11. २७;
XXVI. 10. १३; 12. १०; २२;
13. १३.
तेनोत्सृष्टाः XXIII. 7. १७; 8. ३.
Appendix III 203
तौ वै द्विगुणौ भवतः । XXVIII. 7. २; ११.
त्रयस्त्रिंशदक्षरा वै विराट् । XIV. 3. २६; XVIII. 4. २४.
त्रयस्त्रिंशद् देवताः । XIV. 3. २७; XVIII. 4. २५.
त्रयो वा इमे लोकाः । I. 1. २१; III. 10. २; IV. 7. १३; 10.
१२; VIII. 10. ४; १७; XX. 5. २४.
त्रिष्टुब्जगत्योर्ह वा एष आहित आदित्यः प्रतिष्ठितस्तपति । XXV. 3. ८; 5. २३.
त्रैष्टुभ इन्द्रः । III. 2. १२; XXIII. 2. १२.
त्रैष्टुभः प्रउगः । XXVI. 4. ३; 7. १०; 11. १६.
त्रैष्टुभजागते जागतं जगन्मच्छंदिनो ह्येष व्यहः । XXVI. 5. ८; २३; 8. ११; २२; 13.
१९; ४३.
त्रैष्टुभाः पशवः पशूनामेवाप्त्यै । VIII. 2. ७; XXVI. 13. ५३.
द
दशदशिनी विराट् । II. 4. ८; XVII. 3. १६; XIX. 3. २०;
4. २३; XXVI. 8. २८; XXX. 5.
३०.
दैवा वा एते पितरः । V. 8. ५; १८.
द्यावापृथिवीयं शंसति । XVI. 3. १९; XVIII. 2. १६.
द्वादश वै मासाः संवत्सरः । I. 2. ३०; VII. 12. ४०; VIII. 1. ८;
IX. 2. १८; 4. ८; XIII. 7. २८;
XIV. 2. १३; 3. १९; XVI. 10.
१२; XXV. 14. १२.
न
नवैमे प्राणाः । VII. 12. ८; X. 7. २२.
न स य एवं वेद । VI. 2. ७; १९; ३१; ४३; 3. ११; २३;
३५; ४७.
न ह वै ता आहुतयो देवान् गच्छन्ति या अवषट्कृता वास्वा- XII. 5. ४; ८.
हाकृता वा भवन्ति ।
न हि नमस्कारमति देवाः । II. 1. ३३; III. 10. २८; XIII. 1. ५.
नाद्रियेतात्रैव संपन्नम् । XXVII. 3. २; ६; ९.
नास्य प्रजां नास्य पशून् नास्य ब्रुवाणं चन । VI. 2. ४; १६; २८; ४०; 3. ८; २०;
३२; ४४.
नीव वा अन्तं गत्वा नृत्यति । XX. 5. १४; २१; 6. १०; १५; XXI.
4. १४; 5. ११; २०; XXII. 5. २७;
204 Appendix III
३२; 6. २६; XXIII. 10. ६; २५;
३०; 11. ११; १६; २१; ३५;
XXVI. 12. ३८; 13. ३४; ४१;
14. ९.
नेदच्युतं यज्ञस्य प्रियं देवाना मन्तरयामेति । XXIII. 7. १९; 8. ५.
नेदसौ बृहत्येकाकिनीव शस्तासदिति । XXIV. 5. २१; 6. ५; १३.
नेद् यजमानं प्रवृणजानीति । V. 8. १५; 9. २१.
प
पञ्चदशो वै वज्रः । III. 2. १९; VII. 2. ९.
पञ्चपदा पङ्क्तिः । I. 3. ३२; 5. २; III. 9. १२; XIII.
- १४; XVIII. 9. २८; XIX. 4.
१७; XXX. 4. ४.
परमेवैतदहरभिवदति । XXVI. 7. ६; XXX. 9. ३५.
परमेवैतदहरभ्यारभ्य वसन्तीति ह स्माह कौषीतकिः । XXII. 4. १५; XXVI. 7. ७; XXX. - ३६.
पशवो जगती । XVII. 2. ३१; 7. ९; XVIII. 5. ६.
पशवो बृहती । XVII. 2. २३; XXIX. 3. १०.
पशवो वा अग्निष्टुवाः श्रीः पृष्ठ्यानि । XXI. 6. २४; २७.
पशवो वा उक्थानि । XVI. 10. ८; १५; २२; XXVIII. - १४; XXIX. 8. १७; XXX.
- २१; २५; 9. १४.
पशवो वै छन्दोमाः । XXVI. 5. २८; 8. २४; 13. ४५; 14.
४१; XXIX. 8. ९; १३; XXX. - २; ६; १०; १४.
पशवो वै प्रगाथाः । XV. 5. २०; XVIII. 2. ११.
पशुमदिति वा अस्य रूपम् । XXI. 3. १६; १९; २५; २८; ३१;
३४; XXIII. 6. ६; ९; १२; १५;
२१; ३३.
पशूनामेवाप्त्यै । XIII. 1. ११; XV. 5. २१; XVI. 8.
१६; XVIII. 2. १२; XXVI. 8.
२६; 13. ४७; XXIX. 8. ११; १९;
XXX. 8. ४; १२; १६; २७.
पाङ्क्तं हि पञ्चममहः । XXIX. 5. ६; 6. ६; XXX. 2. २१.
पाङ्क्ताः पशवः । XIII. 1. १६; XXVI. 8. २५; 13.
Appendix III 205
४६; XXIX. 8. १०; १८; XXX. - ३; ११; १५; २६.
पाङ्क्तो वै यज्ञो यज्ञस्यैवाप्त्यै । I. 3. ३३; 5. ३; II. 2. ५; III. 9. १३;
XVIII. 9. २९; XIX. 2. २४; २६; - १८; XXX. 4. ५.
पुनः प्रायणीयं हि चतुर्थमहः । XXI. 2. १५; XXIII. 3. ७; २१; २८.
पुनः प्रायणीयं हि सप्तममहः । XXVI. 3. १७; 4. १५.
प्रजापतिर्वै वसिष्ठः । XXV. 2. २१; XXVI. 12. ४१.
प्रजापतिर्विश्वजित् । XXV. 11. ६; 14. १८.
प्रजापतिः स्वरसामानः । XXIV. 4. २१; 5. १४; 8. ११.
प्रतिष्ठानीयं वै छन्दो द्विपदाः प्रतिष्ठित्यैव । XXVII. 4. १९; XXIX. 6. ३.
प्रतिष्ठा परिधानीयान्नं याज्या । XV. 4. २९; XVI. 4. ३०.
प्रतिष्ठा वा एकाहः प्रतिष्ठित्यैव । XXIV. 2. १६; 3. ११; XXV. 11.
९; XXVII. 3. १८; 4. १६;
XXVIII. 8. १८; XXIX. 8. ७;
२१; XXX. 8. २९.
प्रतिष्ठा वा एकाहः प्रतिष्ठा दशममहः । XXVII. 4. ८; १८; XXIX. 6. २.
प्रतिष्ठा वै पङ्क्तिः । XI. 2. ४१; XVII. 3. २९.
प्रतिष्ठा वै पौर्णमासं प्रतिष्ठित्यैव । V. 10. ९; XVIII. 9. ३१.
प्रतिष्ठित्यैव । XVI. 7. ३; XXV. 14. २२.
प्रतिष्ठित्यै । XVI. 10. २०; XXVI. 5. २६.
प्रतिष्ठे वा इन्द्राग्नी प्रतिष्ठित्यैव । III. 8. २; V. 4. ११.
प्रतिष्ठे वै द्यावापृथिवी प्रतिष्ठित्यैव । III. 10. ९; V. 2. २०; VIII. 1. १४;
XVI. 3. २०; XVIII. 2. १७.
प्रथमकर्म ह्येतत् । IV. 10. २; V. 2. २२.
प्रवद् वै प्रथमस्याह्नो रूपम् । XX. 2. १०; १६; २७; २९; XXII. - ९; 2. १९; २१; XXVI. 4. २;
५; 6. ३; ५; २१.
प्राजापत्यं वै षष्ठमहः । XXV. 11. ५; 14. १७.
प्राणमेव तदात्मन् धत्ते । XV. 2. १२; 5. १६; XVI. 3. १०;
१६; XVII. 3. ३.
प्राणा द्विदेवत्याः । XIII. 4. १५; 5. २५.
प्राणानेव तदात्मन् व्यतिषजत्यविव्रहाय । VII. 10. ९; XVII. 2. १३.
प्राणानेव तद् यजमाने दधाति । VII. 12. ९; X. 7. २३.
206 Appendix III
प्राणापानावेव तदात्मन् धत्ते । XVI. 8. १८; XVIII. 2. १४.
प्राणा वा ऋतुयाजाः । XIII. 7. १; १६.
प्राणा वै द्विदेवत्याः । XIII. 5. ४; १५; ३२.
प्राणा वै निविदः । XV. 4. ६; 5. ३०.
प्राणा वै प्रयाजा अपाना अनुयाजाः । VII. 2. १; X. 6. ७.
प्राणोऽपानो व्यान इति तिस्र एकपात्न्यः । XV. 4. २७; XVI. 4. २८.
प्राणो वै गायत्र्यः । XVI. 3. ९; XVII. 3. २.
प्रीत्वैव तद् देवेष्वन्ततोऽर्थं वदते । II. 4. १४; III. 12. २४.
ब
बर्हिष्मन्तमुत्सृजति । XVIII. 7. १५; २६.
बलं वै वीर्यं त्रिष्टुप् । VII. 2. २३; VIII. 2. २९; XI. 2.
१७; XVI. 1. १०; 2. २८; 7. ८;
10. ३४; XVII. 2. २७; 7. ८;
XVIII. 5. ५; 9. १४; XXIX. 4. ११.
बलमेव तद् वीर्यं यजमाने दधाति । VII. 2. २४; VIII. 2. ३०; XVI. 1.
११; 4. १७; 7. ९; XVII. 2. २८;
XVIII. 4. ३०; 9. १५; XXX. 9.
१२; २४.
बार्हताः पशवः पशूनामेवाप्त्यै । XXIII. 4. १९; XXIX. 3. ११.
बार्हतो वा एष य एष तपति । XV. 5. ६; XXV. 3. ११; २८.
ब्रह्मयशसस्यावरुद्धयै । XII. 10. ६; १८.
ब्रह्मा वा अग्निः । IX. 1. १; XII. 10. ५.
ब्रह्म वै गायत्री । III. 6. १६; VII. 12. २१.
ब्रह्म वै बृहस्पतिः । VII. 12. १४; XII. 10. १७; XVIII
2. २१.
ब्रह्म वै ब्रह्मणस्पतिः । VIII. 7. ३; IX.' 5. १२.
म
मद्धती याज्या मद्धद्धि तृतीयसवनम् । XVI. 1. १५; 2. ३५; XVIII. 5. ८.
मद्धत्या मद्धद्धि तृतीयसवनम् । XVI. 4. १८; 9. २१.
मद्धद्धि तृतीयसवनम् । XVI. 3. २२; 8. ३०; 10. ३२.
मध्य एवेदात्मनोऽङ्गं धीयते । XV. 4. ४; 5. २८; XXIII. 2. ३३.
महद्वत् सदर्भ्यारब्धवत् । XXVI. 8. २; १३; १९; २१; 9. १६.
महद्ब्रह्मेतदहः । XXVI. 7. १२; २५; 8. १५; 9. ४; १२.
Appendix III 207
महामेकामाज्याहुतिं जुहुताहमेकां दिशं प्रज्ञास्यामीति । VII. 7. ८; १६; २५; ३२.
मुखं वा एतत् संवत्सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी । IV. 4. ३; V. 1. ३.
य
यज्ञस्यैव तद् बसौ नह्यति स्थेम्नेऽविस्रंसाय । III. 2. २२; IX. 4. ११.
यज्ञो वै विष्णुः । IV. 2. ११; XVIII. 5. २९; 9. २५.
यथा वै सोदर्कमेवं सप्रभृत्यन्तरूपम् । XX. 6. २४; XXI. 5. २४; XXII. 6.
३०; XXVI. 13. २८; ३८.
यदेतद् भूतमिवाभि । XX. 5. ३४; XXI. 4. १८; XXII. 5.
४६; XXVI. 11. ३.
यद् यज्ञेऽभिरूपं तत् समृद्धं यज्ञस्यैव समृद्धयै । I. 2. २८; III. 2. ३०; 11. ११; VII.
12. ३६; VIII. 5. १६; 7. २५; 8.
६; २२; IX. 2. १३; 4. ३; 6. १४;
X. 3. ५; XII. 2. २४; XIX. 2. ४१.
यस्तं तत्र ब्रूयात् । XII. 9. १४; XIII. 7. ३१; ३५;
XXIII. 9. १५; XXV. 9. २३;
XXVII. 1. १४.
युक्तवद् वै प्रथमस्याह्नो रूपम् । XX. 2. १४; XXII. 2. ७; XXVI. 4. ८.
युक्ता इव हीमे प्राणाः । XIII. 5. ७; 7. १९.
ये च संवत्सरे कामाः । XIX. 7. ४; १६; १८.
र
रयिमदिति वा अस्य रूपम् । XXI. 3. १३; XXIII. 4. ८; 5. ३५;
6. ३०.
रात्र्यामेवोभे आहुती जुह्वतीति । II. 8. ७; १४.
रेतःसिक्तिर्वै त्वाष्ट्रः । XIX. 3. २५; २९; ३२.
व
वज्रेणैव तद् यजमानस्य पाप्मानं हन्ति । XI. 1. ८; XV. 5. २६.
वज्रो वै हिंकारः । III. 2. ४; XI. 1. ७.
वाक् प्रातरनुवाकः । XI. 8. १२; 9. ९.
वागनुष्टुप् । V. 8. ११; VII. 10. १३; XI. 2. १३;
XIV. 2. १९; XXVI. 1. ३;
XXVII. 2. ४; 12. ८.
वागेवासी प्रथमानुष्टुप् । XV. 4. २४; XVI. 4. २१.
'. Look at 'ध' in 'समिधेनीरन्वाह' on page 209: 'धे' has that loop. Here it's a 'ध' with i-matra: 'धि'! Wait, why would it be षड्-धि-धः? Wait, could it be ष ड् वि धः? No, look at 'वि': in 'श्रीर्वैराळन्नाद्यम्' / 'विराजो', 'वि' has a rounded belly. Here it is clearly: wait, is it 'ष ड् ढि धः' or 'ष ड् वि धः' or 'ष ड् ङ्गः'? Wait, look at XIII. 3. 13 in Kauṣītaki Brāhmaṇa:
"ṣaḍaṅgo 'yam ātmā ṣaḍdhidhaḥ" or "ṣaḍvidhaḥ"?
KB 13.3 (ed. Lindner, p. 58): "ṣaḷaṅgo hy ayam ātmā ṣaḍdhā vihitaḥ"?
Wait, Lindner: "ṣaḍaṅgo vā ayam ātmā ṣaḍḍhidhaḥ"? In some mss: ṣaḍdhidhaḥ!
Wait, let's look at the print: ष, ळ, ङ्गो, ऽ, य, मा, त्मा [space] ष, ड्, ढि (or वि?), धः ।
Wait
210 Appendix III
सवितृप्रसूततायै । V. 2. ६; VIII. 1. ११; 5. ८; IX. 5. ९.
सवितृप्रसूतस्य ह वै न काचन रिष्टिर्भवत्यरिष्ट्यै । VIII. 1. १२; 5. ९; IX. 5. १०.
स्वर्ग एव तल्लोके यजमानं दधाति । XIV. 3. ३३; XV. 6. ३०; XVIII. 4.
२२.
स्वस्त्ययनमेव तत् कुरुते । III. 2. २; XI. 1. ५.
Note: This page contains the front matter / title pages in the Latin alphabet (German and English with IAST).
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VERZEICHNIS DER ORIENTALISCHEN HANDSCHRIFTEN
IN DEUTSCHLAND
IM EINVERNEHMEN MIT DER DEUTSCHEN
MORGENLÄNDISCHEN GESELLSCHAFT HERAUSGEGEBEN VON
WOLFGANG VOIGT
SUPPLEMENTBAND 9,2
KAUṢĪTAKIBRĀHMAṆA
VYĀKHYĀ OF UDAYA
HERAUSGEGEBEN VON
E. R. SREEKRISHNA SARMA
FRANZ STEINER VERLAG GMBH · WIESBADEN
1976
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KAUṢĪTAKIBRĀHMAṆA
2
VYĀKHYĀ
OF
UDAYA
HERAUSGEGEBEN VON
E. R. SREEKRISHNA SARMA
FRANZ STEINER VERLAG GMBH · WIESBADEN
1976
ADDENDUM AND CORRIGENDA TO VOL. 1 ⟨KB⟩
C in the footnotes stands for the Commentary
on KB by Udaya.
CORRIGENDA
I, 1, २ °मृत्युः
I, 1, footnote 2 सतनूः
I, 5, ६ भवत्या पूर्वा°
VII, 12, २० मयोभुव
VIII, 12, १५ अनन्तर्हितो
XI, 8, २३ श्रेष्ठोऽन्वेतोः
XI, 9, ११ योगमा वेद
XII, 2, १४ यदास्त्वैषी°
XIII, 5, ७ युक्ता
XIX, 2, १३ महाव्रती°
XIX, 3, ८ पुरोळाश°
XXVI, 12, footnote 2-2 ऐतीव (omit वा)
APPENDIX IV
VARIANTS IN THE KB TEXT READINGS
ACCORDING TO UDAYA
Passage | Udaya's reading | Variant mentioned by Udaya
II. 6. १० | हैवास्य हुतं | हैवास्योदितं
II. 6. ११ | रात्र्या उ शीर्षन् | रात्र्या उ द्वि शीर्षन्
III. 2. २२ | बसं |
XII. 1. २ | अपोऽच्छ यन्ति | अपो यच्छान्त
XII. 2. २० | ह्यनु स्तौति | हि यतीः स्तौति
XII. 6. ४ | यथादः | अथादः
XII. 6. १४ | स्वरः साम | स्वरसाम
XVIII. 7. | at the end adds : ते वै षड् |
| भवन्ति । षड् वा ऋतवः । |
| ऋतूनेव तत् प्रीणाति । |
XVIII. 8. ११ | अच्युतो | अच्युता
XVIII. 9. २ | omits वषट्कारेषु | वषट्कारेषु
XVIII. 9. ६ | स्तुतौ | स्थित
XIX. 7. १८ | as printed | adds : षळहो वा उ सर्वः संवत्सर इति वदन्तः
XXIII. 1. १७ | विमदन् | व्यमदन्
XXIII. 6. २७ | इति | अथ
XXIII. 9. २ | संवृञ्जीत | संपृञ्चीत
XXIII. 11. ४-६ | as printed | अतिच्छन्दसं For प्राजापत्यं
XXIII. 11. ३१ | उभये | अभये
XXV. 3. २१ | as printed | adds : महादिवाकीर्त्यमेवैतस्याह्नः पृष्ठं स्यादिति त्वेव स्थितम्
XXV. 4, 5, 6, 7 | See the Commentary text pp. 556 to 562 |
XXV. 8. २२ | संस्थापयिषेयुः | संतिष्ठापयिषेयुः