कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)
Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary
महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा
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178 Appendix II
उप नो हरिमः सुतम् XXIII. १०.२७. RV. 8.93.31.
उपप्रयन्तो अध्वरम् XI. ३.९. RV. 1.74.1.
XXII. १.८. RV. 1.74.1.
उप प्रियं पनिप्रतम् IX. ६.५. RV. 9.67.29.
उपवक्ता जनानाम् XXVIII. ५.१४. RV. 4.9.5.
उप वां जिह्वा घृतमाचरष्यत VII. २.१८. (ŚŚ. 2.4.3.)
उपसद्याय मीळहुषे VIII. ९.१२;२१. RV. 7.15.1.
उपहूता देवा अस्य सोमस्य पवमानस्य विचक्षणस्य मक्ष उप XII. ७.२. (ŚŚ. 6.8.14.)
मां देवा ह्वयन्तामस्य सोमस्य पवमानस्य विचक्षणस्य मक्षे
मनसा त्वा भक्षयामि वाचा त्वा भक्षयामि प्राणेन त्वा
भक्षयामि चक्षुषा त्वा भक्षयामि श्रोत्रेण त्वा भक्षयामि
उभावपापश्व X. ४.१. (ŚŚ. 5.17.10.)
उरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् XXI. ५.१२. RV. 6.19.1.
उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान् XXV. ७.९;३८. RV. 6.47.8.
XXIX. ५.१५. RV. 6.47.8.
उशिजो जग्मुरभि तानि वेदसा XX. २.१८. RV. 3.60.1.
उषासानक्ता बृहती सुपेशसा XXIV. ४.९. RV. 10.36.1.
ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये X. ३.२. RV. 1.36.13.
ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेत् XXV. २.१०. RV. 4.13.2.
ऊर्ध्वो अग्निः सुमतिं वस्वो अश्रेत् XXVI. १२.२९. RV. 7.39.1.
ऊर्ध्वो नः पाहांहसो नि केतुना X. ३.२. RV. 1.36.14.
ऋजुनीती नो वरुणः XXVI. ६.९. RV. 1.90.1.
ऋभुर्विभ्वा वाज इन्द्रो नो अच्छ XXIII. ६.१०. RV. 4.34.1.
एकमेकं सुशस्तिभिः XXVI. १५.७. RV. 1.20.7.
एतायामोप गव्यन्त इन्द्रम् XXI. ३.१४. RV. 1.33.1.
एति प्र होता व्रतमस्य मायया XX. २.२८. RV. 1.144.1.
एदं बर्हिर्न षीदत XXIV. २.११. RV. 2.41.13.
एन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः XXVI. ८.७. RV. 1.52.1.
एन्द्र याहि हरिभिः XXV. ७.२४. RV. 8.34.1.
एन्द्र याह्युप नः परावतः XXIII. १०.१७. RV. 1.130.1.
एमा अगन्न् रेवतीर्जीवधन्याः XII. २.२१. RV. 10.30.14.
एवा वन्दस्व वरुणं बृहन्तं IX. ४.१२. RV. 8.42.2.
एवा हि देवाः XXIII. ५.१७. RVKh. 5.4.10.
एवा हि पूषन् XXIII. ५.१५. RVKh. 5.4.10.
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एवा हीन्द्र XXIII. ५.१३. RVKh. 5.4.10.
एवा ह्यग्न XXIII. ५.१०. RVKh. 5.4.10.
एवा ह्यसि वीरयुः XXIII. ५.२६. RV. 8.92.28.
एवा होवा XXIII. ५.६. RVKh. 5.4.10.
एष प्र पूर्वीरव तस्य चम्रिषः XXV. ७.३. RV. 1.56.1.
ओजः सहः सह ओजः स्वः III. ७.९. (ŚŚ. 1.1.39.)
ओमासश्चर्षणीधृतः XXVI. ६.१३. RV. 1.3.7.
क ईं व्यक्ता नरः सनीळाः XXIII. ३.१५. RV. 7.56.1.
कतम ऊती अभ्या ववर्त्तति XX. २.२१. RV. 10.64.1.
कतरा पूर्वी कतरापरायोः XXIII. ११.१३. RV. 1.185.1.
कथा देवानां कतमस्य यामनि XX. २.२०. RV. 10.64.1.
XXI. ३.२३. RV. 10.64.1.
कद्वित्था नृंः पात्रं देवयताम् XXIV. ४.४. RV. 1.121.1.
कदू न्वस्याकृतम् XXIV. ७.२. RV. 8.66.9.
कद्ध नूनं कद्यप्रियः XXVI. १.१७. RV. 8.7.31.
कन्नव्यो अतसीनाम् XXIV. ५.१८. RV. 8.3.13.
कपूथ्नरः कपूथमुद्घातान XXX. ५.२८. RV. 10.101.12.
कया त्वं न ऊत्या XXVII. ५.१. RV. 8.93.19.
कया नश्चित्र आ भुवत् XXVII. ५.१. RV. 4.31.1.
कया मती कुत एतास एते XXVI. ५.५. RV. 1.165.1.
कया शुभा सवयसः सनीळाः XIX. ४.१. RV. 1.165.1.
XXIV. ५.११. RV. 1.165.1.
XXV. ३.१;
१०.२३. RV. 1.165.1.
XXVI. ५.१. RV. 1.165.1.
कश्छन्दसां योगमा वेद धीरः XI. ९.११. RV. 10.114.9.
का राघदोत्राश्विना वाम् VIII. ७.८. RV. 1.120.1.
किमु श्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन XIX. ४.२६. RV. 1.161.1.
XXI. ५