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सर्वकोश
कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)

कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)

Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary

महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा

DevanagariSanskritpublished119 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

APPENDIX IV
VARIANTS IN THE KB TEXT READINGS
ACCORDING TO UDAYA
Passage | Udaya's reading | Variant mentioned by Udaya
II. 6. १० | हैवास्य हुतं | हैवास्योदितं
II. 6. ११ | रात्र्या उ शीर्षन् | रात्र्या उ द्वि शीर्षन्
III. 2. २२ | बसं |
XII. 1. २ | अपोऽच्छ यन्ति | अपो यच्छान्त
XII. 2. २० | ह्यनु स्तौति | हि यतीः स्तौति
XII. 6. ४ | यथादः | अथादः
XII. 6. १४ | स्वरः साम | स्वरसाम
XVIII. 7. | at the end adds : ते वै षड् |
| भवन्ति । षड् वा ऋतवः । |
| ऋतूनेव तत् प्रीणाति । |
XVIII. 8. ११ | अच्युतो | अच्युता
XVIII. 9. २ | omits वषट्कारेषु | वषट्कारेषु
XVIII. 9. ६ | स्तुतौ | स्थित
XIX. 7. १८ | as printed | adds : षळहो वा उ सर्वः संवत्सर इति वदन्तः
XXIII. 1. १७ | विमदन् | व्यमदन्
XXIII. 6. २७ | इति | अथ
XXIII. 9. २ | संवृञ्जीत | संपृञ्चीत
XXIII. 11. ४-६ | as printed | अतिच्छन्दसं For प्राजापत्यं
XXIII. 11. ३१ | उभये | अभये
XXV. 3. २१ | as printed | adds : महादिवाकीर्त्यमेवैतस्याह्नः पृष्ठं स्यादिति त्वेव स्थितम्
XXV. 4, 5, 6, 7 | See the Commentary text pp. 556 to 562 |
XXV. 8. २२ | संस्थापयिषेयुः | संतिष्ठापयिषेयुः