कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)
Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary
महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा
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186 Appendix II
TS. 1.8.22.1.
प्र ते महे विदथे शंसिषं हरी XXV. ६.१. RV. 10.96.1.
प्रत्यस्मै पिपीषते XXIII. ५.२४. RV. 6.42.1.
XXVIII. ६.१. RV. 6.42.1.
प्रत्येता वामा सूक्तार्यं सुन्वन् यजमानोऽब्रवीत् XIII. ६.१८. (ŚŚ. 7.6.6.)
प्रत्वक्षसः प्रतवसो विरप्शिनः XX. २.२६. RV. 1.87.1.
प्र देवत्रा ब्रह्मणो गातुरेतु XII. १.११. RV. 10.30.1.
प्र देवं देववीतये VIII. १.१८. RV. 6.16.41.
प्र देवं देव्या धिया IX. २.५. RV. 10.176.2.
प्र देव्येतु सूनृता XX. ५.१९. RV. 1.40.3.
प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी ऋतावृधा XX. २.१५. RV. 1.159.1.
XXII. २.१. RV. 1.159.1.
प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिः XXIII. ३.४. RV. 7.53.1.
प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिः XV. २.१९. RV. 1.40.5.
प्र नो राया परीणसा XXI. ३.४. RV. 5.10.1.
प्रबाबधान XXVI. १२.३६. RV. 7.95.1.
प्र बाहूवा सिसृतं जीवसे नः XVIII. ९.२०. RV. 7.62.5.
प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त XXVI. ७.२१. RV. 7.42.1.
प्र बर्हीतुं सदनादृतस्य XXV. २.१५. RV. 7.36.1.
प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये XXX. ६.२०. RV. 1.57.1.
प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचः XXVI. १३.१७. RV. 1.101.1.
प्र यज्यवो मरुतो भ्राजदृष्टयः XXIII. ११.३७. RV. 5.55.1.
XXV. ४.११. RV. 5.55.1.
प्र यद् वसिष्ठमभिषं XXVI. ६.२०. RV. 8.7.1.
प्र यन्तु वाजास्तविषीभिरग्नयः XXIII. ३.१७. RV. 3.26.4.
प्रयाजान् मे अनुयाजाँश्च केवलान् I. ३.१०. RV. 10.51.8.
प्र ये शुष्मन्ते जनयो न समयः XXI. २.१८. RV. 1.85.1.
प्र व इन्द्राय बृहते XXVII. ३.१५. RV. 8.89.3.
प्र वः पान्तं रघमन्यवोऽन्धः XXIV. ४.४. RV. 1.122.1.
प्र वः शुक्राय मानवे भरध्वम् XII. ४.१६. RV. 7.4.1.
XXVI. ५.१. RV. 7.4.1.
प्र वः स्पळक्ऋत्स्रुविताय दावने XXI. ३.२९. RV. 5.59.1.
प्र बां मरन् मानुषा देवयन्तः IX. ३.१५. RV. 10.13.2.
प्र वां महि द्यवी अभि XXVI. १४.४. RV. 4.56.5.
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प्र वीरया शुचयो दद्रिरे वाम् XXVI. ५.४. RV. 7.90.1.
प्र वो देवायाग्नये XX. २.३. RV. 3.13.1.
XXII. १.१२. RV. 3.13.1.
XXIV. १.१९. RV. 3.13.1.
XXV. २.३०. RV. 3.13.1.
प्र वो यज्ञेषु देवयन्तो अचंन् XXVI. ५.१२. RV. 7.43.1.
प्र शर्धाय मारुताय स्वभानवे XXII. २.१८. RV. 5.54.1.
प्र शुक्रैतु देवी मनीषा XXIII. ३.४. RV. 7.34.1.
प्र सम्राजो असुरस्य प्रशस्तिम् XXIII. ३.१२. RV. 7.6.1.
प्र सोता जीरो अध्वरेष्वस्थात् XXVI. १२.७. RV. 7.92.2.
प्रस्थायेन्द्राग्निभ्यां सोमं वोचतोपो अस्मान् ब्राह्मणान् XXVIII. ५.३०. (ŚŚ. 7.6.3.)
ब्राह्मणा ह्वयध्वम्
प्राचं यज्ञं चकृम XXVI. 11.२. RV. 3.1.2.
प्राणं मे पाहि प्राणं मे जिन्व स्वाहा त्वा सुभव सूर्याय XII. 5.२. (ŚŚ. 6.8.1.)
प्राणो मे प्राणेन दीक्षताम् VII. ६.१६. (ŚŚ. 5.4.1.)
प्राणो मे प्राणेन दीक्षतां स्वाहा VII. ६.५.
प्रातः प्रातःसावस्य XIII. २.३. RVKh. 5.7.4.1.
प्रातर्भक्षु धियावसुर्जगम्यात् XXII. ५.१३. RV. 1.58.9.
प्रातर्यावभिंरा गतम् XXVIII. ६.११. RV. 8.38.7.
प्रातर्यावाणा प्रथमा यजध्वम् VIII. २.१५. RV. 5.77.1.
प्रेतां यज्ञस्य शंभुवा IX. ३.८. RV. 2.41.19.
XXVI. ७.४. RV. 2.41.19.
प्रेदं ब्रह्म वृत्रतूर्येष्वाविथ XXIII. ५.३१. RV. 8.37.1.
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः VIII. ४.९. RV. 1.40.3.
IX. ५.११. RV. 1.40.3.
XX. ५.१८. RV. 1.40.3.
प्रैते वदन्तु प्र वयं वदाम XXIX. १.८. RV. 10.94.1.
बण्महाँ असि सूर्य XXV. ५.७. RV. 8.101.11.
बृहदचं विभावसो XXIV. १.२१. RV. 5.25.7.
बृहदिन्द्राय गायत XXVII. ३.१५. RV. 8.89.1.
बृहद् वदन्ति मदिरेण मन्दिना XXIX. १.११. RV. 10.94.4.
बृहद् वदेम विदथे सुवीराः VIII. २.५. RV. 2.23.19.
बृहद्वयो हि मानवे XXIV. ५.२. RV. 5.16.1.
बृहस्पतिः पुरएता ते अस्तु VII. १२.१३. AV. 7.8.1.