कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)

कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)
Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary
महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा
DevanagariSanskritpublished119 पृष्ठ
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| Pratīka | Chapter & Section | Citation |
|---|---|---|
| 192 | Appendix II | |
| वाचीन्द्रायाोक्यं देवेभ्यः | XIV. 4.१९. | (ŚŚ. 8.21.3.) |
| वाजयन्तः पुरंध्या | XXIII. 6.२. | RV. 3.62.11. |
| वाजिन्तमाय सह्वासे सुप्रित्य | XXI. 3.३३. | RV. 10.115.6. |
| वातापेहेवनश्रुतः | XXVII. 8.३. | (TA. 3.3.1.) |
| वामं नो अस्त्वर्यमन् वामं वरुण शंस्यम् | XXVI. 9.८. | RV. 8.83.4. |
| वाममद्य सवितर्वाममु श्वः | XXIII. 6.५. | RV. 6.71.6. |
| वायवा याहि दर्शंत | XIV. 6.१८. | RV. 1.2.1. |
| विभ्राड् बृहत् पिबतु सोम्यं मधु | XXV. 4.१. | RV. 10.170.1. |
| वि यत् पवित्रं धिषणा अतन्वत | VIII. 6.१४. | (ŚŚ. 5.9.16.) |
| वि रश्मिभिः ससृजे सूर्यो गाः | XXV. 2.१६. | RV. 7.36.1. |
| विरोकिणः सूर्यस्येव रश्मयः | XXV. 8.११. | RV. 5.55.3. |
| विश्वजिते धनजिते स्वजिते | XXV. 6.९. | RV. 2.21.1. |
| XXVI. 13.३६. | RV. 2.21.1. | |
| विश्वभ्राड् भ्राजो महि सूर्यो दृशे | XXV. 4.१. | RV. 10.170.3. |
| विश्वानरस्य वस्पतिम् | XX. 3.११. | RV. 8.68.4. |
| विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः | IX. 3.१७. | RV. 5.81.2. |
| विश्वाहा त्वा सुमनसः सुचक्षसः | XXV. 4.५. | RV. 10.37.7. |
| विश्वे देवा ऋतावृधः | XXVI. 9.११. | RV. 6.52.10. |
| विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे | XVI. 4.१४. | RV. 6.52.13. |
| विश्वे देवास आ गत | XXVI. 6.१४; 14.१४. | RV. 2.41.13. |
| विश्वे देवास आ गत शृणुता म इमं हवम् | XXIV. 2.१०. | RV. 2.41.13. |
| विश्वेभिः सोम्यं मधु | XIV. 7.२०. | RV. 1.14.10. |
| विश्वो देवस्य नेतुः | XX. 3.२०. | RV. 5.50.1. |
| XXII. 3.२०. | RV. 5.50.1. | |
| वि षू मुञ्चा | XXIX. 1.१२. | RV. 10.94.14. |
| विष्णुर्योनिं कल्पयतु | VIII. 7.१३. | RV. 10.184.1. |
| वि सूर्यो मध्ये अमुचद् रथं दिवः | XXV. 4.३. | RV. 10.138.3. |
| वृषा केतुर्यजतो द्यामशायत | XXII. 4.९. | RV. 10.92.1. |
| वृष्णे शर्धाय | XXII. 4.१०. | RV. 1.64.1. |
| वृष्णे शर्धाय सुमखाय वेधसे | XIX. 6.३८. | RV. 1.64.1. |
| XX. 4.९. | RV. 1.64.1. | |
| वेदिशदे प्रियघामाय सुष्टुते | XXV. 8.१३. | RV. 1.140.1. |
| वैश्वानराय धिषणामृतावृधे | XIX. 6.३४. | RV. 3.2.1. |
Page 193
| Pratīka | Chapter & Section | Citation |
|---|---|---|
| Appendix II | 193 | |
| XX. 6.१७. | RV. 3.2.1. | |
| XXI. 5.१५. | RV. 3.2.1. | |
| XXII. 6.२१. | RV. 3.2.1. | |
| XXV. 8.९. | RV. 3.2.1. | |
| वैश्वानराय पृथुपाजसे विपः | XX. 2.२३. | RV. 3.3.1. |
| XXI. 2.१२. | RV. 3.3.1. | |
| XXII. 2.१५. | RV. 3.3.1. | |
| वैश्वानरो अजीजनत् | XXVI. 9.१४. | (ŚŚ. 10.10.8.) |
| वैश्वानरो न ऊतये | XXVI. 6.१७. | AV. 6.35.1. |
| व्रजं च विष्णुः सखिवां अपोर्णुते | IX. 6.९. | RV. 1.156.4. |
| शतं भूमीरूत स्युः | XXII. 5.२५. | RV. 8.70.5. |
| शं नो भव चक्षसा शं नो अह्ना | XXV. 4.१२. | RV. 10.37.10. |
| शान्तिरसि | VI. 9.१५. | MS. 4.9.27. |
| शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे | XXII. 5.३०. | RV. 7.32.19. |
| शुक्रं ते अन्यद् यजतं ते अन्यत् | VIII. 6.३. | RV. 6.58.1. |
| शृङ्गाणीवेच्छृङ्गिणां सं ददृश्रे | X. 3.२२. | RV. 3.8.10. |
| शोंसामो दैव | XIV. 4.२; ९. | TS. 3.2.9.5. |
| शोंसावो | XIV. 4.१. | (ŚŚ. 7.9.1.) |
| शौशोसामो दैव | XIV. 4.१६. | |
| श्येनो न योनिं सदनं धिया कृतम् | IX. 6.११. | RV. 9.71.6. |
| श्रवद् व इन्द्रः शृणवद् वो अग्निः | XXVIII. 5.२८. | (ŚŚ. 7.6.3.) |
| श्रायन्त इव सूर्यम् | XXV. 5.४. | RV. 8.99.3. |
| श्रुधी हवमिन्द्र मा रिषण्यः | XXIII. 2.४. | RV. 2.11.1. |
| श्रोत्रं मे श्रोत्रेण दीक्षताम् | VII. 6.२०. | (ŚŚ. 5.4.1.) |
| श्रोत्रं मे श्रोत्रेण दीक्षतां स्वाहा | VII. 6.९. | |
| षड्शितिरस्य वङ्कयः | X. 7.१२. | (ŚŚ. 5.17.1.) |
| षण्मासो दक्षिणादित्यः षळुदङ्ङेति सूर्यः | XIX. 2.२०. | |
| सं रश्मिभिस्ततनः सूर्यस्य | XXV. 9.१३. | RV. 7.2.1. |
| संवत्सर इदमद्या व्यख्यत् | XIX. 6.२७. | RV. 1.161.13. |
| संसीदस्व महां असि | VIII. 5.१४. | RV. 1.36.9. |
| सखायः सं वः सम्यञ्चम् | XXI. 4.३. | RV. 5.7.1. |
| सखायो मा रिषण्यत | XXIII. 10.१३. | RV. 8.1.1. |
| सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वीः | XXIV. 7.७. | RV. 6.34.1. |
| सत्रा वृषञ्छठर आ वृषस्व | XVII. 3.३३. | RV. 10.96.13. |