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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(४६१)

बाजी जोग यज्ञ व्रत पूजा । बाजी देवी देवल दूजा ॥१८॥ बाजी तीरथ व्रत आचारा । बाजी जोग यज्ञ व्योहरा ॥ बाजी जल थल सकल किवाई । बाजीसों बाजी लिपटाई ॥१९॥ बाजीका यह सकल पसारा । बाजी माहिं रहै संसारा ॥ कहैं कवीर सब बाजी माहीं । बाजीगरको चीन्है नाहीं ॥२०॥

अथ बीजककी रमैनी ।

प्रथम रमैनी १ ॥

अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥१॥
ते तिरिये भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिउ अंता ॥२॥
बाखरि एक विधातै कीन्हा । चौदह ठहर पाटि सो लीन्हा ॥३॥
हरि हर ब्रह्मा महंतौ नाऊँ । ते पुनि तीन बसाबल गाऊँ ॥४॥
ते पुनि रचनि खंड ब्रह्मंडा । छा दर्शन छानवे परखंडा ॥५॥
पेटहि काहु न वेद पढ़ाया । सुनति कराय तुरुक नहि आया ॥६॥
नारी मो चित गर्भप्रसूती । स्वांग धरै बहुतै करतूती ॥७॥
तहिया हम तुम एकै लोहू । एकै प्राण वियापल मोहू ॥८॥
एकै जनी जना संसारा । कौन ज्ञानते भयो निनारा ॥९॥
भा बालक भगद्वारे आया । भग भोगेते पुरुष कहाया ॥१०॥
अविगतिकी गति काहु न जानी । एक जीभ कित कहाँ बखानी ॥११॥
जो सुख होइ जीभ दश लाखा । तौ कोइ आय महंतौ भाखा ॥१२॥

सा०-कहहिं कवीर पुकारिकै, ई लेऊ व्यवहार ।

एक रामनाम जाने विना, भव बूडि मुआ संसार ॥१॥

दूसरी रमैनी २ ॥

जीवरूप यक अन्तर बासा । अन्तर ज्योति कीन परगासा ॥१॥
इच्छारूप नारि अवतरी । तासु नाम गायत्री धरी ॥२॥ तेहि नारीके पुत्र तिन भाऊ । ब्रह्मा विष्णु महेश नाऊ ॥३॥ तब ब्रह्मा

१ काई,

(४६२)

कवीरपंथी—

पूँछल महतारी । को तोर पुरुष तू काकरि नारी ॥४॥ तुम हम
हम तुम और न कोई । तुमहिं मोर पुरुष हमहिं तोर जोई ॥२॥

सा०-बाप पूतकी एकै नारी, एकै माय बिआय ।

ऐसा पूत सपूत न देख्यो, बापै चीन्है धाय ॥ २ ॥

तीसरो रमैनी ३ ॥

प्रथम अरंभ कौनके भयऊ । दूसर प्रकट कौन सो ठयऊ ॥१॥

प्रकटे ब्रह्मा विष्णु शिव शक्ती । प्रथमै भक्ति कीन जिव उक्ती ॥२॥

प्रकटे पवन पानी औ छाया । बहु बिस्तारकै प्रकटी माया ॥३॥

प्रकटे अंड पिंड ब्रह्मण्डा । पृथिवी प्रकट कीन नवरंढा ॥४॥

प्रकटे सिध साधक संन्यासी । ये सब लागि रहे अविनासी ॥५॥

प्रकटे सुरनर सुनि सब झारी । तेऊ खोजि परे सब हारी ॥६॥

सा०-जीव सीव प्रकटे सबै, वे ठाकुर सब दास ।

कविर और जाने नहीं, एक रामनामकी आस ॥ ३ ॥

चौथी रमैनी ४॥

प्रथम चरण गुरु कीन बिचारा । करता गावै सिरजनहारा ॥१॥

कहै करिकै जग बौराया । शक्ति भक्ति लै बांधिनि माया ॥२॥

अद्भुत रूप जातिकी वानी । उपजी प्रीति रमैनी ठानी ॥३॥

गुणि अनगुणी अर्थ नहिं आया । बहुतक जने चीन्ह नहिं पाया

॥४॥ जो चीन्है तेहि निर्मल अंगा । अनचीन्है नल भये पतंगा ॥४॥

सा०-चीन्हि चीन्हि कह गावहू, बानी परी न चीन्हि ।

आदि अंत उत्पति प्रलय, सब आपुहि कहि दीन्हि ॥४॥

पांचवी रमैनी ५॥

कहैलौ कहौ जुगनकी बाता । भूले ब्रह्म न चीन्है ज्ञाता ॥१॥

हरिहर ब्रह्माके मन भाई । बिबि अक्षर लै जुगति बनाई ॥२॥

बिबि अच्छरका कीन बैधाना । अनहद शब्द ज्योति परमाना ॥३॥

अच्छर पठि गुनि राह चलाई । सनक सनन्दनके मन भाई ॥४॥

शब्दावली

(४६३)

वेद किताब कीन्ह विस्तारा । फैल गैल मन अगम अपारा ॥५॥
चहुँ जुग भगत बांधल बाटी । समुझि न परी मोटरी फाटी ॥६॥
भैभै पृथ्वी चहुँ दिसि धावै । अस्थिर होय न औषध पावै ॥७॥
होय भिस्त जो चित न डोलावै । खसमहि छोड़ि दोजखको
धावै ॥८॥ पूरुब दिशा हंस गति होई । है समीप सँधि बूझै कोई
॥९॥ भगता भगतिन कीन सिगारा । बूड़ि गयल सब माँझहिं
धारा ॥ ५ ॥

सा०-विन गुरु ज्ञाने दुन्द भो, खसम कही मिलि बात ।
जुग जुग कहवैया कहै, काहु न मानी जात ॥ ५ ॥

छठी रमैनी ६ ॥

वर्णहुँ कौन रूप औ रेखा । दूसर कौन आहि जो देखा ॥१॥
ओ ओंकार आदि नहि बेदा । ताकर कहौ कौन कुल भेदा ॥२॥
नहि तारागण नहि रवि चंदा । नहि कछु होत पिताके बिदा ॥३॥
नहि जल नहि थल नहि थिर पवना । को धरै नाम हुकुम को
बरना ॥ ४ ॥ नहि कछु होत दिवस अरु राती । ताकर कहहु
कौन कुल जाती ॥ ५ ॥

सा०-शून्य सहज मन स्मृतिते, प्रकट भई यक ज्योति ।
बलिहारी ता पुरुष छवि, निरालंब जो होति ॥ ६ ॥

सातवी रमैनी ७ ।

जहिया होत पवन नहि पानी । तहिया सृष्टि कौन उत्पानी
॥ १ ॥ तहिया होत कली नहि फूला । तहिया होत गर्भ नहि
मूला ॥ २ ॥ तहिया होत न विद्या वेदा । तहिया होत शब्द
नहि खेदा ॥ ३ ॥ तहिया होत पिंड नहि बासू । ना धर धरणि
न गगन अकासू ॥ ४ ॥ तहिया होत गुरु नहि चेला । गम्य
अगम्य न पंथ दुहेला ॥ ५ ॥

(४६४)

कवीरपंथी-

सा०-अविगतिकी गति का कहौं, जाके गाँव न ठाँव ।
गुण विहीना पेखना, का कहि लीजै नाँउ ॥ ७ ॥

आठवीं रसनी । (बेदांत विचार) ८ ।

तत्त्व मसी इनके उपदेशा । ई उपनिषद कहै संदेशा ॥ १ ॥
ऊ निश्चय उनके बड़ भारी । वाहिको वर्ण करे अधिकारी ॥२॥
परमतत्त्वका निज परमाना । सनकादिक नारद सुख माना ॥३॥
याज्ञवल्क्य औ जनक संवादा । दत्तात्रय वहे रसस्वादा ॥४॥
वहे वसिष्ठ राम मिलि गाई । वहे कृष्ण ऊधव ससुझाई ॥५॥
वहे बात जो जनक दिढाई । देहै धरे विदेह कहाई ॥ ८ ॥

सा०-कुल अभिमाना खोयकै, जियत सुवा नहि होय ।
देखत जो नहि देखिया, अदृष्ट कहावै सोय ॥ ८ ॥

नवीं रसनी ९ ।

बांधे अष्ट कष्ट नौ सुता । यम बांधे अंजनिके पूता ॥ १ ॥
यमके बाहन बांधिनि जनी । बांधे सृष्टि कहालौं गनी ॥२॥ बांधे
व तेंतीस करोरी । सुमिरत बँदि लोह गौ तोरी ॥३॥ राजा सुमिरैदे
तुरिया चढी । पंथी सुमिरि नाम ले बढी ॥ ४ ॥ अर्थ बिहीना
सुमिरे नारी । परजा सुमिरे पुहुमी झारी ॥ ९ ॥

सा०-बँदि मनाय फल पावहीं, बँदि दिया सो देव ।

कह कवीर ते ऊबरे, निसि दिन नामहि लेव ॥ ९ ॥

रसनी दशवीं १० ।

राही ले पिपराही बही । करगी आवत काहु न कही ॥ आई
करगी भो अजगूता । जन्म जन्म जम पहिरे बूता ॥ बूता पहिर
जम करे पयाना । तीन लोकमें कीन्ह समाना ॥ बांधेउ ब्रह्मा
विष्णु महेश्वर । सुर नर सुनि औ बांध गणेश्वर ॥ बांधे पवन
पावक औ नीरू । चन्द्र सूर बांधे दोउ बीरू ॥ सांच मंत्र बांधे
सब झारी । अमृत वस्तु न जाने नारी ॥

शब्दावली

(४६५)

सा०-अमृत वस्तु जाने नहीं, मगन भये कित लोय ।
कहहि कवीर कामो नहीं, जीवहिं मरण न होय ॥११॥

रत्नो ग्यारहवीं ११ ।

आंधरी गुष्ठि सृष्टि भई बौरी । तीन लोक महाँ लागि ठगौरी ॥
ब्रह्महिं ठग्यो नाग संहारी । देवन सहित ठग्यो त्रिपुरारी ॥ राज
ठगौरी विष्णुहिं परी । चौदह भुवन केर चौधरी ॥ आदि अन्त
जेहि काहु न जानी । ताको डर तुम काहेक मानी ॥ ऊ उतंग
तुम जाति पतंगा । यम घर किहेउ जीवको संगा ॥ नीम कीट
जस नीम पियारा । विषको अमृत (मान) कहत गवारा ॥ विषके
संग कौन गुण होई । किंचित लाभ मूल गौ खोई ॥ विष अमृत
गौ एकै सानी । जिन जाना तिन विष के मानी ॥ कंहा भये नर
सुय बेसुद्धा । बिन परचय जग बूढ़ न बुद्धा ॥ मतिके हीन
कौन गुण कहई । लालच लागे आशा रहई ॥

सा०-भुवा है मरी जाहुगे, भुये कि बाजी ढोल ।

स्वप्न सनेही जग भया, सहिदानी रहिगो बोल ॥ ११ ॥

रत्नो नारहवीं १२ ।

माटिक कोट पषानक ताला । सोई बन सोई रखवाला ॥ सो
बन देखत जीव डेराना । ब्राह्मण वैष्णव एक करि जाना ॥ (जोरी)
ज्यों किसान किसानी करई । उपजे खेत बीज नहिं परई ॥
छाड़ि देहु नर झोलिक झेला । बूड़े दोऊ गुरु औ चेला ॥ तीसर
बूड़े पारथभाई । जिन बन दाहे दवा लगाई ॥ भूंकि भूंकि कूकर
मरि गयऊ । काज न एक सियारसे भयऊ ॥

साखी-मूस विलारी एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।

अचरज यक देखो हो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥१२॥

१ कहां भये नल स्रक्ष बेस्रक्ष । बिन परिचय जग मूढ न बूझा ॥

(४६६)

कवीरपंथी—

रमनी तेरहवीं १३ ॥

नहिं परतीति जो यह संसारा । द्रव्यक चोट कठिन को मारा ॥
सो तो शेषै जाय लुकाई । काहूके परतीति न आई ॥ चले लोग
सब मूल गँवाई । यमकी बाढ़ि काटि नहिं जाई ॥ आजु काज
जिय काल्हि अकाजा । चले लादि दिरगंतर राजा ॥ सहज
बिचारत मूल गँवाई । लाभ ते हानि होय रे भाई ॥ ओछी मती
चन्द्र गो अथई । त्रिकुटी संगम स्वामी बसई ॥ तबहीं विष्णु
कहा समुझाई । मैथुन अष्ट तुम जीतहु जाई ॥ तब सनकादिक
तत्त्व बिचारा । जैसे रंक धन पाव अपारा ॥ भौ मय्यादि बहुत
सुख लाग। यहि लेखे सब संशय भागा ॥ देखत उत्पति लागु
न बारा । एक मरे यक करै विचारा ॥ सुये गयेकी काहु न कही ।
झूठी आश लागि जग रही ॥

सा०-जरत जरतसे बाचहू, काहे न करहु गोहार ।

विष विष्याकै खायहू, राति दिवस मिलि झारि ॥ १३ ॥

रमनी चौदहवीं १४ ।

बड सो पापी आहि गुमानी । पाखण्ड रूप छल्यो नर जानी ॥
बावन रूप छल्यो वलि राजा । ब्राह्मण कीन्ह कौनको काजा ॥
ब्राह्मणही सब कीन्हो चोरी । ब्राह्मणही को लागी खोरी ॥ ब्राह्मण
कीन्हो वेद ( ग्रन्थ ) पुराना । कैसेहु कै मोहि मानुष जाना ॥
यकसे ब्रह्महि पंथ चलाया । यकसे हंस गोपालहिं गाया ॥ यकसे
शम्भू पंथ चलाया । यकसे भूत प्रेत मन लाया ॥ यकसे पूजा
जैन विचारा । एकसे निहुरि निमाज गुजारा ॥ कोइ काहुको
हटा न माना । झूठा खसम कविर न जाना ॥ तन मन भजि रहू
मोरे भगता । सत्य कवीर सत्य है वक्ता ॥ आपुहि देव आपुही
पाती । आपुहि कुल आपुहि है जाती ॥ सर्व भूत संसार निवासी ।

शब्दावली

(४६७)

आपुहि खसम आप सुखरासो ॥ कहते मोहि भयल युगचारी ।
काके आगे कहौं पुकारी ॥

सा०-सांचे कोइ न मानई, झूठेके संग जाय ।

झूठे झूठा मिलि रहा, अहमक खेहा खाय ॥ १४ ॥

रमैनी फन्तहवीं १५ ॥

उनई बदरिया परिगौ सँझा । अगुवा भूले बन खंड मंझा ॥
पिय अन्ते धन अन्ते रहई । चौपरि कामरि माथे गहई ॥

सा०-कुलवा भार न ले सकै, कहै सखिनसों रोऽ ।

ज्यों २ भौजै कामरी, त्यों २ भारी होइ ॥ १५ ॥

रमैनी सोलहवीं १६ ॥

चलत चलत अति चरण पिराने । हारि परे तहँ अति खिसि-
याने ॥ गण गन्धर्व मुनि अन्त न पाया । हरि अलोप जग
धन्धे लाया ॥ गहनी बन्धन बंध न सूझा । थाकि परे तहँ कछुन
न बूझा ॥ भूलि परे तब अधिक डेराई । रजनी अंध कूप है जाई ॥
माया मोह उहां भर भूरी । दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥ वरवै
तपै अखंडित धारा । रौने भयावनि कछु न अधारा ॥

सा०-सबै लोग जहँ डाइया, अन्धा सबै भुलान ।

कहा कोइ नहि मानही, (सब) एकै माहि समान ॥ १६ ॥

रमैनी सत्रहवीं १७ ॥

जस जीव आपु मिलै अस कोई । बहुत धर्म सुख हृदया
होई ॥ जासुं बात रामकी कही । प्रीति न काहुसों निर्वही ॥
एकै भाव सकल जग देखी । बाहर परे सो होय विवेखी ॥ विषय
मोहके फंद छोड़ाई । जहां जाय तहँ काटु कसाई ॥ है कसाई
छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ मानुष बड़े बड़े है आये ।
एकै पंडित सबै पढाये ॥ पढ़ना पढ़उ धरहु जनि गोई । नहिं तो
निश्चय जाहु विगोई ॥

(४६८)

कवीरपंथी—

सा०—सुमिरन करहु रामको, छाडहु दुखकी आस ।
तर ऊपर धरि चापि है, जस कोल्हू कोटि पचास ॥१७॥

रमैनी मठारहवीं १८ ॥

अद्वुत पंथ बरणि नहिं जाई । भूले राम भूली दुनिआई ॥
जो चेतहु तो चेतु रे भाई । नहिं तो जीव यमै ले जाई ॥ शब्द
न माने कथै विज्ञाना । ताते यम दीन्हों है थाना ॥ संशय सावज
बसै शरीरा । ते खायल अनवेधल हीरा ॥

सा०—संशय सावज शरीरमें, संगहि खेले जुहारि ।
ऐसा घायल बापुरा, जीवन मारे झारि ॥१८॥

रमैनी उन्नीसवीं १९ ॥

अनहद अनुभवकी करि आशा । देखो यह बिपरीति तमाशा ॥
इहै तमाशा देखहु भाई । जहाँ है शुन्य तहाँ चलि जाई ॥ शुन्यहि
बाँछा शुन्यहिं गयऊ । हाथा छोड़ि बे हाथा भयऊ ॥ संशय
सावज सब संसारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥

सा०—सुमिरण करहु रामको, काल गहे है केश ।
ना जानों कब मारिहै, क्या घर क्या परदेश ॥१९॥

रमैनी बीसवीं २० ॥

अब कहु राम नाम अविनासी । हरि तजि जियरा कतहु न
जासी ॥ जहाँ जाहु तहैं होहु पतंगा । अब जनि जरहु समुझि
बिष संग ॥ राम नाम लौलाय सो लीन्हा । भुङ्गी कीट समुझि मन
दीन्हा ॥ भौ अति गुरुवा दुख के भारी । करु जिय जतन सो
देखु विचारी ॥ मनकी बात है लहरि विकारा । तोहि नहिं सूझे
वार न पारा ॥

सा०—इच्छाके भव सागरे, वोहित राम अधार ।
कहैं कवीर हरि शरण गहु, गो बछ सुर विस्तार ॥२०॥

रमैनी इक्कीसवीं २१ ॥

(७५२)

बहुत दुखै है दुखकी खानी । तब बचिहौ जब रामहि जानी ॥
रामहि जान युक्ति जो चलई । युक्तिहिं ते फंदा नहिं परई ॥
युक्तिहि युक्ति चलत संसारा । निश्चै कहा न मानु हमारा ॥
कनक कामिनी घोर पटोरा । संपति बहुत रहै दिन थोरा ॥
थोरी संपति गौ बौराई । धर्म रामकी खबरि न पाई ॥ देखि त्रास
सुख गौ कुम्हिलाई । अमृत धोखे गो विष खाई ॥

सा०- मैं सिरजों मैं मारहुं, मैं जारी मैं खाँव ।

जल थल मैही रमि रहौं, मोर निरंजन नाँव ॥ २१ ॥

रमैनी बाईसवीं २२ ॥

अलख निरंजन लखै न कोई । जेहि बंधे बंधा सब लोई ॥
जेहि झूठे सब बाँधु अयाना । झूठी बात साँचकै माना ॥ धंधा
बंधा कीन व्यवहारा । कर्म विर्वर्जत बसे निनारा ॥ षट आश्रम
षट दर्शन कीन्हा । षटरस वस्तु खोट सब चीन्हा ॥ चारि वृक्ष
छौ शाख बखाने । विद्या अगणित गने न जाने ॥ औरो आगम
करे बिचारा । तेहि नहिं सुझे वार न पारा ॥ जप तीरथ व्रत
कीजै पूजा । दान पुण्य कीजै बहु दूजा ॥

सा०-मन्दिर तो है नेहका, मत कोइ पैठे धाय ।

जो कोइ पैठे धायके, बिन शिर सेती जाय ॥ २२ ॥

रमैनी तेईसवीं २३ ॥

अरुप सुख दुख आदिहु अंता । मन भुलान मैगर मैं मंता ॥
सुख विसराय मुक्ति कहैं पावै । परिहरि साँच झूठ निज धावै ॥
अनल ज्योति डाहे यक संगा । नयन नेह जस जरे पतंगा ॥
करहु विचार जेहि दुख जाई । परि हरि झूठा केर सगाई ॥
लालच लागे जन्म सिराई । जग मरन नियरायल आई ॥

१ जप तीरथ पूजे व्रत भूता । दान औ पुण्य किये बहूता ॥

(४७०)

कबीररंथी-

सा०-भरमकी बांधा ई जगत, यहि विधि आवे जाय ।
मानुष जन्महिं पाय नर, काहेको जहँडाय ॥२३॥

रमैनी चौबीसवीं २४ ॥

चन्द चकोर अस बात जनाई । मानुष बुद्धि दीन पलटाई ॥
चारि अवस्था सपना कहई । झूठो फुरे जानत रहई ॥ मिथ्या
बात न जाने कोई । यही विधि सिगरे गैल विगोई ॥ आगे दैदै
सबन गँवाया । मानुष बुद्धि न स्वपनेहु पाया ॥ चौतिस अक्षर
सो निकले जोई । पाप पुण्य जानेगा सोई ॥

सा०-सोइ कहंते सोइ होहुगे, निकरि न बाहर आव ।
हो हजूर ठाढे कहौं, कयों धोखे जन्म गवाव ॥२४॥

रमैनी पचीसवीं २५ ॥

चौतिस अक्षरका यही विशेषा । सहसरो नाम यहीमें देखा ॥
भूलि भटक नर फिर घट आयो । होय अजान सो सभन गँवायो ॥
खोजहिं ब्रह्मा विष्णु शिव शक्ती । अनंत लोक खोजहिं शिव
भगती ॥ खोजहिं गण गंधर्व सुनि देवा । अनंत लोक खोजहिं
बहु भेवा ॥

सा०-यती सती सब खोजहीं, मनै न मानै हार ।
बड़े बड़े बीर बाँचे नहीं, कहहिं कवीर पुकार ॥२५॥

रमैनी छब्बीसवीं ॥ २६ ॥

आपुहि कर्तारा भय करतारा । ( कुलाला ) बहु विधि वासन
गढे कुम्हारा ॥ विधिना सबै कीन यक ठाऊँ । अनेक यतनके
बनक बनाऊँ ॥ जठर अग्नि मह दिये प्रजाली । तामहँ आपु भये
प्रतिपाली ॥ बहुत यतनके बाहर आया । तब शिवशक्ती नाम
घराया ॥ घरका सुत जो होय अयाना । ताके संग न जाहि
सयाना ॥ साँची बात कहौं मैं अपनी । भया दिवाना औरकी
सपनी ॥ गुप्त प्रगट है एके सुदरा । काको कहिये ब्राह्मण सुदरा ॥
झूठे गर्व भूलौ मति कोई । हिन्दू तुरुक झूठ कुल दोई ॥

शब्दावली

(४७१)

सा०-जिन्ह यह चित्र बनाइया, साँचा सो सूत्रधार ।
कह कवीर ते जन भले, चित्रवंतहि लेहि विचार ॥ २६ ॥

रमनी सताईसवीं २७ ॥

ब्रह्माको दीन्हो ब्रह्मण्डा । सात द्वीप पुहुमी नौ खण्डा ॥ सत्य
सत्य कहि विष्णु दृढाई । तीन लोक मई राखिनि जाई ॥ लिंग
रूप तब शंकर कीन्हहा । धरती कील रसातल दीन्हहा ॥ तब अष्टंगी
रची कुमारी । तीन लोक मोहा सब झारी ॥ दुतिया नाम पार्वती
भयऊ । तप करता शंकरको दयऊ ॥ एकै पुरुष एक है नारी ।
ताते रचनि खानि भौ चारी ॥ शर्मन वर्मन देवो दासा ।
रज सत तम गुण धरणि अकाशा ॥ २७ ॥

सा०-एक अण्ड ओंकार ते, सब जग भयो पसार ।

कहहि कवीर सब नारिरामकी, अविचल पुरुष भतार ॥ २७ ॥

रमनी अठ्ठाईसवीं २८ ॥

अस जोलहाका मर्म न जाना । जिन जग आइ पसारल ताना ॥
धरति अकाश दोऊ गाड बनाई । चंद्र सूर दुइ नरा भराई ॥
सहस तार लै पूरिन पूरी । अजहू विनय कठिन है दूरी ॥ कहहि
कवीर करम सों जोरी । सूत कुसूत बिने भल कोरी ॥ २८ ॥

रमनी उन्तौसवीं २९ ॥

वज्रहुते त्रिन छनमें होई । त्रिने वज्र करै पुनि सोई ॥ निझरू
नरू जानि परिहरई । कर्मक बांधा लालच करई ॥ कर्म धर्म बुद्धि
मति परिहरिया । झूठा नाम साँचलै धरिया ॥ रजगति त्रिविधि
कीन्ह परगासा । कर्म धर्म बुधिकेर विनाशा ॥ रविके उदय तारा
भौ छीना । चर बेहर दोनोमें लीना ॥ विषके खाये विष नहिं
जावै । गारुड सो जो मरत जिआवै ॥

सा०-अलख जो लागी पलकमें, पलकहिमें ढसि जाय ।

विषहर मंत्र न मानई, गारुड काह कराय ॥ २९ ॥

(४७२)

कवीरपंथी—

रमैनी तीसवीं ॥ ३० ॥

औ भूले षष्ठ दरशन भाई । पाखण्ड भेष रहा लपटाई ॥
जीव शीवका आयन सोना । चांरिउ वेद चतुर्गुण मौना ॥
जैनी धर्मक मर्म न जाना । पाती तोरि देव घर आना ॥
दवना मरूआ चम्पा फूला । मानो जीव कोटि समतूला ॥
औ पृथ्वीको रोम उचारे । देखत जन्म आपनो हारे ॥
मनमथ बिंदु करे असरारा । कलपे बिन्दु खसैं नहिं द्वारा ॥
ताका हाल होय अघकूचा । छौ दरसनमें जैन विगूचा ॥

सा०—ज्ञान अमर पद बाहिरे, नियरे ते है दूरि ।
जो जाने तेहि निकट है, रह्यो सकल घट पूरि ॥३०॥

रमैनी इकतीसवीं ३१ ॥

सुम्रिति आहि गुणनको चीन्हा । पाप पुण्यको मारग लीन्हा ॥
सुम्रिति वेद पढै असरारा । पाखण्ड रूप करै हंकारा ॥
पढै वेद ओ करै बड़ाई । संशय गांठि अजहुं नहिं जाई ॥
पढिकै शास्त्र जीव बध करई । मूढ़ि काटि अगमनकै धरई ॥

सा०—कहहि कवीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ।

अनुभव भाव न दर्शई, जियत न आपु लखाय ॥३१॥

रमैनी बत्तीसवीं ॥ ३२ ॥

अंध सो दर्पण वेद पुराना । दरबी कहा महारस जाना ॥
जस खर चंदन लादे भारा । परिमल बास न जानु गँवारा ॥
कहहि कवीर खोजै अस्माना । सो न मिला जो जाय अभिमाना ॥३२॥

रमैनी तैतीसवीं ॥ ३३ ॥

वेदकी पुत्री स्मृति भाई । सो जेवरि करि लेतै आई ॥
आपुहि बरी आपु गर बन्धा । झूठी मोह कालको धंधा ॥
बंधवत बंधा छोरि नहिं जाई । विषय स्वरूप भूलि दुनियाई ॥
हमरे लखत

१ चारोबद्ध चतुर्गुण मौना ।

शब्दावली

(४७३)

सकल जग लूटा । दास कवीर राम कहि छूटा ॥

सा०-रामहि राम पुकारते, जिभ्या परिगौ रौम ।

मुधाजल पीवे नहीं, खोद पियनकी होस ॥ ३३ ॥

रमैनी चौतीसवीं ३४ ॥

पढि पढि पंडित करहु चतुराई । निज सुक्तिहि मोहि कहु
समुझाई ॥ कहां बसे पुरुष कवन सो गाऊँ । सो मोहि पण्डित
सुनावहु नाऊँ ॥ चारि वेद ब्रह्मे निज ठाना । सुक्तिक मर्म उन्हीं
नहि जाना ॥ दान पुत्र उन बहुत बखाना । अपने मरनकी
खबरि न जाना ॥ एक नाम है अगम गँभीरा । तहवाँ अस्थिर
दास कवीरा ॥

सा०-चिउटी जहां न चढि सके, राई नहि ठहराय ।

आवागमनकी गम नहीं, तहँ सकलो जग जाय ॥ ३४ ॥

रमैनी पैंतीसवीं ३५ ॥

पंडित भूले पढि गुणि वेदा । आपु अपनपौ जानु न भेदा ॥
संध्या तर्पण औ षट कर्मा । ई बहु रूप करहि अस धर्मा ॥
गायत्री युग चारि पढाई । पूछहु जाय सुक्ति किन पाई ॥ औरके
छुये लेतहौ सींचा । तुमते कहहु कौन है नीचा ॥ ई गुण गर्व करो
अधिकाई । अतिके गर्ब न होय भलाई ॥ जासु नाम है गर्व
प्रहारी । सो कस गर्वहि सके संहारी ॥

सा०-कुल मर्यादा खोइकै, खोजिनि पद निर्वान ।

अंकुर बीज नशाइकै, भये विदेही थान ॥ ३६ ॥

रमैनी छत्तीसवीं ३६ ॥

ज्ञानी चतुर विचच्छण लोई । एक स्यान स्यान न होई ॥
दूसर स्यानको मर्म न जाना । उत्पति परलय रैनि विहाना ॥
बानिज एक सबन मिलि ठाना । नेम धर्म संजम भगवाना ॥
हरि अस ठाकुर तज्यो न जाई । बालन भिस्ति गांव दुलहाई ॥

( ४७४ )

कवीरपंथी-

सा०-ते नर मरिके कहाँ गये, जिन दिन्हा गुर घोटि ।
राम नाम निज जानिकै, छाडहु बस्तू खोटि ॥३६॥

रमनी संतोषवी ३७ ॥

एक सयान सयान न होई । दूसर स्यान न जाने कोई ॥
तीसर सयान सयाने खाई । चौथ सयान तहाँ ले जाई ॥
पँचये सयान न जाने कोई । छठये महाँ सब गये विगोई ॥
सतये सयान जो जानहु भाई । लोक वेदमें देहु देखाई ॥

सा०-बीजक बतावै बितको, जो बित गुता होय ।
शब्द बतावै जीवको, बूझे विरला होय ॥३७॥

रमनी अदतीसवी ३८ ॥

यहि विधि कहाँ कहा नहि माना । मार्ग मांहि पसारिनि
ताना ॥ राति दिवस मिलि जोरिनि तागा । ओटत कातत भर्म
न भागा ॥ भर्म सब घट रह्यो समाई । भर्म छाडि कतहुँ नहिं
जाई ॥ परै न पूरि दिनौ दिन छीना । तहाँ जाय जहाँ अंग
विहीना ॥ जो मति आदि अन्त चलि आया । सो मति उन
सब प्रगट सुनाया ॥

सा०-वहै संदेश फुर मानिकै, लीन्हो सीस चढाय ।
संतो है संतोष सुख, रहहु हृदय जुडाय ॥३८॥

रमनी उत्तालीसवी ३९ ॥

जिन्ह कलमां कलि माह पढाया । कुदरत खोज तिन्हुँ नहिं
पाया ॥ करमत कर्म करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥
करमत सो जो गर्भ औतरिया । करंमत सो निमाज गुजरिया ॥
करमत सुन्नति और जनेऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥

सा०-पानी पवन संजोयकै, राचयाई उत्पात ।
शून्यहि सुरति समानिया, कासों कहिये जात ॥३९॥

१ करमत सो जो नामहि धरिया ।

शब्दावली

(४७५)

रमैनी चालीसवीं ४० ॥

आदम आदि सुद्धि नहिं पाईं । मामा हउआ कहांते आईं ॥
तब नहिं होते तुरुक औ हिन्दू । मायाके रुधिर पिताके बिन्दू ॥
तब नहिं होते गाय कसाई । तब विस मिल्लाः किन फरमाईं ॥
तब नहिं रह्यो कुल औ जाती । दोजरव भिस्त कहां उतपाती ॥
मन मसलेकी खबरि न जाने । मति मुलान दोइ दीन बखाने ॥

सा०-संयोगेका गुण रवे, विन योगे गुण जाय ।

जिभ्या स्वादके कारणे, कीन्हे बहुत उपाय ॥ ४० ॥

रमैनी इकतालीसवीं ४१ ॥

अम्की रासि ससुद्रकी खाई । रवि मसि कोटि तैंतीसौ भाई ॥
भैवर जालमें आसन माडा । चाहत सुख दुख संग न छाडा ॥
दुखको मर्म काहु नहिं पाया । बहुत भांतिके जग भर्माया ॥
( बौराया ) ॥ आपुहि बाउर आपु सयाना । हृदय बसत राम
नहिं जाना ॥

सा०-तेई हरि तेइ ठाकुरा, तेई हरिके दास ।

न जम भया न जामनी, भामिनी चली निरास ॥ ४१ ॥

रमैनी बयालीसवीं ४२ ॥

जब हम रहल रहा नहिं कोई । हमरे माँहिं रहल सब कोई ॥
कहहु हो राम कौन तोरि सेवा । सो ससुझाय कहौ मोहि देवा ॥
फुर फुर कहउँ मारु सब कोई । झूठेहि झूठा संगति होई ॥
आंधर कहे सबै हम देखा । तहें दिठियार बैठि सुख पेखा ॥
यहि विधि कहौ मालु जो कोई । जस सुख तस जो हृदया होई ॥
कहहि कवीर हंस मुसकाई । हँमरे कहल दुष्ट बहु भाई ॥ ४२ ॥

रमैनी तैंतालसीवीं ॥ ४३ ॥

जिन्ह जिव कीन्ह आपु विश्वासा । नरक गये ते नरकहिं बासा ॥
आवत जात न लागहि बारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥

१ मुस्ताई । २ हमरे कहल छुठिही भाई ।

( ४७६ )

कवीरपंथी—

चौदह विद्या पढि समुझावै । अपने मरनकी खबर न पावै ॥ जाने
जिवको परा अंदेसा । झूठहि आनिकै कहा संदेसा ॥ संगति
छोडि करै अस रागा । उब है मोट नरक कर भारा ॥ ४३ ॥

सा०—गुरु द्रोही औ मन सुखी, नारि पुरुष विचार ।

ते नर चौरासी अप्रि है, जौलौ शशि दिनकार ॥ ४३ ॥

रमैनी चौवालीसवी ॥ ४४ ॥

कबहुँ न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥
बहुरि न पैहौ ऐसो थाना । साधु संग तुम नहिं पहिचाना ॥ अब
तोर होइ नरकमें बासा । निस्त्र दिन बसे लबारके पास ॥ ४४ ॥

सा०—जात सबन कहैं देखिया, कहहिं कवीर पुकार ।

चेतवाहोहु तो चेतिले, दिवस परत है धार ॥ ४४ ॥

रमैनी पैतालीसवी ॥ ४५ ॥

हिरण्यकुश रावण गौ कंसा । कृष्ण गये सुर नर मुनि बंसा ॥
ब्रह्मा गये मरम नहिं जाना । बड सब गये जो रहे सयाना ॥
समुझि परी नहिं राम कहानी । निरबक दूध कि सरबक पानी ॥
रहिगौ पंथ थकित भौ पवना । दशो दिशा उजारि भौ गवना ॥
मीन जाल भौ इ संसारा । लोहकि नाव पषानको भारा ॥ खेवे
सबै मरम नहिं जाना । तहिबो कहै रहै उतराना ॥ ४५ ॥

सा०—मछरी मुख जस केंचुवा, मुखवन मुँह गिरदान ।

सर्पन मुँह गहेजुवा, जात सबनको जान ॥ ४५ ॥

रमैनी छयालीसवी ॥ ४६ ॥

विनसै नाग गरुड गलि जाई । विनसै कपटी औ सतभाई ॥
विनसे पाप पुण्य जिन्ह कीन्हा । विनसे गुन निर्गुन जिन चीन्हा ॥
विनसे अग्नि पवन औ पानी । विनसे सूछि कहाँ लौ गानी ॥ विष्णु
लोक विनसे छन माहीं । हौ देखा परलैकी छाँही ॥ ४६ ॥

सा०—मछ रूप माया भई, यमरा खेलै अहेर ।

इहिर ब्रह्म न उबरे, सर नर मुनि केहि केर ॥ ४६ ॥

शब्दावली

(४७७)

रमैनी संतालीसर्वो ॥ ४७ ॥

जरासिंधु शिशुपाल संहारा । सहस्राञ्जै छल सो मारा ॥
बड छल रावन सो गौ वीती । लंका रही कंचनकी भीती ॥ दुयोंधन
अभिमानहिं गयऊ । पांडव केर मरम नहिं पयऊ ॥ मायाके
दम्भ गैल सब राजा । उत्तम मध्यम बाजन बाजा ॥ छौ चकवे
सब धरनि समाना । एको जीव परतीति न माना ॥ कहाँ लौ
कहौ अचेते गयऊ । चेत अचेत झगर एक भयऊ ॥ ४७ ॥

सा०-ई माया जग मोहिनी, मोहिंसि सब जग धाय ।

हरिचंद्र सतके कारने, घर घर गये बिकाय ॥४७॥

रमैनी अडतालीसर्वो ॥ ४८ ॥

मानिक पुरहि कवीर बसेरी । महति सुनी शेख तक्रि केरी ॥
ऊजे सुनी जमन पुर धामा । झूसी सुनी पिरनको नामा ॥ इकइस
पीर लिखै तेहि ठामा । खतमा पढै पैगम्बर नामा ॥ सुनी बोल
मोहि रहा न जाई । देखि सुकरवा रहे भुलाई ॥ हवीव औ
नबीको कामा । जहांलों अमल सो सबै हरामा ॥ ४८ ॥

सा०-शेख अकरदी शेख सकरदी, मानो बचन हमार ।

आदि अन्त औ जुगहि जुग देखहु दृष्टि पसार ॥४८॥

रमैनी उन्चासर्वो ॥ ४९ ॥

दूरकी बात कहौ दवैसा । बादसाह है कौने भेसा ॥ कहाँ कूच
कहां करे सुकामा । कौन सुरतिको करो सलामा ॥ मैं तोहि पूछों
सुसलमाना । लाल जूद की नाना बाना ॥ काजी काज करो
तुम कैसा । घर घर जवह करावौ भैसा ॥ बकरी मुर्गी किन
फुरमाया । किसके कहे तुम छूरी चलाया ॥ दर्द न जानै पीर
कहावै । बैता पठि पठि जग भर्मावै ॥ कह कवीर यक सय्यद
कहावै । आप सरीखा जग कबुलावै ॥ ४९ ॥

सा०-दिनभर रोजा रहत है, रात हनत है गाय ।

यह खून वह बन्दगी, क्यों कर खुशी खोदाय ॥ ४९ ॥

(४७८)

कबीरपंथी—

रमैनी पद्मासवी ५० ॥

कह इत मोहिं भयल जुग चारी । समझत नाहीं मोहि सुत नारी ॥ बंस आग लगी बंसै जरिया । अम भुलाय नर धंघे परि्या ॥ हस्तीके फन्दे हस्ती रहई । मृगीके फन्दे मृगा परई ॥ लोहै लोह काटु जस आना । तियाके तत्व तिया पहिचाना ॥५०॥

सा०—नारि रचंते पुरुष है, पुरुष रचंते नारि ।

पुरुषहि पुरुषा जो रचे, ते बिरले संसार ॥ ५० ॥

रमैनी इत्यावनवी ॥ ५१ ॥

जाकर नाम अकहुआ भाई । ताकर कहा रमैनी गाई ॥ कहैको तातपर्य है ऐसा । जस पंथी वोहित चढि वैसा ॥ है कछु रहनि गहनिकी बाता । बैठा रहै चला पुनि जाता ॥ रहै बदन नहिं स्वांग सुभाऊ । मन अस्थिर नहिं बीलै काऊ ॥ ५१ ॥

सा०—तन रहते मन जात है, मन रहते तन जाय ।

तन मन एकै है रहै, हंस कवीर कहाय ॥ ५१ ॥

रमैनी वावनवी ५२ ॥

जेहि कारन शिव अजहुँ वियोगी । अंग बिभूति लायभै जोगी ॥ सेष सहस मुख पार न पावै । सो अब खसम सहित समुझावै ॥ ऐसी विधि जो मो कहँ धावै । छठयें मास दरस जो पावै ॥ कौनेहु भांति दिखाई देऊँ । गुप्तहि रहौं सुभाव सब लेऊँ ॥५२॥

सा०—कहहिं कवीर पुकारिके, सबका उहै हवाल ।

कहा हमार मानै नहीं, किमि छूटै भ्रमजाल ॥ ५२ ॥

रमैनी तिरपनवी ५३ ॥

महादेव मुनि अन्त न पाया । उमा सहित उन जन्म गंवाया ॥ उनहुते सिद्ध साधक होई । मन निश्चै कहु कैसे कोई ॥ जब लग तनयै आहै सोई । तब लग चेत न देखो कोई ॥ तब चेतिहो जब तजिहो प्राना । भया अन्त तब मन पछताना ॥ इतना सुनत निकट चलि आई । मनके विकार न छूटे भाई ॥

१ उनसे सिद्ध साधक नहिं कोई । मन निश्चय कहु कैसे होई ।

शब्दावली

(४७९)

सा०-तीनलोक मुआ कौआयके, छुटि न काहुकी आस ।
यक अंधरे जग खाइया, सब जग भया विनास ॥५३॥

रमनी चौवनवी ५४ ॥

मरिगो ब्रह्मा काशीके वासी । शिव सहित मुये अविनाशी ॥
मथुरा मरिगो कृष्ण गुवारा । मरि मरि गये दसो अवतारा ॥ मरि
मरि गये भगति जिन ठानी । सर्गुण मां जिन दुर्गुण आनी ॥

सा०-नाथ मछंदर बांचे नहीं, गोरखदत्त औ व्यास ।

कहहि कवीर पुकारिके, परे कालके फांस ॥५४॥

रमनी पचपनवी ५५ ॥

गये राम औ गये लछमना । संग न गई सीता असधना ॥
जात कौरवन लागु न वारा । गये भोज जिन्ह साजल धारा ॥
गये पांडव कुंतीसी रानी । गये सहदेव जिन्ह बुद्धि मति ठानी ॥
सर्व सोनकी लंक बनाई (उठाई) । चलत बार कछु संग न लाई ॥
कुरिया जासु अंतरिक्ष छाई । सो हरिश्चन्द्र देखि नहीं जाई ॥
मूरख मानुष अधिक सँजोवै । अपने सुवल और लगि रोवै ॥
ई न जाने अपनो मरि जैवे । टकादश विठै और ले खेवै ॥

सा०-अपनी अपनी करिगये, लगी न काहुकी साथ ।

अपनी करिगये रावणा, अपनी दशरथ नाथ ॥५५॥

रमनी छप्पनवी ५६ ॥

दिन दिन जै जरलके पाऊ । गाड़े जाइ न उमगे काऊ ॥
कंध न देई मसखरी करई । करहु धौँ कौनि भांति निस्तरई ॥
अकरम करै करमको धावै । पठि गुनि वेद जगत समुझावै ॥ छूछे
परे अकारथ जाई । कहैं कवीर चित चेतहु भाई ॥ ५६ ॥

रमनी सत्तावनवी ५७ ॥

कृतियासूत्र लोक यक अहई । लाख पचासकी आगे कहई ॥

१-तीन लोक मो आइके, छूटी न काहुकी आश ।

यक अंधार जग खाइया, सब जग भया निराश ॥

(४८०)

कबीरपंथी—

विद्या वेद पढे पुनि सोई । बचन कहत परतच्छे होई ॥ पहुँची
बात विद्याकी वेता । वाहुके भर्म भयो संकेता ॥

सा०—खग खोजनको तुम परे, पीछे अगम अपार ।

बिन परचे किमि जानिहौ, झूठा है हंकार ॥६७॥

रमैनी अदृष्टावनी ५८ ॥

तै सुत मानु हमारी सेवा । तो कहैं राज देऊँ हो देवा ॥ अगम
द्विगम गढ देहैं छुड़ाई । ओरो बात सुनहु कहु आई ॥ उत्पति
परलै देउँ दिखाई । करहु राज सुख बिलसहु जाई ॥ एको बार
होइहै बाँको । बहुरि जन्म न होइहै ताको ॥ जाय पाप हुइहैं
सुख घाना । निश्चय बचन कबीरको माना ॥

सा०—साधु संत तेइ जना जिन, माना बचन हमार ।

आदि अंत उत्पति प्रलय, देखहु दृष्टि पसार ॥६८॥

रमैनी उनसठवी ५९ ॥

चढ़त चढावत भंडहर फोरी । मन नहिं जनिको करि चोरी ॥
चोर एक मूसल संसारा । विरला जाने कोइ बूझन हारा ॥
स्वर्ग पताल भूमि लै बारी । एके राम सकल रखवारी ॥

सा०—पाहन है है सब गये, अन भितियनके चित्त ।

जासो किये भिताइया, सो धन भया न हित्त ॥६९॥

रमैनी साठवी ७० ॥

छाड़हु पति छाड़हु लबराई । मन अभिमान टूटि तब जाई ॥
जिनहले चोरि जो भिच्छा खाई । सो विरवा पलुहावन जाई ॥
पुनि संपति औ पतिको धावै । सो विरवा संसार लै आवै ॥

सा०—झूठ झूठ कै डारहु, मिथ्या यह संसार ।

तेहि कारण मैं कहत हौं, जाते होय उबार ॥ ६० ॥

१ पंटी बात विद्याकी पंदा ।