कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
रमनी तेरहवीं १३ ॥
नहिं परतीति जो यह संसारा । द्रव्यक चोट कठिन को मारा ॥
सो तो शेषै जाय लुकाई । काहूके परतीति न आई ॥ चले लोग
सब मूल गँवाई । यमकी बाढ़ि काटि नहिं जाई ॥ आजु काज
जिय काल्हि अकाजा । चले लादि दिरगंतर राजा ॥ सहज
बिचारत मूल गँवाई । लाभ ते हानि होय रे भाई ॥ ओछी मती
चन्द्र गो अथई । त्रिकुटी संगम स्वामी बसई ॥ तबहीं विष्णु
कहा समुझाई । मैथुन अष्ट तुम जीतहु जाई ॥ तब सनकादिक
तत्त्व बिचारा । जैसे रंक धन पाव अपारा ॥ भौ मय्यादि बहुत
सुख लाग। यहि लेखे सब संशय भागा ॥ देखत उत्पति लागु
न बारा । एक मरे यक करै विचारा ॥ सुये गयेकी काहु न कही ।
झूठी आश लागि जग रही ॥
सा०-जरत जरतसे बाचहू, काहे न करहु गोहार ।
विष विष्याकै खायहू, राति दिवस मिलि झारि ॥ १३ ॥
रमनी चौदहवीं १४ ।
बड सो पापी आहि गुमानी । पाखण्ड रूप छल्यो नर जानी ॥
बावन रूप छल्यो वलि राजा । ब्राह्मण कीन्ह कौनको काजा ॥
ब्राह्मणही सब कीन्हो चोरी । ब्राह्मणही को लागी खोरी ॥ ब्राह्मण
कीन्हो वेद ( ग्रन्थ ) पुराना । कैसेहु कै मोहि मानुष जाना ॥
यकसे ब्रह्महि पंथ चलाया । यकसे हंस गोपालहिं गाया ॥ यकसे
शम्भू पंथ चलाया । यकसे भूत प्रेत मन लाया ॥ यकसे पूजा
जैन विचारा । एकसे निहुरि निमाज गुजारा ॥ कोइ काहुको
हटा न माना । झूठा खसम कविर न जाना ॥ तन मन भजि रहू
मोरे भगता । सत्य कवीर सत्य है वक्ता ॥ आपुहि देव आपुही
पाती । आपुहि कुल आपुहि है जाती ॥ सर्व भूत संसार निवासी ।