कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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बाजी जोग यज्ञ व्रत पूजा । बाजी देवी देवल दूजा ॥१८॥ बाजी तीरथ व्रत आचारा । बाजी जोग यज्ञ व्योहरा ॥ बाजी जल थल सकल किवाई । बाजीसों बाजी लिपटाई ॥१९॥ बाजीका यह सकल पसारा । बाजी माहिं रहै संसारा ॥ कहैं कवीर सब बाजी माहीं । बाजीगरको चीन्है नाहीं ॥२०॥
अथ बीजककी रमैनी ।
प्रथम रमैनी १ ॥
अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥१॥
ते तिरिये भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिउ अंता ॥२॥
बाखरि एक विधातै कीन्हा । चौदह ठहर पाटि सो लीन्हा ॥३॥
हरि हर ब्रह्मा महंतौ नाऊँ । ते पुनि तीन बसाबल गाऊँ ॥४॥
ते पुनि रचनि खंड ब्रह्मंडा । छा दर्शन छानवे परखंडा ॥५॥
पेटहि काहु न वेद पढ़ाया । सुनति कराय तुरुक नहि आया ॥६॥
नारी मो चित गर्भप्रसूती । स्वांग धरै बहुतै करतूती ॥७॥
तहिया हम तुम एकै लोहू । एकै प्राण वियापल मोहू ॥८॥
एकै जनी जना संसारा । कौन ज्ञानते भयो निनारा ॥९॥
भा बालक भगद्वारे आया । भग भोगेते पुरुष कहाया ॥१०॥
अविगतिकी गति काहु न जानी । एक जीभ कित कहाँ बखानी ॥११॥
जो सुख होइ जीभ दश लाखा । तौ कोइ आय महंतौ भाखा ॥१२॥
सा०-कहहिं कवीर पुकारिकै, ई लेऊ व्यवहार ।
एक रामनाम जाने विना, भव बूडि मुआ संसार ॥१॥
दूसरी रमैनी २ ॥
जीवरूप यक अन्तर बासा । अन्तर ज्योति कीन परगासा ॥१॥
इच्छारूप नारि अवतरी । तासु नाम गायत्री धरी ॥२॥ तेहि नारीके पुत्र तिन भाऊ । ब्रह्मा विष्णु महेश नाऊ ॥३॥ तब ब्रह्मा
१ काई,