सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 481

शब्दावली

(४६७)

आपुहि खसम आप सुखरासो ॥ कहते मोहि भयल युगचारी ।
काके आगे कहौं पुकारी ॥

सा०-सांचे कोइ न मानई, झूठेके संग जाय ।

झूठे झूठा मिलि रहा, अहमक खेहा खाय ॥ १४ ॥

रमैनी फन्तहवीं १५ ॥

उनई बदरिया परिगौ सँझा । अगुवा भूले बन खंड मंझा ॥
पिय अन्ते धन अन्ते रहई । चौपरि कामरि माथे गहई ॥

सा०-कुलवा भार न ले सकै, कहै सखिनसों रोऽ ।

ज्यों २ भौजै कामरी, त्यों २ भारी होइ ॥ १५ ॥

रमैनी सोलहवीं १६ ॥

चलत चलत अति चरण पिराने । हारि परे तहँ अति खिसि-
याने ॥ गण गन्धर्व मुनि अन्त न पाया । हरि अलोप जग
धन्धे लाया ॥ गहनी बन्धन बंध न सूझा । थाकि परे तहँ कछुन
न बूझा ॥ भूलि परे तब अधिक डेराई । रजनी अंध कूप है जाई ॥
माया मोह उहां भर भूरी । दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥ वरवै
तपै अखंडित धारा । रौने भयावनि कछु न अधारा ॥

सा०-सबै लोग जहँ डाइया, अन्धा सबै भुलान ।

कहा कोइ नहि मानही, (सब) एकै माहि समान ॥ १६ ॥

रमैनी सत्रहवीं १७ ॥

जस जीव आपु मिलै अस कोई । बहुत धर्म सुख हृदया
होई ॥ जासुं बात रामकी कही । प्रीति न काहुसों निर्वही ॥
एकै भाव सकल जग देखी । बाहर परे सो होय विवेखी ॥ विषय
मोहके फंद छोड़ाई । जहां जाय तहँ काटु कसाई ॥ है कसाई
छूरी हाथा । कैसेहु आवै काटों माथा ॥ मानुष बड़े बड़े है आये ।
एकै पंडित सबै पढाये ॥ पढ़ना पढ़उ धरहु जनि गोई । नहिं तो
निश्चय जाहु विगोई ॥