कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 477, कुल 968 में से
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वेद किताब कीन्ह विस्तारा । फैल गैल मन अगम अपारा ॥५॥
चहुँ जुग भगत बांधल बाटी । समुझि न परी मोटरी फाटी ॥६॥
भैभै पृथ्वी चहुँ दिसि धावै । अस्थिर होय न औषध पावै ॥७॥
होय भिस्त जो चित न डोलावै । खसमहि छोड़ि दोजखको
धावै ॥८॥ पूरुब दिशा हंस गति होई । है समीप सँधि बूझै कोई
॥९॥ भगता भगतिन कीन सिगारा । बूड़ि गयल सब माँझहिं
धारा ॥ ५ ॥
सा०-विन गुरु ज्ञाने दुन्द भो, खसम कही मिलि बात ।
जुग जुग कहवैया कहै, काहु न मानी जात ॥ ५ ॥
छठी रमैनी ६ ॥
वर्णहुँ कौन रूप औ रेखा । दूसर कौन आहि जो देखा ॥१॥
ओ ओंकार आदि नहि बेदा । ताकर कहौ कौन कुल भेदा ॥२॥
नहि तारागण नहि रवि चंदा । नहि कछु होत पिताके बिदा ॥३॥
नहि जल नहि थल नहि थिर पवना । को धरै नाम हुकुम को
बरना ॥ ४ ॥ नहि कछु होत दिवस अरु राती । ताकर कहहु
कौन कुल जाती ॥ ५ ॥
सा०-शून्य सहज मन स्मृतिते, प्रकट भई यक ज्योति ।
बलिहारी ता पुरुष छवि, निरालंब जो होति ॥ ६ ॥
सातवी रमैनी ७ ।
जहिया होत पवन नहि पानी । तहिया सृष्टि कौन उत्पानी
॥ १ ॥ तहिया होत कली नहि फूला । तहिया होत गर्भ नहि
मूला ॥ २ ॥ तहिया होत न विद्या वेदा । तहिया होत शब्द
नहि खेदा ॥ ३ ॥ तहिया होत पिंड नहि बासू । ना धर धरणि
न गगन अकासू ॥ ४ ॥ तहिया होत गुरु नहि चेला । गम्य
अगम्य न पंथ दुहेला ॥ ५ ॥