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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(४६८)

कवीरपंथी—

सा०—सुमिरन करहु रामको, छाडहु दुखकी आस ।
तर ऊपर धरि चापि है, जस कोल्हू कोटि पचास ॥१७॥

रमैनी मठारहवीं १८ ॥

अद्वुत पंथ बरणि नहिं जाई । भूले राम भूली दुनिआई ॥
जो चेतहु तो चेतु रे भाई । नहिं तो जीव यमै ले जाई ॥ शब्द
न माने कथै विज्ञाना । ताते यम दीन्हों है थाना ॥ संशय सावज
बसै शरीरा । ते खायल अनवेधल हीरा ॥

सा०—संशय सावज शरीरमें, संगहि खेले जुहारि ।
ऐसा घायल बापुरा, जीवन मारे झारि ॥१८॥

रमैनी उन्नीसवीं १९ ॥

अनहद अनुभवकी करि आशा । देखो यह बिपरीति तमाशा ॥
इहै तमाशा देखहु भाई । जहाँ है शुन्य तहाँ चलि जाई ॥ शुन्यहि
बाँछा शुन्यहिं गयऊ । हाथा छोड़ि बे हाथा भयऊ ॥ संशय
सावज सब संसारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥

सा०—सुमिरण करहु रामको, काल गहे है केश ।
ना जानों कब मारिहै, क्या घर क्या परदेश ॥१९॥

रमैनी बीसवीं २० ॥

अब कहु राम नाम अविनासी । हरि तजि जियरा कतहु न
जासी ॥ जहाँ जाहु तहैं होहु पतंगा । अब जनि जरहु समुझि
बिष संग ॥ राम नाम लौलाय सो लीन्हा । भुङ्गी कीट समुझि मन
दीन्हा ॥ भौ अति गुरुवा दुख के भारी । करु जिय जतन सो
देखु विचारी ॥ मनकी बात है लहरि विकारा । तोहि नहिं सूझे
वार न पारा ॥

सा०—इच्छाके भव सागरे, वोहित राम अधार ।
कहैं कवीर हरि शरण गहु, गो बछ सुर विस्तार ॥२०॥