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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(४३५)

किसीके साथ किसी अवस्थामें भी छल कपटका वर्ताव नहीं करता । २ शीतलता-अर्थात् सदा शान्त अकोध रहता है । ३ समता-धारण करता है अर्थात् सब जीवोंके सुख दुःखोंको अपने आत्माके समानही समझकर उनसे समानता वरतता है । ४ सुखदाई-सबके लिये सुखदाई होता है अर्थात् कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिससे किसीको दुःख होवे ।

७ सहज परीक्षा ४.

निह प्रपंच निहतरंग रु, निर्द्भन्द निरलेप ।
चारौ लक्षण सहजके, मिटे सकल विशेष ॥ ७ ॥

भावार्थ-सहजयोग अर्थात् सहज वृत्तिको धारण करनेवालोंमें चार गुण स्वभावसेही वास करते हैं । १ निष्प्रपंचता-सहज वृत्तिवाला पुरुष प्रपंचमें कभी नहीं फँसता-जहाँ कहीं प्रपंचकी वृद्धि देखता है आप वहाँसे खसक जाता है । २ निहतरङ्ग-नाना प्रकारके मनके तरङ्गोंसे अपनेको बचा रखता है । ३ निर्द्भन्द-द्रन्दसे अलग रहता है । ४ निलैप-सदा सबमें रहते हुए भी निलैप-रहता है ।

“सब संग रसिये सब संग बसिये सबका लीजे नाम ।
हाँजी हाँजी सबकी कीजे. रहिये अपने ठाम ॥”

८ शून्य ।

लव धीरज अरु ध्यान जो, मिली समाधि है चार ।
ये लक्षण हैं शून्यके, किये संत प्रचार ॥ ८ ॥

भावार्थ-शून्य अथवा समाधिवानके ४ लक्षण हैं । १ लव-एक ओर वृत्ति लगी रहै. २ धीर्य-जिस काममें लगे दृढ होकर लगे. ३-ध्यान-जिधर वृत्ति जाय उधरही तन्मय हो जावे. ४-समाधि-ध्येय वस्तुमें ऐसा निमग्न हो जाना कि, जुदाई जान न पड़े ॥

(४३६)

कवीरपंथी-

समौ-ये बत्तिस जब ऊगहीं, तैतीसो छिप जाय ।
कहै कवीर सुनु गोरखा, आवा गमन नसाय ॥

इति अष्टाङ्ग योगकी रमनी ॥

रमनी--करीमकी हिकमत ॥

वाह करीम वलि हिकमत तेरी । खाक एक सूरत बहुतेरी ॥
औघे बासन नीर जमाया । जतन जतन करि नूर उपाया ॥ १ ॥
आप मनीका सकल पसारा । हिन्दू तुरुक कोई नहि न्यारा ॥
दम दम करि बोले सब कोई । दमके भीतर हरदम होई ॥ २ ॥
बाहर दमको लखै जो कोई । ताको आवा-गमन न होई ॥ दम
लखिया जिन लखिया नामा । दम छूटा पाये निज ठामा ॥ ३ ॥
पीर पैगम्बर शेख मुलाना । तुम्हरी सिफत सुनि भै दिवाना ॥ कहै
कवीर वह साहब न्यारा । यार वाः यार वाः यार हमारा ॥ ४ ॥

रमनी--काया मसजिद ॥

यार वा यार वा यार हमारा । सब जीवनका प्रान अधारा ॥
काया मसजिद अजब सँवारी । दोय खम्भा दस लगी किवारी
॥ १ ॥ ता भीतर होय बंग निमाजा । हरदम इरदम हरदम साजा ॥
एक मसजिद दसो दरवाजा । मन मुछा तहैं पठै निमाजा ॥ २ ॥
ज्ञान करद मौन दिल पकरी । बिस्मिल कीन्हो पांचो बकरी ॥
पांच चोर करै कुफराना । मारी सबदसूँ किया छिमाना ॥ ३ ॥
पांच पीर बसे इक थाना । शब्द अनाहद घुरै निशाना ॥ कहैं
कवीर अजब कछु देखा । नूर नाम सत साहब पेखा ॥ ४ ॥

रमनी--मन ॥

मनकी मूठ लखै जो कोई । सो जन संत पारखी होई ॥ नगन
मगन बकला कंद खाई । देखि दिसा मनको पतियाई ॥ १ ॥
बहु विधि बकता चतुर परवाना । अलप अहारी काया खीना ॥
बहु बुधिमान प्रेम हित रोवै । रंचक चाह रसातल बोवै ॥ २ ॥

शब्दावली

(४३७)

ताके फंद परे जो कोई । रंचक सुख दुख बहुते होई ॥ कहै कवीर सोई निज दासा । जाको पारबल्लकी आसा ॥ ३ ॥

साखी-जो तू चाहे मुड़झको, मति कछु राखे आस ।
मुड़झ सरीखा होय रहो, सब कुछ तेरे पास ॥

रमैनी-मन राजा ॥

मन राजा संग पवन वजीरा । चित चंचल निश्चल नहि थीरा ॥
पांच मवासो त्रिगुण खाई । पांच पचीस जिनके संग भाई ॥
तैंतीसो मिलि द्रन्द्र मचावैं । मन राजाको नाच नचावैं ॥ ज्ञान
सूरमा बीडा लीन्हा । तैंतीसों पर डेरा दीन्हा ॥२॥ पांच मवासी
मिलिया आई । मन राजा पर फिरी दुहाई ॥ जोग जुगतका
लशकर साजा । गगन दमामा निरभय बाजा ॥ ३ ॥ झलकत
चन्दा जोति अपारा । मिटिगा तिमिर भया उजियारा ॥ गुरु
परताप सकल बस हूआ । नहीं कोइ जूझा नहि कोइ मूआ ॥४॥
आप आपमें सबही जाना । जिन जाना तिन निजके माना ॥
कहैं कवीर या पद को बूझे । आपा मिटे तबही घर सूझे ॥५॥

साखी-ऐसी बानी बोलिये, मनका आपा खोय ।
या आपाको डार दे, दया करै सब कोय ॥

रमैनी-कथता बकता ॥

कथता बकता श्रोता सोई । आप विचारे ज्ञानी होई ॥ चंचल
चपल बुधिका बेला । अगिन पवन पानीका मेला ॥ १ ॥ नव
दरवाजा दसूं दुवारा । बूझहु ज्ञानी ज्ञान विचारा ॥ माटीका गौन
पवनका सूआ । पांच तत्त्वले परगट हूआ ॥ २ ॥ काया माटी
बोले पवना । बूझे पण्डित सूवा कौना ॥ मुई सुरति बाद अहं-
कारा । एक न सूवा बोलन हारा ॥ ३ ॥ जिस कारन तप तीरथ
जाहीं । रतन पदारथ है घर माहीं ॥ पठ पठ पंडित वेद बखाना ।

(४३८)

कवीरपंथी-

भीतर होती वस्तु न जाना ॥ ४ ॥ हूँ न मरूँ मेरी मरै बलाय ।
बोलन हारा रहै समाय ॥ कहैं कवीर गुरु ब्रह्म बताया । मरता
जीता नजर न आया ॥ ५ ॥

सा०-राम मरै तो हम मरै, नातर मरे बलाय ।
अविनासीको चीगुटा, मरे न मारा जाय ॥

रमनी । बोलना ।

बोलना कहा कहिये रे भाई । बोलत बोलत तत्त्व नसाई ॥ १ ॥
बोलत बोलत बढै विकारा । चित्त बोलेका होय विचारा ॥ २ ॥
संत मिलै कछु कहिँ कहिये । मिलै असंत मौन होय रहिये ॥ ३ ॥
ज्ञानी सो बोले हितकारी । मूरख सो बोले झखमारी ॥ ४ ॥
कहैं कवीर आधा घट डोलै । भरा होय तो मुखों न बोले ॥ ५ ॥

सा०-बोली तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल ।
हिये तराजू तौलके, तब मुख बाहर खोल ॥

रमनी सातगुक्की ।

गुरु गुरु कहत सकल संसारा । गुरु सोइ जिन तत्त्व विचारा
॥१॥ प्रथम गुरु हैं माता पिता । रज वीरजके जो हैं दाता ॥२॥
दूसर गुरु है मनसा दाई । गर्भवासको बंध छुड़ाई ॥ ३ ॥ तीसर
गुरु जिन धरिया नामा । लेले नाम पुकारे गामा ॥ ४ ॥ चौथे
गुरु जिन दीच्छा दीन्हा । जग व्यवहार रीति सब कीन्हा ॥ ५ ॥
पांचे गुरु जिन वैष्णव कीन्हा । रामनामको सुमिरन दीन्हा ॥ ६ ॥
छठे गुरु जिन भ्रम गढ तोडा । दुविधा मेटि एकसों जोडा ॥ ७ ॥
सातम गुरु सत शब्द लखाया । जहाँका तत ले तहाँ समाया ॥
साखी-सात गुरु संसारमें, सेवक सब संसार ।
सतगुरु सोई जानिये, भव जल तारे पार ॥

रमनी निर्वाण देश ॥

हंस वा दिस करहु पयाना । जा देस बसै पुरुष पुराना ॥
हल न चले जहाँ बहै न कुदारा । अमृत भोजन करै अहारा ॥ १ ॥

शब्दावली

(४३९)

चले न चरखा बजै न ताती । अम्बर चौर पहिरे बहु भांती ॥
बरषै न मेघ चुवै नहिं पानी । शीतल सुरति अमी भरि आनी ॥२॥
चंद न सूर दिवस नहिं राती । कुल नहिं भेद वरन नहिं जाती ॥
रोग न दोष जहँ शोक न संतापा । कहै कवीर जहँ समरथ आपा ॥३॥

साखी-सुरति समानो निरतमें, निरत रही निरधार ।
सुरति निरति परचा भया, तब पाया दीदार ॥

रमैनी गुरुकी ॥

गुरु सम दाता कोड़ नहिं भाई । मुक्तिक मार्ग दियो बताई ॥
गुरु विन हिरदय ज्ञान न आवे । ज्यों कस्तूरी मिरग भुलावे ॥
गुरु विनु मिटै न अपनो आपा । भरम जेवरी बाँध्यो साँपा ॥
गुरु विनु केहरि कूपहिं पडिया । गुरु विनु गज छायाहिं लडिया ॥
गुरु विन स्वान देखि बहु भेखा । मन्दिर एक काँचको देखा ॥
चहुँ दिसि दीखै अपनी छाया । भूँकत भूँकत प्राण गँवाया ॥ गुरु
विन मुवा नलनी सो बंधा । गुरु विन कपि पडो सो फंदा ॥ कहैं
कवीर भरम्यो संसारा । गुरु विन सतगुरु किम उत्तै पारा ॥

साखी-भरम जेवरी गज बंध्यो, फिर जन्मे मर जाय ।
कहै कवीर सतगुरु मिलै, तब सतलोक सिधाय ॥

रमैनी-विरह शर्ता ॥

तैं कहैं जाने बिरहकी बाती । प्रेम न उपजे तेरी छाती ॥ जैसी
प्रीति मच्छ जो कीन्हा । जलते विछुडे जीवहिं दीन्हा ॥ ऐसी प्रीति
मच्छीकी जानी । सूवा पीछे माँग्यो पानी ॥ धन सरवर जहँ काली
माटी । प्रीतम बिछुडे छाती फाटी ॥ कब तोर हाड रु माँस
सुखाया । कब तोर नयनन लोहू आया ॥ कब तैंने प्रेम पियाला
पीया । कब तैं पिय मार्ग सिर दीया ॥ कहैं कवीर योही तन
खोया ॥ पाँव पसार पेट भर सोया ॥

(४४०)

कवीरपंथी-

सा०-जब लग विरह उपजे नहीं, तब लग नहिं पहिचान ।
प्रेम परगटचो जब अंगमें, मन तब किया कुरबान ॥

रसनी-गुरुटककी ॥

जाको टेक एक गुरु दाता । ताको और कछु न सुहाता ॥
पय जो बिगडा माखन होई । बिगडे छाँछ कहै नहिं कोई ॥
पतिव्रताको लाँछन होई । गनिका बिगडे कहत न कोई ॥
सूरा भागा आप विगोई । कायर भागा कहै न कोई ॥
नटनी नाचै आपा खोई । देखन हार पड़े नहिं कोई ॥
भूला मनको जो समुझावे । आदि अंत सोइ संत कहावे ॥
कहैं कवीर हम एता कहिया । सांच माने सो नरकहिं गइया ॥

सा०-डालकी चूकी बांदरी, शब्दका चूका हंस ।
कहैं कवीर धर्मदास सो, दोऊ निरफल वंस ॥

रसनी-गुरु महिमा ॥

सतगुरु बोले अमृत वानी । गुरु विन मुक्ति नहीं रे प्रानी ॥
गुरु हैं आदि अंतके दाता । गुरु है मुक्ति पदारथ आता ॥
गंगा काशी अस्थाना । चारि वेद गुरु गमते जाना ॥
गुरु है सुरसरि निर्मल धारा । विनु गुरु घटना हो उजियारा ॥
अडसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आवे । गुरुकी दया घर बैठहिं पावे ॥
गुरु कहै सोई पुन करिये । मातु पिता दोऊ कुल तरिये ॥
गुरु पारस परसे नर लोई । लोहते कंचन होय सोई ॥
शुक देव गुरु जनक बिदेही । वो भी गुरुके परम सनेही ॥
नारद गुरु प्रह्लाद पठाये । भक्ति हेतु जिन दर्शन पाये ।
कागभुसुंड शम्भु गुरु कीन्हा ॥
अगम निगम सबही कहि दीन्हा । ब्रह्मा गुरु अग्निको कीन्हा ॥
होम यज्ञ जिन आज्ञा दीन्हा ॥ वशिष्ठ गुरु किया रघुनाथा ।
पाइ दरस तब भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरना ।
पाइ भक्ति तब तारन तरना ॥ नारद दिच्छा धिमर सो पायो ।
चौरासी सो

शब्दावली

(४४१)

तुरत छुडायो ॥ गुरु कहै सोई है साँचा । विनु पगिचय सेवक है काँचा ॥ कहै कवीर गुरु आपु अकेला । दश औतार गुरुका चेला ॥
साखी-राम कृष्ण ते को बडा, उनहु तो गुरु कीन ।
तीन लोकके वै धनी, गुरु आगे आधीन ॥

रमनी—गुलाहाकी ॥

जुलहा कहि कहि जग भरमाया । मो जुलहेका मरम न पाया ॥
समझ विना जिव भरम भुलाना । विनही सूत न पसारे ताना ॥
धरनि अकास बिच खाड खुदाई । चन्द सुर दोय नली भराई ॥
आदि नामका पूरन पूरा । चेतहु अंधा पथ है दूरा ॥ सूत कुसूत बुने नर कोरी । वाको सुरति निरति है जोरी ॥
हम षट दर्शन हम षट भेखा । हमही तत्व अनूप अलेखा ॥
हम हैं सकल सकल हम माहीं । हमते और दूसरा नाही ॥
सबही कर्म हमारा कहिया । हम करमनते न्यारा रहिया ॥
निरगुन सगुन खेल हमारा । हमरा चौदह लोक पसारा ॥
बन्दीछोर है विरद हमारा । हमही बन्दी छुडावन हारा ॥
जुग जुग बन्द छुडावन आये । ताते बंदीछोर कहाये ॥
कहै कवीर हम अगम अपारी । स्वसम नली सो एक हमारी ॥

रमनी—स्वरूप महिमा ॥

जीवत जीव जागनी ठानै । माया ब्रह्म दोऊ पहिचाने ॥
तीन सुरूप एकहि देखा । ताको निहचल विज्ञान विसेखा ॥
माया ब्रह्म दोऊते न्यारा । आगे पारब्रह्म उजियारा ॥
विज्ञानीको कोइ नहि पावे । वाहि स्वरूप नजर नहि आवे ॥
तूनकी ओट पहाड़ लुकाना । ऐसे ताहि दूर मति जाना ॥
है हममें हमही सा देखा । निज सुरूपको यही विशेषा ॥
आवे कहीं कहुँ नहि जाई । समुन्द्र लहरि समुन्द्र समाई ॥
ज्यों बालक खेले फिरकाई । देखि परे तो सकल फिराई ॥
जो हिरदामें होय रहे थीरा । ताका विनसे नाहि शरीरा ॥
चंचल निहचल यहि रूपा । निरखे देखि यहि वस्तु

(४४२)

कवीरपंथी-

अनूपा ॥ बिछरन मिलन होय कछु केरा । जैसे सोवै सुपना तेरा ॥
सोवे जहाँ तहाँ उठि जागे । पंछी मनि राह उठि लागे ॥ आगे पीछे
मध्यम कोई । ऐसा सहज सरूपी होई ॥

साखी-सहज सरूपी होय रहै, दिलकी दुविधा जाय ।
अकह कवीरा क्या कहै, उलटि कालको खाय ॥

रमनी-कालजीत ॥

काल न आवे निहचल होई । अब यह जतन करो सब कोई ॥
निहचल चित्त न कबहुँ चलावे । ताको काल न कबहुँ सतावे ॥
परगट कहा तब है जग माहीं । जागे जाकूँ सूझे नाहीं ॥ जो कोइ
चेतन होय करि जागे । ताके तसकर कबहुँ न लागे ॥ कलह
कल्पना सब विधि खोई । निहचे सहज सरूपी होइ ॥ इच्छा ते
जग जीवत नाई । ब्रह्म अनिच्छित गहै चित लाई ॥ कारज कारनकी
यह बाता । माया माहीं ब्रह्म समाता ॥ माया माहीं ब्रह्म फंदाया ।
ताते पुरुष प्रकृति कहाया । अच्छर है इक और अनूपा ॥ पारब्रह्म
अन इच्छित रूपा । पूर्ण ब्रह्मते न्यारा होई । परमहंसनको प्यारा
सोई ॥ हंसदसा होय जु भाई । ताको काल कबहुँ नहिं खाई ॥

साखी-काल काल सबही कहे, काल न जाने कोय ।

जेती मनकी कल्पना, काल कहावै सोय ॥

रमनी-निर्वाणपद ।

ऐसा ब्रह्म विचारो भाई । शब्द उठै धुनि कहाँ समाई ॥ काष्ठ
मथि २ अगिन उपाई । उलटि अग्नि काष्ठको खाई ॥ दोनों नास
भयो इक ठाऊँ । उड़ गइ भसम धरेका नाऊँ ॥ भस्म भई उड़
कहवों गई । सो गति याकी ऐसी भई ॥ सुए जीव जइहो जाहाँ ।
जीवतही ले राखो ताहाँ ॥ जैसो केल कदली खंद । ऐसा पारब्रह्म
गोविन्द ॥ खोजत खोजत पायो ठौर । मैं जानो कछु आगे और ॥
नहिं कछु नहिं कछु नहिं कछु सोई । पंछी पीछे खोज न होई ॥

शब्दावली

(४४३)

दास कवीर तहां लौलीन । आगे पन्थ न पीछे चीन ॥

सा०—सबही घर है गांवमें, गाँव कौन घर माहिं ।

ऐसे सब जग ब्रह्ममें, न्यारो कितहुँ नाहिं ॥

सत्यनाथ ।

रमैनी—स्वरूप पहिचान ॥

आपने रूप राम हम पाये । ताते जीवन मुक्ति घर आये ॥
तब हम भक्ति कीन हरि केरी । आसा राखी मनसा घेरी ॥ आसा
मनसा भई निरासा । छुट गये बन्धन भये खुलासा ॥ तब हम
योगयुक्ति चित धरते । अष्ट कला मन पवना भरते ॥ अब हम
पायो अपना भेव । आपुहि कर्ता आपुहि देव ॥ तब हम जान्यो
यह अब जानी । अन जानेसे करी पहिचानी ॥ गयो भरम
मन बव्यो हुलास । सहजहिं राम कवीरा दास ॥

सा०—अर्थ धर्म अरु काम तजि, देह काल सिर धूर ।

संशय नाहीं मुक्तिमें, ब्रह्म रहा भरपूर ॥

रमैनी एकतार ।

भजि यकतार भ्रममति भूलो । है यकतार सबनको दूलो ॥
बिन यकतार कस पतिवरता । एक पिया विन सबै अविस्था ॥
१॥ राम राम कहि भक्ति दिठावे । बिन यकतार राम कहँ पावे ॥
भागवत सौ पुरान उचारे । निगम चारि सुनि श्रुति विचारे ॥२॥
वेद पढै पढि अरथ बतावे । विन यकतार थाह नहिं पावै ॥ बिन
अंकूर बीज नहिं ऊगे । विन यकतार हंस कहँ पूगे ॥ ३ ॥ बिन
यकतार भक्ति क्या कीजे । गुरु प्रताप अमीरस पीजे ॥ रंकार
जहँ अनहद गाजे । ता ऊपर यकतार विराजे ॥४॥ इंगला पिंगला
सुषमन साधै । ले उदान पौन तहँ बांधे ॥ अरधै उरधै सुरति
लगावे । विन यकतार पीव नहिं पावै ॥ ५ ॥ वेद पुरान अरु
शास्तर सोधै । अर्थ करि करि मन परबोधै ॥ जहँलग वेद तहांलग

(४४४)

कवीरपंथी-

ओंकारा । केवल ब्रह्म वेद सो न्यारा ॥ ६ ॥ षट दर्शन जहँ कोह
न देखा । वह यकतार सुरति सो पेखा ॥ जाको गुरु यकतार
लखाया । पहुँचा धाम बहुरि नहि आया ॥ ७ ॥ जैसे सरिता
सिन्धु समाई । ऐसे हंसे सुरति मिलाई ॥ है यकतार सजीवन
बूटी । बिन यकतार बात सब झूठी ॥ ८ ॥ बात कहूँ तो कोइ न
मानै । जिन देखा सोई पहिचानै ॥ पूरब जन्म भक्ति परगटाई ।
सो यकतारहि लखै बनाई ॥ ९ ॥ छर अच्छर दोनों ते न्यारा ।
है यकतार सकल आधार ॥ है सब रस पर जिह्वा नहि आवे ।
बैठि निरंतर नाद बजावे ॥ १० ॥ जप तप और अनेक दृढावे ।
बिन यकतार मुक्ति नहि पावे ॥ जप तप व्रत खीन होय जाई ।
बिन यकतार न हंसा पाई ॥ ११ ॥

समौ-सतगुरु सो साँचा रहै, सुरति रहै यकतार ।
कहै कवीर धर्मदास सो, पहुँचे लोक मंझार ॥

रमनी-ज्ञान विरह ॥

लागी चोट शब्दकी तनमें । गिरह नहिँ चैन चैन नहिँ बनमें ॥
सूरा खेत जबै मंडाना । ना जानू को रहै निदाना ॥ १ ॥ दूँदत
फिहँ पीव नहिँ पाऊँ । औषधि मूल कहाँ घसि लाऊँ ॥ तुमसे
वैद न हमसे रोगी । बिन दीदार क्यों जिये वियोगी ॥ २ ॥
एकहि रंग रंगी सब नारी । ना जानू को पियकी प्यारी ॥ कहै
कवीर कोइ गुरुमुख पावे । बिन दरस न दीदार दिखावे ॥ ३ ॥

समौ-साधु हमारे शिरधनी, हम साधुनकी खेह ।
रोम रोममें रमि रहा, ज्यों बादलमें मेह ॥

रमनी षट दर्शन ।

बंदा ! दरसे सब घट माहीं । अंधरे अंखिया सूझत नाहीं ॥
या घट चन्दा या घट सूरा । या घट बाजै अनहदू तूरा ॥ १ ॥
या घट मथुरा या घट काशी । या घट पूरि रहा अविनाशी ॥

शब्दावली

(४४५)

या घट भीतर दस दरवाजा । पांच प्रधान छठी मन राजा ॥ २ ॥
या घट भीतर सोलह खाई । चक्र फिरे गढ मुसौ न जाई ॥ या
घट भीतर धोबि पुरानी । कपडा धोवे विनु सिल पानी ॥ ३ ॥
धोयलेरे धोबिया मधुरिसि धारा । उत्तम निर्मल घाट हमारा ॥
कहै कवीर कोइ धोवे विचारी । जो धोवे सो उत्तरे पारी ॥ ४ ॥
समौ-घटहीमें सबहीं बसैं, जह लगि ज्ञान विलास ।
सब ऊपर साहब धनी, घटहीमें निज बास ॥

रमैनी—योग भोगकी ॥

दुनिया दिवानी हमहुं दिवाना । हमरे तो है अनहद ज्ञाना ॥
दुनिया पट पटंबर भोगी । हम तो ज्ञान पदार्थ योगी ॥ १ ॥
दुनिया चाहे हस्ती घोडा । हम पाय पियादे गढ तोडा ॥ दुनिया
चाहे विषरा प्याला । हम तो नाम सदा मतवाला ॥ २ ॥ दुनिया
अपने मारग जाई । हम तो सतकी राह चलाई ॥ कहैं कवीर
हम पाई छाहीं । जीवतके संग सुवाके माहीं ॥ ३ ॥

साखी—हम वासी वहि देशके, पार ब्रह्मका खेल ।
दीपक पाया गैवका, बिन बाती बिन तेल ॥

आदि रमैनी ।

आदि रमैनी कहूँ विचारी । सुनियो संतो कथा निनारी ॥
युग छत्तीस छयानवे लाखा । अरब कोटि सत सुकृत भाखा ॥ १ ॥
जब नहिं होते शून्य बिस्मूत्रा । जब नहिं होते पाप औ पुत्रा ॥
न था वेद अरु ना थी बानी । ना था ब्रह्मा नहिं थी ब्रह्मानी ॥ २ ॥
ना था पवन नहीं था पानी । ना थी माया अकथ कहानी ॥ ना
थी धरती नहीं अकासा । जब नहिं होता तत्त्व विलासा ॥ ३ ॥
जब नहिं होता तुरुक औ हिन्दू । माताका रक्त पिताका बिन्दू ॥
जब नहिं होता गाय कसाई । कहो विसमिछाह किन फरमाई ॥ ४ ॥
जब नहिं होता भादू माहा । कच्छ मच्छ नहीं बाराहा ॥ जब

(४४६)

कवीरपंथी—

नहिं होते रघुपति रावन । जब नहिं होते कृष्ण बलि बावन ॥ ५ ॥
जब नहिं होते शम्भु गौर । जब नहिं होते दश औतारा ॥ जब
नहिं होते कूर्म औ शेष । जब नहिं शारद गौरि गणेशा ॥ ६ ॥
जब नहिं होते निरंजन राया । जिन जीवन कहैं बांधि झुलाया ॥
तेतीस कोट देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥ ७ ॥

समौ-कहैं कविर कछु ना होता, होता आप अलेख ।
तबका आप कवीर है, धरि धरि खेले भेख ॥

रमनी-एक ओंकार ॥

ऐसा ज्ञान विचारै कोई । सो नर जीवन मुक्तता होई ॥ पाँच
तत्त्व गुण तीनों सोई । अविगत सो सब परगट होई ॥ १ ॥
बोलनहारा कहैं सो हूआ । कैसे उपजा कैसे मूआ ॥ पवनकी गाँठ
सहज बनि आई । ताका बना बगूला भाई ॥ २ ॥ खुलि गइ गाँठ
खोज नहिं पाया । पवनक पुतला पवन समाया ॥ जैसे बादल
होत अकारा । तैसे दरसे यह संसारा ॥ ३ ॥ मिट गया बादल
रहा अकासा । ऐसे आतमको न विनासा ॥ इस बहुरंगीका पार
न पाया । कहैं कवीर गुरु भेद लखाया ॥ ४ ॥ पाया भेद भया
उजियारा । साहब दरस्यो पार ओंकारा ॥ यही ज्ञान रतन है
भाई । जो पावै सुख विलसे आई ॥ ५ ॥

साखी-ज्ञान रतनकी कोठरी, चुपकर दीजे ताल ।
पारिख आगे खोलिये, शीतल बचन रिसाल ॥

रमनी-गुरु महिमा ॥

गुरु मिले तो सत्य लखावे । बिन गुरु अन्त न कोऊ पावे ॥
जिन गुरुकी कीन्ही परतीती । एक नाम कर भवजल जीती ॥ १ ॥
गुरु प्रेमते जीव मराला । गुरु स्नेह बिन काग कराला ॥ गुरु दया
गुरु शब्द हमारा । गुरु परगट गुरु गुप्त अधारा ॥ २ ॥ गुरु पृथ्वी
गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थल महाँ कीन निवासा ॥ चन्द सूर

शब्दावली

(४४७)

गुरु सब संसारा । गुरु विन होय न कोइ व्यवहारा ॥ ३ ॥ गुरु
ब्रह्मा औ विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥ चर
अचर जहां लगि सब देखा । गुरु विन कछु और नहिं पेखा ॥४॥
उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्है गुरु बरिष्ठा ॥ ये सब
जीव गुरु मय जानो । गुरुसे भिन्न और नहिं मानो ॥ ५ ॥ गुप्त
प्रगट सबही जग जाया । सबहीमें है सतगुरुकी छाया ॥ कहैं
कवीर सो हंस पियारा । यही भांतिते गुरु दरश निहारा ॥ ६ ॥

सा०-सो गुरु निसिदिन बंदिषे, जासो पढ़ये नाम ।
नाम विना घट अंध है, ज्यों दीपक विन धाम ॥

रत्नो-गृहो रहनी ॥

गृही भाव भक्ति जो साधे । संत साधु सेवा अचराधे ॥ चर
तजि बाहर कबहुँ न जाई । गुरु गम भक्ति करै लौलाई ॥ १ ॥
भक्ति करै निर्भय सहदानी । गुरु अरु साधु एक करि जानी ॥
जहां साधु तहैं सतगुरु वासा । जहैं सतगुरु तहैं मुक्ति निवासा
॥ २ ॥ जहां मुक्ति तहैं लोक उजागर । जहां लोक तहैं रह सुख
सागर ॥ जहां सुख सागर तहां कवीर । भक्ति मध्य बाहर औ
तीर ॥ ३ ॥ जहां मध्य तहैं पुरुष अमान । जहैं बाहर तहैं हंस
सुजान ॥ जहां तीर तहैं निर्मल धीर । जहां मरन नहिं व्यापै पीर
॥ ४ ॥ जहां पीर तहैं संशय धीर । संशय मध्य असंशय नीर ॥
जहां नीर तहैं सुख संतोखा । जरा मरण नहिं व्यापै धोखा ॥५॥
जहां धोख तहैं आवै धीर । जहां धीर तहैं गहिर गंभीर ॥ जहां
गंभीर तहां स्थिर होइ । जहां थीर तहैं लहरि न कोइ ॥ ६ ॥
लहरि नहीं तहैं आपै आप । आपा मेटि मिटै संताप ॥ आपा मेटे
ममिता खोइ । भाव भक्ति करि मानुष होइ ॥ ७ ॥ मानुष होय
गहै निरवाना । पावै सत्य सही अस्थाना ॥ मानुष पद छोड़े
व्यवहारा । ताते फिरि आवै संसारा ॥ ८ ॥ संसार आइके भक्ति

(४४८)

कवीरपंथी-

कमाई । भक्ति कमाय भक्त कहाई ॥ भक्त कहाइके रहै उदासा ।
सत्य गुरु मिलै सत्य विश्वासा ॥ ९ ॥ सतगुरु मिलै तो संशय
भागे । सो फिरि बहुरि अंक नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके
नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥ १० ॥ सतगुरु पाय दुसर
घर नाही । आवागमन रहित घर जाहीं ॥ कहैं कवीर सत्य करि
माने । साधु गुरु नहीं अन्तर जाने ॥ ११ ॥

सा०-साधु बड़े परमार्थी, चन ज्यों बरषे आय ।
तपन बुझावैं औरकी, अपनो पारस लाय ॥

रमनी-वैरागी (साधु) रहनी ॥

वैरागी उनमुन घर करई । हर्ष शोक कछु चित्त न धरई ॥
रुखा सूखा करै अहारा । निसि दिन आतम तत्त्व सम्हारा ॥ १ ॥
विकसित बदन भजनके आगर । शीतल सदा प्रेम सुखसागर ॥
रहिता रहै बहै नहीं कबहीं । सो वैरागी पावे हमहीं ॥ २ ॥ हमें
पाय हमहीं अस होई । आवागमन मिटावे सोई ॥ आवा-गमन
मिटावै काई । रहैं अधीन तत्त्व समाई ॥ ३ ॥ काया धरि काया कहैं
बोधे । आवागमन रहित तत सोधे ॥ जीवत मरे मरे पुनि जीवैं ।
उनमुनि बसे महा रस पीवैं ॥ ४ ॥ महाशून्यमो रहै समाई । मरै न
जिवे आवे न जाई ॥ ऐसी विधि वैरागी सोई । हम मिलि रहै
हमहि अस होई ॥ ५ ॥ भीतर रहनी कहा बनायी । बाहर रहनी
देहुँ बतायी ॥ वैरागी आसन दृढ होई । रहै अजाँच जाँचे नहीं
कोई ॥ ६ ॥ वैरागी अस चाल चलावे । तजै अखज तव हंस
कहावे ॥ मद्य मांसके निकट न जाई । करै अहार सो काल कसाई
॥ ७ ॥ प्रेम भक्ति आने उर माहीं । द्रोह घात दिसि चित्तवै नाही ॥
जीव दया राखे हिय जानी । मन वच कर्म घात नहीं आनी ॥ ८ ॥
हंस दशा धरि पंथ चलावे । श्रवनि कण्ठी तिलक लगावे ॥ क्रोध

शब्दावली

(४४९)

कपट सब देह बहाई । क्षमा गंगमें पैठि नहाई ॥१॥ विन जाँचे जो कहु आवे । रूखा सुखा ना विलगावे ॥ गृही भक्ति जो सेवा लावे । ताको देखि न मोह बढावे ॥ १० ॥ वर्तमान वरते सो साधा । अधिक चहै तो होय व्याघा ॥ छाड़ि उपाधि रहै लवलीना । कहै कवीर सो हंस परवीना ॥ ११ ॥

सा०-संत सराहिये ताहिको, जाको सतगुरु टेक ।

टेक निवाहे देह भरि, रहै शब्द मिलि एक ॥

रसनी ॥ गुरु शिष्य अविकारी ॥

साहब सेवक एकै होई । सदा बसंत खेले सब कोई ॥ गुरु शिष्य एक जब होई । चिन्ह न परे एककी दोई ॥ १ ॥ साहब सेवक वरण दुहेला । एकै वरण गुरु औ चेला ॥ जैसे फूल बास कहैं तोरी । पाछे तिल संग तेहि जोरी ॥ २ ॥ पाछे फूल सुवासहिं देई । तिल तजि तेल बास गहि लेई ॥ ऐसे गुरु शब्द जो देई । चेला गहे निज हेतु विलोई ॥ ३ ॥ विना प्रेम जिव होय अनेरा । पाछे परे कालके घेरा ॥ गुरु सुवास है फूल सनेही । तिल अनुमान शिष्यकी देही ॥ ४ ॥ प्रेम भक्ति जो गुरु बतावे । करि विश्वास शिष्य तेहि धावे ॥ गुरु शिष्य भेद नहिं ताही । जोइ गुरु सोइ शिष्य निवाही ॥ ५ ॥ गुरु पूरा शिष सूरा होई । तबहि काल रहै मुख गोई ॥ शेष विना गुरु छूटे नाहीं । फिरि फिरि परिहैं भोचक माहीं ॥ ६ ॥ सतगुरु सो सतभाव बतावे । शिष, सोई जो प्रेम लगावे ॥ तीनों लोक एक होय जाई । गुरु शिष अलग होय नहिं भाई ॥ ७ ॥

सा०-गुरु समाना शिष्यमें, शिष कर लीया नेह ।

विलगाये विलगे नहीं, एक प्रान दुइ देह ॥

कर्म बण्डकी रसनी १ ।

कर्म कथा अब कहूँ बखानी । जौन फाँस अटके नर प्रानी ॥

कवीरपंथी शब्दावली १५

(४५०)

कवीरपंथी-

चारों खानि कर्म अधिकाई । चहुँ खानि मिलि कर्म टढाई ॥
कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चन्द्र शूर प्रकाशा ॥ कर्महि
ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महिते भौ गौरि गणेशा ॥ सात बार
पन्द्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम
कृष्ण अवतारा । कर्महि रावण कंस संहारा ॥ कर्महि ले वसुदेव
घर आवा । कर्महि यमुदा गोद खिलावा ॥ कर्महिते वन गऊ
चराई । कर्महि गोपी केलि कराई ॥ कौशिल्या तप कर्म जो करिया ।
कारण कर्म राम औतरिया ॥ कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा ।
कर्महि राम दीन्ह वनवासा ॥ कर्म जाय जब धनुष चढावा ।
कर्महि जनकसुता सिर नावा ॥ कर्महि हरचो सीता कई आई ।
दुख सुख कर्म ताहि भुगताई ॥ कर्म रेखते कोइ न सुकता । लछमन
राम करम फल भुगता ॥ कर्मसाग बांधेउ तहिया । कर्महि जल
जीवन दुख सहिया ॥ रुद्र राम कर्म कीन्ह लडाई । भला मिलाप
हना भेट चढाई ॥ कर्मरेख नहि मिटे मिटाई । जीव पपील लङ्का
होय आई ॥ कर्म रेख लंकापति गयो । लंकापति विभीषण भयो ॥
कर्म रेख सबहीं पर छाजा । कहाँ राम कहँ रावण राजा ॥ कर्मरेख
सबहिन पर होई । देखो शुद्ध विलोय विलोई ॥ कर्मरेख सागर
बँध हीना । बिरला कोई चीन्हे चीन्हा ॥

कर्म रेख सागर बँध्यो, सौ योजन मर्याद ।

विन अक्षर कोइ ना छूटे, अक्षर अगम अगाध ॥ १ ॥

रमनी ॥ २ ॥

सागर है भवसागर धारा । नहि कछु सूझे वार न पारा ॥
तहवाँ बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥ कर्म रेख
बंधा सब कोई । खानी बानी देखि विलोई ॥ वेद कितेब कर्महीं
गाय। कर्महिको निःकर्म बताया ॥ सद्गुरु मिले तो भेद बतावे ।

शब्दावली

(४५१)

कर्म अकर्म मध्य दिखलावे ॥ कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥ अक्षरसागर निर्भय वानी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥ गोरख भरथरि गोपी चन्दा । कर्म फाँस सबही पुनी फन्दा ॥ सौ औ सात चौदह इक्कीसा । ब्रह्माके चौरासी भेसा ॥ कर्म फाँस तहवाँ लग राखा । जहाँ लग वेद व्यास कछु भाषा ॥ दश औ द्वादश कर्म बखाना । जिन जाना तिनहीं पहिचाना ॥ कर्म अकर्म मूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥ अक्षर सागर मूल भैंडारा । अक्षर मूल भेद उजियारा ॥ अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥

सा०-कर्महिं डोर चारो युग, सुनो सन्त सब दास ।

तत्त्वभेद निहतत्त्व लहि, जगते रहो उदास ॥ २ ॥

खंनो ॥ ३ ॥

सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारण कर्म नन्द घर गाजा ॥ एक नारि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपी निरमावा ॥ कारण कर्म केलि भव कीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥ जहाँ तहाँ गोरस जाय चुरावा । जहाँ जहाँ कर्म तहाँ ले खावा ॥ कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥ कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥ कर्महि कारण तहाँ सिधारा । कारण कर्म पिवे विषधारा ॥ मारि ताहि कीन्ही गति चारा । कर्म फाँस बोरचो संसारा ॥ कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्हो हाथा ॥ कर्महि मारि विध्वंस जो कीन्हा । कर्म फाँस सबही आधीना ॥ कुब्जा कछु कर्म जो कीन्हा । कारण कर्म कृष्ण गति दीन्हा ॥ कर्म पताल कालेश्वर नाथा । साँवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥ यज्ञ अश्वमेध करत बलि राजा । कर्मते जाय पताल विराजा ॥ कर्महि वामन रूप

(४५२)

कबीरपंथी—

बनाया। बलिराजापै दान दिवाया ॥ कर्म अहूठ नापि पग लीन्ह। तीने पग तीनों पुर कीन्ह। ॥ आधा पाँव कर्म अधिकारी। बाँधि नृपति पतालहिं डारी ॥ जहाँ लगि जीव जन्तु उत्पानी। तहाँ लगि कर्म राय परवानी ॥ कर्म फाँसते कोइ न छूटे। कर्म फाँस सबहिन घर लूटे ॥

सा०—कर्म फाँस छूटे नहीं, केतो करो उपाय।

सद्गुरु मिले तो ऊबै, नहिं तो परलय जाय ॥ ३ ॥

रमैनी ४ ॥

जो कुछ कर्म जगतमें करई। करि करि कर्म बहुरि भव परई ॥ एक न होय यज्ञ व्रत ठाना। एक न पाप पुण्य पहिचाना ॥ एक कर्म कुल लीन्ह उठाई। कर्म अकर्म न जाने भाई ॥ एक छापा और तिलक बनावे। पहिरि मेखला साधु कहावे ॥ वैष्णव होय करै षट्कर्म। वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥ कथा पुराण सुनै चित लाई। कर्महि सुमिरे बहु विधि भाई ॥ विष्णु सुमिरि तप बहु विधि कियो। सो निःकर्म विष्णु नहिं भयो ॥ कर्मक डोरि बँधा संसारा। क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥ एक अभंग एकादशि करई। तन छूटे वैकुण्ठहिं तरई ॥ यह वैकुण्ठ न इस्थिर होई। अन्त कर्मगति परलय सोई ॥ करै कर्म वैकुण्ठहिं जाई। कर्म घटे भव जल फिरि आई ॥ योगी योग कर्मको साधे। किरिया कर्म पवन आराधे ॥ योगी कर्म पवनको किरिया। भुगतै कर्म देह पुनि धरिया ॥ संन्यासी जो बन बन फिरहीं। होय निःकर्म कर्म फिर परहीं ॥ जीयत दग्ध देहको करई। जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥ कोई नम्र कोई वज्र कछोटा। भरमत फिरि सहै पग ठोटा ॥ राजद्वार पावे अवतारा। भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥ पण्डित जन सब कर्म बखाने। नख शिख कर्मफाँस अरुझाने ॥

शब्दावली

(४५३)

कर्म धर्मकी युक्ति बतावै । दान पुण्य बहु विधि अरथावै ॥ वज्र दान लै जन्म गँवावै । होई ऊंट बहु भार लदावै ॥ एक जो करै बरत अवतारा । होइ है सूकर थान सियारा ॥ सूकर थान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होइ हैं सुकता ॥

सा०-बहु बन्धनसे बाँधिया, एक विचारा जीव ।

जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावै पीव ॥

संज्ञी ॥५॥

शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस सुकताओं ॥ निरालम्ब अवलम्ब न जानै । शब्द निरन्तर भेद बखानै ॥ पाप पुण्यकी छोड़े आसा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥ रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निस्तत्त्व समाई ॥ तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको देइ भजाई ॥ सुख सम्पति नहिं विपत्ति विचारे । काम क्रोध तृष्णा परजारे ॥ किया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरुवारे ॥ सो ग्रहे जो निग्रह काया । अभिअन्तरकी मेटे माया ॥ शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥ ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरण परछाले ॥ गहे तत्त्व निस्तत्त्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥ सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥ धन यौवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥ चहुँदिशि मंसा पवन कलोलै । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोलै ॥ उनमुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्त्वभेद निहतत्त्वहिं लहई ॥ जो कोइ आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥ मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरुगम लूटे ज्ञान भँडारा ॥ शूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥ दुखिया होय रेन दिन रोई । भोगी भोग करै सुख सोई ॥ दुख सुख भोग सोग सम जाने । भली बुगी कछु मन नहिं आने ॥ भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय

( ४५४ )

कबीररचनी-

पावे वह बैरागा ॥ सींगी अच्छय रैन दिन बाजे । सिद्ध साधु तहँ आसन छाजे ॥

सा०-आसन साथै आपमें, आपा डारे खोय ।

कहैं कवीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥ ६ ॥

इति कर्मवण्डकी रमनी ।

सत्यनाम ।

अथ पंच' देहकी निर्णय ॥

एक जीवको स्वतः पद, बुद्धि आँति सो काल । काल होइ यह काल रचि, तामें भये बिहाल ॥ १ ॥ बीहालेको मतो जो, देउँ सकल बतलाय । जाते पारख प्रौढ लहि, जीव नष्ट नहिं जाय ॥२॥ करि अनुमान जो शून्य भो, सूझे कतहूँ नाहिं । आपु आप बिसरो जबै, तन विज्ञान कहि ताहि ॥ ३ ॥ ज्ञान भयो जाग्यो जबै, करि आपन अनुमान । प्रतिबिंबित झाई लखै, साक्षी रूप बखान ॥ ४ ॥ साक्षी होय प्रकाश भो, महा कारण त्यहि नाम । मसुर प्रमाण सो विम्ब भो, नील बरण घनइयाम ॥ ५ ॥ बटयो विम्ब अध पर्व भो, शून्याकार स्वरूप । ताको कारण कहत हैं, महाँ अधियारी कूप ॥ ६ ॥ कारण सो आकार भो, श्वेत अँगुष्ठ प्रमान । वेद शास्त्र सब कहत हैं, सूक्ष्म रूप बखान ॥ ७ ॥ सूक्ष्म रूपते कर्म भो, कर्महिते यह अस्थूल । परा जीव या रहटमें, सहे घनेरी शूल ॥ ८ ॥

संतौ षट प्रकारकी देवी ॥

स्थूल सूक्ष्म कारण महाँ कारण केवल हंस कि लेही ॥ साटे तीन हाथ परमाना देह स्थूल बखानी । राता वर्ण बैखरी बाचा जागृत अवस्था जानी ॥ रजो गुणी ओंकार मात्रुका त्रिकुटी है

१ इस प्रन्यमें बटदेहका वर्णन है परन्तु इसका नाम पंचदेहका निर्णय है इसका कारण यह है कि, हंस देहको इसरी बेहोके साथ न मिलाकर अलग माना है । क्योंकि, वह बन्ध और मोक्षते परे मध्यकी भूमिका है ।