सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 450

(४३६)

कवीरपंथी-

समौ-ये बत्तिस जब ऊगहीं, तैतीसो छिप जाय ।
कहै कवीर सुनु गोरखा, आवा गमन नसाय ॥

इति अष्टाङ्ग योगकी रमनी ॥

रमनी--करीमकी हिकमत ॥

वाह करीम वलि हिकमत तेरी । खाक एक सूरत बहुतेरी ॥
औघे बासन नीर जमाया । जतन जतन करि नूर उपाया ॥ १ ॥
आप मनीका सकल पसारा । हिन्दू तुरुक कोई नहि न्यारा ॥
दम दम करि बोले सब कोई । दमके भीतर हरदम होई ॥ २ ॥
बाहर दमको लखै जो कोई । ताको आवा-गमन न होई ॥ दम
लखिया जिन लखिया नामा । दम छूटा पाये निज ठामा ॥ ३ ॥
पीर पैगम्बर शेख मुलाना । तुम्हरी सिफत सुनि भै दिवाना ॥ कहै
कवीर वह साहब न्यारा । यार वाः यार वाः यार हमारा ॥ ४ ॥

रमनी--काया मसजिद ॥

यार वा यार वा यार हमारा । सब जीवनका प्रान अधारा ॥
काया मसजिद अजब सँवारी । दोय खम्भा दस लगी किवारी
॥ १ ॥ ता भीतर होय बंग निमाजा । हरदम इरदम हरदम साजा ॥
एक मसजिद दसो दरवाजा । मन मुछा तहैं पठै निमाजा ॥ २ ॥
ज्ञान करद मौन दिल पकरी । बिस्मिल कीन्हो पांचो बकरी ॥
पांच चोर करै कुफराना । मारी सबदसूँ किया छिमाना ॥ ३ ॥
पांच पीर बसे इक थाना । शब्द अनाहद घुरै निशाना ॥ कहैं
कवीर अजब कछु देखा । नूर नाम सत साहब पेखा ॥ ४ ॥

रमनी--मन ॥

मनकी मूठ लखै जो कोई । सो जन संत पारखी होई ॥ नगन
मगन बकला कंद खाई । देखि दिसा मनको पतियाई ॥ १ ॥
बहु विधि बकता चतुर परवाना । अलप अहारी काया खीना ॥
बहु बुधिमान प्रेम हित रोवै । रंचक चाह रसातल बोवै ॥ २ ॥