कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 968 में से
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या घट भीतर दस दरवाजा । पांच प्रधान छठी मन राजा ॥ २ ॥
या घट भीतर सोलह खाई । चक्र फिरे गढ मुसौ न जाई ॥ या
घट भीतर धोबि पुरानी । कपडा धोवे विनु सिल पानी ॥ ३ ॥
धोयलेरे धोबिया मधुरिसि धारा । उत्तम निर्मल घाट हमारा ॥
कहै कवीर कोइ धोवे विचारी । जो धोवे सो उत्तरे पारी ॥ ४ ॥
समौ-घटहीमें सबहीं बसैं, जह लगि ज्ञान विलास ।
सब ऊपर साहब धनी, घटहीमें निज बास ॥
रमैनी—योग भोगकी ॥
दुनिया दिवानी हमहुं दिवाना । हमरे तो है अनहद ज्ञाना ॥
दुनिया पट पटंबर भोगी । हम तो ज्ञान पदार्थ योगी ॥ १ ॥
दुनिया चाहे हस्ती घोडा । हम पाय पियादे गढ तोडा ॥ दुनिया
चाहे विषरा प्याला । हम तो नाम सदा मतवाला ॥ २ ॥ दुनिया
अपने मारग जाई । हम तो सतकी राह चलाई ॥ कहैं कवीर
हम पाई छाहीं । जीवतके संग सुवाके माहीं ॥ ३ ॥
साखी—हम वासी वहि देशके, पार ब्रह्मका खेल ।
दीपक पाया गैवका, बिन बाती बिन तेल ॥
आदि रमैनी ।
आदि रमैनी कहूँ विचारी । सुनियो संतो कथा निनारी ॥
युग छत्तीस छयानवे लाखा । अरब कोटि सत सुकृत भाखा ॥ १ ॥
जब नहिं होते शून्य बिस्मूत्रा । जब नहिं होते पाप औ पुत्रा ॥
न था वेद अरु ना थी बानी । ना था ब्रह्मा नहिं थी ब्रह्मानी ॥ २ ॥
ना था पवन नहीं था पानी । ना थी माया अकथ कहानी ॥ ना
थी धरती नहीं अकासा । जब नहिं होता तत्त्व विलासा ॥ ३ ॥
जब नहिं होता तुरुक औ हिन्दू । माताका रक्त पिताका बिन्दू ॥
जब नहिं होता गाय कसाई । कहो विसमिछाह किन फरमाई ॥ ४ ॥
जब नहिं होता भादू माहा । कच्छ मच्छ नहीं बाराहा ॥ जब