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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(४४६)

कवीरपंथी—

नहिं होते रघुपति रावन । जब नहिं होते कृष्ण बलि बावन ॥ ५ ॥
जब नहिं होते शम्भु गौर । जब नहिं होते दश औतारा ॥ जब
नहिं होते कूर्म औ शेष । जब नहिं शारद गौरि गणेशा ॥ ६ ॥
जब नहिं होते निरंजन राया । जिन जीवन कहैं बांधि झुलाया ॥
तेतीस कोट देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥ ७ ॥

समौ-कहैं कविर कछु ना होता, होता आप अलेख ।
तबका आप कवीर है, धरि धरि खेले भेख ॥

रमनी-एक ओंकार ॥

ऐसा ज्ञान विचारै कोई । सो नर जीवन मुक्तता होई ॥ पाँच
तत्त्व गुण तीनों सोई । अविगत सो सब परगट होई ॥ १ ॥
बोलनहारा कहैं सो हूआ । कैसे उपजा कैसे मूआ ॥ पवनकी गाँठ
सहज बनि आई । ताका बना बगूला भाई ॥ २ ॥ खुलि गइ गाँठ
खोज नहिं पाया । पवनक पुतला पवन समाया ॥ जैसे बादल
होत अकारा । तैसे दरसे यह संसारा ॥ ३ ॥ मिट गया बादल
रहा अकासा । ऐसे आतमको न विनासा ॥ इस बहुरंगीका पार
न पाया । कहैं कवीर गुरु भेद लखाया ॥ ४ ॥ पाया भेद भया
उजियारा । साहब दरस्यो पार ओंकारा ॥ यही ज्ञान रतन है
भाई । जो पावै सुख विलसे आई ॥ ५ ॥

साखी-ज्ञान रतनकी कोठरी, चुपकर दीजे ताल ।
पारिख आगे खोलिये, शीतल बचन रिसाल ॥

रमनी-गुरु महिमा ॥

गुरु मिले तो सत्य लखावे । बिन गुरु अन्त न कोऊ पावे ॥
जिन गुरुकी कीन्ही परतीती । एक नाम कर भवजल जीती ॥ १ ॥
गुरु प्रेमते जीव मराला । गुरु स्नेह बिन काग कराला ॥ गुरु दया
गुरु शब्द हमारा । गुरु परगट गुरु गुप्त अधारा ॥ २ ॥ गुरु पृथ्वी
गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थल महाँ कीन निवासा ॥ चन्द सूर