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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(४४८)

कवीरपंथी-

कमाई । भक्ति कमाय भक्त कहाई ॥ भक्त कहाइके रहै उदासा ।
सत्य गुरु मिलै सत्य विश्वासा ॥ ९ ॥ सतगुरु मिलै तो संशय
भागे । सो फिरि बहुरि अंक नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके
नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥ १० ॥ सतगुरु पाय दुसर
घर नाही । आवागमन रहित घर जाहीं ॥ कहैं कवीर सत्य करि
माने । साधु गुरु नहीं अन्तर जाने ॥ ११ ॥

सा०-साधु बड़े परमार्थी, चन ज्यों बरषे आय ।
तपन बुझावैं औरकी, अपनो पारस लाय ॥

रमनी-वैरागी (साधु) रहनी ॥

वैरागी उनमुन घर करई । हर्ष शोक कछु चित्त न धरई ॥
रुखा सूखा करै अहारा । निसि दिन आतम तत्त्व सम्हारा ॥ १ ॥
विकसित बदन भजनके आगर । शीतल सदा प्रेम सुखसागर ॥
रहिता रहै बहै नहीं कबहीं । सो वैरागी पावे हमहीं ॥ २ ॥ हमें
पाय हमहीं अस होई । आवागमन मिटावे सोई ॥ आवा-गमन
मिटावै काई । रहैं अधीन तत्त्व समाई ॥ ३ ॥ काया धरि काया कहैं
बोधे । आवागमन रहित तत सोधे ॥ जीवत मरे मरे पुनि जीवैं ।
उनमुनि बसे महा रस पीवैं ॥ ४ ॥ महाशून्यमो रहै समाई । मरै न
जिवे आवे न जाई ॥ ऐसी विधि वैरागी सोई । हम मिलि रहै
हमहि अस होई ॥ ५ ॥ भीतर रहनी कहा बनायी । बाहर रहनी
देहुँ बतायी ॥ वैरागी आसन दृढ होई । रहै अजाँच जाँचे नहीं
कोई ॥ ६ ॥ वैरागी अस चाल चलावे । तजै अखज तव हंस
कहावे ॥ मद्य मांसके निकट न जाई । करै अहार सो काल कसाई
॥ ७ ॥ प्रेम भक्ति आने उर माहीं । द्रोह घात दिसि चित्तवै नाही ॥
जीव दया राखे हिय जानी । मन वच कर्म घात नहीं आनी ॥ ८ ॥
हंस दशा धरि पंथ चलावे । श्रवनि कण्ठी तिलक लगावे ॥ क्रोध