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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(४४१)

तुरत छुडायो ॥ गुरु कहै सोई है साँचा । विनु पगिचय सेवक है काँचा ॥ कहै कवीर गुरु आपु अकेला । दश औतार गुरुका चेला ॥
साखी-राम कृष्ण ते को बडा, उनहु तो गुरु कीन ।
तीन लोकके वै धनी, गुरु आगे आधीन ॥

रमनी—गुलाहाकी ॥

जुलहा कहि कहि जग भरमाया । मो जुलहेका मरम न पाया ॥
समझ विना जिव भरम भुलाना । विनही सूत न पसारे ताना ॥
धरनि अकास बिच खाड खुदाई । चन्द सुर दोय नली भराई ॥
आदि नामका पूरन पूरा । चेतहु अंधा पथ है दूरा ॥ सूत कुसूत बुने नर कोरी । वाको सुरति निरति है जोरी ॥
हम षट दर्शन हम षट भेखा । हमही तत्व अनूप अलेखा ॥
हम हैं सकल सकल हम माहीं । हमते और दूसरा नाही ॥
सबही कर्म हमारा कहिया । हम करमनते न्यारा रहिया ॥
निरगुन सगुन खेल हमारा । हमरा चौदह लोक पसारा ॥
बन्दीछोर है विरद हमारा । हमही बन्दी छुडावन हारा ॥
जुग जुग बन्द छुडावन आये । ताते बंदीछोर कहाये ॥
कहै कवीर हम अगम अपारी । स्वसम नली सो एक हमारी ॥

रमनी—स्वरूप महिमा ॥

जीवत जीव जागनी ठानै । माया ब्रह्म दोऊ पहिचाने ॥
तीन सुरूप एकहि देखा । ताको निहचल विज्ञान विसेखा ॥
माया ब्रह्म दोऊते न्यारा । आगे पारब्रह्म उजियारा ॥
विज्ञानीको कोइ नहि पावे । वाहि स्वरूप नजर नहि आवे ॥
तूनकी ओट पहाड़ लुकाना । ऐसे ताहि दूर मति जाना ॥
है हममें हमही सा देखा । निज सुरूपको यही विशेषा ॥
आवे कहीं कहुँ नहि जाई । समुन्द्र लहरि समुन्द्र समाई ॥
ज्यों बालक खेले फिरकाई । देखि परे तो सकल फिराई ॥
जो हिरदामें होय रहे थीरा । ताका विनसे नाहि शरीरा ॥
चंचल निहचल यहि रूपा । निरखे देखि यहि वस्तु