कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 454, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(४४०)
कवीरपंथी-
सा०-जब लग विरह उपजे नहीं, तब लग नहिं पहिचान ।
प्रेम परगटचो जब अंगमें, मन तब किया कुरबान ॥
रसनी-गुरुटककी ॥
जाको टेक एक गुरु दाता । ताको और कछु न सुहाता ॥
पय जो बिगडा माखन होई । बिगडे छाँछ कहै नहिं कोई ॥
पतिव्रताको लाँछन होई । गनिका बिगडे कहत न कोई ॥
सूरा भागा आप विगोई । कायर भागा कहै न कोई ॥
नटनी नाचै आपा खोई । देखन हार पड़े नहिं कोई ॥
भूला मनको जो समुझावे । आदि अंत सोइ संत कहावे ॥
कहैं कवीर हम एता कहिया । सांच माने सो नरकहिं गइया ॥
सा०-डालकी चूकी बांदरी, शब्दका चूका हंस ।
कहैं कवीर धर्मदास सो, दोऊ निरफल वंस ॥
रसनी-गुरु महिमा ॥
सतगुरु बोले अमृत वानी । गुरु विन मुक्ति नहीं रे प्रानी ॥
गुरु हैं आदि अंतके दाता । गुरु है मुक्ति पदारथ आता ॥
गंगा काशी अस्थाना । चारि वेद गुरु गमते जाना ॥
गुरु है सुरसरि निर्मल धारा । विनु गुरु घटना हो उजियारा ॥
अडसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आवे । गुरुकी दया घर बैठहिं पावे ॥
गुरु कहै सोई पुन करिये । मातु पिता दोऊ कुल तरिये ॥
गुरु पारस परसे नर लोई । लोहते कंचन होय सोई ॥
शुक देव गुरु जनक बिदेही । वो भी गुरुके परम सनेही ॥
नारद गुरु प्रह्लाद पठाये । भक्ति हेतु जिन दर्शन पाये ।
कागभुसुंड शम्भु गुरु कीन्हा ॥
अगम निगम सबही कहि दीन्हा । ब्रह्मा गुरु अग्निको कीन्हा ॥
होम यज्ञ जिन आज्ञा दीन्हा ॥ वशिष्ठ गुरु किया रघुनाथा ।
पाइ दरस तब भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरना ।
पाइ भक्ति तब तारन तरना ॥ नारद दिच्छा धिमर सो पायो ।
चौरासी सो