कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
अनूपा ॥ बिछरन मिलन होय कछु केरा । जैसे सोवै सुपना तेरा ॥
सोवे जहाँ तहाँ उठि जागे । पंछी मनि राह उठि लागे ॥ आगे पीछे
मध्यम कोई । ऐसा सहज सरूपी होई ॥
साखी-सहज सरूपी होय रहै, दिलकी दुविधा जाय ।
अकह कवीरा क्या कहै, उलटि कालको खाय ॥
रमनी-कालजीत ॥
काल न आवे निहचल होई । अब यह जतन करो सब कोई ॥
निहचल चित्त न कबहुँ चलावे । ताको काल न कबहुँ सतावे ॥
परगट कहा तब है जग माहीं । जागे जाकूँ सूझे नाहीं ॥ जो कोइ
चेतन होय करि जागे । ताके तसकर कबहुँ न लागे ॥ कलह
कल्पना सब विधि खोई । निहचे सहज सरूपी होइ ॥ इच्छा ते
जग जीवत नाई । ब्रह्म अनिच्छित गहै चित लाई ॥ कारज कारनकी
यह बाता । माया माहीं ब्रह्म समाता ॥ माया माहीं ब्रह्म फंदाया ।
ताते पुरुष प्रकृति कहाया । अच्छर है इक और अनूपा ॥ पारब्रह्म
अन इच्छित रूपा । पूर्ण ब्रह्मते न्यारा होई । परमहंसनको प्यारा
सोई ॥ हंसदसा होय जु भाई । ताको काल कबहुँ नहिं खाई ॥
साखी-काल काल सबही कहे, काल न जाने कोय ।
जेती मनकी कल्पना, काल कहावै सोय ॥
रमनी-निर्वाणपद ।
ऐसा ब्रह्म विचारो भाई । शब्द उठै धुनि कहाँ समाई ॥ काष्ठ
मथि २ अगिन उपाई । उलटि अग्नि काष्ठको खाई ॥ दोनों नास
भयो इक ठाऊँ । उड़ गइ भसम धरेका नाऊँ ॥ भस्म भई उड़
कहवों गई । सो गति याकी ऐसी भई ॥ सुए जीव जइहो जाहाँ ।
जीवतही ले राखो ताहाँ ॥ जैसो केल कदली खंद । ऐसा पारब्रह्म
गोविन्द ॥ खोजत खोजत पायो ठौर । मैं जानो कछु आगे और ॥
नहिं कछु नहिं कछु नहिं कछु सोई । पंछी पीछे खोज न होई ॥