कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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दास कवीर तहां लौलीन । आगे पन्थ न पीछे चीन ॥
सा०—सबही घर है गांवमें, गाँव कौन घर माहिं ।
ऐसे सब जग ब्रह्ममें, न्यारो कितहुँ नाहिं ॥
सत्यनाथ ।
रमैनी—स्वरूप पहिचान ॥
आपने रूप राम हम पाये । ताते जीवन मुक्ति घर आये ॥
तब हम भक्ति कीन हरि केरी । आसा राखी मनसा घेरी ॥ आसा
मनसा भई निरासा । छुट गये बन्धन भये खुलासा ॥ तब हम
योगयुक्ति चित धरते । अष्ट कला मन पवना भरते ॥ अब हम
पायो अपना भेव । आपुहि कर्ता आपुहि देव ॥ तब हम जान्यो
यह अब जानी । अन जानेसे करी पहिचानी ॥ गयो भरम
मन बव्यो हुलास । सहजहिं राम कवीरा दास ॥
सा०—अर्थ धर्म अरु काम तजि, देह काल सिर धूर ।
संशय नाहीं मुक्तिमें, ब्रह्म रहा भरपूर ॥
रमैनी एकतार ।
भजि यकतार भ्रममति भूलो । है यकतार सबनको दूलो ॥
बिन यकतार कस पतिवरता । एक पिया विन सबै अविस्था ॥
१॥ राम राम कहि भक्ति दिठावे । बिन यकतार राम कहँ पावे ॥
भागवत सौ पुरान उचारे । निगम चारि सुनि श्रुति विचारे ॥२॥
वेद पढै पढि अरथ बतावे । विन यकतार थाह नहिं पावै ॥ बिन
अंकूर बीज नहिं ऊगे । विन यकतार हंस कहँ पूगे ॥ ३ ॥ बिन
यकतार भक्ति क्या कीजे । गुरु प्रताप अमीरस पीजे ॥ रंकार
जहँ अनहद गाजे । ता ऊपर यकतार विराजे ॥४॥ इंगला पिंगला
सुषमन साधै । ले उदान पौन तहँ बांधे ॥ अरधै उरधै सुरति
लगावे । विन यकतार पीव नहिं पावै ॥ ५ ॥ वेद पुरान अरु
शास्तर सोधै । अर्थ करि करि मन परबोधै ॥ जहँलग वेद तहांलग