कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(४२३)
पाया । बहुरि न जोनी संकट आया ॥ ५ ॥ छठईं छूति करो मत कोई । सब घट ब्रह्म व्यापक होई ॥ सातम नाम सुधा रस पीजे । निर्मल नाम साहेबको लीजे ॥ ६ ॥ ( सातें सतनाम रस पीजे । सिरके सांटे साहिब लीजे ॥ ) आठम अनुभव लेहु बिचारी । सब घट पुरुष कहूँ नहि नारी ॥ ७ ॥ नौ नारी देखो इक साथ । है हीरा जो आवै हाथा ॥ दशों दिसा मन काहेको धावे । अन्दर खोजे साहब पावे ॥ ८ ॥ ग्यारह आवागमन न होई । जो सतनामहिं चीन्हे कोई ॥ द्वादश ऊपर बोले ओई । जरा मरन दुख नासे सोई ॥ ९ ॥ ( द्वादश ऊपर बोले सोई । जरा मरनके भरम न होई ॥ तेरस तनकी तपन बुझाई । होय लौलीन साहब गुन गाई ॥ १० ॥ चौदश चञ्चल निश्चल कीन्हा । तब साहिब आपन करि लीन्हा ॥ पूनो प्रेम पियाला पीजै । सिरके सांटे साहिब लीजै ॥ ११ ॥ सोलह तिथि यहि विधि भाखा । सबहि कला विचार अभिलाखा ॥ सोलह कला सम्पूर्णन भयऊ । कहैं कवीर सत लोके गयऊ ॥ १२ ॥
साखी-सोरह सुत सो पुरुषके, सोरह कला विहार ।
सत्यलोक सो पावई, सोलह करे विचार ॥
अथ रमैनी अक्षर छण्डकी ॥
अच्छर खानी अच्छर बानी । अच्छरसे अच्छर उत्पानी ॥ अच्छर आदि बसे आकास । अच्छर चन्द सूर परकास ॥ १ ॥ अच्छर ब्रह्मा विष्णु महेस । अच्छर नारद गौरि गनेस ॥ अच्छर धरनि पवन औ पानी । अच्छर आदिहि अगम बखानी ॥ २ ॥ अच्छर नव औतार जो भयऊ । बिन अच्छर कोउ भेद न लहेऊ ॥ बिन अच्छर नाहिं निवेरा । अच्छर बिन सब पुंघ कुहेरा ॥ ३ ॥ अच्छर निरंकार परमाना । अदली अच्छर अदल अमाना ॥ अच्छर काया अच्छर माया । अच्छर जग सतगुरु हो आया ॥ ४ ॥
(४२४)
कवीरपंथी—
अच्छर मंत्र जंत्र सब पूजा । विन अच्छर कोइ और न दूजा ॥
अच्छरमें सब जगत भुलाना । विन अच्छर नहिं उपजे ज्ञाना ॥६॥
अच्छर विन कारज नहिं रती । विन अच्छर पावे नहिं गती ॥
अच्छरमें सब जग उपजाया । अच्छर शून्य विशून्य समाया ॥६॥
अच्छर आवै अच्छर जाई । अच्छर काल सबनको खाई ॥
अच्छर सबका भारै लेखा । अच्छर गुप्त परगट होय देखा ॥७॥
सतगुरु अच्छर आनि बतावा । जीवनको भय फंद छुडावा ॥
निअच्छर की पावे सहिदानी । कहैं कवीर तब छूटे प्रानी ॥८॥
सार्वी-अच्छर पावे प्रेम सो, धोखा देह बहाय ।
प्रेम भक्ति जाने विना, जिव परले तर जाय ॥ १ ॥
रमनी । प्रेम अच्छरकी ।
अच्छर प्रेम लखै जो कोई । प्रेम विना सब दुनी विगोई ॥
जो कोइ करै प्रेम मो बासा । जरा मरणकी छूटै आसा ॥ १ ॥
जोगी गोरख बहु विधि गावैं । बहुत प्रेम सो नाद बजावैं ॥ नाद
बजाय भेद नहिं पावैं । छूटै प्रान बहुत पछतावैं ॥२॥ एक प्रेम
संन्यास विचारे । तीरथ वरत करि काया गारै ॥ करै तपस्या
होमैं काया । अच्छर प्रेम कहो कहैं पाया ॥३॥ एक प्रेमसे पढ़ै
पुराना । करम भरम कथि भावै ज्ञाना ॥ पाप पुण्य बहु विधि
अरथावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ ४ ॥ एक प्रेम गहि
कुलकी कानी । डालि तोड आमकी आनी ॥ करवा चौथ करै बहु
पूजा । अच्छर प्रेम कहो कहैं सूजा ॥ ५ ॥ तुरुक कतल करि
दीन बनावै । पीर औलिया बहुत मनावै ॥ आयत बैत हदीस
अति गावै । धारै प्रेम मक्के चलि जावै ॥ ६ ॥ पढ़ै प्रेम औ हुरी
चलावै । अच्छर प्रेम कहो कहैं पावै ॥ जीव दया दिलमें पहिचाना ।
सोई प्रेम निज प्रेम समाना ॥ ७ ॥
शब्दावली
(४२५)
प्रेम प्रेम सबही कहै, प्रेम न चीन्है कोय ।
जाहि प्रेम साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ॥ २ ॥
रमैनी रहनी गहनी ।
रहनि गहनि पावे जो कोई । शब्द सार निअच्छर सोई ॥
अच्छरमें निहअच्छर सारा । ताहि पाय कोइ हंस हमारा ॥ १ ॥
हंस होय परखे वह वानी । अच्छर भेद करै पहिचानी ॥ अच्छर
भेद करै कडिहारी । निहअच्छर मई हंस उवारी ॥ २ ॥ अच्छर
निहअच्छर भेद निनारा । जो परखे सो भवजल पारा ॥ कहै
कवीर जो कहै विचारै । आप तरे औरनको तारे ॥ ३ ॥
शब्द सार निहअच्छरा, जब तब करियो याद ।
अन्त फलेगी माहिली, ऊपरकी सब बाद ॥ ३ ॥
रमैनी यमजाल ।
तीन लोक जम जाल पसारा । नेम धर्म षटकर्म अचारा ॥
आचारे सब दुनी भुलानी । सार शब्द कोउ विरले जानी ॥ १ ॥
सत्तपुरुषको जाने कोई । तीन लोक जाते पुनि होई ॥ करम भरम
तजि शब्द समावे । इस्थिर ज्ञान अमरपद पावे ॥ २ ॥ सत्यशब्द
को करे विचारा । सो छूटे जमजाल अपारा ॥ कहै कवीर जिन
तत्त विचारा । सोहँ शब्द है अगम अपारा ॥ ३ ॥
शब्द हमारा सत्य है, सुनि मत जाहु सरख ।
जो चाहे निज मुक्तिको, लीजो शब्दहिं परख ॥ ४ ॥
रमैनी—सांचाकडिहार ॥
नाम अमलमें रहे मतवाला । प्रेम अमीका पीवे प्याला ॥
ज्ञान दीष निज भीतर बारा । सो कहिये सांचा कडिहारा ॥ १ ॥
और अमलको रंग न करई । माया ममताको पर हरई ॥ सार
शब्दमें ध्यान लगावे । सो कडिहार जम जाल बचावे ॥ २ ॥
दया छमा औ शील विचारा । धीरज धरम संतोष अचारा ॥
(४२६)
कवीरपंथी—
यह सब धरे ममता मारे । सो कडिहार जगत जल तारे ॥३॥
शब्द सरोतर हिरदय साँचा । छाडि परपंच सत्यसे राँचा ॥
सत्यनाम मो रहै न काँचा । सो कडिहार जगत सो बाँचा ॥४॥
कुल करनाको मेटै धोखा । समता ज्ञान सु अंतर पोखा ॥
ज्ञान रतनके पूरे नौका । सो कडिहार बैठिहै चौका ॥५॥
दया छिमा संतोष विचारा । शील वैराग ज्ञान अधारा ॥
काम क्रोध चिन्ता नहि परई । सो कडिहार आरति करई ॥६॥
आसा वासा मनको नासे । माया मोह न फटके पासे ॥
कर्म कला सो तिनका तोरे । सो कडिहार नारियल मोरे ॥७॥
सिख साखा सब प्रेम बढावैं । बहुत भांति ते सेवा लावैं ॥
कोटिक शिष्य करै सनमाना । रह कडिहार शब्द लपटाना ॥८॥
गुरुका शब्द सदा परकासे । भेद भरम का दुविधा नासे ॥
नहिं तो कालरूप कडिहारा । सब जीवनका करै अहारा ॥९॥
लोभ मोहकी धरे सगाई । शब्द छाडि जग करै ठगाई ॥
शब्द चाल हिरदे नहि आवे । सो कडिहार कस लोक सिधावे ॥१०॥
आसन चाँपै फूलके, धरै जु जमको भाव ।
कहैं कवीर तब जानि है, पड़े वज्रको चाव ॥६॥
रमनी—सत्यनाम ।
सत्यनाम सुमिरो मन माहीं । जहवाँ रजनी वासर नाही ॥
आदि अन्त नहि धरनि अकासा । पावक पवन न नीर निवासा ॥१॥
चन्द सूर तहवाँ नहि कोई । प्रात सांझ तहवाँ नहि दोई ॥
कर्म भर्म पुण्य नहि पापा । तहवाँ जपियो अजपा जापा ॥२॥
झलमलाट चहुँदिस ऊँजियारा । वरषे तहाँ अगरकी धारा ॥
तहँ सतगुरुको आसन होई । कोटि माहिं जन पहुँचे कोई ॥३॥
दसो दिसा झिलमिल तहँ छाजा । बाजे तहाँ सु अनहद बाजा ॥
तहवाँ हंसा ध्यान लगावे । बहुरि न जोनी संकट आवे ॥४॥
शब्दावली
(६२७)
उहवाँको सुख वरनि न जाई । सतगुरु मिलै तो देह लखाई ॥
ज्यों गुंगाको सुपना देखो । ऐसो जीवत जनम को लेखो ॥ ५ ॥
सा०-मन पवना दुइ थिर हुआ, भया प्रेम परकास ।
जीवातम जहँ रमि रहा, पूरन ब्रह्म विलास ॥ ६ ॥
रमनी—रहनी पहचान ।
सतगुरु सो सतनाम सुनावे । और गुरु कोइ काम न आवे ॥
तीरथ सोई जो मोछै पापा । मित्र सोई जो हरे संतापा ॥ १ ॥
जोगी सो जो काया सोधे । बुद्धि सोई जो नाहि विरोधे ॥ पण्डित
सोई जो आगम जानै । भक्त सोई जो भय नहि आने ॥ २ ॥
दाते जो औगुन परहरई । ज्ञानी सोइ जीवता मरई ॥ सुक्ता सोई
सतनाम अराधे । श्रोता सोई जो सुरतिहिं साधे ॥ ३ ॥ सेवक
सोई गहै विश्वासा । निसिदिन राखै संतन आसा ॥ सतगुरु का
लोपै नहि बाचा । कहै कवीर सो सेवक सांचा ॥ ४ ॥
जीवन मरन जानै नहीं, अंध भया सब जाय ।
द्वारे दाद न पावई, अनेक जनम पछताय ॥ ७ ॥
अथ कवीर अष्टाङ्गयोग प्रारम्भः ।
अविगत योग रमनी ॥ १ ॥
अविगत लीला अगम अपारा । धरनी धन्यो संत औतारा ॥
अविगत लीला अगम अलेखा । अबरन बरन रूप नहि रेखा ॥ १ ॥
जा गति सुरनर सुनि नहि पाई । अविगतकी गति वरनि नहि जाई ॥
शेष सहस मुख निसिदिन गावैं । उस्तुति करत पार नहि पावैं
॥ २ ॥ वेद कोटि सहस गुण गावे । अविगतकी गति बरनि नहि
जावे ॥ कहैलों कहौ कहा नहि जाई । अविगतिकी गति अविगति
भाई ॥ ३ ॥
(४२८)
कवीरपंथी-
सा०-अविगतिकी गति विगत है, मन बुधि चितते दूर ।
आपा मेटि सतगुरु मिलै, पावे दरस हजूर ॥ १ ॥
कर्मयोग रमैनी ॥ २ ॥
योगी योग बहुत जो करई । क्रिया योगते नहिं निस्तरई ॥
फिर फिर आवै फिर फिरि जाई । कर्महि कर्म बहुत उरझाई ॥
होय निहकर्म नाम जो ध्यावे । योनी संकट बहुरि न आवे ॥ कर्महि
कर्म बँधा बहु भारा । कर्महि कर्म अटका संसारा ॥ देह कर्म जो
दीन उठाई । मनका कर्म छुटै नहिं भाई ॥ जब लग मनका कर्म
न खोवे । तब लग मन निरमल नहिं होवे ॥ मनकी क्रिया जबै
मिटि जाई । तब प्रभु मिलै सहजमें आई ॥ मने निरञ्जन आपुहिं
होई । याको जाने विरला कोई ॥
तन क्रियाको खाड़िके, मन क्रिया रुचि राख ।
कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निज भाख ॥ २ ॥
तत्कर्मयोग रमैनी ॥ ३ ॥
तन कर करनी देहु बहाई । मन कर करनी सत्य मिलाई ॥
मनकी क्रिया सत्य जो होई । ताहि समान क्रिया नहिं कोई ॥ १ ॥
सांख्य योग करना है-सारा । जेहिते उतरे भवजल पारा ॥ सत
क्रिया ते ज्ञानी भयऊ । सत क्रिया साहब मिलि गयऊ ॥ २ ॥
सत क्रिया सत पुरुषहिं ध्यावे । सत क्रिया सतनाम मिलावे ॥ सत
क्रिया जग होय उदासा । सत क्रियाते मुक्ति निवासा ॥ ३ ॥
समौ०-सत्य क्रिया निर्वाण है, है तन मन ते भिन्न ।
मन पवना दिठ करि गहै, सत्यनाम निज चिन्ह ॥ ३ ॥
अष्टांगयोग अन्तर्गत.
सांख्य योग रमैनी ॥ ४ ॥
अब मैं सांख्य योग बतलाऊँ । योग अष्टाङ्गके लछन दिख-
लाऊँ ॥ इक इकके चारि चारि लच्छन । जो जाने सो होय
विचच्छन ॥ १ ॥ यों तो कहे लछन बतीसा । अष्टांगयोगमें एकहि
शब्दावली
(४२९)
दीसा । अष्टांगयोग सांख्य जो जाने । और लच्छन बत्तीस पिछाने ॥ २ ॥ प्रथम योग ज्ञान बखाना । दूसर विचार कहै परमाना ॥ तीसर योग विवेकहिं जाने । चौथा योग शील परधाने ॥ ३ ॥ पँचवां योग संतोष बखाना । योग निरवैर छठवहिं माना ॥ सतवाँ सहज योग है भाई । अठवाँ शून्य एक लौलाई ॥ ४ ॥
समौ-तेई भवसागर तरे, या करनी निज सार ।
सत क्रिया सतसो गहै, सत्यनाम आधार ॥ ४ ॥
ज्ञानयोग १ रमैनी ॥ ५ ॥
प्रथम योग ज्ञान है भाई । तेहिते सुख परमपद पाई ॥ निरालंब अलब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥ १ ॥ करम भरम तजि साहब जाने । भली बुरी कछु चित्त न आने ॥ निरवासिक वास नहिं कोई । जड़ल वस्ती एके होई ॥ २ ॥ होय निरभय रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥ द्वैत विचार न मनमें आवे । आतमरूप सदा दरसावे ॥ ३ ॥
समौ-एक नामको जानिके, दूजा देह बहाय ।
तीरथ वरत जप तप नहीं, आतम ब्रह्म समाय ॥ ५ ॥
विचारयोग २ रमैनी ॥ ६ ॥
दूजा योग विचार सम्हारे । निरमोही होय आप विचारे ॥ लै निरद्वन्द्व रहै जगमाहीं । जगके सुखसों लागे नाहीं ॥ १ ॥ मातु पिता सुत नारि निभावे । काम क्रोध मद लोभ भुलावे ॥ होय निशंक शब्द सो लागे । अनहद सुनै आतमा जागे ॥ २ ॥ देह अदेह करै निरुवारा । देही छोड़ विदेह पैसारा ॥ देह छोड़ विदेह समाना । हँसा पावे पद निर्वाना ॥ ३ ॥
समौ-जो कुछ करे सुविचारके, पाप पुन्य ते न्यार ।
नाम कवीरा जानिके, जाय पुरुष दरबार ॥ ६ ॥
(४३०)
कवीरपंथी—
विवेकयोग ३ रमनी ॥७॥
तीजो योग विवेक कहावे । विन विवेक कोइ पार न पावे ॥
जाके समाधान मन होई । भली बुरी कहि जावे कोई ॥ १ ॥
समदर्शी सम ज्ञान विचारे । सब घट भीतर ब्रह्म निहारे ॥ प्रीति
गहै सो नाम समाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ २ ॥
जाके शान्ति होय घट माहीं । कोइ कछु कहो क्रोध मन नाहीं ॥
सोइ विवेकी सत पद जाने । सबहीं आतम एक पिछाने ॥ ३ ॥
समौ—जब लग नहीं विवेक मन, तब लग लगै न तीर ।
भवसागर नामी तरे, अस कथि कहैं कवीर ॥ ७ ॥
शील योग ४ रमनी ॥८॥
चौथा योग शील कहि दीन्हा । बिना शील साहब नहिं चीन्हा ॥
निर्मल सोचहिं सोच विचारे । सुच रुच दया धरम डर धारे ॥ १ ॥
मनको संयम करै जो जानी । पांचो पकड़ि एक घर आनी ॥
सत्यशब्द भासे संसारा । सतही ते उतरे भवपारा ॥ २ ॥ होय
सरोतर सत्य बखाने । भावे भला बुरा कोइ मानै ॥ बुरा कर्म ते
लजा करई । बिना विचार नहीं पगु धरई ॥ ३ ॥ जो काहुको
होय उपकारा । मन बच कर्म करै उपचारा ॥ शीलवान जग
अस बुधि पाई । आपन दिसि वह चूके नाहीं ॥ ४ ॥ शील पाइ
इन्द्री निज साधे । गुरुगम पन्थ नाम अवराधे ॥ जियत मरै
सोई शिलवन्ता । शब्द विचारि गहै मगु कन्ता ॥ ५ ॥
समौ—शील छमा जब ऊपजे, अलख दृष्टि तब होय ।
बिना शील पहुँचे नहीं, कोटि कथै जो कोय ॥ ८ ॥
संतोषयोग ५ रमनी ॥९॥
पंचवों योग संतोष बखाना । विन संतोष बूढे अज्ञाना ॥ मानो
नहीं रंक औ राजा । होय अमान नहिं काहुसो काजा ॥ १ ॥
नर्क स्वर्ग बंछे नहिं कोई । होय अबंछक साहिब सोई ॥ मन
शब्दावली
(४३१)
स्थिर करि प्रेम उपजावे । अनहद शब्द सुने चित लावे ॥ २ ॥
जो कछु कर्म योगते आवे । जानि प्रारब्ध शीस चढावे ॥ मनमें
छोभ न लावे कबहीं । जो कछु आवे सह ले सबहीं ॥ ३ ॥ होनी
होय टले नहिं काहू । करि असंतोष मिले का लाहू ॥ संतोषी हो
ऐसी मति राखे । निराश वचन कबहुं नहिं भाखे ॥ ४ ॥ सोई
योग संतोष कमावे । काल जाल ते जीव छुडावे ॥ विन संतोष
काल सुख जाई । पाई संतोष काल बहाई ॥ ५ ॥
समौ-निरमल शब्द प्रकाश करि, रह सुख सेज समय ।
सत्यनाम संतोष विन, सत्यलोक नहिं जाय ॥९॥
निरवर योग ६ रमैनी ॥ १० ॥
छठवें योग है निरवैरा । जासे जगमें होय निवेरा ॥ सब घट
भीतर एक करि जाने । होय सुहृद प्रेमहि परमाने ॥ १ ॥ सुखदाई
सबहिनको भावे । जल सरूप होय अग्नि बुझावे ॥ शीतल होय
सबहिनको भावे । समता होय तुरमता पावे ॥ २ ॥ निरवैरी
निहकाम रहावे । साई सेती नेह लगावे ॥ साईके सबही जग
माहीं । कापर दाय़ा कापर नाहीं ॥ ३ ॥ अपनो रूप जगत
विखराना । कोहे आपन कोहै आना ॥ कासन बैर करो मोर भाई ।
अपनहि रूप रहा जग छाई ॥ ४ ॥ अपनो दांत जीभको काटे ।
तो कहैं कोई जीभ कहैं छांटे ॥ आपन अंगुरी आंख गडावे । तो
कहैं अंगुरी काटि गिरावे ॥ ५ ॥ एकहि आतम सकल समाना ।
मायाके गुण आनहि आना ॥ अहै निजरूप सकलमें एकै । जो
वस काशी सो बस मकै ॥ ६ ॥ मायावश हो सब जग भूला ।
मोर तोरके गर्वहिं फूला ॥ निरवैरी निहकाम सु होवे । सतगुरु
ज्ञान बैर सब खोवे ॥ ७ ॥
समौ-कंचन कांच है एक सम, दुष्ट मित्र सब एक ।
दूजा भाव न जानई, एक नामकी टेक ॥ १० ॥
(४३२)
कवीरपंथी—
सहज योग ७. रसनी ॥ ११ ॥
सतवाँ योग सहज है मीता । सहज भावसो सबही जीता ॥
एक विचार प्रेम उपजावे । पाँचै इन्द्री सहज समावे ॥ १ ॥
निरलोभी होय लोभ भुलावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥
निरल्लेप कितहुँ नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागै ॥
सहज ध्यान रहै लौलाई । सहजे सहजे पार लगाई ॥ ३ ॥
जा घट ज्ञान सहज समावे । सहजे माया आप भुलावे ॥
सहजे परिचय आतम होई । ब्रह्मरूपमें सहज समोई ॥ ४ ॥
सहज समाधि भले जग जाने । गुरु प्रतापते सहज पिछाने ॥
जप तप योग सहजमें आवे । काया कष्ट न कबहुँ करावे ॥ ५ ॥
आतम परिचय सहजहिं पावे । खुले नैन सो दरस करावे ॥
विना सहज दूसर कछु नहीं । सहजेमें सब रहा समाई ॥ ६ ॥
सहज योग जो कोई धरै । आप तरे औ जगको तारे ॥
सहजहिं आतम ब्रह्म प्रकाशा ॥ सहजे जीव मुझान विलासा ॥ ७ ॥
विना सहज नहीं भव पारा । विना सहज बूढे भव धारा ॥
कहे कवीर सुनो नर लोई । सहजे सहज भया सब कोई ॥ ८ ॥
समौ-सब जग झूठा जानिके, गहे नाम सत सार ।
सहजे सहजे प्रकट भया, सतगुरु शब्द सम्हार ॥ ११ ॥
शून्य योग ८ । रसनी ॥ १२ ॥
आठम योग शून्य है नीके । विना नाम जप लागु सुफीके ॥
सहजे नाम विदेह समावे । विना नाम कहाँ सुख पावे ॥ १ ॥
शून्यहिते सब जग उपराजा । शून्यहिते भव शब्द अवाजा ॥
शून्य सहज एक नाम विराजे । अनहद बाजा बाजन बाजे ॥ २ ॥
सहज शून्य जो लावे ध्याना । अलख लखे आप बलवाना ॥
नाम सहज शून्यमें होई । अलखहिं लखे आप है सोई ॥ ४ ॥
शब्दावली
(४३३)
सहज शून्य जो ध्यान लगावे । भौजल तरत वार नहीं लावे ॥
सुराते शब्दमें सहज समावे । सहज समाधि परमपद पावे ॥६॥
जब लग नाम विदेह न आवे । तब लग सहज समाधि न पावे ॥
ध्यान विदेह औ ज्ञान विदेहा । सहज समाधिमें चहिये एहा ॥६॥
ध्यान विदेह लखे जब प्रानी । विदेह नाम मिले परमानी ॥ काया
नाम सबे जग जाने । नाम विदेह विरले पहिचाने ॥ ७ ॥
समौ-ज्ञान विचार विवेकसो, शील संतोष समय ।
नाम गहे निरभय रहै, सहज सतलोक समय ॥ १२ ॥
शब्द सनेही होय रहै, जगते रहै उदास ।
सुख सागरमें घर करै, सत्य नाम विश्वास ॥
अब्दांगयोगका सार (१) ज्ञान परीक्षा साखी ।
ज्ञानी लक्षण चार हैं, सुनि त्यागो विस्माद ।
निरालंब निहभ्रमपुनि, निर्वासिक निहस्वाद ॥ १ ॥
भावार्थ-ज्ञानकी परीक्षा चार गुणोंसे होती है-
१ निरालम्ब, २ निःभ्रम, ३ निर्वासना, ४ निःस्वाद ॥
(२) विचार परीक्षा ।
विचार परीक्षा चार है, निर्मोही निरबन्द ।
निःशंक निरावरण सोई, छुटे कालको फन्द ॥ २ ॥
भावार्थ-विचार योगकी प्राप्ति इन चार लक्षणोंसे जानी जाती है-१ निर्मोही होवे, २ निर्वन्ध हो, ३ निःशंक हो, ४ निरावरण अर्थात् आत्मरूपमें सन्देह न हो ॥
(३) विवेक परीक्षा ।
सर्वज्ञी सुचेत होय, सावधान मन मार ।
सार आही सुजानिये, विवेक परीक्षा चार ॥ ३ ॥
भावार्थ-१ सर्वज्ञी अर्थात् किसी बातको सुनतेही उसकी तहको पहुँच जाना । २ सुचेत अर्थात् सदा हृदयका जाग्रत
(४३४)
कवीरपंथी-
रखना, गाफिल न होना, प्रमादमें न भूलना, ३ सावधान मन इन्द्री आदि सबोंपर सदा दृष्टि रखना, जिसमें ये ठगने न पावें। ४ सारग्राही-कैसा भी प्रसंग उलटा-सुलटा सम्मुख आकर उपस्थित हो उसमेंसे उत्तम सार ले लेना ॥
(४) शील परीक्षा ।
शुचि साधन संयम करन, श्रवण करन गुरु वानि ।
विनय वचन सब सो कहै, रूप आपनो जानि ॥४॥
भावार्थ-जिसमें शील आता है-उसमें चार गुण आकर वास करते हैं। १ पवित्रता-भीतर बाहर दोनों प्रकारसे पवित्र रहता है। २ संयम-शारीरिक मानसिक जितने कार्य हैं सब नियम पूर्वक करता है। ३ गुरुकी वाणी और उपदेशमें श्रद्धा (विश्वास) रखता है। ४ नम्रता-सबके साथ कोमलतासे वरतता है।
५ संतोष परीक्षा ॥ ४ ॥
संतोष परीक्षा सुनि लीजे । अयाची अमानी मन दीजे ॥
स्थिर वाच्छा नहि करई । सो संतोषी संत उच्चरई ॥५॥
भावार्थ-जिसके हृदयमें संतोषका वास होता है वह- १ अयाँची-अर्थात् यथा प्राप्त संतुष्ट रहकर उसीमें निर्वाह कर लेता है किसीसे याचना करनेकी इच्छा नहीं रखता। २ अमानी-मिथ्या अभिमान कर आप दुःखी नहीं होता; दूसरोंको भी दुःखी नहीं करना। ३ स्थिर-अर्थात् सदा धैर्यके साथ अपना सब कार्य करता है कभी घबराता नहीं। ४ अबाँछित-यथा प्राप्तमें संतुष्ट रहनेवाला अधिककी वांछाही क्यों करेगा।
६ निर्वर परीक्षा ४.
सुहिरदयता शीतलता, समता जान सुजान ।
सुखदाई सब जीवको, निरवैरी पहिचान ॥ ६ ॥
भावार्थ-निर्वैरता जिसमें आती है वह- १ सुहृद होजाता है
शब्दावली
(४३५)
किसीके साथ किसी अवस्थामें भी छल कपटका वर्ताव नहीं करता । २ शीतलता-अर्थात् सदा शान्त अकोध रहता है । ३ समता-धारण करता है अर्थात् सब जीवोंके सुख दुःखोंको अपने आत्माके समानही समझकर उनसे समानता वरतता है । ४ सुखदाई-सबके लिये सुखदाई होता है अर्थात् कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिससे किसीको दुःख होवे ।
७ सहज परीक्षा ४.
निह प्रपंच निहतरंग रु, निर्द्भन्द निरलेप ।
चारौ लक्षण सहजके, मिटे सकल विशेष ॥ ७ ॥
भावार्थ-सहजयोग अर्थात् सहज वृत्तिको धारण करनेवालोंमें चार गुण स्वभावसेही वास करते हैं । १ निष्प्रपंचता-सहज वृत्तिवाला पुरुष प्रपंचमें कभी नहीं फँसता-जहाँ कहीं प्रपंचकी वृद्धि देखता है आप वहाँसे खसक जाता है । २ निहतरङ्ग-नाना प्रकारके मनके तरङ्गोंसे अपनेको बचा रखता है । ३ निर्द्भन्द-द्रन्दसे अलग रहता है । ४ निलैप-सदा सबमें रहते हुए भी निलैप-रहता है ।
“सब संग रसिये सब संग बसिये सबका लीजे नाम ।
हाँजी हाँजी सबकी कीजे. रहिये अपने ठाम ॥”
८ शून्य ।
लव धीरज अरु ध्यान जो, मिली समाधि है चार ।
ये लक्षण हैं शून्यके, किये संत प्रचार ॥ ८ ॥
भावार्थ-शून्य अथवा समाधिवानके ४ लक्षण हैं । १ लव-एक ओर वृत्ति लगी रहै. २ धीर्य-जिस काममें लगे दृढ होकर लगे. ३-ध्यान-जिधर वृत्ति जाय उधरही तन्मय हो जावे. ४-समाधि-ध्येय वस्तुमें ऐसा निमग्न हो जाना कि, जुदाई जान न पड़े ॥
(४३६)
कवीरपंथी-
समौ-ये बत्तिस जब ऊगहीं, तैतीसो छिप जाय ।
कहै कवीर सुनु गोरखा, आवा गमन नसाय ॥
इति अष्टाङ्ग योगकी रमनी ॥
रमनी--करीमकी हिकमत ॥
वाह करीम वलि हिकमत तेरी । खाक एक सूरत बहुतेरी ॥
औघे बासन नीर जमाया । जतन जतन करि नूर उपाया ॥ १ ॥
आप मनीका सकल पसारा । हिन्दू तुरुक कोई नहि न्यारा ॥
दम दम करि बोले सब कोई । दमके भीतर हरदम होई ॥ २ ॥
बाहर दमको लखै जो कोई । ताको आवा-गमन न होई ॥ दम
लखिया जिन लखिया नामा । दम छूटा पाये निज ठामा ॥ ३ ॥
पीर पैगम्बर शेख मुलाना । तुम्हरी सिफत सुनि भै दिवाना ॥ कहै
कवीर वह साहब न्यारा । यार वाः यार वाः यार हमारा ॥ ४ ॥
रमनी--काया मसजिद ॥
यार वा यार वा यार हमारा । सब जीवनका प्रान अधारा ॥
काया मसजिद अजब सँवारी । दोय खम्भा दस लगी किवारी
॥ १ ॥ ता भीतर होय बंग निमाजा । हरदम इरदम हरदम साजा ॥
एक मसजिद दसो दरवाजा । मन मुछा तहैं पठै निमाजा ॥ २ ॥
ज्ञान करद मौन दिल पकरी । बिस्मिल कीन्हो पांचो बकरी ॥
पांच चोर करै कुफराना । मारी सबदसूँ किया छिमाना ॥ ३ ॥
पांच पीर बसे इक थाना । शब्द अनाहद घुरै निशाना ॥ कहैं
कवीर अजब कछु देखा । नूर नाम सत साहब पेखा ॥ ४ ॥
रमनी--मन ॥
मनकी मूठ लखै जो कोई । सो जन संत पारखी होई ॥ नगन
मगन बकला कंद खाई । देखि दिसा मनको पतियाई ॥ १ ॥
बहु विधि बकता चतुर परवाना । अलप अहारी काया खीना ॥
बहु बुधिमान प्रेम हित रोवै । रंचक चाह रसातल बोवै ॥ २ ॥
शब्दावली
(४३७)
ताके फंद परे जो कोई । रंचक सुख दुख बहुते होई ॥ कहै कवीर सोई निज दासा । जाको पारबल्लकी आसा ॥ ३ ॥
साखी-जो तू चाहे मुड़झको, मति कछु राखे आस ।
मुड़झ सरीखा होय रहो, सब कुछ तेरे पास ॥
रमैनी-मन राजा ॥
मन राजा संग पवन वजीरा । चित चंचल निश्चल नहि थीरा ॥
पांच मवासो त्रिगुण खाई । पांच पचीस जिनके संग भाई ॥
तैंतीसो मिलि द्रन्द्र मचावैं । मन राजाको नाच नचावैं ॥ ज्ञान
सूरमा बीडा लीन्हा । तैंतीसों पर डेरा दीन्हा ॥२॥ पांच मवासी
मिलिया आई । मन राजा पर फिरी दुहाई ॥ जोग जुगतका
लशकर साजा । गगन दमामा निरभय बाजा ॥ ३ ॥ झलकत
चन्दा जोति अपारा । मिटिगा तिमिर भया उजियारा ॥ गुरु
परताप सकल बस हूआ । नहीं कोइ जूझा नहि कोइ मूआ ॥४॥
आप आपमें सबही जाना । जिन जाना तिन निजके माना ॥
कहैं कवीर या पद को बूझे । आपा मिटे तबही घर सूझे ॥५॥
साखी-ऐसी बानी बोलिये, मनका आपा खोय ।
या आपाको डार दे, दया करै सब कोय ॥
रमैनी-कथता बकता ॥
कथता बकता श्रोता सोई । आप विचारे ज्ञानी होई ॥ चंचल
चपल बुधिका बेला । अगिन पवन पानीका मेला ॥ १ ॥ नव
दरवाजा दसूं दुवारा । बूझहु ज्ञानी ज्ञान विचारा ॥ माटीका गौन
पवनका सूआ । पांच तत्त्वले परगट हूआ ॥ २ ॥ काया माटी
बोले पवना । बूझे पण्डित सूवा कौना ॥ मुई सुरति बाद अहं-
कारा । एक न सूवा बोलन हारा ॥ ३ ॥ जिस कारन तप तीरथ
जाहीं । रतन पदारथ है घर माहीं ॥ पठ पठ पंडित वेद बखाना ।
(४३८)
कवीरपंथी-
भीतर होती वस्तु न जाना ॥ ४ ॥ हूँ न मरूँ मेरी मरै बलाय ।
बोलन हारा रहै समाय ॥ कहैं कवीर गुरु ब्रह्म बताया । मरता
जीता नजर न आया ॥ ५ ॥
सा०-राम मरै तो हम मरै, नातर मरे बलाय ।
अविनासीको चीगुटा, मरे न मारा जाय ॥
रमनी । बोलना ।
बोलना कहा कहिये रे भाई । बोलत बोलत तत्त्व नसाई ॥ १ ॥
बोलत बोलत बढै विकारा । चित्त बोलेका होय विचारा ॥ २ ॥
संत मिलै कछु कहिँ कहिये । मिलै असंत मौन होय रहिये ॥ ३ ॥
ज्ञानी सो बोले हितकारी । मूरख सो बोले झखमारी ॥ ४ ॥
कहैं कवीर आधा घट डोलै । भरा होय तो मुखों न बोले ॥ ५ ॥
सा०-बोली तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल ।
हिये तराजू तौलके, तब मुख बाहर खोल ॥
रमनी सातगुक्की ।
गुरु गुरु कहत सकल संसारा । गुरु सोइ जिन तत्त्व विचारा
॥१॥ प्रथम गुरु हैं माता पिता । रज वीरजके जो हैं दाता ॥२॥
दूसर गुरु है मनसा दाई । गर्भवासको बंध छुड़ाई ॥ ३ ॥ तीसर
गुरु जिन धरिया नामा । लेले नाम पुकारे गामा ॥ ४ ॥ चौथे
गुरु जिन दीच्छा दीन्हा । जग व्यवहार रीति सब कीन्हा ॥ ५ ॥
पांचे गुरु जिन वैष्णव कीन्हा । रामनामको सुमिरन दीन्हा ॥ ६ ॥
छठे गुरु जिन भ्रम गढ तोडा । दुविधा मेटि एकसों जोडा ॥ ७ ॥
सातम गुरु सत शब्द लखाया । जहाँका तत ले तहाँ समाया ॥
साखी-सात गुरु संसारमें, सेवक सब संसार ।
सतगुरु सोई जानिये, भव जल तारे पार ॥
रमनी निर्वाण देश ॥
हंस वा दिस करहु पयाना । जा देस बसै पुरुष पुराना ॥
हल न चले जहाँ बहै न कुदारा । अमृत भोजन करै अहारा ॥ १ ॥
शब्दावली
(४३९)
चले न चरखा बजै न ताती । अम्बर चौर पहिरे बहु भांती ॥
बरषै न मेघ चुवै नहिं पानी । शीतल सुरति अमी भरि आनी ॥२॥
चंद न सूर दिवस नहिं राती । कुल नहिं भेद वरन नहिं जाती ॥
रोग न दोष जहँ शोक न संतापा । कहै कवीर जहँ समरथ आपा ॥३॥
साखी-सुरति समानो निरतमें, निरत रही निरधार ।
सुरति निरति परचा भया, तब पाया दीदार ॥
रमैनी गुरुकी ॥
गुरु सम दाता कोड़ नहिं भाई । मुक्तिक मार्ग दियो बताई ॥
गुरु विन हिरदय ज्ञान न आवे । ज्यों कस्तूरी मिरग भुलावे ॥
गुरु विनु मिटै न अपनो आपा । भरम जेवरी बाँध्यो साँपा ॥
गुरु विनु केहरि कूपहिं पडिया । गुरु विनु गज छायाहिं लडिया ॥
गुरु विन स्वान देखि बहु भेखा । मन्दिर एक काँचको देखा ॥
चहुँ दिसि दीखै अपनी छाया । भूँकत भूँकत प्राण गँवाया ॥ गुरु
विन मुवा नलनी सो बंधा । गुरु विन कपि पडो सो फंदा ॥ कहैं
कवीर भरम्यो संसारा । गुरु विन सतगुरु किम उत्तै पारा ॥
साखी-भरम जेवरी गज बंध्यो, फिर जन्मे मर जाय ।
कहै कवीर सतगुरु मिलै, तब सतलोक सिधाय ॥
रमैनी-विरह शर्ता ॥
तैं कहैं जाने बिरहकी बाती । प्रेम न उपजे तेरी छाती ॥ जैसी
प्रीति मच्छ जो कीन्हा । जलते विछुडे जीवहिं दीन्हा ॥ ऐसी प्रीति
मच्छीकी जानी । सूवा पीछे माँग्यो पानी ॥ धन सरवर जहँ काली
माटी । प्रीतम बिछुडे छाती फाटी ॥ कब तोर हाड रु माँस
सुखाया । कब तोर नयनन लोहू आया ॥ कब तैंने प्रेम पियाला
पीया । कब तैं पिय मार्ग सिर दीया ॥ कहैं कवीर योही तन
खोया ॥ पाँव पसार पेट भर सोया ॥
(४४०)
कवीरपंथी-
सा०-जब लग विरह उपजे नहीं, तब लग नहिं पहिचान ।
प्रेम परगटचो जब अंगमें, मन तब किया कुरबान ॥
रसनी-गुरुटककी ॥
जाको टेक एक गुरु दाता । ताको और कछु न सुहाता ॥
पय जो बिगडा माखन होई । बिगडे छाँछ कहै नहिं कोई ॥
पतिव्रताको लाँछन होई । गनिका बिगडे कहत न कोई ॥
सूरा भागा आप विगोई । कायर भागा कहै न कोई ॥
नटनी नाचै आपा खोई । देखन हार पड़े नहिं कोई ॥
भूला मनको जो समुझावे । आदि अंत सोइ संत कहावे ॥
कहैं कवीर हम एता कहिया । सांच माने सो नरकहिं गइया ॥
सा०-डालकी चूकी बांदरी, शब्दका चूका हंस ।
कहैं कवीर धर्मदास सो, दोऊ निरफल वंस ॥
रसनी-गुरु महिमा ॥
सतगुरु बोले अमृत वानी । गुरु विन मुक्ति नहीं रे प्रानी ॥
गुरु हैं आदि अंतके दाता । गुरु है मुक्ति पदारथ आता ॥
गंगा काशी अस्थाना । चारि वेद गुरु गमते जाना ॥
गुरु है सुरसरि निर्मल धारा । विनु गुरु घटना हो उजियारा ॥
अडसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आवे । गुरुकी दया घर बैठहिं पावे ॥
गुरु कहै सोई पुन करिये । मातु पिता दोऊ कुल तरिये ॥
गुरु पारस परसे नर लोई । लोहते कंचन होय सोई ॥
शुक देव गुरु जनक बिदेही । वो भी गुरुके परम सनेही ॥
नारद गुरु प्रह्लाद पठाये । भक्ति हेतु जिन दर्शन पाये ।
कागभुसुंड शम्भु गुरु कीन्हा ॥
अगम निगम सबही कहि दीन्हा । ब्रह्मा गुरु अग्निको कीन्हा ॥
होम यज्ञ जिन आज्ञा दीन्हा ॥ वशिष्ठ गुरु किया रघुनाथा ।
पाइ दरस तब भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरना ।
पाइ भक्ति तब तारन तरना ॥ नारद दिच्छा धिमर सो पायो ।
चौरासी सो
शब्दावली
(४४१)
तुरत छुडायो ॥ गुरु कहै सोई है साँचा । विनु पगिचय सेवक है काँचा ॥ कहै कवीर गुरु आपु अकेला । दश औतार गुरुका चेला ॥
साखी-राम कृष्ण ते को बडा, उनहु तो गुरु कीन ।
तीन लोकके वै धनी, गुरु आगे आधीन ॥
रमनी—गुलाहाकी ॥
जुलहा कहि कहि जग भरमाया । मो जुलहेका मरम न पाया ॥
समझ विना जिव भरम भुलाना । विनही सूत न पसारे ताना ॥
धरनि अकास बिच खाड खुदाई । चन्द सुर दोय नली भराई ॥
आदि नामका पूरन पूरा । चेतहु अंधा पथ है दूरा ॥ सूत कुसूत बुने नर कोरी । वाको सुरति निरति है जोरी ॥
हम षट दर्शन हम षट भेखा । हमही तत्व अनूप अलेखा ॥
हम हैं सकल सकल हम माहीं । हमते और दूसरा नाही ॥
सबही कर्म हमारा कहिया । हम करमनते न्यारा रहिया ॥
निरगुन सगुन खेल हमारा । हमरा चौदह लोक पसारा ॥
बन्दीछोर है विरद हमारा । हमही बन्दी छुडावन हारा ॥
जुग जुग बन्द छुडावन आये । ताते बंदीछोर कहाये ॥
कहै कवीर हम अगम अपारी । स्वसम नली सो एक हमारी ॥
रमनी—स्वरूप महिमा ॥
जीवत जीव जागनी ठानै । माया ब्रह्म दोऊ पहिचाने ॥
तीन सुरूप एकहि देखा । ताको निहचल विज्ञान विसेखा ॥
माया ब्रह्म दोऊते न्यारा । आगे पारब्रह्म उजियारा ॥
विज्ञानीको कोइ नहि पावे । वाहि स्वरूप नजर नहि आवे ॥
तूनकी ओट पहाड़ लुकाना । ऐसे ताहि दूर मति जाना ॥
है हममें हमही सा देखा । निज सुरूपको यही विशेषा ॥
आवे कहीं कहुँ नहि जाई । समुन्द्र लहरि समुन्द्र समाई ॥
ज्यों बालक खेले फिरकाई । देखि परे तो सकल फिराई ॥
जो हिरदामें होय रहे थीरा । ताका विनसे नाहि शरीरा ॥
चंचल निहचल यहि रूपा । निरखे देखि यहि वस्तु
(४४२)
कवीरपंथी-
अनूपा ॥ बिछरन मिलन होय कछु केरा । जैसे सोवै सुपना तेरा ॥
सोवे जहाँ तहाँ उठि जागे । पंछी मनि राह उठि लागे ॥ आगे पीछे
मध्यम कोई । ऐसा सहज सरूपी होई ॥
साखी-सहज सरूपी होय रहै, दिलकी दुविधा जाय ।
अकह कवीरा क्या कहै, उलटि कालको खाय ॥
रमनी-कालजीत ॥
काल न आवे निहचल होई । अब यह जतन करो सब कोई ॥
निहचल चित्त न कबहुँ चलावे । ताको काल न कबहुँ सतावे ॥
परगट कहा तब है जग माहीं । जागे जाकूँ सूझे नाहीं ॥ जो कोइ
चेतन होय करि जागे । ताके तसकर कबहुँ न लागे ॥ कलह
कल्पना सब विधि खोई । निहचे सहज सरूपी होइ ॥ इच्छा ते
जग जीवत नाई । ब्रह्म अनिच्छित गहै चित लाई ॥ कारज कारनकी
यह बाता । माया माहीं ब्रह्म समाता ॥ माया माहीं ब्रह्म फंदाया ।
ताते पुरुष प्रकृति कहाया । अच्छर है इक और अनूपा ॥ पारब्रह्म
अन इच्छित रूपा । पूर्ण ब्रह्मते न्यारा होई । परमहंसनको प्यारा
सोई ॥ हंसदसा होय जु भाई । ताको काल कबहुँ नहिं खाई ॥
साखी-काल काल सबही कहे, काल न जाने कोय ।
जेती मनकी कल्पना, काल कहावै सोय ॥
रमनी-निर्वाणपद ।
ऐसा ब्रह्म विचारो भाई । शब्द उठै धुनि कहाँ समाई ॥ काष्ठ
मथि २ अगिन उपाई । उलटि अग्नि काष्ठको खाई ॥ दोनों नास
भयो इक ठाऊँ । उड़ गइ भसम धरेका नाऊँ ॥ भस्म भई उड़
कहवों गई । सो गति याकी ऐसी भई ॥ सुए जीव जइहो जाहाँ ।
जीवतही ले राखो ताहाँ ॥ जैसो केल कदली खंद । ऐसा पारब्रह्म
गोविन्द ॥ खोजत खोजत पायो ठौर । मैं जानो कछु आगे और ॥
नहिं कछु नहिं कछु नहिं कछु सोई । पंछी पीछे खोज न होई ॥