कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
सा०-अविगतिकी गति विगत है, मन बुधि चितते दूर ।
आपा मेटि सतगुरु मिलै, पावे दरस हजूर ॥ १ ॥
कर्मयोग रमैनी ॥ २ ॥
योगी योग बहुत जो करई । क्रिया योगते नहिं निस्तरई ॥
फिर फिर आवै फिर फिरि जाई । कर्महि कर्म बहुत उरझाई ॥
होय निहकर्म नाम जो ध्यावे । योनी संकट बहुरि न आवे ॥ कर्महि
कर्म बँधा बहु भारा । कर्महि कर्म अटका संसारा ॥ देह कर्म जो
दीन उठाई । मनका कर्म छुटै नहिं भाई ॥ जब लग मनका कर्म
न खोवे । तब लग मन निरमल नहिं होवे ॥ मनकी क्रिया जबै
मिटि जाई । तब प्रभु मिलै सहजमें आई ॥ मने निरञ्जन आपुहिं
होई । याको जाने विरला कोई ॥
तन क्रियाको खाड़िके, मन क्रिया रुचि राख ।
कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निज भाख ॥ २ ॥
तत्कर्मयोग रमैनी ॥ ३ ॥
तन कर करनी देहु बहाई । मन कर करनी सत्य मिलाई ॥
मनकी क्रिया सत्य जो होई । ताहि समान क्रिया नहिं कोई ॥ १ ॥
सांख्य योग करना है-सारा । जेहिते उतरे भवजल पारा ॥ सत
क्रिया ते ज्ञानी भयऊ । सत क्रिया साहब मिलि गयऊ ॥ २ ॥
सत क्रिया सत पुरुषहिं ध्यावे । सत क्रिया सतनाम मिलावे ॥ सत
क्रिया जग होय उदासा । सत क्रियाते मुक्ति निवासा ॥ ३ ॥
समौ०-सत्य क्रिया निर्वाण है, है तन मन ते भिन्न ।
मन पवना दिठ करि गहै, सत्यनाम निज चिन्ह ॥ ३ ॥
अष्टांगयोग अन्तर्गत.
सांख्य योग रमैनी ॥ ४ ॥
अब मैं सांख्य योग बतलाऊँ । योग अष्टाङ्गके लछन दिख-
लाऊँ ॥ इक इकके चारि चारि लच्छन । जो जाने सो होय
विचच्छन ॥ १ ॥ यों तो कहे लछन बतीसा । अष्टांगयोगमें एकहि