कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
यह सब धरे ममता मारे । सो कडिहार जगत जल तारे ॥३॥
शब्द सरोतर हिरदय साँचा । छाडि परपंच सत्यसे राँचा ॥
सत्यनाम मो रहै न काँचा । सो कडिहार जगत सो बाँचा ॥४॥
कुल करनाको मेटै धोखा । समता ज्ञान सु अंतर पोखा ॥
ज्ञान रतनके पूरे नौका । सो कडिहार बैठिहै चौका ॥५॥
दया छिमा संतोष विचारा । शील वैराग ज्ञान अधारा ॥
काम क्रोध चिन्ता नहि परई । सो कडिहार आरति करई ॥६॥
आसा वासा मनको नासे । माया मोह न फटके पासे ॥
कर्म कला सो तिनका तोरे । सो कडिहार नारियल मोरे ॥७॥
सिख साखा सब प्रेम बढावैं । बहुत भांति ते सेवा लावैं ॥
कोटिक शिष्य करै सनमाना । रह कडिहार शब्द लपटाना ॥८॥
गुरुका शब्द सदा परकासे । भेद भरम का दुविधा नासे ॥
नहिं तो कालरूप कडिहारा । सब जीवनका करै अहारा ॥९॥
लोभ मोहकी धरे सगाई । शब्द छाडि जग करै ठगाई ॥
शब्द चाल हिरदे नहि आवे । सो कडिहार कस लोक सिधावे ॥१०॥
आसन चाँपै फूलके, धरै जु जमको भाव ।
कहैं कवीर तब जानि है, पड़े वज्रको चाव ॥६॥
रमनी—सत्यनाम ।
सत्यनाम सुमिरो मन माहीं । जहवाँ रजनी वासर नाही ॥
आदि अन्त नहि धरनि अकासा । पावक पवन न नीर निवासा ॥१॥
चन्द सूर तहवाँ नहि कोई । प्रात सांझ तहवाँ नहि दोई ॥
कर्म भर्म पुण्य नहि पापा । तहवाँ जपियो अजपा जापा ॥२॥
झलमलाट चहुँदिस ऊँजियारा । वरषे तहाँ अगरकी धारा ॥
तहँ सतगुरुको आसन होई । कोटि माहिं जन पहुँचे कोई ॥३॥
दसो दिसा झिलमिल तहँ छाजा । बाजे तहाँ सु अनहद बाजा ॥
तहवाँ हंसा ध्यान लगावे । बहुरि न जोनी संकट आवे ॥४॥