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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 446

(४३२)

कवीरपंथी—

सहज योग ७. रसनी ॥ ११ ॥

सतवाँ योग सहज है मीता । सहज भावसो सबही जीता ॥
एक विचार प्रेम उपजावे । पाँचै इन्द्री सहज समावे ॥ १ ॥
निरलोभी होय लोभ भुलावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥
निरल्लेप कितहुँ नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागै ॥
सहज ध्यान रहै लौलाई । सहजे सहजे पार लगाई ॥ ३ ॥
जा घट ज्ञान सहज समावे । सहजे माया आप भुलावे ॥
सहजे परिचय आतम होई । ब्रह्मरूपमें सहज समोई ॥ ४ ॥
सहज समाधि भले जग जाने । गुरु प्रतापते सहज पिछाने ॥
जप तप योग सहजमें आवे । काया कष्ट न कबहुँ करावे ॥ ५ ॥
आतम परिचय सहजहिं पावे । खुले नैन सो दरस करावे ॥
विना सहज दूसर कछु नहीं । सहजेमें सब रहा समाई ॥ ६ ॥
सहज योग जो कोई धरै । आप तरे औ जगको तारे ॥
सहजहिं आतम ब्रह्म प्रकाशा ॥ सहजे जीव मुझान विलासा ॥ ७ ॥
विना सहज नहीं भव पारा । विना सहज बूढे भव धारा ॥
कहे कवीर सुनो नर लोई । सहजे सहज भया सब कोई ॥ ८ ॥

समौ-सब जग झूठा जानिके, गहे नाम सत सार ।

सहजे सहजे प्रकट भया, सतगुरु शब्द सम्हार ॥ ११ ॥

शून्य योग ८ । रसनी ॥ १२ ॥

आठम योग शून्य है नीके । विना नाम जप लागु सुफीके ॥
सहजे नाम विदेह समावे । विना नाम कहाँ सुख पावे ॥ १ ॥
शून्यहिते सब जग उपराजा । शून्यहिते भव शब्द अवाजा ॥
शून्य सहज एक नाम विराजे । अनहद बाजा बाजन बाजे ॥ २ ॥
सहज शून्य जो लावे ध्याना । अलख लखे आप बलवाना ॥
नाम सहज शून्यमें होई । अलखहिं लखे आप है सोई ॥ ४ ॥