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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

-७. १६३½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २२९
अत्रोद्देशकः
कस्यापि विषमबाहोरुत्र्यश्रक्षेत्रस्य सूक्ष्मगणितमिदम् ।
द्वे रूपे निर्दिष्टे त्रीणीष्टं भूमिबाहवः के स्युः ॥ १५९½ ॥
पुनरपि सूक्ष्मगणितफलसंख्यां ज्ञात्वा तत्फलवद्विषमत्रिभुजानयनसूत्रम्—
स्वाष्टहतात्सेष्टकृतेः कृतिमूलं चेष्टमितरदितरहृतम् ।
ज्येष्ठं स्वाल्पार्धोनं स्वल्पार्धं तत्पदेन चेष्टेन ॥ १६०½ ॥
क्रमशॊ हत्वा च तयोः संक्रमणे भूसुजौ भवतः ।
इष्टार्धमितरदोः स्याद्विषमत्रैकोणके क्षेत्रे ॥ १६१½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वे रूपे सूक्ष्मफलं विषमत्रिभुजस्य रूपाणि ।
त्रीणीष्टं भूदोषौ कथय सखे गणिततत्त्वज्ञ ॥ १६२½ ॥
सूक्ष्मगणितफलं ज्ञात्वा तत्सूक्ष्मगणितफलवत्समवृत्तक्षेत्रानयनसूत्रम्—
गणितं चतुरभ्यस्तं दशपदभक्तं पदे भवेद्व्यासः ।
सूक्ष्मं समवृत्तस्य क्षेत्रस्य च पूर्ववत्फलं परिधिः ॥ १६३½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी असमान भुजाओं वाली त्रिभुजाकार आकृति के संबंध में यह बतलाया गया है कि
शुद्ध क्षेत्रफल का माप २ है, और मन से चुनी हुई राशि ३ है। आधार का मान तथा भुजाओं का
मान क्या है ? ॥ १५९½ ॥
पुनः, विषम भुजाओं वालेतथा दत्त शुद्ध माप क्षेत्रफल वाले त्रिभुज क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये
दूसरा नियम—
दिये गये क्षेत्रफल के माप में ८ का गुणा कर, और तब उसमें मन से चुनी हुई राशि के वर्ग
को जोड़कर, प्राप्त योगफल का वर्गमूल प्राप्त किया जाता है। यह और मन से चुनी हुई राशि एक
दूसरे के द्वारा भाजित की जाती हैं। इन भजनफलों में से बड़ा, छोटे भजनफल की अर्द्धराशि द्वारा
ह्रासित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त शेष राशि और यह छोटे भजनफल की अर्द्धराशि क्रमशः ऊपर
लिखित वर्गमूल और मन से चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित की जाती हैं। इस प्रकार प्राप्त गुणनफलों
के संबंध में संक्रमण क्रिया करने पर आधार और भुजाओं में से किसी एक का मान प्राप्त होता है।
मन से चुनी हुई राशि की आधी राशि विषम त्रिभुज की दूसरी भुजा की अर्धा होती है ॥ १६०-१६१½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
विषम त्रिभुज के संबंध में क्षेत्रफल का शुद्ध माप ३ है। हे गणितज्ञ सखे, आधार तथा भुजाओं
के माप बतलाओ ॥ १६२½ ॥
दत्त सूक्ष्म क्षेत्रफल वाले, किसी समवृत्त क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम—
सूक्ष्म क्षेत्रफल का माप ४ द्वारा गुणित कर, १० के वर्गमूल द्वारा भाजित किया जाता है।
इस प्रकार परिणामी भजनफल के वर्गमूल को प्राप्त करने से व्यास का मान प्राप्त होता है। समवृत्त
क्षेत्र के संबंध में, ऊपर समझाये अनुसार, क्षेत्रफल और परिधि का माप प्राप्त किया जाता है ॥ १६३½ ॥
(१६३½) इस गाथा में दिया गया नियम सूत्र, क्षेत्रफल = (द² / ४) × √१०, जहाँ द वृत्त
का व्यास है, से प्राप्त किया गया है ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति पूर्ण एवं शुद्ध पाठ दिया गया है:

२३० ] गणितसारसंग्रह [ ७. १६४½-
अत्रोद्देशकः
समवृत्तक्षेत्रस्य च सूक्ष्मफलं पञ्च निर्दिष्टम्।
विष्कम्भः को वास्य प्रगणय्य ममाशु तं कथय ॥ १६४½ ॥
व्यावहारिकगणितफलं च सूक्ष्मफलं च ज्ञात्वा तद्व्यावहारिकफलवत्तत्सूक्ष्मगणितफलवद्द्वि
समचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य त्रिसमचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य च सूत्रम्—
धनवर्गान्तरपदयुतिवियुतीष्टं भूमुखे भुजे स्थूलम्।
द्विसमे सपदस्थूलात्पदयुतिवियुतीष्टपदहृतं त्रिसमे ॥ १६५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
समवृत्त क्षेत्र के संबंध में क्षेत्रफल का शुद्ध माप ५ है। वृत्त का व्यास गणना कर शीघ्र
बतलाओ ॥ १६४½ ॥
किसी क्षेत्रफल के व्यावहारिक तथा सूक्ष्म माप ज्ञात होने पर, दो समान भुजाओं वाले तथा
तीन समान भुजाओं वाले उन क्षेत्रफलों के माप के चतुर्भुज क्षेत्रों को प्राप्त करने के लिये नियम—
दो समान भुजाओंवाले क्षेत्रफल के संबंध में, क्षेत्रफल के सन्निकट और सूक्ष्म मापों के वर्गों के
अन्तर के वर्गमूल को प्राप्त करते हैं। इस वर्गमूल को मन से चुनी हुई राशि में जोड़ते हैं, तथा उसी
मन से चुनी हुई राशि में से वही वर्गमूल घटाते हैं। आधार और ऊपरी भुजा को प्राप्त करने के लिये
इस प्रकार प्राप्त राशियों को मन से चुनी हुई राशि के वर्गमूल से भाजित करना पड़ता है। इसी
प्रकार, सन्निकट क्षेत्रफल में मन से चुनी हुई राशि का भाग देने पर समान भुजाओं का मान प्राप्त
होता है ॥ १६५½ ॥
(१६५½) यदि 'रा' किसी दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के सन्निकट क्षेत्रफल को, और
'र' सूक्ष्म मान को प्ररूपित करते हों, और प मन से चुनी हुई संख्या हो, तो
आधार = [√(रा² - र²) + प] / √प ; ऊपरी भुजा = [प - √(रा² - र²)] / √प ;
और प्रत्येक बराबर भुजाओं का मान = रा / √प ।
यदि दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की भुजाओं के माप क्रमशः अ, ब, स, द हों, तो
रा = अ (ब + द) / २ ; प = [(ब + द) / २]² ;
और र = [(ब + द) / २] × √[अ² - ((ब - द)² / ४)] ।
आधार और ऊपरी भुजा के लिये ऊपर दिये गये सूत्र रा, र
और प के इन मानों का प्रतिस्थापन करने पर सरलतापूर्वक
सत्यापित किये जा सकते हैं। इसी प्रकार तीन बराबर
भुजाओं वाले चतुर्भुज के संबंध में भी यह नियम ठीक सिद्ध होता है।

-७. १६८½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २३१
अत्रोद्देशकः
गणितं सूक्ष्मं पञ्च त्रयोदश व्यावहारिकं गणितम् ।
द्विसमचतुरश्रभूमुखदोषः के षोडशेच्छया च ॥ १६६½ ॥
त्रिसमचतुरश्रस्योदाहरणम् ।
गणितं सूक्ष्मं पञ्च त्रयोदश व्यावहारिकं गणितम् ।
त्रिसमचतुरश्रबाहून् संचिन्त्य सखे ममाचक्ष्व ॥ १६७½ ॥
व्यावहारिकस्थूलफलं सूक्ष्मफलं च ज्ञात्वा तद्व्यावहारिकस्थूलफलवत् सूक्ष्मगणितफलवत्सम-
त्रिभुजानयनस्य च समवृत्तक्षेत्रव्यासानयनस्य च सूत्रम्—
धनवर्गान्तरमूलं यत्तन्मूलाद्द्विसंगुणितम् ।
बाहुस्त्रिसमत्रिभुजे समस्य वृत्तस्य विष्कम्भः ॥ १६८½ ॥
सन्निकट क्षेत्रफल का माप, मन से चुनी हुई राशि द्वारा भाजित होकर, भुजाओं के मान को
उत्पन्न करता है ।
तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की दशा में, ऊपर बतलाये हुए दो क्षेत्रफलों के वर्गों के
अंतर के वर्गमूल को क्षेत्रफल के सन्निकट माप में जोड़ते हैं । इस परिणामी योग को कल्पित राशि
मानकर उसमें ऊपर बतलाये हुए वर्गमूल को जोड़ते हैं । पुनः, उसी कल्पित राशि में से उक्त वर्गमूल
को घटाते हैं । इस प्रकार प्राप्त राशियों में वर्गमूल का भाग अलग-अलग देकर, आधार और ऊपरी भुजा
प्राप्त करते हैं । यहाँ भी क्षेत्रफल के व्यावहारिक माप को इस कल्पित राशि के वर्गमूल द्वारा भाजित
करने पर अन्य भुजाओं के माप प्राप्त होते हैं ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
सूक्ष्म क्षेत्रफल का माप ५ है, क्षेत्रफल का सन्निकट माप १३ है, और मन से चुनी हुई राशि
१६ है । दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में आधार, ऊपरी भुजा और अन्य भुजा के
मान क्या-क्या हैं ? ॥ १६६½ ॥
तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र संबंधी एक उदाहरण—
क्षेत्रफल का सूक्ष्म रूप से शुद्ध माप ५ है, और क्षेत्रफल का व्यावहारिक माप १३ है । हे मित्र,
सोचकर मुझे बतलाओ कि तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की भुजाओं के माप क्या-क्या
हैं ? ॥ १६७½ ॥
समत्रिबाहु त्रिभुज और समवृत्त के व्यास को प्राप्त करने के लिये नियम, जब कि उनके व्याव-
हारिक और सूक्ष्म क्षेत्रफल के माप ज्ञात हों—
क्षेत्रफल के सन्निकट और सूक्ष्म रूप से ठीक मापों के वर्गों के अंतर के वर्गमूल के वर्गमूल
को २ द्वारा गुणित किया जाता है । परिणाम, इष्ट समत्रिभुज की भुजा का माप होता है । वह, इष्ट
वृत्त के व्यास का माप भी होता है ॥ १६८½ ॥
(१६८½) किसी समबाहुत्रिभुज के व्यावहारिक और सूक्ष्म क्षेत्रफल के मानों के लिये इस
अध्याय की गाथा ७ और ५० के नियमों को देखिये ।

२३२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १६९१/२-
अत्रोद्देशकः
स्थूलं धनमष्टादश सूक्ष्मं त्रिघनो नवाहतः करणिः ।
विगणय्य सखे कथय त्रिसमत्रिभुजप्रमाणं मे ॥ १६९१/२ ॥
पञ्चकृतेर्वर्गो दशगुणितः करणिर्भवेदिदं सूक्ष्मम् ।
स्थूलमपि पञ्चसप्ततिरेतत्को वृत्तविष्कम्भः ॥ १७०१/२ ॥
व्यावहारिकस्थूलफलं च सूक्ष्मगणितफलं च ज्ञात्वा तद्व्यावहारिकफलवत्तत्सूक्ष्मफलवद्विसमत्रिभुजक्षेत्रस्य भूभुजाप्रमाणसंख्ययोरानयनस्य सूत्रम्-
फलवर्गान्तरमूलं द्विगुणं भूर्व्यावहारिकं बाहुः ।
भूम्यर्थमूलभक्ते द्विसमत्रिभुजस्य करणिमिदम् ॥ १७११/२ ॥
अत्रोद्देशकः
सूक्ष्मधनं षष्टिरिह स्थूलधनं पञ्चषष्टिborderदिष्टम् ।
गणयित्वा ब्रूहि सखे द्विसमत्रिभुजस्य भुजसंख्याम् ॥ १७२१/२ ॥
इष्टसंख्यावद्विसमचतुरश्रक्षेत्रं ज्ञात्वा तद्विसमचतुरश्रक्षेत्रस्य सूक्ष्मगणितफलसमान-
सूक्ष्मफलवदन्यद्विसमचतुरश्रक्षेत्रस्य भूभुजमुखसंख्यानयनसूत्रम्-
उदाहरणार्थ प्रश्न
व्यावहारिक क्षेत्रफल १८ है । क्षेत्रफल का सूक्ष्म रूप से शुद्ध माप ( ३ )³ को ९ से गुणित
करने से प्राप्त राशि का वर्गमूल है । हे सखे, मुझे गणना के पश्चात् बतलाओ कि इष्ट समत्रिभुज
की भुजा का माप क्या है ? ॥ १६९१/२ ॥ क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप ६२५० का वर्गमूल है । क्षेत्रफल का
सन्निकट माप ७५ है । ऐसे क्षेत्रफलों वाले समवृत्त के व्यास का माप बतलाओ ॥ १७०१/२ ॥
जब किसो क्षेत्रफल के व्यावहारिक और सूक्ष्म माप ज्ञात हों, तब ऐसे क्षेत्रफल के मापोंवाले
समद्विबाहु त्रिभुज के आधार और भुजा के संख्यात्मक मानों को निकालने के लिये नियम-
क्षेत्रफल के व्यावहारिक और सूक्ष्म मापों के वर्गों के अंतर के वर्गमूल की दुगुनी राशि को
किसी समद्विबाहु त्रिभुज का आधार मान लेते हैं। दत्त व्यावहारिक क्षेत्रफल का माप बराबर भुजाओं
में से किसी एक का माप मान लिया जाता है। आधार तथा भुजा के इन मानों को आधार के प्राप्त मान
की अर्द्धराशि के वर्गमूल द्वारा भाजित करते हैं। तब इष्ट समद्विबाहु त्रिभुज का आधार और भुजा के
इष्ट माप प्राप्त होते हैं। यह नियम समद्विबाहु त्रिभुज के संबंध में है ॥ १७११/२ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यहाँ क्षेत्रफल का सूक्ष्म रूप से ठीक माप ६० है, और व्यावहारिक माप ६५ है । हे मित्र,
गणना के पश्चात् बतलाओ कि इष्ट समद्विबाहु त्रिभुज की भुजाओं के संख्यात्मक माप क्या-क्या
हैं ॥ १७२१/२ ॥
जब चुनी हुई संख्या और दो बराबर भुजाओं वाला चतुर्भुज क्षेत्र दिया गया हो, तब किसी ऐसे
दूसरे दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र का आधार, ऊपरी भुजा और अन्य भुजाओं को निकालने
के लिये नियम, जिसका सूक्ष्म क्षेत्रफल दिये गये दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज के सूक्ष्म क्षेत्रफल
के तुल्य हो-

-७. १७४ ½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २३३
लम्बकृताविष्टोनासमसंकर्मणीकृते भुजा ज्येष्ठा ।
ह्रस्वयुतिवियुति मुखभूयुतिदलितं तलमुखे द्विसमचतुरश्रे ॥ १७३ ½ ॥
अत्रोद्देशकः
भूरिन्द्रा दोर्विश्वे वक्त्रं गतयोऽवलम्बको रवयः ।
इष्टं दिक् सूक्ष्मं तत्फलवद्द्विसमचतुरश्रमन्यत् किम् ॥ १७४ ½ ॥

यदि दिये गये दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के लंब का वर्ग दत्त विकल्पित संख्या के
साथ विषम संक्रमण क्रिया करने के उपयोग में लाया जाता है, तो प्राप्त दो फलों में से बड़ा मान दो
बराबर भुजाओंवाले इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र की बराबर भुजाओं में से किसी एक का मान होता है। दो बराबर
भुजाओं वाले दिये गये चतुर्भुज की ऊपरी भुजा और आधार के मानों के योग की अर्द्धराशि को,
क्रमशः, उपर्युक्त विषम संक्रमण में प्राप्त दो फलों में से छोटे फल द्वारा बढ़ाकर और हासित करने
पर दो बराबर भुजाओं वाले इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र के आधार और ऊपरी भुजा के माप उत्पन्न
होते हैं ॥ १७३ ½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दिये गये चतुर्भुज क्षेत्र का आधार १४ है, दो बराबर भुजाओं में से प्रत्येक का माप १३ है,
ऊपरी भुजा ४ है, लम्ब १२ है, और दत्त विकल्पित संख्या १० है । दो बराबर भुजाओं वाला ऐसा
कौन सा चतुर्भुज है, जिसके सूक्ष्म क्षेत्रफल का माप दिये गये चतुर्भुज के क्षेत्रफल के बराबर है ?
॥ १७४ ½ ॥

(१७३ ½) इस नियम में ऐसे प्रश्न पर विचार किया गया है, जिसमें ऐसे दो बराबर भुजाओं
वाले चतुर्भुज क्षेत्र की रचना करना है, जिसका क्षेत्रफल किसी दूसरे दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज
के तुल्य हो, और जिसकी ऊपरी भुजा से आधार तक की लम्ब दूरी भी उसी के समान हो । मान लो
दिये गये चतुर्भुज की बराबर भुजाएँ अ और स हैं, और ऊपरी भुजा तथा आधार क्रमशः ब और द हैं ।
यह भी मान लो कि लंब दूरी प है । यदि इष्ट चतुर्भुज की संवादी भुजाएँ अ₁, ब₁, स₁, द₁ हों, तो
क्षेत्रफल और लम्ब दूरी, दोनों चतुर्भुजों के संबंध में बराबर होने से हमें यह प्राप्त होता है—
द₁ + ब₁ = द + ब .........( १ );
और अ₁² - ((द₁ - ब₁)/२)² = प² .........( २ );
अर्थात् (अ₁ + (द₁ - ब₁)/२) (अ₁ - (द₁ - ब₁)/२) = प² ।
मानलो अ₁ - (द₁ - ब₁)/२ = ना; तब अ₁ + (द₁ - ब₁)/२ = प²/ना ,
और (अ₁ + (द₁ - ब₁)/२) + (अ₁ - (द₁ - ब₁)/२) = प²/ना + ना ।
∴ ((प²/ना) + ना) / २ = अ₁, ............( ३ )
ग० सा० सं०-३०

२३४ ] गणितसारसंग्रहः [ -७. १७५½ ]
द्विसमचतुरश्रक्षेत्रव्यावहारिकस्थूलफलसंख्यां ज्ञात्वा तद्व्यावहारिकस्थूलफले इष्टसंख्या-
विभागे कृते सति तद्द्विसमचतुरश्रक्षेत्रमध्ये तत्तद्भागस्य भूमिसंख्यानयनेऽपि तत्तत्स्थानावल-
म्बकसंख्यानयनेऽपि सूत्रम्—
खण्डयुतिभक्ततलमुखकृत्यन्तरगुणितखण्डमुखवर्गयुतम् ।
मूलमधस्तलमुखयुतदलहृतलब्धं च लम्बकः क्रमशः ॥१७५½॥
जब कोई दत्त व्यावहारिक माप वाला क्षेत्रफल किसी दी गई संख्या के भागों में विभाजित
किया जाय, तब दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के उन विभिन्न भागों के आधारों के संख्यात्मक
मानों तथा विभिन्न विभाजन बिन्दुओं से मापी गईं भुजाओं के संख्यात्मक माप को निकालने के लिये
नियम, जब कि दो भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के व्यावहारिक क्षेत्रफल का संख्यात्मक माप
दिया गया हो—
दो बराबर भुजाओं वाले दिये गये चतुर्भुज क्षेत्र के आधार और ऊपरी भुजा के संख्यात्मक
मानों के वर्गों के अंतर को इष्ट अनुपाती भागों के कुल मान द्वारा भाजित किया जाता है । इस प्रकार
प्राप्त भजनफल के द्वारा विभिन्न भागों के निष्पत्तियों के मान क्रमशः गुणित किये जाते हैं । प्राप्त
गुणनफलों में से प्रत्येक में दिये गये चतुर्भुज की ऊपरी भुजा के माप का वर्ग जोड़ा जाता है ।
इस प्रकार प्राप्त योग का वर्गमूल, प्रत्येक भाग के आधार के मान को उत्पन्न करता है । प्रत्येक
भाग का क्षेत्रफल, आधार और ऊपरी भुजा के योग की अर्धराशि द्वारा भाजित होकर, इष्ट क्रम में
लंब का माप उत्पन्न करता है, जो सन्निकट माप के लिये भुजा की तरह वर्ता जाता है ॥ १७५½ ॥
और (द + ब)/२ ± [ (प²/ना) - ना ] / २ = (द₁ + ब₁)/२ ± { (अ₁ + (द₁ - ब₁)/२) - (अ₁ - (द₁ - ब₁)/२) } / २
= द₁ अथवा ब₁...............(४)
यहाँ 'ना' इष्ट अथवा दत्त विकल्पित संख्या है । तीसरे और चौथे सूत्र वे हैं, जो प्रश्न का साधन
करने के नियम में दिये गये हैं ।
( १७५½ ) यदि च छ ज झ दो बराबर भुजाओं वाला चतुर्भुज हो, और इफ, गह और कल
चतुर्भुज को इस तरह विभाजित करते हों कि विभाजित भाग क्षेत्रफल के संबंध में क्रमशः म, न, प, ख
के अनुपात में हों, तो इस नियम के अनुसार,
जब भुजा च छ = अ, छ ज = द, ज झ = स और झ च = ब है, तब
इफ = √ [ { (द² - ब²) / (म + न + प + ख) } × म + ब² ] ;
गह = √ [ { (द² - ब²) / (म + न + प + ख) } × (म + न) + ब² ] ;
कल = √ [ { (द² - ब²) / (म + न + प + ख) } × (म + न + प) + ब² ] ;
इत्यादि ।
इसी प्रकार,

-७. १७६ ½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २३५
अत्रोद्देशकः
वदनं सप्तोक्तमधः क्षितिस्त्रयोविंशतिः पुनस्त्रिंशत् ।
बाहू द्वाभ्यां भक्तं चैकैकं लब्धमत्र का भूमिः ॥ १७६ ½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ऊपरी-भुजा का माप ७ है, नीचे आधार का माप २३ है, और शेष भुजाओं में से प्रत्येक का
माप ३० है । ऐसे क्षेत्र में अंतराविष्ट क्षेत्रफल ऐसे दो भागों में विभाजित किया जाता है कि प्रत्येक
को एक ( हिस्सा ) प्राप्त होता है । यहाँ निकाले जाने वाले आधार का मान क्या है ? ॥ १७६ ½ ॥
चह = [ { अ × (द + ब)/२ } × { म/(म + न + प + ख) } ] / [ (इफ + चझ)/२ ] ;
इग = [ { अ × (द + ब)/२ } × { न/(म + न + प + ख) } ] / [ (गह + इफ)/२ ] ;
गक = [ { अ × (द + ब)/२ } × { प/(म + न + प + ख) } ] / [ (कल + गह)/२ ] ;
इत्यादि ।
यह सरलतापूर्वक दिखाया जा सकता है कि चछ/चह = (छज - चझ)/(इफ - चझ) ,
∵ [ चछ ( छज + चझ ) ] / [ चह ( इफ + चझ ) ] = [ ( छज )² - ( चझ )² ] / [ ( इफ )² - ( चझ )² ] ;
परन्तु, [ चछ ( छज + चझ ) ] / [ चह ( इफ + चझ ) ] = (म + न + प + ख)/म ;
∴ [ ( छज )² - ( चझ )² ] / [ ( इफ )² - ( चझ )² ] = (म + न + प + ख)/म ;
∴ (इफ)² = [ { म (छज² - चझ²) } / (म + न + प + ख) ] + (चझ)² = [ (द² - ब²) / (म + न + प + ख) ] × म + ब² ;
और इफ = √[ { (द² - ब²) / (म + न + प + ख) } × म + ब² ] । इसी प्रकार अन्य सूत्र सत्यापित किये जा
सकते हैं ।
यद्यपि इस पुस्तक में ग्रंथकार ने केवल यह कहा है कि भजनफल को भागों के मानों से गुणित
करना पड़ता है, तथापि वास्तव में भजनफल को प्रत्येक दशा में भागों के मानों से ऊपरी भुजा तक
की प्ररूपण करने वाली संख्या के द्वारा गुणित करना पड़ता है । उदाहरणार्थ, पिछले पृष्ठ की आकृति में

२३६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १७७½-
भूमिद्विषष्टिशतमथ चाष्टादश वदनमत्र संदृष्टम् ।
लम्बश्चतुरशतीदं क्षेत्रं भक्तं नरैश्चतुर्भिश्च ॥ १७७½ ॥
एकद्विकत्रिकचतुःखण्डान्येकैकपुरुषलब्धानि ।
प्रक्षेपतया गणितं तलमप्यवलम्बकं ब्रूहि ॥ १७८½ ॥
भूमिरशीतिर्वदनं चत्वारिंशच्चतुर्गुणा षष्टिः ।
अवलम्बकप्रमाणं त्रीण्यष्टौ पञ्च खण्डानि ॥ १७९½ ॥
स्तम्भद्वयप्रमाणसंख्यां ज्ञात्वा तत्तस्तम्भद्वयाग्रे सूत्रद्वयं बद्ध्वा तत्सूत्रद्वयं कर्णीकारेण
इतरेतरस्तम्भमूलं वा तत्स्तम्भमूलमतिक्रम्य वा संस्पृश्य तत्कर्णीकारसूत्रद्वयस्पर्शनस्थानादारभ्य
अधःस्थितभूमिपर्यन्तं तन्मध्ये एकं सूत्रं प्रसार्य तत्सूत्रप्रमाणसंख्यैव अन्तरावलम्बकसंज्ञा भवति ।
अन्तरावलम्बकस्पर्शनस्थानादारभ्य तस्यां भूम्यामुभयपार्श्वयोः कर्णीकारसूत्रद्वयस्पर्शनपर्यन्त-
माबाधासंज्ञा स्यात् । तदन्तरावलम्बकसंख्यानयनस्य आबाधासंख्यानयनस्य च सूत्रम्—
स्तम्भौ रज्ज्वन्तरभूहृतौ स्वयोगहृतौ च भूगुणितौ ।
आबाधे ते वामप्रक्षेपगुणोऽन्तरावलम्बः ॥ १८०½ ॥
दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज के आधार का माप १६२ है, और उपरी भुजा का माप १८ है।
दो भुजाओं में से प्रत्येक का मान ४०० हैं। इस प्रकार, इस आकृति से घिरा हुआ क्षेत्रफल, ४ मनुष्यों
में विभाजित किया जाता है। मनुष्यों को प्राप्त भाग क्रमशः १, २, ३, और ४ के अनुपात में हैं।
इस अनुपाती विभाजन के अनुसार प्रत्येक दशा में क्षेत्रफल, आधार और दो बराबर भुजाओं में से
एक के मानों को बतलाओ ॥ १७७½-१७८½ ॥ दिये गये चतुर्भुज क्षेत्र के आधार का माप ८० है,
ऊपरी भुजा ४० है, तथा दो बराबर भुजाओं में से प्रत्येक ४ × ६० है । हिस्से क्रमशः ३, ८ और
५ के अनुपात में हैं। इष्ट भागों के क्षेत्रफल, आधारों और भुजाओं के मानों को निकालो ॥ १७९½ ॥
ज्ञात ऊँचाई वाले दो स्तंभों में से प्रत्येक के उपरी सिरे में दो धागे ( सूत्र ) बँधे हुए हैं।
इन दो धागों में से प्रत्येक इस तरह फैला हुआ है कि वह सम्मुख स्तंभ के मूल भाग को कर्ण के रूप में
स्पर्श करता है, अथवा दूसरे स्तंभ के पार जाकर भूमि को स्पर्श करता है । उस बिन्दु से, जहाँ दो
कर्णीकार धागे मिलते हैं, एक और दूसरा धागा इस तरह लटकाया जाता है, कि वह लंब रूप होकर
भूमि को स्पर्श करता है। इस अंतिम धागे के माप का नाम अंतरावलम्बक या भीतरी लंब होता है।
जहाँ पर यह लंबरूप धागा भूमि को स्पर्श करता है, उस बिन्दु से किसी भी ओर प्रस्थान करने वाली
रेखा उन बिन्दुओं तक जाकर ( जहाँ कर्ण धागे भूमि को स्पर्श करते हैं ) आबाधा अथवा आधार का
खंड कहलाती है । ऐसे लम्ब तथा आबाधों के मानों को प्राप्त करने के नियम—
प्रत्येक स्तम्भ के माप को स्तम्भ के मूल से लेकर कर्ण धागे के भूमि स्पर्श बिन्दु तक के बीच
की लम्बाई वाले आधार को माप द्वारा भाजित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त प्रत्येक भजनफल,
भजनफलों के योग द्वारा भाजित किया जाता है। परिणामी भजनफलों को संपूर्ण आधार के माप
द्वारा गुणित करने पर क्रम से आबाधाओं के माप प्राप्त होते हैं। ये आबाधाओं के माप, क्रमशः विलोम
क्रम में, ऊपर दिये गये प्रथम बार में प्राप्त भजनफलों द्वारा गुणित होने पर, प्रत्येक दशा में अंतराव-
लम्बक ( भीतरी लम्ब ) को उत्पन्न करते हैं ॥ १८०½ ॥
द² - ब²
ग ह का मान निकालने के लिये ───────────── को
म + न + प + ख
∙ केवल 'न' से ही नहीं वरन् म + न से भी गुणित करना पड़ता है ।

–७. १८२½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २३७
अत्रोद्देशकः
षोडशहस्तोच्छ्रायौ स्तम्भाववनिश्च षोडशोद्दिष्टौ ।
आबाधान्तरसंख्यामत्राप्यवलम्बकं ब्रूहि ॥ १८१½ ॥
स्तम्भैकस्योच्छ्रायः षट्त्रिंशद्विंशतिर्द्वितीयस्य ।
भूमिर्द्वादश हस्ताः काबाधा कोऽयमवलम्बः ॥ १८२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दिये गये स्तंभ की ऊँचाई १६ हस्त है । उस आधार की लम्बाई जो उन दो बिन्दुओं के
बीच की होती है, जहाँ धागे भूमि को स्पर्श करते हैं, १६ हस्त देखी गई है । इस दशा में आधार के
खंडों (आबाधाओं) और अंतरावलम्बक के संख्यात्मक मानों को निकालो ॥ १८१½ ॥ एक स्तंभ की
ऊँचाई ३६ हस्त है, दूसरे की २० हस्त है । आधार रेखा की लम्बाई १२ हस्त है । आबाधाओं और
अंतरावलम्बक के माप क्या-क्या हैं ? ॥ १८२½ ॥ दो स्तंभ क्रमशः १२ और १५ हस्त हैं, उन दो

(१८०½) आकृति में यदि अ और ब स्तम्भों की ऊँचाइयाँ
हों, स स्तंभों के बीच का अंतर हो, और म और न क्रमशः एक
स्तम्भ के मूल से लेकर, भूमि को स्पर्श करने वाले, दूसरे स्तम्भ के
अग्र से फैले हुए धागे के भूमिस्पर्श बिन्दु तक की लम्बाईयाँ हों,
तो नियमानुसार,
स₁ = { अ/(स + न) ÷ (अ (स + म) + ब (स + न))/((स + म) (स + न)) } × (स + म + न) ;
स₂ = { ब/(स + म) ÷ (अ (स + म) + ब (स + न))/((स + म) (स + न)) } × (स + म + न) ; जहाँ स₁ और स₂
सम्पूर्ण आधार के खण्ड हैं ।
और प = स₁ × ब/(स + म), अथवा स₂ × अ/(स + न), जहाँ प अन्तरावलम्बक है । इस आकृति
में सजातीय त्रिभुजों पर विचार करने पर यह ज्ञात होगा कि—
स₂/प = (स + न)/अ और स₁/प = (स + म)/ब ।
इन निष्पत्तियों से हमें स₁/स₂ = (अ (स + म))/(ब (स + न)) प्राप्त होता है;
∵ स₁/(स₁ + स₂) = (अ (स + म))/(अ (स + म) + ब (स + न)) , ∴ स₁ = (अ (स + म) (स + म + न))/(अ (स + म) + ब (स + न)) ;
क्योंकि स₁ + स₂ = स + म + न;
इसी प्रकार, स₂ = (ब (स + न) (स + म + न))/(अ (स + म) + ब (स + न)) ∴ और प = स₂ × अ/(स + न) = स₁ × ब/(स + म) ।

२३८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १८३½-
द्वादश च पञ्चदश च स्तम्भान्तरभूमिरपि च चत्वारः ।
द्वादशकस्तम्भाद्याद्रज्जुः पतितान्यतो मूलात् ॥ १८३½ ॥
आक्रम्य चतुर्हस्तात्परस्य मूलं तथैकहस्ताच्च ।
पतिताग्रात्काबाधा कोऽस्मिन्नवलम्बको भवति ॥ १८४½ ॥
बाहूप्रतिबाहू द्वौ त्रयोदशावनिरियं चतुर्दश च ।
वदनेऽपि चतुर्हस्ताः काबाधा कोऽन्तरावलम्बश्च ॥ १८५½ ॥
क्षेत्रमिदं मुखभूम्योरेकैकौनं परस्पराग्राच्च ।
रज्जुः पतिता मूलात्त्वं ब्रूह्यवलम्बकाबाधे ॥ १८६½ ॥
बाहुस्त्रयोदशैकः पञ्चदश प्रतिभुजा मुखं सप्त ।
भूमिरियमेकविंशतिरस्मिन्नवलम्बकाबाधे ॥ १८७½ ॥
स्तंभों के बीच का अंतराल ( अंतर ) ४ हस्त है । १२ हस्त वाले स्तंभ के उपरी अग्र से एक धागा
सूत्र आधार रेखा पर दूसरे स्तंभ के मूल से ४ हस्त आगे तक फैलाया जाता है । इस दूसरे
स्तंभ ( जो १५ हस्त ऊँचा है ) के अग्र से एक धागा उसी प्रकार आधार रेखा पर पहिले
स्तंभ के मूल से १ हस्त आगे तक फैलाया जाता है । यहाँ आबाधाओं और अंतरावलम्बक के माप को
बतलाओ ॥ १८४½ ॥ दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में दो भुजाओं में से प्रत्येक
१३ हस्त है । यहाँ आधार १४ हस्त, और ऊपरी भुजा ४ हस्त है । अंतरावलम्बक द्वारा बनाये गये
आधार के खंडों ( आबाधाओं ) के माप क्या हैं, और अंतरावलम्बक का माप क्या है ? ॥ १८५½ ॥
उपर्युक्त चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में उपरी भुजा और आधार प्रत्येक १ हस्त कम हैं । दो लंबों में से
प्रत्येक के ऊपरी अग्र से एक धागा दूसरे लंब के मूल तक पहुंचने के लिये फैलाया जाता है ।
अंतरावलम्बक और उत्पन्न आबाधाओं के माप क्या हैं ? ॥ १८६½ ॥ असमान भुजाओं वाले चतुर्भुज
के संबंध में एक भुजा १३ हस्त, सम्मुख भुजा १५ हस्त, उपरी भुजा ७ हस्त और आधार २१ हस्त
है । अंतरावलम्बक तथा उससे उत्पन्न हुए आबाधाओं के मान क्या-क्या हैं ? ॥ १८७½॥ एक समबाहु
(१८५½) यहाँ दो बराबर भुजाओं वाला चतुर्भुज क्षेत्र दिया गया है; दूसरी गाथा में तीन
बराबर भुजाओं वाला तथा और अगली गाथा में विषमबाहु चतुर्भुज दिये गये हैं । इन सब दशाओं में
चतुर्भुज के कर्ण सबसे पहिले गाथा ५४ अध्याय ७ के नियमानुसार प्राप्त किये जाते हैं । तब ऊपरी
भुजा के अंतों से आधार पर गिराये हुए लंबों के मापो और उन लंबों द्वारा उत्पन्न आधार के खंडों
( आबाधाओं ) को ( अध्याय ७ की ४९वीं गाथा में दिये गये नियम का प्रयोग कर ) प्राप्त करते हैं ।
तब लंबों के मापों को हस्त मानकर, ऊपर १८०½ वीं गाथा के नियम को प्रयुक्त कर, अंतरावलम्बक तथा
उससे उत्पन्न आबाधाओं को प्राप्त करते हैं । १८७½ वीं गाथा में दिया गया प्रश्न वङ्कड़ी टीका में कुछ
भिन्न विधि से किया गया है । ऊपरी भुजा आधार के समानान्तर मान ली जाती है, और लंब तथा
उससे उत्पन्न आबाधाओं के माप ऐसे त्रिभुज की रचना करके प्राप्त करते हैं, जिसकी भुजाएँ उक्त चतुर्भुज
की भुजाओं के बराबर होती हैं, -और जिसका आधार चतुर्भुज के आधार और ऊपरी भुजा के अन्तर
के बराबर होता है ।

)²? No,(सम)². Wait, let's look at the text after the formula: है । अब, फ इ और ब स अथवा अ द को स्तंभ मानकर संकेत में कथित नियम प्रयोग में लाया जा सकता है ।`
Wait, "संकेत में कथित नियम प्रयोग में लाया जा सकता है"!
"संकेत" refers to the hint / note!
Wait, look at the previous text:
स्तंभ की ऊँचाई का माप ज्ञात है । किसी कारणवश स्तंभ भग्न हो जाता है, और भग्न स्तंभ
का ऊपरी भाग भूमि पर गिरता है । (भग्न स्तंभ का) निम्न भाग उन्नत भाग के ऊपरी भाग पर
अवलम्बित रहता है । तब स्तंभ के मूल से गिरे हुए ऊपरी अग्र (जो अब भूमि को स्पर्श करता है)
की पैठिक (आधारीय) दूरी ज्ञात की जाती है । स्तंभ के मूल भाग से लेकर शेष उन्नत भाग के माप
And then below the line:
( १८४½-१८९½ ) इस प्रश्न के अनुसार दी गई आकृति इस प्रकार है:—
यहाँ भीतरी लम्ब ग ह और क ल हैं । इन्हें प्राप्त करने के लिये
पहिले फ इ को प्राप्त करते हैं । टीकानुसार
फ इ का माप = ...
Wait! "यहाँ भीतरी लम्ब ग ह और क ल हैं । इन्हें प्राप्त करने के लिये पहिले फ इ को प्राप्त

२४० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १९०½-
स्तम्भस्योन्नतप्रमाणसंख्यां ज्ञात्वा तस्मिन् स्तम्भे येनकेनचित्कारणेन भग्ने पतिते सति
तत्तम्भाग्रमूलयोर्मध्ये स्थितौ भूसंख्यां ज्ञात्वा तत्तस्तम्भमूलादारभ्य स्थितपरिमाणसंख्यानयन-
स्य सूत्रम् —
निर्गमवर्गान्तरमितिवर्गविशेषस्य यद्भवेदर्धम् ।
निर्गमनेन विभक्तं तावत्स्थित्वाथ भग्नः स्यात् ॥ १९०½ ॥
अत्रोद्देशकः
स्तम्भस्य पञ्चविंशतिरुरुच्छ्रायः कश्चिदन्तरे भग्नः ।
स्तम्भाग्रमूलमध्ये पञ्च स गत्वा कियान् भग्नः ॥ १९१½ ॥
वेणूच्छ्राये हस्ताः सप्तकृतिः कश्चिदन्तरे भग्नः ।
भूमिश्च सैकविंशतिरस्य स गत्वा कियान् भग्नः ॥ १९२½ ॥
वृक्षोच्छ्रायो विंशतिरग्रस्थः कोऽपि तत्फलं पुरुषः ।
कर्णीकृत्य व्यक्षिपदथ तरुमूलस्थितः पुरुषः ॥ १९३½ ॥
तस्य फलस्याभिमुखं प्रतिभुजरूपेण गत्वा च ।
फलमग्रहीच्च तत्फलनरयोर्गतियोगसंख्यैव ॥ १९४½ ॥
पञ्चाशद्भूत्तत्फलगतिरूपा कर्णसंख्या का ।
तद्वृक्षमूलगतनरगतिरूपा प्रतिभुजापि कियती स्यात् ॥ १९५½ ॥


का संख्यात्मक मान निकालने के लिये यह नियम है—
संपूर्ण ऊँचाई के वर्ग और ज्ञात आधारीय ( basal ) दूरी के वर्ग के अंतर की अर्द्ध राशि जब
संपूर्ण ऊँचाई द्वारा भाजित होती है, तब शेष उन्नत भाग का माप उत्पन्न होता है । जो अब संपूर्ण
ऊँचाई का शेष बचता है वह भग्न भाग का माप होता है ॥ १९०½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
स्तंभ की ऊँचाई २५ हस्त है । वह मूल और अग्र के बीच कहीं टूटा है । फर्श पर गिरे हुए
अग्र ( ऊपरी भाग ) और स्तंभ के मूल के बीच की दूरी ५ हस्त है । बताओ कि टूटने का स्थान बिन्दु
मूल से कितनी दूर है ? ॥ १९१½ ॥ ( उगने वाले ) बाँस की ऊँचाई का माप ४९ हस्त है । वह मूल
और अग्र के बीच कहीं भग्न हुआ है । आधारीय दूरी २१ हस्त है । वह मूल से कितनी दूरी पर टूटा
है ॥ १९२½ ॥ किसी वृक्ष की ऊँचाई २० हस्त है । कोई मनुष्य उसके ऊपरी भाग ( चोटी ) पर
बैठकर कर्णरूप पथ में फल को नीचे फेंकता है ( अर्थात् वह फल सरल रेखा में गिरकर, समकोण
त्रिभुज का कर्ण बनाता है ) । तब दूसरा मनुष्य जो वृक्ष के नीचे बैठा हुआ है, फल तक सरल रेखा में
पहुँचता है ( यह पथ त्रिभुज की दूरी भुजा का निर्माण करता है ), और उस फल को ले लेता है ।
फल तथा इस मनुष्य द्वारा तय की गई दूरियों का योग ५० हस्त है । फल द्वारा तय किये गये पथ
द्वारा निरूपित कर्ण का संख्यात्मक मान क्या है ? मनुष्य द्वारा तय किये गये पथ द्वारा निरूपित अन्य
भुजा का माप क्या हो सकता है ? ॥ १९३½-१९५½ ॥

-७. १९६½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २४१
ज्येष्ठस्तम्भसंख्यां च अल्पस्तम्भसंख्यां च ज्ञात्वा उभयस्तम्भान्तरभूमिसंख्यां ज्ञात्वा
तज्ज्येष्ठसंख्ये भग्ने सति ज्येष्ठस्तम्भाग्रे अल्पस्तम्भाग्रं स्पृशति सति ज्येष्ठस्तम्भस्य भग्नसंख्यानय-
नस्य स्थितशेषसंख्यानयनस्य च सूत्रम्—
ज्येष्ठस्तम्भस्य कृतेर्ह्रस्वावनिवर्गयुतिमपोह्यार्धम् ।
स्तम्भविशेषेण हृतं लब्धं भग्नोन्नतिर्भवति ॥ १९६½ ॥
अत्रोद्देशकः
स्तम्भः पञ्चोच्छ्रायः परस्त्रयोविंशतिस्तथा ज्येष्ठः ।
मध्यं द्वादश भग्नज्येष्ठाग्रं पतितमितराग्रे ॥ १९७½ ॥
आयतचतुरश्रक्षेत्रकोटिसंख्यायास्तृतीयांशद्वयं पर्वतोत्सेधं परिकल्प्य तत्पर्वतोत्सेध-
संख्यायाः सकाशात् तदायतचतुरश्रक्षेत्रस्य भुजसंख्यानयनस्य कर्णसंख्यानयनस्य च सूत्रम्—
गिर्युत्सेधो द्विगुणो गिरिपुरमध्यक्षितिर्गिरेरर्धम् ।
गगने तत्रोत्पतितं गिर्यर्धव्याससंयुतिः कर्णः ॥ १९८½ ॥
ऊँचाई में बड़े (ज्येष्ठ) स्तंभ की ऊँचाई का संख्यात्मक मान तथा ऊँचाई में छोटे (अल्प)
स्तंभ की ऊँचाई का संख्यात्मक मान ज्ञात है । इन दो स्तंभों के बीच की दूरी का संख्यात्मक मान
भी ज्ञात है । ज्येष्ठ स्तंभ भग्न होकर इस प्रकार गिरता है, कि उसका ऊपरी अग्र अल्प स्तंभ के ऊपरी
अग्र पर अवलम्बित होता है, और भग्न भाग का निम्न भाग, शेष भाग के ऊपरी भाग पर स्थित रहता
है । इस दशा में ज्येष्ठ स्तंभ के भग्न भाग की लम्बाई का संख्यात्मक मान तथा उसी ज्येष्ठ स्तंभ के
शेष भाग की ऊँचाई के संख्यात्मक मान को प्राप्त करने के लिये नियम—
ज्येष्ठ स्तंभ के संख्यात्मक माप के वर्ग में से, अल्प स्तंभ के माप के वर्ग और आधार के माप
के वर्ग के योग को घटाते हैं । परिणामी शेष की अर्द्ध राशि को दो स्तंभों के मापों के अंतर द्वारा भाजित
करते हैं । प्राप्त भजनफल भग्न स्तंभ के उन्नत भाग की ऊँचाई होता है । ॥१९६½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक स्तंभ ऊँचाई में ५ हस्त है, उसी प्रकार दूसरे ज्येष्ठ स्तंभ ऊँचाई में २३ हस्त है । उनके
बीच की दूरी १२ हस्त है । भग्न ज्येष्ठ स्तंभ का ऊपरी अग्र अल्प स्तंभ के ऊपरी अग्र पर गिरता है ।
भग्न ज्येष्ठ स्तंभ के उन्नत भाग की ऊँचाई निकालो ॥ १९७½ ॥
आयत क्षेत्र की उर्ध्वाधर (लंब रूप) भुजा के संख्यात्मक मान की दो तिहाई राशि को पर्वत की
ऊँचाई मानकर, उस पर्वत की ऊँचाई की सहायता से उक्त आयत के कर्ण और क्षैतिज भुजा (आधार)
के संख्यात्मक मानों को निकालने के लिये नियम—
पर्वत की दुगुनी ऊँचाई, पर्वत के मूल से वहाँ के शहर के बीच की दूरी का माप होती है ।
पर्वत की आधी ऊँचाई गगन में ऊपर की ओर की उड़ान की दूरी (उड्डयन) का माप है । पर्वत की
आधी ऊँचाई में, (पर्वत के मूल से) शहर की दूरी का माप जोड़ने से कर्ण प्राप्त होता है ॥ १९८½ ॥
(१९६½) यदि ज्येष्ठ स्तम्भ की ऊँचाई अ और अल्प स्तम्भ की ब
द्वारा निरूपित हो; उनके बीच की दूरी स हो, और अ₁ भग्न स्तम्भ
के उन्नत भाग की ऊँचाई हो, तो नियमानुसार,
अ₁ = { अ² – (ब² + स²) } / { २ (अ – ब) }
ग० सा० सं०-३१

२४२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १९९½-
अत्रोद्देशकः
षड्योजनोर्ध्वशिखरिणि यतीश्वरौ तिष्ठतस्तत्र ।
एकोऽङ्घ्रिचर्ययागात्तत्राप्याकाशचार्यपरः ॥ १९९½ ॥
श्रुतिवशमुत्पत्य पुरं गिरिशिखरान्मूलमवरुह्यान्यः ।
समगतिकौ संजातौ नगरव्यासः किमुत्पतितम् ॥ २००½ ॥
डोलाकारक्षेत्रे स्तम्भद्वयस्य वा गिरिद्वयस्य वा उत्सेधपरिमाणसंख्यामेव आयतचतुरश्र-
भुजद्वयं क्षेत्रद्वये परिकल्प्य तद्गिरिद्वयान्तरभूम्यां वा तत्तस्तम्भद्वयान्तरभूम्यां वा आबाधाद्वयं
परिकल्प्य तदाबाधाद्वयं व्युत्क्रमेण निक्षिप्य तद्व्युत्क्रमं न्यस्ताबाधाद्वयमेव आयतचतुरश्रक्षेत्रद्वये
कोटिद्वयं परिकल्प्य तत्कर्णद्वयस्य समानसंख्यानयनसूत्रम्—
उदाहरणार्थ प्रश्न
६ योजन ऊँचाई वाले किसी पर्वत पर २ यतीश्वर तिष्ठे थे । उनमें से एक ने पैदल गमन किया ।
दूसरे आकाश में गमन कर सकते थे । ये दूसरे यतीश्वर ऊपर की ओर उड़े, और तब शहर में कर्ण मार्ग
से उतरे । प्रथम यतीश्वर शिखर से पर्वत के मूल तक सीधे नीचे की ओर उद्गम दिशा में उतरे, और
पैदल शहर की ओर चले । यह ज्ञात हुआ कि दोनों ने समान दूरियाँ तय कीं । पर्वत के मूल से शहर
तक की दूरी क्या है, और ऊपरी उड़ान की ऊँचाई कितनी है ? ॥ १९९½–२००½ ॥
लटकन ( डोल ) और उसके दो भूमि पर आधारित लंबरूप अवलंबों द्वारा निरूपित क्षेत्र में,
दो स्तंभों अथवा दो पर्वत शिखरों की ऊँचाइयों के माप दो आयत चतुरश्र क्षेत्रों की क्षैतिज ( क्षितिज
के समानान्तर ) भुजाओं के माप मान लिये जाते हैं । तब, इन ज्ञात क्षैतिज भुजाओं की सहायता से,
और ( दशानुसार ) दो पर्वत अथवा दो स्तंभ के बीच की आधार रेखा के संबंध में लंब के मिलन बिन्दु
द्वारा उत्पन्न आबाधाओं ( खंडों ) के मानों को प्राप्त करते हैं । इन दो आबाधाओं को विलोम क्रम में
लिखते हैं । इस प्रकार विलोम क्रम में लिखे गये ( दो आबाधाओं के ) मानों की दो आयताकार
चतुर्भुज क्षेत्रों की दो लंब भुजाओं के माप मान लेते हैं । ( ऐसी दशा में ) इन दो आयतों के कर्णों के
समान संख्यात्मक मान को प्राप्त करने के लिये नियम —
( १९९½–२००½ ) आकृति में यदि पर्वत की ऊँचाई 'अ' द्वारा निरूपित है, शहर से
पर्वत के मूल की दूरी 'ब' है, और कर्ण मार्ग की लम्बाई 'स'
है, तो गाथा १९८½ के नियम की पृष्ठभूमि में की गई कल्पना
के अनुसार 'अ' भुजा सा बा की २/३ है । इसलिये ऊर्ध्व दिशा
की उड़ान दा बा अर्थात् ½ अ है............( १ )
चूँकि दो साधुओं की उड़ानें बराबर हैं, ∴ स + ½ अ = अ + ब;
∴ स = ½ अ + ब..............( २ )
∴ स² = ¼ अ² + ब² + अ ब, परन्तु स² = ९/४ अ² + ब²;
∴ अ ब = २ अ²;
∴ ब = २ अ................( ३ )
दिये गये नियम में ये ही तीन सूत्र ( १ ), ( २ ) और ( ३ ) वर्णित हैं ।

-७. २०१½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २४३

डोलाकारक्षेत्रस्तम्भाद्वितयोर्ध्वसंख्ये वा ।
शिखरिद्वयोर्ध्वसंख्ये परिकल्प्य भुजद्वयं त्रिकोणस्य ॥ २०१½ ॥
तहोद्धितयान्तरगतभूसंख्यायास्तदाबाधे ।
आनीय प्राग्वत्ते व्युत्क्रमतः स्थाप्य ते कोटी ॥ २०२½ ॥
स्यातांतस्मिन्नायतचतुरश्रक्षेत्रयोश्च तद्दोर्भ्याम् ।
कोटिभ्यां कर्णौ द्वौ प्राग्वत्स्यातां समानसंख्यौ तौ ॥ २०३½ ॥


डोल तथा उसके दो लंबरूप अवलंबों द्वारा निरूपित आकृति के संबंध में, दो स्तंभों की अथवा
दो पर्वतों की ऊँचाइयों के मापों को त्रिभुज की दो भुजाओं के माप मान लेते हैं । तब, दिये गये स्तंभों
अथवा पर्वतों की बीच की आधार रेखा के मान के तुल्य उन दो भुजाओं के बीच की आधार रेखा के
संबंध में, शीर्ष से आधार पर गिराये गये लंब से उत्पन्न आबाधाओं के मान पहिले दिये गये नियमानुसार
प्राप्त करते हैं । यदि इन आबाधाओं ( खंडों ) के मानों को विलोम क्रम में लिखा जावे, तो वे इष्ट
किया में दो आयतों की दो लंब भुजाओं के मान बन जाते हैं । अब, पहिले दिये गये नियमानुसार
दो आयतों के कर्णों के मानों को उपर्युक्त त्रिभुज की दो भुजाओं ( जो यहाँ आयत की दो क्षैतिज भुजाएँ
ली गई हैं ) तथा उन दो लंब भुजाओं की सहायता से प्राप्त करते हैं । ये कर्ण समान संख्यात्मक
मान के होते हैं ॥ २०१½-२०३½ ॥


( २०१½-२०३½ ) इस नियम में वर्णित चतुर्भुजों में, मानलो, लंब भुजाएँ अ, ब द्वारा निरूपित हैं,
आधार स है; स₁, स₂ उसके खंड ( आबाधायें ) हैं, और रज्जु ( रस्से ) के प्रत्येक समान भाग की
लंबाई ल है ।
अब, अ² + स₁² = ब² + स₂² ।
∴ ( स₂ + स₁ ) ( स₂ - स₁ ) = अ² - ब²; और स₁ + स₂ = स;
अ² - ब² अ² - ब²
———— + स स - ————
स स
स₂ = ———————— और स₁ = ———————— ।
२ २

ये मान, अ और ब भुजाओंवाले त्रिभुज के 'स' माप वाले आधार के खंडों के हैं । आधार के
खंड शीर्ष से लंब गिराने से उत्पन्न हुए हैं । नियम में यही कथित है । गाथा ४९ का नियम भी देखिये ।
( २१०½ ) यहाँ बतलाया हुआ पथ समकोण त्रिभुज की भुजाओं में से होकर जाता है । इस
नियम में दिये गये सूत्र का बीजीय निरूपण यह है—
ब² + अ²
क = ————— × द, जहाँ क कर्णपथ से जाने पर व्यतीत हुए दिनों की संख्या है, अ और ब
ब² - अ²

क्रमशः दो मनुष्यों की गतियाँ हैं, और द उत्तर दिशा से जानेपर व्यतीत हुए दिनों की संख्या है । इस
प्रश्न में दत्त व्यास पर आधारित निम्नलिखित समीकरण से यह स्पष्ट है—
ब² क² = द² ब² + ( क + द )² × अ²

२४४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. २०४-
अत्रोद्देशकः
स्तम्भस्त्रयोदशैकः पञ्चदशान्यश्चतुर्दशान्तरितः ।
रज्जुर्बद्धा शिखरे भूमीपतिता क१ आबाधे ॥ २०४ ॥
ते रज्जू समसंख्ये स्यातां तद्रज्जुमानमपि कथय ॥ २०५ ॥
द्वाविंशतिरुत्सेधो गिरेस्तथाष्टादशान्यशैलस्य ।
विंशतिरुभयोर्मध्ये तयोश्च शिखयोःस्थितौ साधू ॥ २०६ ॥
आकाशचारिणौ तौ समागतौ नगरमत्र भिक्षायै ।
समगतिकौ संजातौ तत्राबाधे कियत्संख्ये ॥
समगतिसंख्या कियती डोलाकारेऽत्र गणितज्ञ ॥ २०७½ ॥
विंशतिरेकस्योन्नतिरद्रेश्च जिनास्तथान्यस्य ।
तन्मध्यं द्वाविंशतिरनयोरुच्चैश्च शृङ्गयोः स्थित्वा ॥ २०८½ ॥
आकाशचारिणौ द्वौ तन्मध्यपुरं समायातौ ।
भिक्षायै समगतिकौ स्यातां तन्मध्यशिखरिमध्यं किम् ॥ २०९½ ॥
विषमत्रिकोणक्षेत्ररूपेण हीनाधिकगतिमतोर्नर्योः समागमदिनसंख्यानयनसूत्रम्—
१. क आबाधे व्याकरणरूपेण अशुद्ध है, क्योंकि द्विवाचक संख्या 'के' और 'आबाधे' के मध्य कोई
संधि नहीं हो सकती है । १८९½ वें श्लोक की टिप्पणी से मिलान करिये ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक स्तंभ ऊँचाई में १३ हस्त है। दूसरा ऊँचाई में १५ हस्त है। इनके बीच की दूरी १४
हस्त है। इन दो स्तंभों के ऊपरी सिरों पर बँधा हुआ एक रस्सा ( रज्जु ) इस तरह नीचे लटकता है,
कि वह इन दो स्तंभों के बीच की दूरी को स्पर्श करता है। स्तंभों के बीच की आधार रेखा के इस
प्रकार उत्पन्न खंडों के मान क्या-क्या हैं ? रज्जु के दो लटकते हुए भाग लम्बाई में समान संख्यात्मक
मान के हैं। रज्जु का माप भी बतलाओ ॥ २०४½-२०५½ ॥ किसी एक पर्वत की ऊँचाई २२ योजन
है। दूसरे पर्वत की १८ योजन है। उन दो पर्वतों के बीच की दूरी २० योजन है। पर्वत के शिखर
पर तिष्ठे हुए दो साधु आकाश में गमन कर सकते हैं। भिक्षा के लिये वे आकाश मार्ग से नीचे आते
हैं, और उन पर्वतों के बीच बसे हुए नगर में मिलते हैं। यह ज्ञात है कि वे आकाश मार्ग से समान
दूरियाँ तय कर आये हैं। इन दशाओं में दो पर्वतों के बीच की आधारीय रेखा के खंडों के संख्यात्मक
मान क्या-क्या हैं ? हे गणितज्ञ, इस डोलाकार क्षेत्र में तय की गई समान राशियों का संख्यात्मक मान
क्या है ? ॥ २०६-२०७½ ॥ एक पर्वत की ऊँचाई २० योजन है, और उसी प्रकार दूसरे पर्वत की
ऊँचाई २४ योजन है। उनके बीच की दूरी २२ योजन है। दो साधु, जो अलग अलग पर्वत के शृङ्ग
पर स्थित थे और आकाश में गमन कर सकते थे, उन दो पर्वतों के बीच में बसे हुए नगर में भिक्षा के
लिये उतरे । वे आकाश में बराबर दूरियाँ तय करते हुए देखे गये । उस मध्य में बसे हुए नगर और
पर्वतों के बीच की दूरी का माप क्या है ? ॥ २०८½-२०९½ ॥
विषम त्रिभुज की सीमाद्वारा निरूपित मार्ग पर असमान गति से चलने वाले दो मनुष्यों का
समागम होने के लिये इष्ट दिनों की संख्या का मान निकालने के लिए नियम—

-७. २१३½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २४५
दिनगतिकृतिसंयोगं दिनगतिकृत्यन्तरेण हृत्वाथ ।
हत्वोद्गतिदिवसैस्तल्लब्धदिने समागमः स्यान्नोः ॥ २१०½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वे योजने प्रयाति हि पूर्वगतिस्त्रीणि योजनान्यपरः ।
उत्तरतो गच्छति यो गत्वासौ तद्दिनानि पञ्चाथ ॥ २११½ ॥
गच्छन् कर्णाकृत्या कतिभिर्दिवसैर्नरं समाप्नोति ।
उभयोर्युगपद्गमनं प्रस्थानदिनानि सदृशानि ॥ २१२½ ॥
पञ्चविधचतुरश्रक्षेत्राणां च त्रिविधत्रिकोणक्षेत्राणां चेत्यष्टविधबाह्यवृत्तव्याससंख्यानयन-
सूत्रम्—
श्रुतिरवलम्बकभक्ता पार्श्वभुजघ्ना चतुर्भुजे त्रिभुजे ।
भुजघातो लम्बहृतो भवेद्बहिर्वृत्तविष्कम्भः ॥ २१३½ ॥
दो मनुष्यों की दैनिक गतियों के संख्यात्मक मानों के वर्गों के योग को उन्हीं दैनिक गतियों के
मानों के वर्गों के अंतर द्वारा भाजित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त भजनफल को उनमें से किसी एक
के द्वारा उत्तर में यात्रा करते हुए ( अन्य मनुष्य से मिलने हेतु दक्षिण पूर्व में जाने के पहिले ) व्यतीत
हुए दिनों की संख्या द्वारा गुणित करते हैं, इन दो मनुष्यों का समागम इस गुणनफल द्वारा मापे गये
दिनों की संख्या के अंत में होता है ॥ २१०½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
पूर्व की ओर यात्रा करनेवाला मनुष्य २ योजन प्रतिदिन की गति से चलता है, और उत्तर की
ओर यात्रा करने वाला दूसरा मनुष्य ३ योजन प्रतिदिन की गति से चलता है । यह दूसरा मनुष्य
५ दिनों तक ( इस प्रकार ) चलने के पश्चात् कर्ण पर चलने के लिये मुड़ता है । वह पहिले मनुष्य से
कितने दिन पश्चात् मिलेगा ? दोनों एक ही समय प्रस्थान करते हैं, और यात्रा में दोनों को समान
समय लगता है ॥ २११½-२१२½ ॥
पाँच प्रकार के चतुर्भुज क्षेत्रों तथा तीन प्रकार के त्रिभुज क्षेत्रोंवाली आठ प्रकार की आकृतियों
के परिगत वृत्तों के व्यासों के संख्यात्मक मान को निकालने के लिये नियम—
चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में, कर्ण के मान को लंब के मान द्वारा भाजित कर, और तब बाजू की
भुजा के मान द्वारा गुणित करने पर, परिगत वृत्त के व्यास का मान उत्पन्न होता है । त्रिभुज क्षेत्र के
संबंध में आधार को छोड़कर, शेष दो भुजाओं के मानों के गुणनफल को लंब के मान द्वारा भाजित
करने पर, परिगत वृत्त का इष्ट व्यास उत्पन्न होता है ॥ २१३½ ॥
( २१३½ ) मानलो कि त्रिभुज अ ब स किसी वृत्त में अंत-
र्लिखित है । अद व्यास है और बइ, अस पर लंब है । बद को जोड़ो ।
अब त्रिभुज अ ब द और ब इ स के कोण क्रमशः आपस में बराबर हैं
( अर्थात् ये त्रिभुज सजातीय [ similar ] हैं )
∴ अब : अद = बइ : बस, ∴ अद = (अब × बस) / बइ ।
यह सूत्र नियम में चतुर्भुज त्रिभुज के परिगत वृत्त के व्यास को
प्राप्त करने के लिये दिया गया है ।

२४६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. २१४½-
अत्रोद्देशकः
समचतुरश्रस्य त्रिकबाहुप्रतिबाहुकस्य चान्यस्य ।
कोटिः पञ्च द्वादश भुजास्य किं वा बहिर्वृत्तम् ॥ २१४½ ॥
बाहू त्रयोदश मुखं चत्वारि धरा चतुर्दश प्रोक्ता ।
द्विसमचतुरश्रबाहिर्विष्कम्भः को भवेदत्र ॥ २१५½ ॥
पञ्चकृतिर्वदनभुजाश्चत्वारिंशच्च भूमिरैकोना ।
त्रिसमचतुरश्रबाहिर्वृत्तव्यासं ममाचक्ष्व ॥ २१६½ ॥
व्येका चत्वारिंशद्बाहुः प्रतिबाहुको द्विपञ्चाशत् ।
षष्टिर्भूमिर्वदनं पञ्चकृतिः कोऽत्र विष्कम्भः ॥ २१७½ ॥
त्रिसमस्य च षड् बाहुस्त्रयोदश द्विसमबाहुकस्यापि ।
भूमिर्दश विष्कम्भावनयोः कौ बाह्यवृत्तयोः कथय ॥ २१८½ ॥
बाहू पञ्चत्र्युत्तरदशकौ भूमिश्चतुर्दशो विषमे ।
त्रिभुजक्षेत्रे बाहिरवृत्तव्यासं ममाचक्ष्व ॥ २१९½ ॥
द्विकबाहुषडश्रस्य क्षेत्रस्य भवेद्विचिन्त्य कथय त्वम् ।
बाहिरविष्कम्भं मे पैशाचिकमत्र यदि वेत्सि ॥ २२०½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
( समबाहु चतुर्भुज ) वर्गाकृति के संबंध में, जिसकी प्रत्येक भुजा ३ है, और अन्य चतुर्भुज क्षेत्र
के संबंध में, जिसकी लंब भुजा ५ और क्षैतिज भुजा १२ है, बतलाओ कि परिगत वृत्त के व्यास के
माप क्या-क्या हैं ? ॥ २१४½ ॥ दो पार्श्व भुजाओं में से प्रत्येक माप में १३ है, ऊपरी भुजा ४ है, और
आधार माप में १४ है । इस दशा में ऐसे दो समान भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के परिगत वृत्त के व्यास
का माप बतलाओ ॥ २१५½ ॥ ऊपरी भुजा और दो बाजू की भुजाओं में से प्रत्येक माप में २५ है ।
आधार माप में ३९ है । यहाँ बतलाओ की ऐसे तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज के परिगत वृत्त के
व्यास का माप क्या है ? ॥ २१६½ ॥ पार्श्व भुजाओं में से किसी एक का माप ३९ है; दूसरी का
माप ५२ है; आधार का माप ६० और ऊपरी भुजा का माप २५ है । इस चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में
परिगत वृत्त का व्यास क्या है ? ॥ २१७½ ॥ किसी समभुज त्रिभुज की भुजा का माप ६ है, और
समद्विबाहु त्रिभुज की भुजा का माप १३ है । इस दशा में आधार का माप १० है । इन त्रिभुजों के
परिगत वृत्तों के व्यासों के मान निकालो ॥ २१८½ ॥ विषम त्रिभुज के संबंध में दो भुजाएँ माप में
१५ और १३ हैं; आधार का माप १४ है । उसके परिगत वृत्त के व्यास का मान मुझे बतलाओ
॥ २१९½ ॥ यदि तुम गणित की पैशाचिक विधियाँ जानते हो, तो ठीक तरह सोचकर बतलाओ कि
जिसकी प्रत्येक भुजा का माप २ है ऐसे नियमित षट्भुजाकार आकृतिवाले क्षेत्र के परिगत वृत्त के
व्यास का मान क्या होगा ? ॥ २२०½ ॥
(२२०½) इस गाथा पर लिखी गई कन्नड़ी टीका में प्रश्न को यह सूचित कर हल किया है कि
नियमित षट्भुज का विकर्ण परिगत वृत्त के व्यास के तुल्य होता है ।

-७. २२३½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २४७
इष्टसंख्याव्यासवत्समवृत्तक्षेत्रमध्ये समचतुरश्राद्यष्टक्षेत्राणां मुखभूभुजसंख्यानयनसूत्रम्—
लब्धव्यासेनेष्टव्यासो वृत्तस्य तस्य भक्तश्च ।
लब्धेन भुजा गुणयेद्गवेच्च जातस्य भुजसंख्या ॥ २२१½ ॥
अत्रोद्देशकः
वृत्तक्षेत्रव्यासस्त्रयोदशाभ्यन्तरेऽत्र संचिन्त्य ।
समचतुरश्राद्यष्टक्षेत्राणि सखे ममाचक्ष्व ॥ २२२½ ॥
आयतचतुरश्रं विना पूर्वकल्पितचतुरश्रादिक्षेत्राणां सूक्ष्मगणितं च रज्जुसंख्यां च ज्ञात्वा
तत्तत्क्षेत्राभ्यन्तरावस्थितवृत्तक्षेत्रविष्कम्भानयनसूत्रम्—
परिधेः पादेन भजेदनायतक्षेत्रसूक्ष्मगणितं तत् ।
क्षेत्राभ्यन्तरवृत्ते विष्कम्भोऽयं विनिर्दिष्टः ॥ २२३½ ॥
व्यास के ज्ञात संख्यात्मक मान वाले समवृत्त क्षेत्र में अंतर्लिखित वर्ग से प्रारंभ होने वाली
आठ प्रकार की आकृतियों के आधार, ऊपरी भुजा और अन्य भुजाओं के संख्यात्मक मानों को निकालने
के लिये नियम—
दिये गये वृत्त के व्यास के मान को न्यास से प्राप्त ऐसे वृत्त के व्यास द्वारा भाजित किया जाता
है, जो निर्दिष्ट प्रकार की विकल्प से चुनी हुई आकृति के परितः खींचा जाता है । इस मन से चुनी हुई
आकृति के भुजाओं के मानों को उपर्युक्त परिणामी भजनफलों द्वारा गुणित करना चाहिए । इस प्रकार,
दिये गये वृत्त में उत्पन्न आकृति की भुजाओं के संख्यात्मक मानों को प्राप्त करते हैं ॥ २२१½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
समवृत्त आकृति का व्यास १३ है । हे मित्र, ठीक तरह विचार कर मुझे बतलाओ कि इस वृत्त
में अंतर्लिखित वर्गादि आठ प्रकार की विभिन्न आकृतियों के संबंध में विभिन्न माप क्या-क्या हैं ॥२२२½॥
केवल आयत क्षेत्र को छोड़कर पूर्वकथित विभिन्न प्रकार के चतुर्भुज और त्रिभुज क्षेत्रों के अंतर्गत
वृत्तों के व्यास का मान निकालने के लिये नियम, जब कि इन्हीं चतुर्भुज और अन्य आकृतियों के संबंध
में क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप और परिमिति का संख्यात्मक मान ज्ञात हो—
( आयत क्षेत्र को छोड़कर अन्य किसी भी ) आकृति के सूक्ष्म ज्ञात क्षेत्रफल को ( उस आकृति
की ) परिमिति की एक चौथाई राशि द्वारा भाजित करना चाहिये । वह परिणाम उस आकृति के अंतर्गत
वृत्त के व्यास का माप होता है ॥ २२३½ ॥
(२२१½) इष्ट और मन से चुनी हुई आकृतियों की सजातीयता ( similiarity ) से यह
नियम स्वमेव प्राप्त हो जाता है ।
( २२३½ ) यदि सब भुजाओं का योग 'य' हो, अंतर्गत वृत्त का व्यास 'व' हो, और संबंधित
चतुर्भुज या त्रिभुजक्षेत्र का क्षेत्रफल 'क्ष' हो, तो
व/२ × य/२ = क्ष होता है ।
इसलिये नियम में दिया गया सूत्र, व = क्ष ÷ य/४, है ।

२४८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. २२४½-
अत्रोद्देशकः
समचतुरश्रादीनां क्षेत्राणां पूर्वकल्पितानां च ।
कृत्वान्तर्वृत्तं ब्रूह्यधुना गणिततत्त्वज्ञ ॥ २२४½ ॥
समवृत्तव्याससंख्यायामिष्टसंख्यां बाणं परिकल्प्य तद्बाणपरिमाणस्य ज्यासंख्या-
नयनसूत्रम्—
व्यासाधिगमोणस्स च चतुर्गुणिताधिगमेन संगुणितः ।
यत्तस्य वर्गमूलं ज्यारूपं निर्दिशेत्प्राज्ञः ॥ २२५½ ॥
अत्रोद्देशकः
व्यासो दश वृत्तस्य द्वाभ्यां छिन्नो हि रूपाभ्याम् ।
छिन्नस्य ज्या का स्यात्प्रगणय्याचक्ष्व तां गणक ॥ २२६½ ॥
समवृत्तक्षेत्रव्यासस्य च मौर्व्याश्च संख्यां ज्ञात्वा बाणसंख्यानयनसूत्रम्—
व्यासज्यारूपकयोर्वर्गविशेषस्य भवति यन्मूलम् ।
तद्विष्कम्भाच्छोध्यं शेषार्धमिषुं विजानीयात् ॥ २२७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वर्गादि पूर्वोल्लिखित आकृतियों के संबंध में अंतर्गत वृत्त खींचकर, हे गणित तत्त्वज्ञ, प्रत्येक ऐसे
अंतर्गत वृत्त के व्यास का मान बतलाओ ॥ २२४½ ॥
किसी समवृत्त के व्यास के ज्ञात संख्यात्मक मान के भीतर (सीमान्तः) बाण के माप की
ज्ञात संख्या लेकर, ऐसे धनुष के धागे के संख्यात्मक मान को प्राप्त करने के लिये नियम जिसका बाण
उसी दिये गये माप के तुल्य है—
दिये गये व्यास के मान और बाण के ज्ञात मान के अंतर को बाण के मान की चौगुनी राशि
द्वारा गुणित किया जाता है । परिणामी गुणनफल का जितना भी वर्गमूल आता है, उसे विद्वान पुरुष
को धनुष की डोरी का इष्ट माप बतलाना चाहिये ॥ २२५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वृत्त का व्यास १० है । उसका २ द्वारा अपकर्तन किया जाता है । हे गणितज्ञ, ठीक गणना के
पश्चात् दिये गये व्यास के कटे हुए भाग के संबंध में धनुष की डोरी का माप बतलाओ ॥ २२६½ ॥
जब किसो दिये गये वृत्त के व्यास का संख्यात्मक मान और उस वृत्त संबंधी धनुष डोरी
(जीवा) का मान ज्ञात हो, तब बाण का संख्यात्मक मान निकालने के लिये नियम—
दिये गये वृत्त के संबंध में व्यास और जीवा (धनुष-डोरी रेखा) के ज्ञात मानों के वर्गों के
अंतर का जो वर्गमूल होता है उसे व्यास के मान में से घटाया जाता है । परिणामी शेष की अर्द्धराशि
बाण (रेखा) का इष्ट मान होती है ॥ २२७½ ॥

  • (२२५½) गाथा २२५½, २२७½, २२९½ और २३१½ में दिये गये सभी नियम इस यथार्थता
    पर आधारित हैं कि किसो वृत्त में प्रतिच्छेदन करने वाले (intersecting) चाप कर्णों की
    आबाधाओं (खंडों) के गुणनफल समान होते हैं ।