गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें२४२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १९९½-
अत्रोद्देशकः
षड्योजनोर्ध्वशिखरिणि यतीश्वरौ तिष्ठतस्तत्र ।
एकोऽङ्घ्रिचर्ययागात्तत्राप्याकाशचार्यपरः ॥ १९९½ ॥
श्रुतिवशमुत्पत्य पुरं गिरिशिखरान्मूलमवरुह्यान्यः ।
समगतिकौ संजातौ नगरव्यासः किमुत्पतितम् ॥ २००½ ॥
डोलाकारक्षेत्रे स्तम्भद्वयस्य वा गिरिद्वयस्य वा उत्सेधपरिमाणसंख्यामेव आयतचतुरश्र-
भुजद्वयं क्षेत्रद्वये परिकल्प्य तद्गिरिद्वयान्तरभूम्यां वा तत्तस्तम्भद्वयान्तरभूम्यां वा आबाधाद्वयं
परिकल्प्य तदाबाधाद्वयं व्युत्क्रमेण निक्षिप्य तद्व्युत्क्रमं न्यस्ताबाधाद्वयमेव आयतचतुरश्रक्षेत्रद्वये
कोटिद्वयं परिकल्प्य तत्कर्णद्वयस्य समानसंख्यानयनसूत्रम्—
उदाहरणार्थ प्रश्न
६ योजन ऊँचाई वाले किसी पर्वत पर २ यतीश्वर तिष्ठे थे । उनमें से एक ने पैदल गमन किया ।
दूसरे आकाश में गमन कर सकते थे । ये दूसरे यतीश्वर ऊपर की ओर उड़े, और तब शहर में कर्ण मार्ग
से उतरे । प्रथम यतीश्वर शिखर से पर्वत के मूल तक सीधे नीचे की ओर उद्गम दिशा में उतरे, और
पैदल शहर की ओर चले । यह ज्ञात हुआ कि दोनों ने समान दूरियाँ तय कीं । पर्वत के मूल से शहर
तक की दूरी क्या है, और ऊपरी उड़ान की ऊँचाई कितनी है ? ॥ १९९½–२००½ ॥
लटकन ( डोल ) और उसके दो भूमि पर आधारित लंबरूप अवलंबों द्वारा निरूपित क्षेत्र में,
दो स्तंभों अथवा दो पर्वत शिखरों की ऊँचाइयों के माप दो आयत चतुरश्र क्षेत्रों की क्षैतिज ( क्षितिज
के समानान्तर ) भुजाओं के माप मान लिये जाते हैं । तब, इन ज्ञात क्षैतिज भुजाओं की सहायता से,
और ( दशानुसार ) दो पर्वत अथवा दो स्तंभ के बीच की आधार रेखा के संबंध में लंब के मिलन बिन्दु
द्वारा उत्पन्न आबाधाओं ( खंडों ) के मानों को प्राप्त करते हैं । इन दो आबाधाओं को विलोम क्रम में
लिखते हैं । इस प्रकार विलोम क्रम में लिखे गये ( दो आबाधाओं के ) मानों की दो आयताकार
चतुर्भुज क्षेत्रों की दो लंब भुजाओं के माप मान लेते हैं । ( ऐसी दशा में ) इन दो आयतों के कर्णों के
समान संख्यात्मक मान को प्राप्त करने के लिये नियम —
( १९९½–२००½ ) आकृति में यदि पर्वत की ऊँचाई 'अ' द्वारा निरूपित है, शहर से
पर्वत के मूल की दूरी 'ब' है, और कर्ण मार्ग की लम्बाई 'स'
है, तो गाथा १९८½ के नियम की पृष्ठभूमि में की गई कल्पना
के अनुसार 'अ' भुजा सा बा की २/३ है । इसलिये ऊर्ध्व दिशा
की उड़ान दा बा अर्थात् ½ अ है............( १ )
चूँकि दो साधुओं की उड़ानें बराबर हैं, ∴ स + ½ अ = अ + ब;
∴ स = ½ अ + ब..............( २ )
∴ स² = ¼ अ² + ब² + अ ब, परन्तु स² = ९/४ अ² + ब²;
∴ अ ब = २ अ²;
∴ ब = २ अ................( ३ )
दिये गये नियम में ये ही तीन सूत्र ( १ ), ( २ ) और ( ३ ) वर्णित हैं ।