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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 421 में से

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पृष्ठ 302

२४८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. २२४½-
अत्रोद्देशकः
समचतुरश्रादीनां क्षेत्राणां पूर्वकल्पितानां च ।
कृत्वान्तर्वृत्तं ब्रूह्यधुना गणिततत्त्वज्ञ ॥ २२४½ ॥
समवृत्तव्याससंख्यायामिष्टसंख्यां बाणं परिकल्प्य तद्बाणपरिमाणस्य ज्यासंख्या-
नयनसूत्रम्—
व्यासाधिगमोणस्स च चतुर्गुणिताधिगमेन संगुणितः ।
यत्तस्य वर्गमूलं ज्यारूपं निर्दिशेत्प्राज्ञः ॥ २२५½ ॥
अत्रोद्देशकः
व्यासो दश वृत्तस्य द्वाभ्यां छिन्नो हि रूपाभ्याम् ।
छिन्नस्य ज्या का स्यात्प्रगणय्याचक्ष्व तां गणक ॥ २२६½ ॥
समवृत्तक्षेत्रव्यासस्य च मौर्व्याश्च संख्यां ज्ञात्वा बाणसंख्यानयनसूत्रम्—
व्यासज्यारूपकयोर्वर्गविशेषस्य भवति यन्मूलम् ।
तद्विष्कम्भाच्छोध्यं शेषार्धमिषुं विजानीयात् ॥ २२७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वर्गादि पूर्वोल्लिखित आकृतियों के संबंध में अंतर्गत वृत्त खींचकर, हे गणित तत्त्वज्ञ, प्रत्येक ऐसे
अंतर्गत वृत्त के व्यास का मान बतलाओ ॥ २२४½ ॥
किसी समवृत्त के व्यास के ज्ञात संख्यात्मक मान के भीतर (सीमान्तः) बाण के माप की
ज्ञात संख्या लेकर, ऐसे धनुष के धागे के संख्यात्मक मान को प्राप्त करने के लिये नियम जिसका बाण
उसी दिये गये माप के तुल्य है—
दिये गये व्यास के मान और बाण के ज्ञात मान के अंतर को बाण के मान की चौगुनी राशि
द्वारा गुणित किया जाता है । परिणामी गुणनफल का जितना भी वर्गमूल आता है, उसे विद्वान पुरुष
को धनुष की डोरी का इष्ट माप बतलाना चाहिये ॥ २२५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वृत्त का व्यास १० है । उसका २ द्वारा अपकर्तन किया जाता है । हे गणितज्ञ, ठीक गणना के
पश्चात् दिये गये व्यास के कटे हुए भाग के संबंध में धनुष की डोरी का माप बतलाओ ॥ २२६½ ॥
जब किसो दिये गये वृत्त के व्यास का संख्यात्मक मान और उस वृत्त संबंधी धनुष डोरी
(जीवा) का मान ज्ञात हो, तब बाण का संख्यात्मक मान निकालने के लिये नियम—
दिये गये वृत्त के संबंध में व्यास और जीवा (धनुष-डोरी रेखा) के ज्ञात मानों के वर्गों के
अंतर का जो वर्गमूल होता है उसे व्यास के मान में से घटाया जाता है । परिणामी शेष की अर्द्धराशि
बाण (रेखा) का इष्ट मान होती है ॥ २२७½ ॥

  • (२२५½) गाथा २२५½, २२७½, २२९½ और २३१½ में दिये गये सभी नियम इस यथार्थता
    पर आधारित हैं कि किसो वृत्त में प्रतिच्छेदन करने वाले (intersecting) चाप कर्णों की
    आबाधाओं (खंडों) के गुणनफल समान होते हैं ।