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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

( ४२ ) गणेशगीता अ० ३ ।
जनाः स्युरितरे राजन्मम मार्गानुयायिनः ॥
तथैव व्यवहारं ते स्वेषु चान्येषु कुर्वते ॥ १६ ॥
हे राजन् ! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी
होजाँय, इसी प्रकारका व्यवहार वे अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें
करते हैं ॥ १६ ॥
कुर्वन्ति देवताप्रीतिं कांक्षन्तः कर्मणां फलम् ॥
प्राप्नुवन्तीह ते लोके शीघ्रं सिद्धिं हि कर्मजाम् १७
और जो कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवताओंकी
उपासना करते हैं, उन उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र
सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
चत्वारो हि मया वर्णा रजःसत्त्वतमोंऽशतः ॥
कर्मांशतश्च संसृष्टा मृत्युलोके मयाऽनघ ॥१८॥
हे पापरहित ! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व रज
तम इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है ॥१८ ॥
कर्त्तारमपि तेषां मामकर्त्तारं विदुर्बुधाः ॥
अनादिमीश्वरं नित्यमलिप्तं कर्मजैर्गुणैः ॥१९॥
यद्यपि मैं इनका कर्ता हूं परन्तु पंडित जन मुझे अकर्ता
जानते हैं अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त
मानते हैं ॥ १९ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ४३ )
निरीहं योऽभिजानाति कर्म बध्नाति नैव तम् ॥
चक्रुः कर्माणि बुद्ध्वैवं पूर्वपूर्व मुमुक्षवः ॥२०॥
जो मुझे इच्छारहित जानता है उसको कर्मबंधन नहीं होता
इस कारण पूर्वमें मुमुक्षु जन यह बिचारकर कर्म करते थे २०
वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद्दृढात् ॥
अज्ञानबन्धनाज्जन्तुर्बुद्ध्वायं मुच्यतेऽखिलात् २१
वासनासे युक्त जो कि संसारका दृढ कारण है यही अज्ञा-
नका बंधन है इसे जानकर प्राणी मुक्त होता है ॥ २१ ॥
तदकर्म च कर्मापि कथयाम्यधुना तव ॥
यत्र मौनं गता मोहादृषयो बुद्धिशालिनः ॥२२॥
क्या कर्म और क्या अकर्म है यह मैं तुमसे कहताहूं इसके
जाननेमें ऋषिभी मोहको प्राप्त होजाते हैं ॥ २२ ॥
तत्त्वं मुमुक्षुणा ज्ञेयं कर्माकर्मविकर्मणाम् ॥
त्रिविधानीह कर्माणि सुनिम्नैषां गतिःप्रिय२३॥
कर्म अकर्म और विकर्म इसका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा
करनेवालोंको जानना अवश्य है, वेतीनही कर्म हैं हे प्रिय !

( ४४ ) गणेशगीता अ० ३.
इनकी गति जाननी महाकठिन है, तू मेरा भक्त है इससे
कहता हूं ॥ २३ ॥
क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः ॥
यस्यस्यात्सहिमत्येँस्मिँल्लोकेमुक्तोऽखिलार्थकृत्।
क्रियामें अक्रियाका ज्ञान, और अक्रियामें क्रियाकी मति
जिसकी होती है वही इस लोकमें सब कर्मका करनेवाला हो
तौभी मुक्त होजाता है ☸ ॥ २४ ॥
कर्मांकुरवियोगेन यः कर्माण्यारभेन्नरः ॥
तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम् ॥ २५ ॥
जो कर्मोंके अंकुरके वियोगसे अर्थात् संकल्प और कामना
रहित कर्म करते हैं तत्त्वके जाननेसे उनकी सब क्रिया दग्ध
हैं, ऐसा पंडितजन कहते हैं ॥ २५ ॥

  • अर्थात् देह और इंद्रिय आदिके जितने उचित और निषिद्ध
    कर्म हैं उनमेंसे किसकोभी आत्मा नहीं करता है और सब बाह्य
    कर्म त्यागने परभी यदि देहादिको आत्मा मानाजाय तौभी अन्तर
    शारीरिक क्रियां होती है वहभी आत्माकी क्रिया समझी जाती है
    एवं उनसे आत्माको संसारका दुःख आवरण करलेता है, इस
    प्रकारका जिन्हें विश्वास है वही जनोंमें बुद्धिमान् हैं और सब कर्म
    करते रहनेपरभी योगी हैं॥

२. अध्याय ४-६: ज्ञान-योग, भक्ति-योग व गणेश-विश्वरूप दर्शन

भाषाटीकासमेत । ( ४५ )
फलतृष्णां विहाय स्यात्सदा तृप्तो विसाधनः ॥
उद्युक्तोऽपि क्रियां कर्तुं किंचिन्नैव करोति सः२६
जो फलकी इच्छाको छोड कर सदा तृप्त रहते, और
कोई साधन नहीं करते हैं, यदि वे कर्म करनेको उद्यत भी हैं
तौभी कुछ नहीं करते हैं ॥ २६ ॥
निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः ॥
केवलं वै गृहं कर्माचरन्नायाति पातकम् ॥ २७॥
जो इच्छा रहित आत्मजित सम्पूर्ण परित्याग किये हैं
ऐसे प्राणी यदि घरमें रहकै कर्मभी करें तौभी उन्हें कुछ
पातक नहीं लगता ॥ २७ ॥
अद्वन्द्वोऽमत्सरोभूत्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समश्चयः।
यथाप्राप्येहं संतुष्टः कुर्वन्कर्म न बद्ध्यते ॥२८॥
द्वंद्व और मत्सरहीन होकर सिद्धि असिद्धिमें समान दृष्टि
रखते हैं जो प्राप्तिहो उसीमें संतुष्ट रहते हैं ऐसे प्राणी कर्म
करनेसे भी लिप्त नहीं होते हैं ॥ २८ ॥
अखिलैर्विषयैर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानवानपि ॥
यज्ञार्थं तस्य सकलं कृतं कर्म विलीयते ॥२९॥

( ४६ ) गणेशगीता अ० ३.
सम्पूर्ण विषयोंसे मुक्त ज्ञानवानभी यदि यज्ञके निमित्त
कर्म करै तौ वह कर्म उसे बाधक नहीं होते, लीन हो
जाते हैं ॥ २९ ॥
अहमग्निर्हविर्दाता हुतं यन्मयि चार्पितम् ॥
ब्रह्माप्तव्यं च ते नाथ ब्रह्मण्येव यतो रतः ॥३०॥
अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेहारे, और जो आहुति मुझे
अर्पण की जाती है, वह सब ब्रह्मरूप है, इसे ब्रह्मस्वरूपसे
देखकर जो हवन करता है,और ब्रह्मके ही अर्पण करता है वह
ब्रह्मरूप कर्मकी समाधिसे ब्रह्महीको प्राप्त होता है ॥ ३० ॥
योगिनः केचिदपरे दिष्टं यज्ञं वदंति च ॥
ब्रह्माग्निरेव यज्ञो वै इति केचन मेनिरे ॥ ३१ ॥
कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें
यज्ञरूप उपायसे यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं ॥ ३१ ॥
संयमाग्नौ परे भूप इंद्रियाण्युपजुह्वति ॥
खाग्निष्वन्ये तद्विषयांश्छन्दादीनुपजुह्वति॥३२॥
हे राजन् ! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रि-
योंको हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादिकोंकी
आहुति देते हैं ॥ ३२ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ४७ )
प्राणानामिंद्रियाणां च परे कर्माणि कृत्स्नशः ॥
निजात्मरतिरूपेऽग्नौ ज्ञानदीप्ते प्रजुह्वति ॥३३॥
और कोई ज्ञानमें जलती हुई आत्मसंयमरूपी योगाग्निमें
सम्पूर्ण इंद्रिय कर्म और प्राणोंका हवन करते हैं, अर्थात्
इनकी क्रिया आत्मामें लय करदेते हैं ॥ ३३ ॥
द्रव्येण तपसा वापि स्वाध्यायेनापि केचन ॥
तीव्रव्रतेन यतिनो ज्ञानेनापि यजंति माम्॥३४॥
कोई द्रव्ययज्ञका अनुष्ठानकर, दान, तपस्या, कोई स्वाध्या-
यसे, कोई महात्मा तीव्र व्रतसे, कोई ज्ञानसे मेरा यजन
करते हैं ॥ ३४ ॥
प्राणेऽपानं तथा प्राणमपाने प्रक्षिपंति ये ॥
रुद्ध्वा गतीश्वोभयोस्ते प्राणायामपरायणाः ३५॥
दूसरे कोई पूरकसे, प्राणवायुमें अपानको और रेचकसे
प्राणको अपानमें हवन करते हैं, और कुंभकके अनुष्ठानसे
प्राणापानकी गतिको रोककर प्राणायाम परायण होते हैं॥३५॥
जित्वा प्राणान्प्राणगतीरुपजुह्वति तेषु च ॥
एवं नानायज्ञरता यज्ञध्वंसितपातकाः ॥ ३६ ॥

( ४८ ) गणेशगीता अ० ३.
दूसरे नियताहार होकर इन्द्रियोंकी वृत्तिको रोक पांचों
प्राणोंमें पांचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकार अनेक
प्रकारके यज्ञकर यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं ॥ ३६ ॥
नित्यं ब्रह्म प्रयांत्येते यज्ञशिष्टामृताशिनः ॥
अयज्ञकारिणो लोको नायमन्यःकुतो भवेत् ३७
इस प्रकारसे जो नित्यही यज्ञसे बचे पदार्थको भोजन
करते हैं वे नित्य ब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यज्ञ न करनेवालोंको
दूसरा लोक तौ कहां यह भी नहीं है ॥ ३७ ॥
कायिकादि त्रिधाभूतान्यज्ञान्वेदे प्रतिष्ठितान् ॥
ज्ञात्वा तानखिलान्भूप मोक्ष्यसेऽखिलबंधनात्॥
हे राजन् ! ब्रह्मके मुखमें मन वचन कर्मके बहुत प्रकारके
यज्ञ वर्णन किये हैं, उन्हें क्रियासे उत्पन्न और क्रिया रहित
आत्मासे न होनेवाले जानो, ऐसा जानकर संसारसे मुक्त
होगे ॥ ३८ ॥
सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः ॥
अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ३९॥
हे राजन् ! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, जिस मोक्षसाधन
ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ३९ ॥

भाषाटीकामेत । ( ४९ )
तज्ज्ञेयं पुरुषव्याघ्र प्रश्नेन नतितः सताम् ॥
शुश्रूषया वदिष्यंति संतस्तत्त्वविशारदाः ॥४०॥
हे पुरुषश्रेष्ठ ! उस ज्ञानयज्ञको सत्पुरुषोंकी सेवा और प्रश्नसे
प्राप्त करो तत्वजाननेवाले शुश्रूषासे उसको कहेंगे ॥ ४० ॥
नानासंगाञ्जनः कुर्वन्नैकं साधुसमागमम् ॥
करोति तेन संसारे बन्धनं समुपैति सः ॥४१॥
जो मनुष्य अनेक प्रकारकी संगति करताहै पर एक साधुकी
संगति नहीं करता,वह संसारमें बंधनको प्राप्त होता है ॥४१॥
सत्संगाद्गुणसंभूतिरापदां लय एव च ॥
स्वहितं प्राप्यते सर्वैरिह लोके परत्र च ॥ ४२ ॥
सत्संगसे गुणकी प्राप्ति, और आपदाका नाश होताहै, इस
लोक और परलोकमें अपना कल्याण प्राप्त होता है ॥४२॥
इतरत्सुलभं राजन्सत्सङ्गोऽतीव दुर्लभः ॥
यज्ज्ञात्वा न पुनर्बन्धमेति ज्ञेयं ततस्ततः ॥४३॥
हे राजन् ! और तो सब सुलभ है, परन्तु सत्संग बडा
दुर्लभ है, जिसके जाननेसे फिर संसारमें नहीं आता, इस
कारण उसका जानना अवश्य है ॥ ४३ ॥

( ५० ) गणेशगीता अ ३.
ततः सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति ॥
अतिपापरतो जन्तुस्ततस्तस्मात्प्रमुच्यते ॥४४॥
सत्संगसे ज्ञान मिलनेसे यह सब प्राणियोंको अपनेमेंही
देखता है, इससे अतिपापी प्राणीभी मुक्त होजाता है ॥४४॥
द्विविधान्यपि कर्माणि ज्ञानाग्निर्दहति क्षणात् ॥
प्रसिद्धोऽग्निर्यथा सर्वं भस्मतां नयति क्षणात्४५
जिस प्रकारसे प्रसिद्ध जलती अग्नि सब लकडियोंको
क्षणमें भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानअग्निमें पाप पुण्य
दोनों प्रकारके कर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप ॥
आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेनयोगिनः४६
हे राजन् ज्ञानकी समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं, योग
सिद्ध महात्मा उस ज्ञानको काल उपस्थित होनेपर स्वयंही
प्राप्त करता है ॥ ४६ ॥
भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात् ॥
लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ४७
भक्तिमान्, इन्द्रिय जीतनेमें तत्पर पुरुषही ज्ञानको प्राप्त
कर सकता है,और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोडे समयमेंही मुक्तिको
प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ५१ )
भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः ॥
तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः ४८
और जो भक्तिहीन श्रद्धारहित सर्वत्र संदिग्धचित्त है, उसे
कल्याणकी प्राप्ति नहीं तथा दोनों लोककी प्राप्ति नहीं,क्योंकि
उसे ज्ञानही नहीं ॥ ४८ ॥
आत्मज्ञानरतं ज्ञाननाशिताखिलसंशयम् ॥
योगास्ताखिलकर्माणं बध्नन्ति भूप तानि न॥४९॥
जो आत्मज्ञानमें रत हैं, जिन्होंने ज्ञानसे सब संदेह दूर
किये हैं, हे राजन् उस योगमें स्थित पुरुषोंको कर्म नहीं लगते
कारण कि उन्होंने योगसे वे कर्म नष्ट करादिये हैं ॥ ४९ ॥
ज्ञानखङ्गप्रहारेण संभूतामज्ञतां बलात् ॥
छित्त्वान्तःसंशयं तस्माद्योगयुक्तो भवेन्नरः ५०॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृ-
तार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्य-
संवादे विज्ञानप्रतिपादनो नाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

( ५२ ) गणेशगीता-अ० ४.
इस कारण ज्ञानरूप खड्गसे मनके अज्ञानसे उत्पन्न हुई
संशयको बलसे काटकर मनुष्यको योगका आश्रय लेना
उचित है ॥ ५० ॥
ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ-
शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ०श्रीगजाननवरेण्यसम्वादे पण्डित-
ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां विज्ञानप्रति-
पादनोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
वरेण्य उवाच ।
संन्यस्तिश्चैव योगश्च कर्मणां वर्ण्यते त्वया ॥
उभयोर्निश्चितं त्वेकं श्रेयो यद्वद मे प्रभो ॥१॥
वरेण्य बोले हे भगवन् ! आप कर्मसंन्यास अर्थात् निष्काम
भावसे कर्म करते करते विशुद्धचित्त होनेपर कर्मत्याग कर-
नेको ज्ञानका कारण कहकर फिर कर्मयोगको ज्ञानका कारण
कहतेहो, इससे मुझे सन्देह होता है इन दोनोंमें जो हित हो
सो कहो ॥ १ ॥
श्रीगजानन उवाच ।
क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने ॥
तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते २

भाषाटीकासमेत । ( ५३ )
श्रीगणेशजी बोले कि, अधिकारियोंके भेदसे कर्मयोग
और कर्मसंन्यास दोनों मुक्तिके साधन हैं, उन दोनोंमें कर्म-
संन्याससे कर्मयोग श्रेष्ठ है ॥ २ ॥
द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न कांक्षति किञ्चन ॥
मुच्यते बंधनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान्सुखम् ३
जो द्वंद्व और दुःखभी सहकर किसीसे द्वेष नहीं करते;
और किसी बातकी इच्छा नहीं करते, ऐसे प्राणी अनायाससे
तत्काल कर्म बन्धनसे मुक्त होते हैं ॥ ३ ॥
वदंति भिन्नफलकौ कर्मणस्त्यागसंग्रहौ ॥
मूढाल्पज्ञास्तयोरेकं संयुञ्जीत विचक्षणः ॥ ४ ॥
कर्मसंन्यास और कर्मयोगको अज्ञानीही पृथक् २ कहते
हैं परन्तु पंडितगण उन्हें एकही कहते हैं ॥ ४ ॥
यदेव प्राप्यते त्यागात्तदेव योगतः फलम् ॥
संग्रहं कर्मणो योगं यो विंदति स विंदति ॥५॥
जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल कर्मयोगसे
प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको जो यथार्थ जानता
है वही ज्ञाता है ॥ ५ ॥

( ५४ ) गणेशगीता-अ० ४
केवलं कर्मणां न्यासं संन्यासं न विदुर्बुधाः ॥
कुर्वन्ननिच्छया कर्म योगी ब्रह्मैव जायते ॥ ६ ॥
पंडितजन केवल कर्मसंन्यासकोही संन्यास नहीं कहते यदि
योगी अनिच्छासे कर्म करे तो वह ब्रह्मही हो जाता है ॥६॥
निर्मलो यतचित्तात्मा जितगो योगतत्परः ॥
आत्मानं सर्वभूतस्थं पश्यन्कुर्वन्न लिप्यते ॥७॥
शुद्धचित्त, आत्माके वश करनेहारे जितेन्द्री योगमें तत्पर
सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित आत्माको देखनेहारे, कर्म करते
हुए भी लिप्त नहीं होते ॥ ७ ॥
तत्त्वविद्योगयुक्तात्मा करोमीति न मन्यते ॥
एकादशानींद्रियाणि कुर्वति कर्म संख्यया ॥८॥
तत्त्वका जानेनहारा योगयुक्त आत्मा पुरुष मैं करता हूं ऐसा
ही नहीं मान्ता, परन्तु मनसहित एकादश इन्द्रिय कर्म करती
हैं ऐसा मानते हैं ॥ ८ ॥
तत्सर्वमर्पयेद्ब्रह्मण्यपि कर्म करोति यः ॥
न लिप्यते पुण्यपापैर्भानुर्जलगतो यथा ॥ ९ ॥
और जो कर्म करनेहारा सब कर्म ब्रह्ममें अर्पणकर देताहै,

भाषाटीकासमेत । ( ५५ )
वह इस प्रकार पापपुण्यसे लिप्त नहीं होता जैसा सूर्यका बिम्ब
जलमें पडता है और वह उससे लिप्त नहीं होता ॥ ९ ॥
कायिकं वाचिकं बौद्धमैन्द्रियं मानसं तथा ॥
त्यक्ताशां कर्म कुर्वन्ति योगज्ञाश्चित्तशुद्धये १०॥
योगके जाननेवाले चित्तशुद्धिके निमित्त मन वचन बुद्धि
इन्द्रिय मनसे अनुराग त्यागकर कर्म करते हैं ॥ १० ॥
योगहीनो नरः कर्म फलेहया करोत्यलम् ॥
बध्यते कर्मबीजैः स ततो दुःखं समश्नुते॥११॥
योगहीन मनुष्य कर्मोंको फलकी इच्छासे करता है,वह कर्म
बीजसे बंधता है, और इसीसे दुःखको प्राप्त होता है ॥११॥
मनसा सकलं कर्म त्यक्त्वा योगी सुखं वसेत् ॥
न कुर्वन्कारयन्वापि नन्दञ्श्वभ्रे सुपत्तने ॥१२॥
योगीको उचित है मनसे सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर,सुखसे
रहे, व उत्तम नगरमें वास करता हुआ भी न कुछ करे
न करावे ॥ १२ ॥
न क्रिया न च कर्तृत्वं कस्यचित्सृज्यते मया ॥
न क्रियाबीजसंपर्कःशक्त्यातात्क्रियतेऽखिलम् १३

( ५६ ) गणेशगीता-अ० ४.
और ऐसा जाननेमें न कोई क्रिया करता हूं, न कोई कर्तृत्व-
पना मुझमें है, न मेरा क्रियाके बीजसे कुछ संबंध है, यह सब
कुछ शक्ति अर्थात् प्रकृतिसे स्वयं होता रहता है ॥ १३ ॥
कस्यचित्पुण्यपापानि न स्पृशामि विभुर्नृप ॥
ज्ञानमूढा विमुह्यन्ते मोहेनावृतबुद्धयः ॥ १४ ॥
मैं विभु आत्मा किसीके पुण्य और पापोंको स्पर्श नहीं
करताहूं, हे राजन् ! मोहसे मलीन बुद्धिवाले ज्ञानके न होनेसे
मूर्खही मोहको प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥
विवेकेनात्मनोऽज्ञानं येषां नाशितमात्मना ॥
तेषां विकाशमायाति ज्ञानमादित्यवत्परम् १५॥
जिन्होंने ज्ञानद्वारा आत्मासेही अपना अज्ञान नाश किया
है उनका ज्ञान सूर्यकी समान परम प्रकाशित होता है ॥१५॥
मन्निष्ठा मद्धियोऽत्यन्तं मच्चित्ता मयि तत्पराः ॥
अपुनर्भवमायान्ति विज्ञानान्नाशितैनसः ॥ १६ ॥
जिनकी निष्ठा और बुद्धि मुझहीमें है, जिनका चित्त मुझमें
अत्यन्त आसक्त है, जो सदा मेरे परायण हैं वह विज्ञानद्वारा
पापनाश करके मुक्त होजाते हैं ॥ १६ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ५७ )
ज्ञानविज्ञानसंयुक्ते द्विजे गवि गजादिषु ॥
समेक्षणा महात्मानः पण्डिताः श्वपचे शुनि १७॥
ज्ञानविज्ञानयुक्त महात्मा पंडितजन ब्राह्मण,गौ,हस्ती आदि
प्राणी, चांडाल, श्वान इन सबमें समान दृष्टि रखते हैं ॥१७॥
वश्यः स्वर्गो जगत्तेषां जीवन्मुक्ताः समेक्षणाः ॥
यतोऽदोषं ब्रह्म समं तस्मात्तैर्विषयीकृतम् ॥१८॥
जिनका मन समतामें स्थित है, इस लोकमें जीते ही वे
संसार और स्वर्गको जीत चुके हैं कारण कि ब्रह्म निर्दोष
और समान है, इसकारण वे ब्रह्ममें स्थित हैं ॥ १८ ॥
प्रियाप्रिये प्राप्य हर्षद्वेषौ ये प्राप्नुवन्ति न ॥
ब्रह्माश्चिता असंमूढा ब्रह्मज्ञाः समबुद्धयः ॥१९॥
जो महात्मा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें हर्षशोक नहीं
करते, वे ज्ञानयुक्त ब्रह्ममें स्थित ब्रह्मके जाननेवालेके समान
बुद्धिमान् हैं ॥ १९ ॥
वरेण्य उवाच ।
किं सुखं त्रिषु लोकेषु देवगन्धर्वयोनिषु ॥
भगवन्कृपया तन्मे वद विद्याविशारद ॥ २० ॥

( ५८ ) गणेशगीता अ० ४.
वरेण्य बोले भगवन् ! तीन लोक तथा देवता ओर गन्धर्व
योनिमें यथार्थ सुख क्या है, हे विद्याविशारद् ! कृपाकर आप
यह मुझसे वर्णन कीजिये ॥ २० ॥
श्रीगजानन उवाच ।
आनन्दमश्नुतेऽसक्तः स्वात्मारामो निजात्मनि॥
अविनाशि सुखं तद्धि न सुखं विषयादिषु॥२१॥
श्रीगणेशजी बोले-जो अपनी आत्मामें ही रमण करते
और कहीं आसक्त नहीं हैं, वह आनन्द भोगते हैं उसीका नाम
अविनाशी सुख है, विषयादिकोंमें सुख नहीं है ॥ २१ ॥
विषयोत्थानि सौख्यानि दुःखानां तानि हेतवः॥
उत्पत्तिनाशयुक्तानि तत्रासक्तो न तत्त्ववित् २२
विषयोंसे उत्पन्न हुए सुख दुःखके ही कारण हैं, और उत्पत्ति
तथा नाशवाले हैं, तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २२॥
कारणे सति कामस्य क्रोधस्य सहते च यः ॥
तौ जेतुं वर्ष्मविरहात्स सुखं चिरमश्नुते ॥२३॥
जो इस शरीरके रहते ही काम क्रोध आदिसे उपजनेवाले
वेगको रोग सकता है वही योगी है और बहुत कालतक
सुख भोगता है ॥ २३ ॥

भाषाटीकासमेत । (५९)
अन्तर्निष्ठोऽन्तःप्रकाशोऽन्तःसुखोऽन्तरतिर्लभेत्
असंदिग्धोऽक्षयं ब्रह्म सर्वभूतहितार्थकृत् ॥२४॥
जिनके हृदयमें भक्ति है ज्ञानसे जिनके सब संदेह मिटकर
प्रकाश होगया है, जिसे कोई संदेह नहीं, जो सब प्राणियोंका
हित करता है, वही अक्षय ब्रह्मको प्राप्त करता है ॥ २४ ॥
जेतारःषड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा ॥
तेषां समंततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो२५॥
जो कामक्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम
और जितेन्द्रियपनमें सावधान हैं, उन आत्मज्ञानियोंको समता
बुद्धिके कारण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है ॥ २५ ॥
आसनेषु समासीनस्त्यक्त्वेमान्विषयान्बहिः ॥
संस्तभ्य भ्रुकुटीमास्ते प्राणायामपरायणः ॥२६
इन सब बाह्य विषयोंको त्यागकर एकान्तमें आसनमें
स्थितहो,दृष्टिको भोहके मध्यमें स्थापनकर प्राणायाम करै२६॥
प्राणायामं तु संरोधं प्राणापानसमुद्भवम् ॥
वदन्ति मुनयस्तं च त्रिधाभूतं विपश्चितः॥२७॥
प्राण और अपान वायुके रोकनेको प्राणायाम कहते हैं,

( ६० ) गणेशगीता अ० ४.
ऋषियोंने जो कि बडे चतुर और मुनि हैं, उसके तीन भेद
कहे हैं ॥ २७ ॥
प्रमाणं भेदतो विद्धि लघुमध्यममुत्तमम् ॥
दशभिद्वर्यधिकैर्वर्णैः प्राणायामो लघुः स्मृतः२८
प्रमाणके भेदसे प्राणायाम लघु, मध्यम और उत्तम ऐसे
तीनप्रकारका है, बारह अक्षरका प्राणायाम लघु कहाता है२८
चतुर्विंशत्यक्षरो यो मध्यमः स उदाहृतः ॥
षट्त्रिंशल्लघुवर्णो य उत्तमः सोऽभिधीयते॥२९॥
चौवीस अक्षरका मध्यम और ३६ छत्तीस अक्षरोंका
उत्तम है ॥ २९ ॥
सिंहं शार्दूलकं वापि मत्तेभं मृदुतां यथा ॥
नयन्ति प्राणिनस्तद्वत्प्राणापानौ सुसाधयेत्३०
सिंह व्याघ्र अथवा मतवाले हाथीको जैसे मनुष्य नम्र
करके अपने आधीन करता है, इसी प्रकार प्राण और अपान
वायुको साधै ॥ ३० ॥
पीडयन्ति मृगांस्तेन लोकान्वश्यंगतान्नृप ॥
दहत्येनस्तथा वायुः संस्तब्धोन च तत्तनुम् ३१

भाषाटीकासमेत । (६१)
हे राजन् ! जिस प्रकार अपने वशमें करे सिंहादि मृगोंको
तथा लोकोंको पीडा नहीं देते हैं, इसी प्रकार यह वायु
प्राणायामसे स्थित होकर पापोंको भस्म करता है, परन्तु
शरीरको नहीं जलाता ॥ ३१ ॥
यथायथा नरः कश्चित्सोपानावलिमाक्रमेत् ॥
तथातथा वशीकुर्यात्प्राणापानौ हि योगवित् ३२
जिस प्रकार क्रमसे मनुष्य चढनेकी सीढियोंको अतिक्र-
मण करता है, इसी प्रकार क्रमसे प्राणापानको वशमें
करना उचित है ॥ ३२ ॥
पूरकं कुम्भकं चैव रेचकं च ततोऽभ्यसेत् ॥
अतीतानागतज्ञानी ततः स्याज्जगतीतले ॥३३॥
पूरक कुंभक और रेचकका अभ्यास करके यह प्राणी इस
जगतमें भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालका ज्ञाता हो जाताहै ३३
प्राणायामैर्द्वादशभिरुत्तमैर्धारणा मता ॥
योगस्तु धारणे द्वेस्याद्योगीशस्ते सदाभ्यसेत् ३४
१ पूरक-वायुको ऊपर खेचना, कुंभक-वायुका रोध करना ।
रेचक-वायुका त्याग करना यह तीन नाड़ी हैं।