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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

यह प्रकृति विषय संपूर्ण । सुना तूने पहले अर्जुन ।
इसीलिए कहता हूं सुन । अगली बात ॥ ९९ ॥
यह है मेरी प्रकृति । महा कल्पांतमें होती ।
ऐक्य-लीन भूत-जाति । मुझ अव्यक्तमें ॥ १०० ॥
ग्रीष्मके प्रखर तापमें । बीज सह दूब भूमिमें ।
ऐक्य होती पूर्ण रूपमें । धनुर्धर ॥ १ ॥
या वर्षा आडंबर मिटता । शरदका परदा खुलता ।
जैसे घन-जात लय होता । गगनका गगनमें ॥ २ ॥
अथवा आकाशका घर । नीरमें तरंग सुंदर ।
लोपता वायु औ' आकार । वैसे ही ॥ ३ ॥
तथा जागते ही जैसा स्वप्न । मनके मनमें होता लीन ।
प्राकृत प्रकृतिमें ही लीन । कल्पक्षयमें ॥ ४ ॥
जब फिर कल्पारंभ होता । कहते हैं मैं सृष्टि सृजता ।
इस विषयमें मैं कहता । सुन तू पार्थ ॥ ५ ॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥
तब है यह जो प्रकृति । करती सहज स्वीकृति ।
तंतु समवाय दीखती । पटमें बुनायी जैसे ॥ ६ ॥
लेकर उस बुनायीका आधार । भरते वस्त्र बन छोटे चौकोर ।
प्रकृति पंचात्मक आकार । लेती है वैसे ॥ ७ ॥
लेकर जामूनका आधार । दूध लेता दहीका आकार ।
वैसे प्रकृति रूप सुंदर । लेती है सृष्टिका ॥ ८ ॥
बीज होता पानीके नजदीक । औ' वही होता शाखोपशाख ।
वैसा मेरा ही कारण देख । भूत जातका यह ॥ ९ ॥
प्रकृति हाथमें लेके जगाता मैं पुनः पुनः ।
भूतोंका संघ संपूर्ण प्रकृतिके अधीन जो ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी २५८

अजी ! राजाने बसाया नगर । सच कहनेका यह प्रकार ।
थक गया क्या राजाका शरीर । नगर बसाके ॥ ११० ॥
मैं प्रकृति-अधिष्ठान कैसे । कोई स्वप्नमें रहता जैसे ।
फिर वही प्रवेशता जैसे । जागृतावस्थामें ॥ ११ ॥
स्वप्नसे जागृतिमें आते । उसके क्या पैर दुखते ।
अथवा स्वप्नमें रहते । होता क्या प्रवास ॥ १२ ॥
इसका है यह अभिप्राय । जो यह भूत-सृष्टिका कार्य ।
चलता उसमें करणीय । मुझे कुछ भी नहीं ॥ १३ ॥
या राजाकी आश्रित प्रजा जैसे । बरतती अपने लिए वैसे ।
प्रकृतिके साथ मेरा भी वैसे । संबंध है यहां ॥ १४ ॥
पूर्णचंद्रसे मिलकर । आता सिंधु उमडकर ।
तत्र चंद्रको धनुर्धर । श्रमना है क्या ॥ १५ ॥
पासका लोह जो अ-चेतन । हिलता रहता यथा-स्थान ।
उससे चुंबकको सहन । करना क्या कष्ट ॥ १६ ॥
ऐसा निज-प्रकृति स्वीकार । करता हूं मैं पांडुकुमार ।
ऐसी भूत-सृष्टि सरासर । प्रसवती जाती ॥ १७ ॥
जो है यह भूतग्राम संपूर्ण । रहता है प्रकृतिके आधीन ।
जैसे बीजसे अंकुर अर्जुन । उपजाती भूमि ॥ १८ ॥
अथवा बाल्यादि अवस्थात्रय । लेकर शरीरका ही आश्रय ।
गगनकी मेघावली प्रश्रय । लेती वर्षा-ऋतुका ॥ १९ ॥
या स्वप्नका कारण निद्रा । वैसी प्रकृति है नरेंद्र ।
जो सम्पूर्ण भूत समुद्र । स्वामिनी प्रकृति ॥ १२० ॥
स्थावर औ' जंगम । स्थूल अथवा सूक्ष्म ।
ऐसा जो भूत ग्राम । प्रकृति मूल ॥ २१ ॥
इसलिए भूतमात्रोंका सृजन । या सृजित भूतोंका प्रतिपालन ।
करना नहीं पडता अर्जुन । हमको कभी ॥ २२ ॥
जलमें फैलती चन्द्रिकाकी लता । उसे चन्द्रको फैलाना न पडता ।
वैसे मुझसे दूर ही है रहता । कर्मजाल ॥ २३ ॥
२५९ राज-विद्या-समर्पणयोग

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥
उमडता जब ज्वार सिंधु-जलका । रोक न सकता तब बांध नूनका
वैसे मैं हूं सकल कर्मोंकी पूर्णता । यह क्या बांधेंगे मुझे ॥ २४ ॥
धूम्र रजका छतनार । रोके यदि वायुका जोर ।
या सूर्यबिंबमें अंधार । करे प्रवेश ॥ २५ ॥
जैसे पर्वतके उदरस्थ । न करे पर्जन्य-धार त्रस्त ।
वैसे प्रकृतिके कर्मजात । मुझे न करते स्पर्श ॥ २६ ॥
विकारोंमें यहां प्रकृतिके । मैं ही हूं जान तू समझके ।
किंतु उदासीन ही रहके । न करता न करता ॥ २७ ॥
घरमें रखी दीप-ज्योती । जो न प्रेरती या रोकती ।
कौन है यह न जानती । कौन क्या करता ॥ २८ ॥
जैसा होता वह साक्षीभूत । गृह-व्यापार प्रवृत्ति हेत ।
भूत कर्ममें मैं अनासक्त । वैसा रहता भूतोंमें ॥ २९ ॥
यह एक ही विचार । क्या कहूं मैं फिर फिर ।
पार्थ यहां एक बार । इतना जान तू ॥ १३० ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥
जैसा लोक-चेष्टामें समस्त । निमित्त मात्र होता सवित ।
जगत प्रभवमें पांडुसुत । कारण मैं हूं ॥ ३१ ॥
किया मैंने प्रकृतिका अंगीकार । जिससे हुआ उत्पन्न स-चराचर ।
तब कारण मैं हुआ स-चराचर । यह है उपपत्ति ॥ ३२ ॥
किंतु जो ये सभी कर्म न बांध सकते मुझे ।
रहता मैं उदासीन तथा आसक्ति हीन भी ॥ ९ ॥
साक्षी मैं प्रकृति-द्वारा उठाता स-चराचर ।
उससे सब सृष्टीका होता है परिवर्तन ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी २६०

इस प्रकाशमें तू निश्चित । निहार ऐश्वर्य योग नित ।
मुझमें है सब भूतजात । उसमें मैं नहीं ॥ ३३ ॥
या भूतमात्र नहीं मुझमें । तथा मैं नहीं भूतमात्रमें ।
इस रहस्यको जाननेमें । भूल न कर तू ॥ ३४ ॥
आकारके परे देखनेसे ही मेरा अनुभव आयेगा—
है यह हमारा सर्वस्व गूढ । दिखाया तुझको मैंने उघड़ ।
लगाकर इन्द्रियोंका किवाड़ । भोग तू हृदयमें ॥ ३५ ॥
रहस्य यह करमें नहीं आता । तब तक मेरा स्वरूप जो पार्था ।
नहीं समझेगा तुझको सर्वथा । भूसेमें जैसे दाना ॥ ३६ ॥
अन्यथा कभी अनुमानसे । लगे समझमें आयी ऐसे ।
क्या मृगजळके सींचनेसे । भीगती है खेती ॥ ३७ ॥
जलमें जब जाल फैलता । चन्द्रबिंब उसमें दीखता ।
जाल जब खींच लिया जाता । तब बिंब कहां ॥ ३८ ॥
शब्द चातुर्यसे वक्तृत्वके । मूँदते नयन प्रतीतिके ।
समय आने पर बोधके । रहते कोरे ॥ ३९ ॥
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
'परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥
यदि कोई संसारसे डरता । मेरी स्वरूप प्राप्तिको चाहता ।
तो हमारेमें जो विचार पार्थ । ध्यानमें रखले ॥ १४० ॥
जिसकी दृष्टिमें हुयी कामली । देखता वह चांदनी भी पीली ।
वैसा मेरा स्वरूप जो निर्मळ । देखते हैं मलिन ॥ ४१ ॥
या ज्वरसे दूषित जो मुख । दूधको कहे कडुआ विष ।
वैसे अमानुषको मानुष । कहेंगे मुझको ॥ ४२ ॥
तुच्छतासे मुझे मूढ देख मानव रूपमें ।
न जानते महा-रूप मेरा जो विश्व-चालक ॥ ११ ॥
२६१ राज-विद्या-समर्पणयोग

इसीलिए तू धनंजय । भूलेगा यह अभिप्राय ।
स्थूल दृष्टिका ज्ञानाशय । होगा व्यर्थ ॥ ४३ ॥
स्थूल-दृष्टिसे मुझे पार्थ । देखना है जान तू व्यर्थ ।
स्वप्नमें पीनेसे अमृत । न होता अमर ॥ ४४ ॥
वैसे स्थूल-दृष्टि है मूढ । जानते समझके दृढ ।
वह जानना होता आड । स्वरूप ज्ञानके ॥ ४५ ॥
होनेसे जैसा नक्षत्रका आभास । अपना ही घात कर लेता हंस ।
नीरमें रत्न-बुद्धिकी कर आस । मारकर चोंच ॥ ४६ ॥
गंगा जान गया मृगजल । उस जानेसे मिला क्या फल ।
सुरतरु समझ बबूल । लगानेसे क्या होगा ? ॥ ४७ ॥
हार मान नीलमणिका दुहरा । पकड लिया विषैला फणिधर ।
अथवा रत्न मानकर पत्थर । चुनना जैसे ॥ ४८ ॥
या प्रकट हुआ स्वर्ण-भंडार । कहकर उठा लिया अंगार ।
कूपमें कूदा छाया देखकर । अपनी सिंह ॥ ४९ ॥
मुझको देहधारी मानकर । निश्चय किया है धनुर्धर ।
उसने चंद्र समझकर । पकडा प्रतिबिंब ॥ १५० ॥
वैसे कृत-निश्चय गया व्यर्थ । कोयी जैसे मांड पीकर पार्थ ।
देखने लगा सुपरिणामार्थ । अमृतके मानो ॥ ५१ ॥
वैसे नाशवंत स्थूलाकार । चितमें निश्चय बांधकर ।
परखा अविनाश अक्षर । दीखूंगा मैं कैसे ॥ ५२ ॥
कोयी पश्चिम समुद्रका तट । चलके पहुंचे पूर्वकी बाट ।
चोकर कूट करके सुभट । मिलेंगे क्या दाने ॥ ५३ ॥
वैसे विकृत जो स्थूल । जानकर मैं केवल ।
जैसे फेन पीके जल । कैसे पायेगा ? ॥ ५४ ॥
ऐसे मोहग्रस्त मनसे । यही मैं मान संभ्रमसे ।
देहके जन्मादि कर्मोंसे । लादते मुझे ॥ ५५ ॥
जिससे अनामको नाम । मुझ क्रिया-शून्यको कर्म ।
अ-शरीरको देह धर्म । आरोपते ॥ ५६ ॥
ज्ञानेश्वरी २६२

मुझ आकारशून्यको आकार । औ' निरुपाधिकको उपचार ।
विधि विवर्जितको व्यवहार । आचारादिक ॥ ५७ ॥
मुझ वर्ण-हीनको वर्ण । तथा गुणातीतको गुण ।
औ' अ-चरणको चरण । अ-पाणिको पाणी ॥ ५८ ॥
अमर्यादको मान । सर्वगतको स्थान ।
शय्यापे लेटे जान । देखते हैं ॥ ५९ ॥
वैसे अ-श्रवणको श्रोत्र । मुझ अ-चक्षुको नेत्र ।
तथा अ-गोत्रको गोत्र । रूप अ-रूपको ॥ १६० ॥
मुझ अव्यक्तको व्यक्ति । तथा अनार्तको आर्ति ।
सर्व तृप्तिको है तृप्ति । सोचते सब ॥ ६१ ॥
अनावरणको प्रावरण । भूषण-अतीतको भूषण ।
सकल कारणको कारण । देखते मुझको ॥ ६२ ॥
मुझ सहजको रचते । स्वयंभूको हैं प्रतिष्ठते ।
निरंतरको आह्वानते । तथा विसर्जते हैं ॥ ६३ ॥
सर्वदा मैं स्वयं-सिद्ध । बाल तरुण और वृद्ध ।
एक रूपका संबंध । जानते वे मुझे ॥ ६४ ॥
मुझ अद्वयको द्वैत । अकर्ताको माने कर्ता ।
तथा अभोक्तकों भोक्ता । कह जानते ॥ ६५ ॥
अकुलका करते कुल-वर्णन । नित्यके निधनसे व्याकुल-मन ।
अंतर्यामिका शत्रु-मित्र अर्जुन । मानते हैं वे ॥ ६६ ॥
मैं हूं सर्वदा स्वानंदाभिराम । मुझे माने सकल-सुखकाम ।
सर्वत्र व्याप्त हूं संपूर्ण सम । मानतें मुझ स्थानिक ॥ ६७ ॥
आत्मा मैं चराचरमें बसता । कहते एकका पक्ष लेता ।
दूसरेका शत्रु बन मारता । बढाचढाके गाते यह ॥ ६८ ॥
अजी ! प्रायः ऐसे समस्त । मनुष्य-धर्म जो प्राकृत ।
लगाते मुझे विपरीत । यही उनका ज्ञान ॥ ६९ ॥
आकार कोई जब देखते । देव भावसे पूजा करते ।
वह बिगडनेपे कहते । नहीं रहा अब ॥ १७० ॥
२६३ राज-विद्या-समर्पणयोग

ऐसे ही अनेक प्रकार । बनाकर मानवाकार ।
करके ज्ञानपे अंधार । विपरीत ज्ञानसे ॥ ७१ ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥
मैं अंधोंके हाथमें पड़ा मोति-सा हूं-
इसीलिए जन्मना ही मोघ । जैसे वर्षाके बिन ही मेघ ।
अथवा मृगजल तरंग । देखना दूरसे ही ॥ ७२ ॥
या मृत्तिकाके घुड़सवार । या कलंदरके अलंकार ।
गंधर्व-नगरका आवार । आभास जो ॥ ७३ ॥
जैसे थूहरका बडा सरल । अंदर खोकला ना है फल ।
लटकते स्तन जैसे गला- । में बकरीके ॥ ७४ ॥
मूर्खका जीवन है व्यर्थ । जैसे सेमल फल पार्थ ।
धिक् उसके कर्म समस्त । जो हैं निरर्थक ॥ ७५ ॥
फिर मानो है उसका पढना । मर्कटका नारियल तोडना ।
अथवा अंधेका हाथ पडना । मोति जैसे ॥ ७६ ॥
वास्तवमें उनके शस्त्र । कुम्हारके हाथमें शंख ।
या कहा अशौचको मंत्र- । बीज किसीने ॥ ७७ ॥
वैसे उसका ज्ञान-जात । औ' आचरण क्रिया पार्थ ।
वह संपूर्ण गया व्यर्थ । चित्तहीन ॥ ७८ ॥
तमो-गुण राक्षसी । जो है सद्बुद्धि ग्रासी ।
विवेक-मूल नासी । निशाचरी ॥ ७९ ॥
उस प्रकृतिके आधीन हुये । इसीलिए चिंताका ग्रास भये ।
इस तामसीके कलेऊ हुये । मुखमें ही ॥ १८० ॥
वे आशावाद मूढोंके व्यर्थ हैं ज्ञान-कर्म भी ।
जिन्होंने संपदा पायी आसुरी मोह-कारक ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी २६४

जहां लारमें आशाकी । लोटती जिह्वा हिंसाकी ।
जुगाली करें कौरकी । मोदसे नित ॥ ८१ ॥
जो हैं कान तक अनर्थके । चाटती जीभ बाहर लाके ।
कोह बन प्रमाद गिरिके । हुई उन्मत्त ॥ ८२ ॥
जहां हैं क्रूर दांत द्वेषके । पीसते हैं बीजको ज्ञानके ।
आवरण डालते तमके । मूढ-बुद्धि पर ॥ ८३ ॥
आसुरी बुद्धिके मुखमें ऐसे । पडते हैं भूत बलिके कौरसे ।
भ्रमजालके कुण्डमें पड़नेसे । सुन धनंजय ॥ ८४ ॥
पडे वे ऐसे गर्तमें तमके । न लगते हाथमें विचारके ।
जहां गये उस स्थानके । निशान भी नहीं ॥ ८५ ॥
मैं भक्तोंके कीर्तन-मेलेमें रहता हूं—
यह निष्फल वर्णन तदर्थ । रहने दो मूर्खोंकी बात पार्थ ।
विस्तार करनेसे वाणी व्यर्थ । थकेगी इससे ॥ ८६ ॥
ऐसे बोले तब देव । "जी" कहा सुन पांडव ।
सुन वाचा ही नीरव । साधु-कथासे ॥ ८७ ॥
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
अजी ! जिनका है निर्मल मानस । बसता वहां मैं ले क्षेत्र-सन्यास ।
नींदमें भी वे करते स-उल्लास । वैराग्याराधना ॥ ८८ ॥
जिनका सद्भाव आलंबन । रहता धर्मका सिंहासन ।
जिनके मनका है जीवन । विवेकमात्र ॥ ८९ ॥
जो हैं ज्ञान गंगामें स्नात । पूर्णता-भोजनसे तृप्त ।
शांति-लताके नव-पात । है अति कोमल ॥ १९० ॥
जुटाके संपदा दैवी महात्मा भजते मुझे ।
अनन्य भावसे जान मैं विश्वारंभ शाश्वत ॥ १३ ॥
(34) २६५ राज-विद्या-समर्पणयोग

पूर्णावस्थामें जो फूटे अंकुर । तथा धर्म-मंडपके आधार ।
शांति-सागरसे लिये हैं भर । पूर्ण-कुम्भ जैसे ॥ ९१ ॥
भक्तिकी हुई इन्हें इतनी प्राप्ति । कहते वे परे हठो तुम मुक्ति ।
उनके आचरणसे है नीति । खिलती सदा ॥ ९२ ॥
उनकी इंद्रियां भी संपूर्ण । पहने हैं शांतिका भूषण ।
उनका चित्त है आभरण । मुझ व्यापकको ॥ ९३ ॥
ऐसे जो महानुभाव । दैवी प्रकृतिके देव ।
जान करके वे सर्व । मेरा ही रूप है ॥ ९४ ॥
बढता हुआ उनका प्रेम । मुझे भजता है जो निष्काम ।
किंतु भिन्नताका मनोधर्म । छूता भी नहीं ॥ ९५ ॥
स्वयं मैं होकर पांडव । करते हैं वे मेरी सेवा ।
किंतु आश्चर्य है जो भाव । अब मैं कहता ॥ ९६ ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥
उत्कर्षसे उन्होंने कीर्तनके । नाशे व्यवसाय प्रायश्चित्तके ।
नाम भी न रहे सब पापके । ऐसा ही किया ॥ ९७ ॥
निस्तेज किये सब यम-दम । तीर्थ उठाये पदसे उत्तम ।
थमे यमलोकके उपक्रम । अनेक प्रकारके ॥ ९८ ॥
यम कहें क्या यमना । दम पूछे किसे दमना ।
तीर्थ कहते हैं क्या खाना । दोष नहीं नाम-मात्र ॥ ९९ ॥
ऐसा है मेरा नाम-घोष । मिटाते हैं विश्वके दुःख ।
सारे जगमें महासुख । गूंज-महकता ॥ २०० ॥
दिखाते वे सूर्योदय बिन । जिलाते हैं अमृतके बिन ।
तथा वे देते योगके बिन । दर्शन-कैवल्यको ॥ १ ॥
नित्य कीर्तनमें मेरे यत्नसे लीन जो व्रती ।
भक्तिसे नित्य हो युक्त पूजते नम्र भावसे ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी २६६

राजा रंकका भेद नहीं करते । बाल-वृद्ध यह भी नहीं देखते ।
जगतको आनंदमें भर देते । पूर्ण-रूपसे ॥ २ ॥
अजी ! कभी कोई जाता है वैकुण्ठ । इन्होंने किया है विश्व ही वैकुण्ठ ।
मेरे नाम गौरवसे हे सुभट । उजलाया विश्व ॥ ३ ॥
तेजमें होते सूर्य-से उज्ज्वल । किन्तु सूर्यमें अस्तका काजल ।
पूर्ण-चन्द्र रहता एक काल । ये सदा पूर्णत्वमें ही ॥ ४ ॥
बरसनेमें मेघ उदार । घटनेमें हैं वह अपूर ।
ये निःसंदेह कृपालु वीर । पंचानन ॥ ५ ॥
उनकी जिह्वा पर सतत । नाम रहे मेरा नृत्य-रत ।
पानेमें जो जाते जन्मजात । सहस्रावधि ॥ ६ ॥
तब मैं वैकुण्ठमें नहीं रहता । भानु-बिम्बमें तब नहीं दीखता ।
योगियोंके हृदयके पार जाता । मैं उस समय ॥ ७ ॥
किंतु उनके पास धनुर्धर । करते जो नाम-घोष मधुर ।
रहता हूँ मैं निश्चित सादर । जो है खोया हुआ ॥ ८ ॥
मेरे गुणगानमें ही हैं वे तृप्त । देशकाल भूलते जो नामरत ।
कीर्तन सुखमें हुए सतत । स्वरूप रूप ॥ ९ ॥
कृष्ण विष्णु हरि गोविंद । नामके निखिल प्रबंध ।
तथा आत्म-चर्चा विशद । खोते हैं उसमें ही ॥ १० ॥
नमस्कार भक्तिसे मद्रूप होते हैं--
रहने दो अब ये अर्जुन । सुन करके वे मेरा कीर्तन ।
तथा विचरते हैं अनुदिन । चराचरमें ॥ ११ ॥
ऐसे अनेक हैं पार्थ । कर सहज सिद्धता ।
मन-प्राणको ले साथ । पथ-दर्शक ॥ १२ ॥
बाहर लगायी यम नियमकी बाड़ । भीतर वज्रासनका गढ़ सुदृढ़ ॥
उस पर प्राणायामकी तोप चढ़ा- । रखी है सज्ज ॥ १३ ॥
वहां कुण्डलिनीके प्रकाशमें । मन-पवनके सहयोगमें ।
कर लिया अपने आधीनमें । सत्रहवींका कुम्भ ॥ १४ ॥
२६७ राज-विद्या-समर्पणयोग

प्रत्याहारने तब परक्रम किया । विषयोंके नाम मात्रको मिटा दिया
सब इन्द्रियोंको बांध करके लाया । हृदयांगनमें ॥ १५ ॥
तब दौड़े धारणाके घुड़सवार । पकड़ लाये महाभूत इक ठौर ।
फिर किया चतुरंग सेना संहार । जो हैं संकल्पकी ॥ १६ ॥
तब “विजय हुआरे विजय ।” सिंगी बजी ध्यानकी हो निर्भय ।
दीखता तन्मयका स-समय । वहां एक-छत्र ॥ १७ ॥
फिर समाधिश्रीका अशेष । आत्मानुभवका राज्य-सुख ।
सिंहासन आरोहण देख । हुआ समरससे ॥ १८ ॥
ऐसा है यह गहन । अर्जुन मेरा भजन ।
अब कहता हूं सुन । अन्य प्रकार ॥ १९ ॥
जैसे सर्वत्र समानरूपमें । एक तंतु रहता है वस्त्रमें ।
वैसे वे “मैं” बिन चराचरमें । जानते नहीं ॥ २० ॥
आदि ब्रह्मसे लेकर । मच्छर तक आखर ।
मेरा रूप है सुन्दर । जानते हैं यह ॥ २१ ॥
फिर छोटा बड़ा नहीं कहते । निर्जीव सजीव नहीं जानते ।
सबके सम्मुख नम्र हैं होते । सब “मैं” मानकर ॥ २२ ॥
अपना उत्तमत्व नहीं जानते । औरोंकी योग्यायोग्यता न देखते ।
सर्वत्र आत्म-तत्व देख नमते । प्रेम-भावसे ॥ २३ ॥
जैसे ऊपरसे पानी गिरता । नीचे तल तक है वह जाता ।
वैसे भूतमात्रसेही नम्रता । स्वभाव यह उनका ॥ २४ ॥
या वृक्षकी शाखा फल-भारसे । उतरती है सहज-भावसे ।
वैसे वे झुकते हैं नम्रतासे । सबके प्रति ॥ २५ ॥
रहते हैं सर्वज्ञ निराभिमान । विनय ही उनकी संपत्ति महान ।
करते वे जयजय मंत्र अर्पण । मुझको ही ॥ २६ ॥
नमनसे गला मानाभिमान । सहज हुए मद्रूप अर्जुन ।
ऐसे होकर मत्स्वरूप-लीन । भजते मुझको ॥ २७ ॥
है यह अर्जुन श्रेष्ठ भक्ति । कही मैंने अभी तेरे प्रति ।
ज्ञान-यज्ञसे भजन रीति । सुन तू भक्तकी अब ॥ २८ ॥
ज्ञानेश्वरी २६८

ज्ञानी-भक्त सदा-सर्वत्र एक भावसे मुझे देखता है—
यह भजन-परिपाटी। जानता ही है तू किरीटी।
की इसकी हमने गोष्ठी। पहले ही ॥ २९॥
तब कहता है “जी हां” अर्जुन। “यह है देवप्रसाद महान।”
जब मिलता अमृत-भोजन। कहेगा कौन “बस है” ॥ ३० ॥
सुनकर यह अनंत। हुआ अति प्रसन्न-चित्त।
सुननेका अर्जुन-मत। जानकर ॥ ३१ ॥
कहते हैं भला किया पार्था। यह अनवसर सर्वथा।
किंतु कहलाती तेरी अवस्था। मुझसे अब ॥ ३२ ॥
पार्थ पूछे ऐसे कैसे कहता। बिन चकोर चंद्र नहीं उगता ?।
देता है वह विश्वको शीतलता। यह स्वभाव उसका ॥ ३३ ॥
यहां चकोर अपनेही हितार्थ। चोंच उठाता चन्द्रकी ओर नित।
हमारी विनय है एक निमित्त। देव आप कृपासिंधु ॥ ३४ ॥
उदारतासे मेघ बरसता। जगतकी है तरस मिटाता।
चातककी प्यासकी क्या है कथा। वर्षाके सम्मुख ॥ ३५ ॥
पानीके लिये एक घूंट। जाना पडता गंगा-तट।
देव सुनाओ हमें चट। चाह है बहु या अल्प ॥ ३६॥
कृष्ण कहे रहने दो पार्था। देखके तुम्हारी यह आस्था।
हुआ है मेरा चित्त मुदित। स्तुति न होती सहन ॥ ३७ ॥
जब तू सुनता है अति उत्तम। वक्तृत्व निमंत्रणका काम।
कहता यह बोल पुरुषोत्तम। आदर कर बोले ॥ ३८ ॥
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
ज्ञान-यज्ञका यह रूप। आदि संकल्प यह यूप।
पंच-महाभूत मंडप। भेद है पशु ॥ ३९॥
दूसरे ज्ञान-यज्ञोंसे देखके ब्रह्म-भावसे।
विवेकसे अविभेद भेदमें भजते मुझे ॥ १५ ॥
२६९
राज-विद्या-समर्पणयोग

फिर पांचोंके जो विशेष गुण । अथवा इन्द्रियां तथा है प्राण ।
यही है यज्ञोपचार भरण । अज्ञान है घृत ॥ २४० ॥
वहां कुण्ड है मन बुद्धिका । प्रज्वलित अग्नी है ज्ञानका ।
समताकी सुन्दर वेदिका । जान तू पार्थ ॥ ४१ ॥
मति कौशल्य स-विवेक । मंत्र-विद्या गौरव नेक ।
शांति ही है सुवा और सुक । जीव है यजमान ॥ ४२ ॥
स्वरूपानुभव पात्रसे । विवेकके महा-मंत्रसे ।
वह है ज्ञानाग्नि होत्रसे । नाशता भेद ॥ ४३ ॥
जब है अज्ञान मिट जाता । यजितका यज्ञ है रुकता ।
आत्म-समरस स्नान होता । अवभृतका ॥ ४४ ॥
तब भूत विषय कारण । न होता इसका भेद ज्ञान ।
एकत्वका है संपूर्ण ज्ञान । होता आत्म-बुद्धिसे ॥ ४५ ॥
जागृत मनुष्य जैसे अर्जुना । कहता स्वप्नकी विचित्र सेना ।
आप रही स्वयं बन गया था ना । निद्रावश होकर ॥ ४५ ॥
अब न रही सेना जो थी सेना । मैं अकेला ही था पूर्ण रूपेण ।
ऐसा होता तब एकत्व-भान । उसको विश्वका ॥ ४७ ॥
फिर जीवत्वका भान है मिटता । आब्रह्म परमात्म बोध भरता ।
इस भांति ज्ञान-भावसे भजता । अद्वय-बोधसे ॥ ४८ ॥
जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग भजन कैसे ?—
या अनादि यह अनेक । भिन्नत्व है अनेकानेक ।
तथा है नाम-रूपादिक । वह भी बिषम ॥ ४९ ॥
इसीलिए विश्व है भिन्न । न भेदता उसका ज्ञान ।
जैसे अंग हैं भिन्न भिन्न । पर शरीर एक ॥ २५० ॥
शाखाओंके अनेक प्रकार । किंतु है एक ही तरुवर ।
रश्मि ढेर, एक दिनकर । वैसे ही पार्थ ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी २७०

वैसे नानाविध व्यक्ति । नाना नाम तथा वृत्ति ।
उसमें मैं अभेद-मूर्ति । भेदमें जानते ॥ ५२ ॥
ऐसे भिन्नत्वमें धनुर्धर । करते ज्ञानयज्ञ सुन्दर ।
बोध न होता नाना प्रकार । जाननेसे ॥ ५३ ॥
या जहां जो कुछ है देखते । मेरे बिन अन्य न जानते ।
सदा मेरी प्रतीति करते । यह बोध उनका ॥ ५४ ॥
बुल्ले जहां तथा जितने होते । जलके आधारसे ही बनते ।
फिर रहते या घुल जाते । पानीमें ही ॥ ५५ ॥
मानो आंधीने परमाणु उडाये । वे भूमित्वसे अलग नहीं गये ।
वे जब पुनः नीचे ही गिर गये । तो पृथ्वी पर ही ॥ ५६ ॥
वैसे कहीं कुछ भी हो जाये । या कहो कुछ भी ना हो जाये ।
सब ही "मैं" बोध लेते गये । सर्व-भावसे ॥ ५७ ॥
अजी ! जहां जितनी मेरी व्याप्ति । उतनी ही है उनकी प्रतीति ।
बहुधाकारकी वर्तन स्थिति । बहुरूप उनकी ॥ ५८ ॥
जैसे भानु-बिंब नित्य । सबके सम्मुख दिव्य ।
वैसे वे विश्वके भव्य । सदा सम्मुख ॥ ५९ ॥
अजी ! उनका वह जो ज्ञान । आगे पीछे न जाने अर्जुन ।
वायु जैसा सदैव गगन । रहे सर्वत्र ॥ २६० ॥
वैसे जितना हूं मैं संपूर्ण । उतना उनका भाव-पूर्ण ।
इससे न करते अर्जुन । भजन होता है ॥ ६१ ॥
वैसे मैं हूं सर्वत्र पूर्ण रूपसे । कहां मेरा भजन न होता कैसे ।
किंतु यहां ऐसा ज्ञान होनेसे । भजन न होता ॥ ६२ ॥
यहां जो उचित रूपसे । भजते हैं ज्ञान-यज्ञसे ।
कही बात मैंने तुझसे । उनकी पार्थ ॥ ६३ ॥
जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं—
यह सब है सतत सबकी ओरसे । अर्पण होता मुझे सहज भावसे ।
यह नहीं जाननेसे अज्ञानियोंसे । न होता मुझे अर्पण ॥ ६४ ॥
२७१ राज-विद्या-समर्पणयोग

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥
उदय होगा जब ज्ञानका । तब वेद ही "मैं हूँ" इसका ।
"मैं" ही तज्जन्य-ऋतु होनेका । अनुभव होगा ॥ ६५ ॥
तब यज्ञ जन्य सकल । सांगोपांग कर्म निर्मल ।
यज्ञ भी "मैं" यह निखिल । होगा बोध पार्थ ॥ ६६ ॥
स्वाहा "मैं" हूँ तथा स्वधा । सोमादि दिव्य विविध ।
आज्य और "मैं" समिधा । मंत्र औ, हवि भी ॥ ६७ ॥
होता मैं हवन करता । अग्नि स्वरूप मैं रहता ।
हवन-वस्तु जो जो होता । वह सब मैं हूँ ॥ ६८ ॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥
अजी ! जिसके अंग-संगसे । यहां प्रकृति के अष्टांगसे ।
जन्म होता विश्वका जिससे । पिता वह मैं हूँ ॥ ६९ ॥
अर्धनारी नटेश्वरी । जो पुरुष वह नारी ।
वैसा मैं सचराचरीं । माता भी हूँ ॥ २७० ॥
जगत जहांसे होता औ' रहता । जिससे जीवन लेकर बढता ।
मेरे बिना वह कछु नहीं होता । अन्य धनुर्धर ॥ ७१ ॥
प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको यहां । जनम दिया हमने मनमें जहां ।
वह पितामह त्रिभुवनमें यहां । मैं हूँ विश्वका ॥ ७२ ॥
जहां ज्ञान-रूप सभी बाट । जिस स्थान आती हैं सुभठ !
उन वेदोंकी वेद्य जो गोष्ठ । कहलाती है ॥ ७३ ॥
मैं ही संकल्प मैं यज्ञ स्वावउंबन अन्न मैं ।
मंत्र मैं हव्य भी मैं हू अग्नि मैं आहुती तथा ॥ १६ ॥
जगदाधार ही मैं हूं माता पिता पितामह ।
मैं तीनों वेद ॐकार जानने योग्य पावन ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी २७२

जहां नाना मतोंका अपरिचितपन । मिटता है शास्त्रोंका अनजान ।
मिलते हैं जहां भूले हुए सभी ज्ञान । वह पवित्र मैं हूँ ॥ ७४ ॥
ब्रह्म-बीजका फूटा अंकुर । घोष ध्वनि नाद औ' आकार ।
उसका भुवन जो ओंकार । वह भी मैं हूँ ॥ ७५ ॥
उस ओंकारका है उदर । समालेता है अ, उ, म, कार ।
जनमते ही वेद लेकर । उठे वे तीनों ॥ ७६ ॥
इसीलिए ऋग् यजु तथा साम । ये तीनों कहे मैं आत्माराम ।
एवं मैं ही हूँ सब कुलक्रम । शब्द ब्रह्मका ॥ ७७ ॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥
जो है यह चराचर संपूर्ण । जिसमें भरी है प्रकृति पूर्ण ।
उस प्रकृतिका विश्राम स्थान । परमगति मैं हूँ ॥ ७८ ॥
जिससे पाती है प्रकृति जीवन । अधिष्ठानसे होता विश्व जनन ।
आकर जो उस प्रकृतिके गुण । भोगता है ॥ ७९ ॥
विश्वश्रीका वह भर्ता । मैं हूँ जानो पांडुसुता ।
हूँ अधिपति समस्ता । त्रिभुवनका मैं ॥ २८० ॥
आकाशको सर्वत्र बसाना । वायुको कभी स्वस्थ न होना ।
तथा वर्षाको बरसना । औ' दहना अग्निको ॥ ८१ ॥
पर्वतको न छोड़ना आसन । समुद्रको न सीमा उल्लंघन ।
पृथ्वी करे भूतोंका वहन । यह है आज्ञा मेरी ॥ ८२ ॥
मेरे कहनेसे है वेद बोलता । मेरे चलानेसे सूर्य है चलता ।
मेरे हिलानेसे प्राण है हिलता । करता विश्वका चलन ॥ ८३ ॥
मेरे ही नियमनमें काल । प्राणि-मात्रको जाता निगल ।
मेरी ही आज्ञामें है सकल । चलता नित्य ॥ ८४ ॥
साक्षी स्वामी सखा भर्ता निवास गति आसरा ।
मैं हूं कर्ता भर्ता हर्ता निदान बीज अक्षय ॥ १८ ॥
२७३ राज-विद्या-समर्पणयोग
(35)

ऐसा हूँ मैं समर्थ । जो जगतका नाथ ।
औ' मैं हूँ साक्षीभूत । गगन जैसा ॥ ८५ ॥
यहां नाम रूपमें पूर्ण । बसा हुआ है अर्जुन ।
नाम रूपका अधिष्ठान । वह भी मैं हूँ ॥ ८६ ॥
जलका है जैसे कल्लोल । औ' कल्लोलमें होता जल ।
वैसे विश्वका मैं सकल । आधार भूत हूँ ॥ ८७ ॥
होता जो मेरा अनन्य शरण । उसका हरता जन्म मरण ।
शरणागतका शरण्य स्थान । मैं ही एक ॥ ८८ ॥
एक मैं अनेक रूप-धारण । कर ले प्रकृतिके भिन्न गुण ।
बन सजीव जगतके प्राण । रहता हूँ पार्थ ॥ ८९ ॥
डबरा सागर भेद न मान । सबमें बिंबता सूर्य समान ।
वैसे ब्रह्मादि भूतमें समान । सु-हृदयस्थ मैं ॥ २९० ॥
अजी ! मैं ही हूँ अर्जुन । त्रिभुवनका जीवन ।
सृष्टि क्षयका कारण । मूल जो मैं हूँ ॥ ९१ ॥
बीज ही शाखाओंको प्रसवता । वही वृक्ष बीजमें है समाता ।
वैसे संकल्पसे सब बनता । औ' समाता संकल्पमें ॥ ९२ ॥
विश्वका बीज जो है संकल्प । अव्यक्त तथा वासना रूप ।
उस संकल्पका है निक्षेप । अन्तमें मैं हूँ ॥ ९३ ॥ .
यहां नाम-रूप मिटते । वर्ण औ' व्यक्ति है अटते ।
जातिके भेद भी खुलते । जब न होता आकाश ॥ ९४ ॥
संकल्प वासना संस्कार । फिर रचनेमें आकार ।
रहते हैं जहां अमर । वह स्थान मैं हूँ ॥ ९५ ॥
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ।
तपके जलको खींच गिराता वृष्टि रूपसे ।
मृत्यु मैं और मैं मोक्ष मैं ही सत् और हूं असत् ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी २७४

मैं सूर्य बन तपता । शोषता औ' प्रकाशता ।
इंद्र बन मैं वर्षाता । आता सुकाल ॥ ९६ ॥
जब है अग्नि काष्ठ खाता । काष्ठ ही है अग्नि बनता ।
वैसे मरता व मारता । जानो स्वरूप मेरा ॥ ९७ ॥
जो जो दीखता है यहां मर्त्य । वह सब मेरा रूप खुत्य ।
तथा जो है सहज अमर्त्य । वह अविनाशी हूँ मैं ॥ ९८ ॥
अजी ! बहुत बोल क्या करना । सबही एक वाक्यमें जानना ।
सता·सत सार अनुभवना । मैं हूँ सब ॥ ९९ ॥
पुण्यकी समाप्तिके बाद पुनः मृत्यु-लोकमें—
इसीलिए पार्थ मैं नहीं । ऐसा कछु है नहीं कहीं ।
प्राणियोंका दैव है कहीं । जो न देखें मुझको ॥ ३०० ॥
पानी बिन तरंग है सूखती । सूर्य बिन रश्मि न दीखती ।
न करते मद्रूपकी प्रतीति । है यह विस्मय ॥ १ ॥
भरा यह मुझसे बाहर भीतर । ढला है विश्व मुझसे ही ओर छोर ।
किंतु बीता है उनका कर्म-कठोर । कहते हैं मैं नहीं ॥ २ ॥
अमृत-कुण्डमें जो पडते । अपनेको निकाल कहते ।
ऐसोंको है क्या कह सकते । अप्राप्यको होता ऐसा ॥ ३ ॥
अन्नके लिए एक कौर । दौडता है अंध सत्वर ।
चिंतामणि ठुकराकर । अंधत्वमें ॥ ४ ॥
मिटती है जब ज्ञानमें आस्था । होती ऐसी अंधेकीसी अवस्था ।
करके न किया ऐसा सर्वथा । होता ज्ञानके बिन ॥ ५ ॥
अंधेको गरुड पंख मिलता । उसका क्या उपयोग होता ।
वैसे सत्कर्म सदा व्यर्थ जाता । ज्ञानके बिन ॥ ६ ॥
अजी ! देख तू यह अर्जुन । आश्रम-धर्मका आचरण ।
विधि-मार्गका देता शिक्षण । अपने आप ॥ ७ ॥
करनेसे सहज-यजन । होता है प्रसन्न वेदार्जन ।
क्रिया फल सह मूर्तिमान । आता सम्मुख ॥ ८ ॥
२७५ राज-विद्या-समर्पणयोग

ऐसे दीक्षित है जो सोमप । आपही होते यज्ञ-स्वरूप ।
वहां पुण्यके नामसे पाप । जुडा जान ॥ ९ ॥
श्रुतित्रयको वे जानकर । शत-यज्ञोंको सम्पन्न कर ।
यजित मुझको भूलकर । चाहते स्वर्ग ॥ ३१० ॥
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥
जैसे जो कल्पतरुकी छायामें । बैठ गांठ बांधे भिक्षा-झोलीमें ।
निकलेगा ही वह भिक्षान्नमें । निर्दैवी निश्चित ॥ ११ ॥
वैसे सौ शत सौ यज्ञ किये मेरेलिए । किंतु चाह है स्वर्ग सुखकेलिए ।
पुण्य करना यह पापकेलिए । ऐसा नहीं क्या ? ॥ १२ ॥
मुझे छोडकर पाना स्वर्ग । अज्ञानका यह पुण्यमार्ग ।
ज्ञानी जन उसे उपसर्ग । कहते हैं जो ॥ १३ ॥
वैसे देख नरकको दुःख । दिया है नाम स्वर्गको सुख ।
नित्यानन्द-रूप है निर्दोष । स्वरूप मेरा ॥ १४ ॥
मेरे पास आते हुए पार्थ । पडते हैं ये दोनों सतत ।
स्वर्ग तथा नरकका पथ । है ये चोरोंके ही ॥ १५ ॥
जो मेरे पास लाता है वही शुद्ध-पुण्य है—
स्वर्ग देता है पुण्यात्मक पाप । नरक देता है पापात्मक पाप ।
मुझ तक पहुंचाता है आप । यह है शुद्ध-पुण्य ॥ १६ ॥
मत्स्वरूपमें रहते । मुझसे हैं दूर होते ।
ऐसे कर्मको कहते । पुण्य कैसे ? ॥ १७ ॥
वेदाभ्यासी सोम पीके पुनीत
यज्ञसे जो चाहते स्वर्ग पाना ।
वे पुण्यसे पाकर इंद्र-लोक
पाते वहांके सुख भोग दिव्य ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी २७६

किंतु रहने दो यह प्रस्तुत । सुन इस भांति हैं वे दीक्षित
यज कर मुझको ही याचित । स्वर्गका सुख ॥ १८ ॥
जो पापात्मक पुण्य होता । उससे मैं नहीं मिलता ।
उससे प्राप्त जो योग्यता । देती है स्वर्ग ॥ १९ ॥
स्वर्ग-सुखका वर्णन—
अमरत्व जहां सिंहासन । ऐरावत जैसा है वाहन ।
राजधानी तथा है भुवन । अमरावती ॥ ३२० ॥
महासिद्धिंका जहां भंडार । अमृतका भरा है कोठार ।
वहां फिरते हैं समाहार । कामधेनुके ॥ २१ ॥
देवही जहां स्वयंसेवक । भूमि है चिंतामणिकी नेक ।
विनोद वाटिका हैं अनेक । सुरतरुकी वहां ॥ २२ ॥
गायन गंधर्वोंका । नर्तन है रंभाका ।
विलास उर्वशीका । मिलता वहां ॥ २३ ॥
मदन करता शय्या-श्रृंगार । चन्द्र बिछाता अमृत-तुषार ।
हरकारा है पवन तयार । वहां सदैव ॥ २४ ॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥
बृहस्पतिसे महान । स्वस्तिश्रीके ब्राह्मण ।
भोजनमें सुरगण । साथ रहते ॥ २५ ॥
वे भोगते स्वर्ग विशाल ऐसा
आते यहीं क्षीण होते हि पुण्य ।
ऐसे फलासक्त जो वेद-धर्मी
पुनः पुनः जाकर लौटते हैं ॥ २१ ॥
२७७ राज-विद्या-समर्पणयोग