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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 333

मुझ आकारशून्यको आकार । औ' निरुपाधिकको उपचार ।
विधि विवर्जितको व्यवहार । आचारादिक ॥ ५७ ॥
मुझ वर्ण-हीनको वर्ण । तथा गुणातीतको गुण ।
औ' अ-चरणको चरण । अ-पाणिको पाणी ॥ ५८ ॥
अमर्यादको मान । सर्वगतको स्थान ।
शय्यापे लेटे जान । देखते हैं ॥ ५९ ॥
वैसे अ-श्रवणको श्रोत्र । मुझ अ-चक्षुको नेत्र ।
तथा अ-गोत्रको गोत्र । रूप अ-रूपको ॥ १६० ॥
मुझ अव्यक्तको व्यक्ति । तथा अनार्तको आर्ति ।
सर्व तृप्तिको है तृप्ति । सोचते सब ॥ ६१ ॥
अनावरणको प्रावरण । भूषण-अतीतको भूषण ।
सकल कारणको कारण । देखते मुझको ॥ ६२ ॥
मुझ सहजको रचते । स्वयंभूको हैं प्रतिष्ठते ।
निरंतरको आह्वानते । तथा विसर्जते हैं ॥ ६३ ॥
सर्वदा मैं स्वयं-सिद्ध । बाल तरुण और वृद्ध ।
एक रूपका संबंध । जानते वे मुझे ॥ ६४ ॥
मुझ अद्वयको द्वैत । अकर्ताको माने कर्ता ।
तथा अभोक्तकों भोक्ता । कह जानते ॥ ६५ ॥
अकुलका करते कुल-वर्णन । नित्यके निधनसे व्याकुल-मन ।
अंतर्यामिका शत्रु-मित्र अर्जुन । मानते हैं वे ॥ ६६ ॥
मैं हूं सर्वदा स्वानंदाभिराम । मुझे माने सकल-सुखकाम ।
सर्वत्र व्याप्त हूं संपूर्ण सम । मानतें मुझ स्थानिक ॥ ६७ ॥
आत्मा मैं चराचरमें बसता । कहते एकका पक्ष लेता ।
दूसरेका शत्रु बन मारता । बढाचढाके गाते यह ॥ ६८ ॥
अजी ! प्रायः ऐसे समस्त । मनुष्य-धर्म जो प्राकृत ।
लगाते मुझे विपरीत । यही उनका ज्ञान ॥ ६९ ॥
आकार कोई जब देखते । देव भावसे पूजा करते ।
वह बिगडनेपे कहते । नहीं रहा अब ॥ १७० ॥
२६३ राज-विद्या-समर्पणयोग