ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकाशमें तू निश्चित । निहार ऐश्वर्य योग नित ।
मुझमें है सब भूतजात । उसमें मैं नहीं ॥ ३३ ॥
या भूतमात्र नहीं मुझमें । तथा मैं नहीं भूतमात्रमें ।
इस रहस्यको जाननेमें । भूल न कर तू ॥ ३४ ॥
आकारके परे देखनेसे ही मेरा अनुभव आयेगा—
है यह हमारा सर्वस्व गूढ । दिखाया तुझको मैंने उघड़ ।
लगाकर इन्द्रियोंका किवाड़ । भोग तू हृदयमें ॥ ३५ ॥
रहस्य यह करमें नहीं आता । तब तक मेरा स्वरूप जो पार्था ।
नहीं समझेगा तुझको सर्वथा । भूसेमें जैसे दाना ॥ ३६ ॥
अन्यथा कभी अनुमानसे । लगे समझमें आयी ऐसे ।
क्या मृगजळके सींचनेसे । भीगती है खेती ॥ ३७ ॥
जलमें जब जाल फैलता । चन्द्रबिंब उसमें दीखता ।
जाल जब खींच लिया जाता । तब बिंब कहां ॥ ३८ ॥
शब्द चातुर्यसे वक्तृत्वके । मूँदते नयन प्रतीतिके ।
समय आने पर बोधके । रहते कोरे ॥ ३९ ॥
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
'परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥
यदि कोई संसारसे डरता । मेरी स्वरूप प्राप्तिको चाहता ।
तो हमारेमें जो विचार पार्थ । ध्यानमें रखले ॥ १४० ॥
जिसकी दृष्टिमें हुयी कामली । देखता वह चांदनी भी पीली ।
वैसा मेरा स्वरूप जो निर्मळ । देखते हैं मलिन ॥ ४१ ॥
या ज्वरसे दूषित जो मुख । दूधको कहे कडुआ विष ।
वैसे अमानुषको मानुष । कहेंगे मुझको ॥ ४२ ॥
तुच्छतासे मुझे मूढ देख मानव रूपमें ।
न जानते महा-रूप मेरा जो विश्व-चालक ॥ ११ ॥
२६१ राज-विद्या-समर्पणयोग