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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 330

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥
उमडता जब ज्वार सिंधु-जलका । रोक न सकता तब बांध नूनका
वैसे मैं हूं सकल कर्मोंकी पूर्णता । यह क्या बांधेंगे मुझे ॥ २४ ॥
धूम्र रजका छतनार । रोके यदि वायुका जोर ।
या सूर्यबिंबमें अंधार । करे प्रवेश ॥ २५ ॥
जैसे पर्वतके उदरस्थ । न करे पर्जन्य-धार त्रस्त ।
वैसे प्रकृतिके कर्मजात । मुझे न करते स्पर्श ॥ २६ ॥
विकारोंमें यहां प्रकृतिके । मैं ही हूं जान तू समझके ।
किंतु उदासीन ही रहके । न करता न करता ॥ २७ ॥
घरमें रखी दीप-ज्योती । जो न प्रेरती या रोकती ।
कौन है यह न जानती । कौन क्या करता ॥ २८ ॥
जैसा होता वह साक्षीभूत । गृह-व्यापार प्रवृत्ति हेत ।
भूत कर्ममें मैं अनासक्त । वैसा रहता भूतोंमें ॥ २९ ॥
यह एक ही विचार । क्या कहूं मैं फिर फिर ।
पार्थ यहां एक बार । इतना जान तू ॥ १३० ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥
जैसा लोक-चेष्टामें समस्त । निमित्त मात्र होता सवित ।
जगत प्रभवमें पांडुसुत । कारण मैं हूं ॥ ३१ ॥
किया मैंने प्रकृतिका अंगीकार । जिससे हुआ उत्पन्न स-चराचर ।
तब कारण मैं हुआ स-चराचर । यह है उपपत्ति ॥ ३२ ॥
किंतु जो ये सभी कर्म न बांध सकते मुझे ।
रहता मैं उदासीन तथा आसक्ति हीन भी ॥ ९ ॥
साक्षी मैं प्रकृति-द्वारा उठाता स-चराचर ।
उससे सब सृष्टीका होता है परिवर्तन ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी २६०