ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥
ऐसा सोचके अहम्को त्यागना । फिर वस्तुका दर्शन करना ।
इससे होगा कल्याण अपना । आपने किया ऐसा ॥ ७१ ॥
नहीं तो कोशकीटक जैसे । बने अपना वैरी आप जैसे ।
तन पर आत्म-भाव रखनेसे । बनते हैं नित ॥ ७२ ॥
प्राप्ति वेलामें दैव हीनकी । चाह होती है अंधत्वकी ।
तथा अपनी ही आंखोकी । मिटती दृष्टि ॥ ७३ ॥
कभी कोई कहता भ्रमसे । यह मैं नहीं चुराया ऐसे ।
अंतःकरणमें फंसे फंदसे । अपनी कल्पनाके ॥ ७४ ॥
देखें तो वह पहले जैसा । किंतु न जानती बुद्धि ऐसा ।
स्वप्नके घावसे कोई जैसा । मरता नहीं ॥ ७५ ॥
अंग भारसे झुकके जैसे । नलिका घूमती उलटके ।
शुक बैठे उसे पकडके । न उडता शंकासे ॥ ७६ ॥
व्यर्थ ही चहूं ओर देखता । संकोचसे नली पकडता ।
वही कसकर पकड़ता । पैरोंसे शुक ॥ ७७ ॥
अपनेको बंधनमें मानकर । भावनासे स्वयं जकड़कर ।
पैरोंसे पकड़ता है कसकर । मुक्त होकर भी ॥ ७८ ॥
कारणके बिन जकड़ा हुआ । किसीसे क्या वह बंधा हुआ ।
खींचने पर भी पकड़ा हुआ । रहता सतत ॥ ७९ ॥
ऐसा रिपु है अपने आप । जिसने बढ़ाये हैं संकल्प ।
न लेता मिथ्याभिमान आप । वह है बंधु अपना ॥ ८० ॥
जीतता अपने आप आपही अपना सखा ।
छोडा यदि उसे स्वैर अपना शत्रु है बना ॥ ६ ॥
१५९ आत्म-संयमयोग
जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण सुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥
आत्मज्ञका वर्णन —
उस स्वांतःकरणजित । सकल कामनाविसे शांत ।
परमात्म उसके सतत । रहता सपीप ॥ ८१ ॥
जलानेसे सोना हीन कस । होता है जो विशुद्ध सरस ।
वैसा जीवका ब्रह्मत्व खास । मिले संकल्प लोपसे ॥ ८२ ॥
घटाकारके मिटनेपर जैसे । घटाकाश मिलनेमें आकाशसे ।
जाना नहीं लगता अन्यत्र जैसे । वैसे अर्जुन ॥ ८३ ॥
नाश हुआ देहाहंकारका । कारणोंके सहित मूलका ।
वास सर्वत्र परमात्माका । अनादि सिद्ध है ॥ ८४ ॥
शीत उष्ण आदिका द्वंद्व । औ' सुख दुःखका चुनाव ।
मानापमान अनुभव । नहीं वहां ॥ ८५ ॥
जिस दिशामें जाता है भास्कर । प्रकाश फैलाता है उसी ओर ।
जिसका स्वरूप है वही स्थिर । दीखता सतत ॥ ८६ ॥
मेघसे गिरी वर्षाकी धार । न चुभे जैसे कभी सागर ।
वैसे शुभाशुभ योगेश्वर । नहीं अनुभवता ॥ ८७ ॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥
जो है यह विज्ञानात्मक भव । सोचनेसे व्यर्थत्व अनुभव ।
फिर हुआ अपना अनुभाव । वही ज्ञान है ॥ ८८ ॥
हुवा शांत जितात्मा जो देखता ब्रह्म केवल ।
शीतोष्ण सुख औ' दुःख मानापमानमें नित ॥ ७ ॥
ज्ञान विज्ञानमें तृप्त स्थिर इंद्रिय जीतके ।
देखता सम जो योगी सोना पाषाण मृत्तिका ॥ ८ ।
ज्ञानेश्वरी १९०
मैं अमर्याद या मर्यादित । इसकी चर्चा भी हुई व्यर्थ
अनुभवमें न आता द्वैत । इसीलिये ॥ ८९ ॥
शरीर है किंतु कौतुक । परब्रह्म-धाम है नेक ।
जिन्होंने जीत लिया देख । इंद्रियोंको ॥ ९० ॥
जो है जितेंद्रिय सहज । वही योग-युक्त समझ ।
वहां छोटे मोटेका दूज । कभी नहीं ॥ ९१ ॥
सोनेका मेरु पर्वत । माटीका ढेर या पात ।
मानता समान नित । समदृष्टिसे ॥ ९२ ॥
पृथ्वीके मोलका प्रसिद्ध । रत्न पाता जो शुद्ध ।
तथा पत्थर भी असिद्ध । एक जैसा ॥ ९३ ॥
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु ।
साधुष्वपिच पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९
सुहृद और शत्रु । उदास और मित्र ।
भेदाभेद विचित्र । कल्पना नहीं ॥ ९४ ॥
या बंधु है कौन उसका । द्वेष करे कौन किसका ।
मैं हूँ विश्व ऐसा जिसका । हुआ अनुभव ॥ ९५ ॥
कहो कैसे फिर उसकी दृष्टि । जाने अधम उत्तम किरीटी ।
दिखाये कैसे पारस कसौटी । सोना औ' लोहकी ॥ ९६ ॥
विवर्णको सुवर्ण करता पारस । वैसे चराचरसे होता समरस ।
बुद्धिमें समता रहती है सरस । निरंतर उसकी ॥ ९७ ॥
विश्वालंकारके प्रकार । अनेक रूपके आकार ।
मूलमें स्वर्ण है धनुर्धर । परब्रह्म रूप ॥ ९८ ॥
प्राप्त जिसे ऐसा उत्तम ज्ञान । नाना प्रकार देख असमान ।
नहीं फंसता वह बुद्धिमान । आकार-जालमें ॥ ९९ ॥
शत्रु मित्र उदासीन मध्यस्थ आप्त औ' पर ।
साधु या पातकीमें भी सम-बुद्धि विशिष्ट सो ॥ ९ ॥
१६१ आत्मसंयम योग
(21)
डालनेसे वस्त्रपर दृष्टि । दीखती सभी सूतकी सृष्टि ।
वहां है नहीं दूसरी गोष्टि । सूतके बिना ॥ १०० ॥
ऐसा प्रतीत जो है करता । अनुभव ऐसा जहां होता ।
वही समबुद्धि कहलाता । नहीं अन्य ॥ १ ॥
होता है वह तीर्थ-राज समान । उसके दर्शनसे हो समाधान ।
होता संगसे ब्रह्मभावका ज्ञान । अनिच्छुको भी ॥ २ ॥
धर्मका सारथ्य करती है उसकी गोष्टि । महा-सिद्धिको जन्म देती उसकी दृष्टि ।
स्वर्गादि सुखकी करना है नव-सृष्टि । खेल है उसको ॥ ३ ॥
यदि कोई सहज स्मरता । देते हैं वे अपनी योग्यता ।
उनकी प्रशंसा स्वभावता । देती शुभ-लाभ ॥ ४ ॥
योगी युञ्जीत सततम् आत्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
कभी अस्त न होगा ऐसे । देखा अद्वैत दिवससे ।
आप रहता है अपनेसे । अखंडित ॥ ५ ॥
इस दृष्टिसे वह विवेकी है । अर्जुन जो एकाकी रहता है ।
त्रिभुवनमें वही होनेसे है । सहज अपरिग्रही ॥ ६ ॥
ऐसे हैं जो असाधारण । प्राप्त पुरुषके लक्षण ।
सर्वज्ञताके ही कारण । श्री कृष्ण कहता ॥ ७ ॥
यह है ज्ञानियोंका बाप । सबकी दृष्टिका है दीप ।
उसका समर्थ संकल्प । रचता विश्वको ॥ ८ ॥
हाटमें है जो प्रणवके । वस्त्र बना शब्द-ब्रह्मके ।
लपेट न सका उसके । यशसे छोटा बड़ा ॥ ९ ॥
उसकी है अंगकी कांतिसे । प्रकाशते रवि-शशि ऐसे ।
विश्व क्या उसके प्रकाशसे । ओझल है पार्थ ॥ ११० ॥
इच्छा संग्रहको छोड़ चित्तको करके वश ।
आत्मामें ही सदा लीन रहा एकांत भावसे ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी १६२
जिसके नामके ही सम्मुख । आकाश लगता बौना देख ।
उसका गुण तू एक एक । कैसा जानेगा ? ॥ ११ ॥
इसीलिये ऐसा वर्णन । न जाने किसके लक्षण ।
कहनेके बहाने मान । कहे हैं यहां ॥ १२ ॥
श्रीकृष्णका भक्त प्रेम --
सुनोजी द्वैतका म्यान मान । नष्ट करता है ब्रह्म-ज्ञान ।
उससे सख्य माधुरी जान । नष्ट होगी ॥ १३ ॥
इसीलिये हरिका यह बोलना । मानो हलकासा परदा रखना ।
मनके सख्य सुखको हे भोगना । द्वैत भावसे ॥ १४ ॥
जिसका सोऽहं भावका रोक । मोक्ष सुखार्थ बने जो रंक ।
उनकी दृष्टिका हे कलंक । लगेगा तेरे प्रेमको ॥ १५ ॥
इसका अहंभाव जायेगा । यदि यह मैं ही हो जायेगा।
मैं अकेला ही कैसा रहूंगा । सोचता है हरि ॥ १६ ॥
दृष्टिसे देख कर सुखी होना । या सुखसे मनसोक्त बोलना ।
या प्रेमसे आलिंगन करना । किसको फिर ॥ १७ ॥
या अपने मनकी सुंदर । बात कहें किससे मधुर ।
हुआ यदि यह धनुर्धर । मुझमें समरसैक्य ॥ १८ ॥
द्वयनीय भावसे जनार्दन । अन्योपदेश रूपसे ही मान ।
बोलनेमें किया मनमोहन । आलिंगन पार्थका ॥ १९ ॥
सुननेमें यह किंचित्कठिण । फिर भी है यह स्पष्ट ही जान ।
श्रीकृष्ण रूपकी मूर्ति अर्जुन । है ढली हुई ॥ १२० ॥
अर्जुनकी प्रशंसा —
जैसे ही आयूके अंतमें । पुत्रजन्म होता है बांझमें ।
फिर वह मोहत्रयमें । नाचने लगती है ॥ २१ ॥
ऐसा हुआ है अनंत । यह मैं नहीं कहता ।
यदि मैं नहीं देखता । प्रेमातिशय ॥ २२ ॥
१६३ आत्मसंयम-योग
देखो कैसा है यह अचरज । कहां उपदेश औ' कहां झुंज ।
परंतु यहां है प्रेमका भोज । नाचता जो ॥ २३ ॥
अजी ! लाज लज्जा है प्रेममें । तथा थकान है व्यसनमें ।
भ्रम नहीं जो पगलाईमें । यह होगा कैसे ॥ २४ ॥
इसका भावार्थ है ऐसा । पार्थ भक्तिका आश्रयसा ।
सुख श्रंगारके मानस-सा । दर्पण रूपमें ॥ २५ ॥
ऐसा है यह पुण्य पवित्र । विश्वमें भक्ति बीज सुक्षेत्र ।
तभी है श्रीकृष्ण-कृपा पात्र । त्रिभुवनमें ॥ २६ ॥
आत्म निवेदनकी नींवका । आधार पीठ है जो सख्यका ।
पार्थ है अधिष्ठान उसका । मुख्य देवता ॥ २७ ॥
पास ही है प्रभु उसका वर्णन । छोड़ करते हैं भक्त-गुणगान ।
भाता है ऐसा स्वभावका अर्जुन । श्रीहरिको सहज ॥ २८ ॥
भजती जैसे पतिको प्रीतिसे । पाती मान्यता प्रीतिकी पतिसे ।
वर्णन ऐसी सतीका पतिसे । होना स्वाभाविक ॥ २९ ॥
अर्जुनका ऐसा गुणगान । चाहता विशेष मेरा मन ।
त्रिभुवनका भाग्य महान् । पार्थमें बसता ॥ १३० ॥
जिसके प्रेमके कारण । निर्गुण हो आता सगुण ।
तथा सकल गुणपूर्ण । अनुभवता प्रेम-पीड़ा ॥ ३१ ॥
श्रोताओंकी ओरसे वक्ताका यशोगान--
कहते तब श्रोता हमारा भाग्य । कैसा बोलना यह सहज योग्य ।
शब्द शोभा आयी पाकर विजय । नाद-ब्रह्मपर ॥ ३२ ॥
आश्चर्यजी गगनमें देश-भाषाके । प्रकार प्रकटते साहित्य रंगके ।
खिल आयी हिंदी ऐसे अलंकारके । वैभवानंदमें ॥ ३३ ॥
छटकी है ज्ञान चांदनी कैसी । भावार्थ दे प्रिय शीतलतासी ।
खिली श्लोकार्थ कुमुदिनी ऐसी । सहज रूपसे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १६४
चाह होती इससे निरिच्छोंमें । मन होता वचन सुननेमें ।
तथा डुलते हैं अंतरंगमें । ज्ञान प्रकाशसे ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वर कृत कृष्ण वर्णन-
निवृत्तिशासने यह जाना । फिर कहा ध्यान सब देना ।
पांडव कुलमें कृष्ण दिन । हुआ उदय ॥ ३६ ॥
देवकीके उदरमें जन्म लिया । यशोदाने सायास पालन किया ।
पांडव कुलके वह काम आया । इस समय ॥ ३७ ॥
तभी सेवा करता बहु समय । अवसर देख करता विनय ।
पड़ा नहीं ऐसा प्रयास अवश्य । विषय जाननेमें ॥ ३८ ॥
अर्जुनकी उत्कट जिज्ञासा -
जाने दो कहते संत जन । विषय कहो सत्वर महान ।
सन्त लक्षण मुझमें अर्जुन । कहता नहीं है ॥ ३९ ॥
किया तो संत लक्षणका विचार । “अयोग्य मैं” निःसंदेह “यह सारा” ।
किंतु तेरा उपदेश सुनकर । बनूंगा अवश्य ॥ १४० ॥
यदि तू मन करेगा । तब मैं ब्रह्म बनूंगा ।
जो कहो अभ्यास करूंगा । निःसंदेह ॥ ४१ ॥
न जानता देव यह किसका बखान । सुनकर करे अंतःकरण स्तब्ध ।
इन लक्षणसे पूर्ण जो संत महान । कैसे होंगे जी ॥ ४२ ॥
यह लक्षण मुझमें क्या आयेगा । इतना तू मुझे अपना पायेगा ।
श्रीकृष्ण कहता “अवश्य ही होगा” । रिमत करके ॥ ४३ ॥
जब तक संतोष नहीं मिलता । सुखका सर्वत्र अभाव रहता ।
जब वह समाधान है मिलता । सुखाभाव कहाँ ॥ ४४ ॥
जो है सर्वेश्वरका सेवक । वह होगा ब्रह्म सकौतुक ।
हुआ है यह फलकारक । दैवयोगसे ॥ ४५ ॥
सहस्र जन्मोंमें इंद्रादिकके । मिलन नहीं होता जिसके ।
आधीन वह कितना पार्थके । कथनमें अधीर ॥ ४६ ॥
१६५ आत्मसंयमयोग
पार्थका यह कहना । मुझको है ब्रह्म होना ।
श्रीकृष्णने यह सुना । पूर्ण रूपसे ॥ ४७ ॥
श्रीकृष्ण कहते तब अपनेमें । ब्रह्मत्वका दोहद हुआ इसमें ।
वैराग्य आया बुद्धिके उदरमें । बनके गर्भ ॥ ४८ ॥
किंतु दिन है अभी अपूर्ण । वैराग्य बसंतमें भरा पूर्ण ।
बौरा आया है भावका महान । सोऽहम्के ॥ ४९ ॥
प्राप्ति फल अब फलेगा । इसमें समय न लगेगा ।
पूर्ण हुआ इसका विराग । जाना श्रीहरिने ॥ १५० ॥
अब यह जो कर्म करेगा । इसको प्रारंभमें फलेगा ।
इसीलिये कहा हुआ होगा । अभ्यास इससे ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरका पंथराज—
श्रीहरि ऐसा सोचकर । कहते हैं सु अवसर ।
: अर्जुन सुन तू सत्वर । पंथराज ॥ ५२ ॥
जडमें वहां प्रवृत्ति वृक्षके । फल लगे करोडों निवृत्तिके ।
पथिक हैं जहां इस पथके । महेश भी ॥ ५३ ॥
योगी-वृंदके अनुभव परसे । उस सूक्ष्म-पथ पर चलनेसे ।
मूर्ध्नि आकाश मार्ग इस कारणसे । हुआ सुलभ ॥ ५४ ॥
आत्म-बोधके सरल पथपर । गये सीधे वे सानंद दौडकर ।
अन्य सकल मार्ग छोड़कर । जो हैं अज्ञानके ॥ ५५ ॥
फिर ऐसे महर्षी आये । साधक थे सिद्ध भये ।
आत्मविद् हो महती पाये । इस पंथसे ॥ ५६ ॥
यह मार्ग जो देखता । भूख प्यास भी भूलता ।
रात दिन न जानता । चलनेमें यहां ॥ ५७ ॥
चलते चलते जहां पग पड़ता । वहां मोक्ष सुखका भांडार खुलता ।
कहीं यदि गलत पग भी पड़ता । वह है स्वर्ग सुखका ॥ ५८ ॥
पूर्वाभिमुख हो चलना । पश्चिमको जा पहुंचना ।
मनको स्थिर ही रखना । चलना यहां ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी १६६
इस भाँतिसे है जाना । गंतव्य स्वयं हो जाना ।
इसे भला क्या कहना । जानेगा तू ॥ १६० ॥
“देव !” तब पार्थ कहता । “मुझे तू कब उभारता ।”
आर्त सागरमें डूबता । हूं इस समय ॥ ६१ ॥
श्रीकृष्ण तब ऐसा कहता । उतावला हो क्यों बोलता ।
अपने आप मैं हूँ कहता । तब तू क्यों पूछता वही ॥ ६२ ॥
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
योग साधनका स्थान ऐसा होना चाहिए—
अब जो मैं एक विशेष कहूंगा । अनुभवसे वह काम आयेगा ।
उसके लिये योग्य ऐसा लगेगा । स्थान एक ॥ ६३ ॥
जहां होता सहज समाधान । न रहता उठनेका भी भान ।
वैराग्य होता जहां बलवान । देखते वह ॥ ६४ ॥
वह हो संतोंका वसतिस्थान । संतोषका हो आवास महान ।
जहां हो चित सदा धैर्यवान । तथा उत्साही भी ॥ ६५ ॥
अभ्यास होता सहज जहां । अनुभव होता आप वहां ।
ऐसी रम्यता वसती वहां । अखंडित ॥ ६६ ॥
वहां जानेसे ही पार्थ । नास्तिकको मनोरथ ।
तपस्यामें हो सु-स्वस्थ । अंतःकरण ॥ ॥ ६७ ॥
सहज ही वहां जानेसे । सहसा बैठ जानेसे ।
करें न मन उठनेसे । सकामका भी ॥ ६८ ॥
करता वह घुमक्कडको भी स्थिर । आनेसे सहज उस स्थान पर ।
जागृत करता वैराग्य सत्वर । थपकियां देके ॥ ६९ ॥
पवित्र देशके स्थान लगाना स्थिर आसन ।
दर्भ चर्म तथा वस्त्र ऊंचा नीचा न हो वह ॥ ११ ॥
१६७
राज्य सुखका त्याग करना । ऐसा कहे विलासीका भी मन ।
एकांतमें यहीं बैठा रहना । ऐसा ही लगे ॥ १७० ॥
स्थान वह ऐसा हो उत्तम । तथा अत्यंत पवित्रतम ।
प्रकटे अधिष्ठान परम । नयनोंमें वहां ॥ ७१ ॥
देखना औ एक विशेष लक्षण । होना वहां साधक-वसति-स्थान ।
न होना जन संचार प्रच्छन्न । अर्जुन वहां ॥ ७२ ॥
वहां अमृतके समान । पक्व फल वृक्ष अर्जुन ।
फलते रहे अनुदिन । सभी ओर ॥ ७३ ॥
पग पगमें बहे नीर । वर्षा ऋतुमें भी पवित्र ।
ऐसे जो सहज निर्झर । सुलभ हो वहां ॥ ७४ ॥
आतप भी हो कोमल । सौम्यता भासे शीतल ।
पवन अति निश्चल । मंदमंद हो ॥ ७५ ॥
अधिक तर हो निःशब्द । न करें आकुल श्वापद ।
शुक तथा न हो षट्पद । उस स्थानमें ॥ ७६ ॥
स्रोत समीप हो हंस । वैसे दो चार सारस ।
कूजन करें आस पास । कोयल कभी कभी ॥ ७७ ॥
किंतु जो निरंतर नहीं । आवे जावे कभी कहीं ।
मोरको अपनी ना नहीं । उस स्थानमें ॥ ७८ ॥
परंतु अवश्य ही अर्जुन । ऐसा ठाव खोजके रखना ।
वहां निगूढ़सा मठ होना । या शिवालय ॥ ७९ ॥
इन दोनोंमें एक । भाता है जो अधिक ।
एकांतमें अधिक । बैठा रहना ॥ १८० ॥
देखें कैसा है यह स्थान । स्थिर रहता है क्या मन ।
रहा तो लगाना आसन । इस भांति ॥ ८१ ॥
योग साधनामें आसन ऐसा होना चाहिये--
वहां शुद्ध मृगचर्म एक बिछाना । उसपे धौत वस्त्रकी तह डालना ।
उसके तलमें कोमलसे बिछाना । कुशांकुर ॥ ८२ ॥
१६८
परंतु अवश्य ही अर्जुन । ऐसा ठाव खोजके रखना ।
वही निगूढसा मठ होना । या शिवालय ॥ ज्ञा. ६-१७९
इस चित्र में कोई पाठ या सामग्री नहीं है (यह पूरी तरह से खाली/श्वेत पृष्ठ है)।
होना है वे स-कोमल समान । एकसे सहज रखना जान ।
रचना करें एकसी समान । भूमिपर ॥ ८३ ॥
थोड़ा भी यदि वह ऊंचा होगा । उससे शरीर अस्थिर होगा ।
थोड़ासा यदि वह नीचा होगा । आयेगा भूमि दोष ॥ ८४ ॥
इसीलिये ऐसा न करना । आसन सम भावका होना ।
ऐसा आसन तैयार करना । धनुर्धर ॥ ८५ ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥
योग-साधनाका प्रारंभ ऐसा करना—
करना प्रारंभ अनुष्ठान । एकाग्र कर अंतःकरण ।
करके श्री गुरुका स्मरण । अनुभवसे ॥ ८६ ॥
ऐसे स्मरणके आदरसे । अहंकारके घुल जानेसे ।
भर जाता है सात्विकतासे । साधक वहां ॥ ८७ ॥
वासनाका विस्मरण होता । इंद्रियोंका चांचल्य मिटता ।
वैसेही तब स्थिरत्व आता । अंतःकरणमें ॥ ८८ ॥
संतुलन ऐसा स्वाभाविक । होने तक रुके क्षण एक ।
बैठो इस बोधमें क्षणिक । आसन पर ॥ ८९ ॥
अंग ही अंगको सचेत करता । जैसे पवनको पवन करता ।
वैसे अनुभवोंका उदय होता । ऐसे समय ॥ १९० ॥
प्रवृत्ति मुडती है पीछेको । समाधि उतरती आगेको ।
अभ्यास पहुंचे पूर्णताको । आसन पर ॥ ९१ ॥
मुद्राका महत्व है ऐसे । कहता हूँ उसीको कैसे ।
भिडाके रान औ' जांघसे । पलथी मारना ॥ ९२ ॥
करके मन एकाग्र रोक चित्तेंद्रिय क्रिया ।
करे आसन पे बैठ योजना आत्म-शुद्धिकी ॥ १२ ॥
(22) १६९ आत्म-संयमयोग
चरण तलको मोड़कर । आधार चक्रके तल पर ।
रखना ऐसे ही सटाकर । सुस्थिर हो बैठे ॥ ९३ ॥
दहिनेको नीचे रखना । उससे सीवन दबाना ।
उसपे सहज रखना । वामपाद ॥ ९४ ॥
गुद औ' शिश्नके मध्यमें । चार अंगुलके स्थानमें ।
डेढ़ औ' डेढ़ अंगुलमें । छोड़ करके ॥ ९५ ॥
रहता है स्थान अंगुल एक । उसे एडीके उत्तराग्रसे देख ।
दबाकर अंग उस पर रख । तौल करके ॥ ९६ ॥
उठाया या नहीं यह जाने नहीं । उतना ही पृष्ठांश उठावो कहीं ।
उठावो गुल्फद्वय भी वैसे ही । उसी समय ॥ ९७ ॥
तब शरीरका ढांचा पार्थ । पूर्ण रूपसे सुन सर्वथा ।
होता ऐडीसे लेकर माथा- । तक स्वयंभू जैसे ॥ ९८ ॥
यह तू जान अर्जुन । मूलबंधका लक्षण ।
वज्रासन भी है गौण । इसका नाम ॥ ९९ ॥
ऐसा आधार मूल पड़ता । उतरनेका मार्ग ढूंढता ।
तब है ऊर्ध्व गतिको पकड़ता । संकुचित अपान ॥ २०० ॥
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
सहज कर संपुट । वाम चरणमें बैठ ।
बाहुमूल दीखें ऊठ । सहज रूपसे ॥ १ ॥
उभरे हुए भुज मूलमें । मस्तक रखना स्थिरतामें ।
किवाड जैसे नेत्र द्वारमें । चाहते लगने ॥ २ ॥
ऊपरके पलक मिटते । नीचेके पलक हैं फैलते ।
जिससे अर्धोन्मिलिन होते । नेत्रद्वय ॥ ३ ॥
शरीर सम-रेखामें रखना स्थिर निश्चल ।
रख नासाग्रमें दृष्टि कभी न देखना कहीं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी १७०
दृष्टि रहती अंतरमें । पैर रखे तो बाहरमें ।
बैठती है नासिकाग्रमें । स्थिर होके ॥ ४ ॥
दृष्टि रहती अंदर ही अंदर । आती नहीं वह हठसे बाहर ।
होती तभी अर्ध दृष्टि है स्थिर । नासिकाग्रमें ॥ ५ ॥
दिशाओंका दर्शन करना । रूप राशीकी राह देखना ।
मिटे दृष्टिकी लत संपूर्ण । अपने आपमें ॥ ६ ॥
होगा फिर कंठनाल संकुचित । चिबुक छूता कंठ अरिक्तकागर्त ।
स्थिर होके फिर दबाती सतत । वक्ष स्थलमें ॥ ७ ॥
होता फिर कंठमणि लोप । उसपे हो बंधका आरोप ।
कहलाता जालंदर आप । पांडुकुमार ॥ ८ ॥
होता है जो नाभी पर पृष्ठ । उदर हो अंदर आकृष्ट ।
अंतरंगमें खिलता कोष्ठ । हृदय-कोषका ॥ ९ ॥
स्वाधिष्ठानके उत्तरानसे । नाभिस्थानके अधोभागसे ।
बढ़ता बंध जिस नामसे । वह उड्डियान ॥ २१० ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥
इस योग-साधनका, विस्तार, परिणाम, अनुभव,—
ऐसे शरीरके बाहर । पड़ा अभ्यासका पाखर ।
मनका चांचल्य भीतर । धीमा पडता ॥ ११ ॥
कल्पना है मिटती । प्रवृत्ति भी घटती ।
तन-मनको शांति । मिलती आप ॥ १२ ॥
क्षुधा गयी है कहां । निद्रा रहती कहां ।
न है स्मरण यहां । मनमें भी ॥ १३ ॥
शांत निर्भय मच्चित्त व्रतस्थ ब्रह्मचर्यमें ।
साधके मनको नित्य मुझमें ही लगा रहे ॥ १४ ॥
१७१ आत्म-संयमयोग
मूलबंधमें रहा हुआ अपान । ऊर्ध्व आया पाकरके आकुंचन ।
पा करके अध ऊर्ध्व आकुंचन । फूल उठता वह ॥ १४ ॥
क्षुभित हो खौलके उन्मत्त । घेरेमें गरजता सतत ।
मणिपूरकको करे आघात । रह रह कर ॥ १५ ॥
फिर वह अपानका बवंडर । शोधन करता संपूर्ण शरीर ।
बालपनका सडा गला जहर । बाहर करता ॥ १६ ॥
अंदर कहीं नहीं मुड सकता । फिर उदरमें संचार करता ।
वहां वह नाम भी नहीं रखता । कफ पित्तका ॥ १७ ॥
धातुके सागर उलटता । मेदके पर्वतोंको तोडता ।
अंदरकी मज्जा निचोडता । अस्थिगत भी ॥ १८ ॥
नसोंको खुल करता । गात्रोंको ढील करता ।
साधकको भी डराता । डरना नहीं ॥ १९ ॥
रोगोंको उठाकर दिखाता । किंतु उनको मिटा भी देता ।
आप औ' पृथ्वीको सान देता । एक जीव-सा ॥ २२० ॥
एक ओर जब यह होता । वहां जो आसनकी उष्णता ।
करती है शक्तिको जागृत । कुंडलिनीकी ॥ २१ ॥
नागका पिल्ला हो जैसे । स्नान कर कुंकुमसे ।
मुडकर आया जैसे । सेज पर ॥ २२ ॥
ऐसी वह कुंडलिनी । साडेतीन घुमावनी ।
अधोमुख सर्पिनी । सोती रहती जो ॥ २३ ॥
जागृत कुंडलिनी शक्तिका कार्य विवेचन--
कडी जैसी वह विद्युल्लताकी । तह जैसी अग्निकी ज्वालाओंकी ।
सांखलसी चमकीली स्वर्णकी । रहती है पार्थ ॥ २४ ॥
सुव्यवस्थित जो सिकुडी हुई । संकुचित स्थानमें सोई हुई ।
वज्रासनके चिमटेमें फंसी हुई । होती है सावध ॥ २५ ॥
गिरा वहां मानो नक्षत्र टूटकर । या आया स्थानच्युत हो स्वयं भास्कर ।
अथवा तेज बीजमें फूटा अंकुर । प्रकाश रूप ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी १०२
अपनें कुंडल खोलकर । लीलसे ही अंग मोडकर ।
कुंडलिनी नाभिकंद पर । टूट पडती ॥ २७ ॥
बहुत दिनकी रहती भूखी । छेडनेसे होती है अति तीखी ।
आवेशसे होकर ऊर्ध्वमुखी । उठती है जो ॥ २८ ॥
वहां हृदय-कोशके निम्न । भागमें रहता जो पवन ।
उसे पकडकर अर्जुन । निगलती वह ॥ २९ ॥
अर्जुन ! मुखकी ज्वालाओंसे । निगलती ऊपर नीचेसे ।
मांस खंड संपूर्ण-रूपसे । शरीरके ॥ २३० ॥
जो जो स्थान हैं समांस । वहांका भरती ग्रास ।
लेती है दो चार ग्रास । हृदयका भी ॥ ३१ ॥
करती फिर तलुओंका शोधन । तथा ऊर्ध्व खंडका भी है भेदन ।
चाटती अंगका प्रत्येक स्थान । वह धनंजय ॥ ३२ ॥
न छोडे अपना आश्रय । नामका भी रक्त संचय ।
रखे शुद्ध चर्मवलय । अस्थिपंजरपे ॥ ३३ ॥
अस्थि-नलियोंको सोखती । शिराओंको भी चूस लेती ।
बाह्य वृद्धिको जलादेती । रोमकूपके ॥ ३४ ॥
सप्त-धातुके जो सागर । प्यारसे घोंट भर कर ।
रखती सब ,सुखाकर । ग्रीष्म कालसा ॥ ३५ ॥
नासापुटिका जों श्वास । जाता अंगुल द्वादश ।
बीचमें धर अशेष । खींचती भीतर ॥ ३६ ॥
अधो-भागसे होता तब आकुंचित । ऊर्ध्व-भागसे होता खींचाव सतत ।
उस भेंटमें केवल चक्रके दांत । रहते बचकर ॥ ३७ ॥
ऐसे होता इन दोनोंका मिलन । किंतु मध्य कुंडलिनी क्षोभ पूर्ण ।
पूछती है उनसे "तुम हो कौन ? । चलो यहां से" ॥ ३८ ॥
पार्थिव धातु वह अशेष । निगलती वह रख शेष ।
आपको भी वैसे ही अशेष । पी जाती है ॥ ३९ ॥
दोनों भूतोंको निगल कर । देती है जो तृप्तिकी डकार !
तब वह संतुष्ट होकर । रहती सुषुम्नाके पास ॥ २४० ॥
१७३ आत्म-संयमयो
तब वह तृप्तिके तोषसे । गरल उगलती मुखसे ।
उस गरलके अमृतसे । जीता प्राण ॥ ४१ ॥
उस अग्निसे निकलता अमृत । करता वह अंतर बाह्य शांत ।
खिलते तब सब गात्र गलित । अर्जुन उसके ॥ ४२ ॥
रुकते हैं नाड़िके स्रोत । नव`विध वायुका द्वैत ।
मिटता और होता मुक्त । शरीर-धर्मसे ॥ ४३ ॥
- इडा पिंगला एक होती । तीनो गांठे जो छूट जाती ।
छह्री झल्लियां टूट जाती । षट्चक्रोंकी ॥ ४४ ॥
अजी ! फिर शशि और भानु । ऐसी कल्पनाका अनुमान ।
कपास रखके भी पवन । दीखता नहीं ॥ ४५ ॥
बुद्धिका आकार तब गलता । परिमल जो घ्राणमें रहता ।
शक्ति संह वह है संचरता । मध्यमामें ॥ ४६ ॥
ढलता उपरकी ओर । चंद्रामृतका सरोवर।
जाता जो बहकर फिर । शक्ति मुखमें ॥ ४७ ॥
उस शक्तिसे रस भरता । सर्वांगमें वह संचरता ।
जहांका वहां सगबगाता । प्राण पवन ॥ ४८ ॥
तपे हुए ढांचेमेंसे । मूम निकलता जैसे ।
भरती रससे वैसे । ढले हुए ॥ ४९ ॥
तब शरीरके आकारसे । विद्युल्लता उतरी है जैसे ।
ऊपर त्वचा आच्छादनसे । ढकी है जो ॥ २५० ॥
रविपर पड़ता मेघावरण । छिपते हैं तब प्रकाश किरण ।
फटता है फिर वह आवरण । न रुकता प्रकाश ॥ ५१ ॥
वैसा ही शुष्क है ऊपर । त्वचावरण तन पर ।
झडे जैसा वह चोकर । तन परसे ॥ ५२ ॥
चमकता वह फिर जैसे बिल्लोर । या रत्न बीजमें उग आया अंकुर
वैसे अवयव कांति शोभा अपार । होती प्रस्फुटित ॥ ५३ ॥
अथवा संध्या-रागके रंग । लेकरके बनाया है अंग ।
अथवा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग । आत्माका जो ॥ ५४ ॥
ज्ञानेश्वरी १७४
या केशरसे भरा हुआ । सिद्ध रससे ढला हुआ ।
मूर्ति रूप उतरा हुआ । 'शांत-ब्रह्म ॥ ५५ ॥
अथवा आनंद त्रयका लेप । या महा सुखका प्रत्यक्ष रूप ।
या मानो संतोष-तरुका रोप । अति कोमल ॥ ५६ ॥
माना कनक-चंपककी कली । या अमृतसे ढली है पुतली ।
या वह कोमलता ही है खिली । अति कोमल हो ॥ ५७ ॥
ओससे शरद्ऋतुकी । प्रफुल्लता चंद्र-बिंबकी ।
या मूर्ति बैठी तेजकी । आसन पर ॥ ५८ ॥
योगीकी काया तब ऐसी बनती । कुंडलिनी जब चंद्रामृत पीती ।
देख डरता छूने वह देहाकृति । कृतांत भी तब ॥ ५९ ॥
बुढापा तब पीछे हठता । तारुण्यका भी वियोग होता ।
बीता हुआ बालपन आता । योगीका पार्थ ॥ २६० ॥
वयमें देखे तो वह इतनासा । कार्य उसका ब्रह्म पुरुषका-सा ।
धैर्यमें मानो मेरु पर्वत जैसा । होता निरुपम ॥ ६१ ॥
अंकुर ही है कनकद्रुमका । नित्य नूतन रत्नकी कलिका ।
वैसी ही उसकी नखाकृतिका । होता नवदर्शन ॥ ६२ ॥
उसके दांत भी नये उगते । किंतु वे अतिशय नन्हे होते ।
हीरेके कणसे वे चमकते । दुपंक्तियोंमें ॥ ६३ ॥
जैसे माणिकके कण । वे भी हो अणुसमान ।
आते हैं सर्वांगपूर्ण । रोमाग्र जो ॥ ६४ ॥
कर चरण तल । मानो हैं रातोत्पल ।
नयन जो निर्मल । कहूं कैसे ॥ ६५ ॥
मुक्ताके संपूर्ण खिल जानेसे । समेट न सकती शुक्त उसे ।
खुल जाता है फिर बंध जैसे । शुक्ति पल्लवोंका ॥ ६६ ॥
वैसे पलक पल्लवमें न समानेसे । दृष्टिके सर्वव्याप्त हो निकलनेसे ।
लिपट जाती है फिर गगनसे । जो पहले थी ॥ ६७ ॥
तन होता तब कंचनका । हलकापन आता वायुका ।
न होता अंश आप-पृथ्विका । अर्जुन वहां ॥ ६८ ॥
१७५ आत्म-संयमयोग
यहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
वह फिर सागर पारका देखता । स्वर्ग लोकका भी विचार सुनता ।
चींटीका मनोगत भी है जान लेता । सहज भावसे ॥ ६९ ॥
पवनाश्वपर भी चढता । उदक पर वह चलता ।
ऐसी सिध्दियां प्राप्त करता । प्रसंग रूप ॥ २७० ॥
जो प्राणका हाथ पकडकर । गगनकी सीढियां बनाकर ।
सुषुम्नाका जीना चढकर । आयी हृदयमें ॥ ७१ ॥
वह कुंडलिनी जगदंबा । चैतन्य चक्रवर्तीकी शोभा ।
उसने विश्व बीजका कोंब । छायामें लिया ॥ ७२ ॥
आकार वह शून्य लिंगका । आवरण है परमात्माका ।
आसरा है जो खुला प्राणका । जन्मभूमिस ॥ ७३ ॥
ऐसी जो वह कुंडलिनी । हुई है हृदय-वासिनी ।
तब अनाहतकी ध्वनी । करती है ॥ ७४ ॥
शक्तिके तनमें चिपकनेसे । बुध्दिमें चैतन्य आया है जैसे ।
उसने ध्वनी सुनी है हौलेसे । अनाहतकी ॥ ७५ ॥
पोखरमें उस नादके । रुप दीखे नाद चित्रके ।
प्रणव रूप आकारके । रेखा लेखन ॥ ७६ ॥
करनेसे इसकी कल्पना । कल्पनासे इसको जानना ।
किंतु कल्पनाका मन लाना । कहांसे अब ॥ ७७ ॥
भूल गया मैं अर्जुन । नाश न होता पवन ।
जिससे है “ख” गगन । गूंजाता वह ॥ ७८ ॥
अनाहतकी उस घन गर्जनासे । गूंज उठता है हृदयाकाश जैसे ।
ब्रह्म-स्थानके महाद्वार हैं उससे । खुलते हैं सहज ॥ ७९ ॥
वहां कमल गर्भाकार अर्जुन । महदाकाश रहता अन्य जान ।
वहां रहता कर अर्ध भोजन । अतृप्त चैतन्य ॥ १८० ॥
सदनमें उस हृदयाकाशके । वास कुंडलिनी-परमेश्वरीके ।
अर्पण करती अपने तेजके । कौर चैतन्यको ॥ ८१ ॥
शाक सह वह बुध्दिके । देकर कौर हाथके ।
द्वैतको न देख सके । ऐसा करती ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी : १७६