ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 235, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस भाँतिसे है जाना । गंतव्य स्वयं हो जाना ।
इसे भला क्या कहना । जानेगा तू ॥ १६० ॥
“देव !” तब पार्थ कहता । “मुझे तू कब उभारता ।”
आर्त सागरमें डूबता । हूं इस समय ॥ ६१ ॥
श्रीकृष्ण तब ऐसा कहता । उतावला हो क्यों बोलता ।
अपने आप मैं हूँ कहता । तब तू क्यों पूछता वही ॥ ६२ ॥
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
योग साधनका स्थान ऐसा होना चाहिए—
अब जो मैं एक विशेष कहूंगा । अनुभवसे वह काम आयेगा ।
उसके लिये योग्य ऐसा लगेगा । स्थान एक ॥ ६३ ॥
जहां होता सहज समाधान । न रहता उठनेका भी भान ।
वैराग्य होता जहां बलवान । देखते वह ॥ ६४ ॥
वह हो संतोंका वसतिस्थान । संतोषका हो आवास महान ।
जहां हो चित सदा धैर्यवान । तथा उत्साही भी ॥ ६५ ॥
अभ्यास होता सहज जहां । अनुभव होता आप वहां ।
ऐसी रम्यता वसती वहां । अखंडित ॥ ६६ ॥
वहां जानेसे ही पार्थ । नास्तिकको मनोरथ ।
तपस्यामें हो सु-स्वस्थ । अंतःकरण ॥ ॥ ६७ ॥
सहज ही वहां जानेसे । सहसा बैठ जानेसे ।
करें न मन उठनेसे । सकामका भी ॥ ६८ ॥
करता वह घुमक्कडको भी स्थिर । आनेसे सहज उस स्थान पर ।
जागृत करता वैराग्य सत्वर । थपकियां देके ॥ ६९ ॥
पवित्र देशके स्थान लगाना स्थिर आसन ।
दर्भ चर्म तथा वस्त्र ऊंचा नीचा न हो वह ॥ ११ ॥
१६७