ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचरण तलको मोड़कर । आधार चक्रके तल पर ।
रखना ऐसे ही सटाकर । सुस्थिर हो बैठे ॥ ९३ ॥
दहिनेको नीचे रखना । उससे सीवन दबाना ।
उसपे सहज रखना । वामपाद ॥ ९४ ॥
गुद औ' शिश्नके मध्यमें । चार अंगुलके स्थानमें ।
डेढ़ औ' डेढ़ अंगुलमें । छोड़ करके ॥ ९५ ॥
रहता है स्थान अंगुल एक । उसे एडीके उत्तराग्रसे देख ।
दबाकर अंग उस पर रख । तौल करके ॥ ९६ ॥
उठाया या नहीं यह जाने नहीं । उतना ही पृष्ठांश उठावो कहीं ।
उठावो गुल्फद्वय भी वैसे ही । उसी समय ॥ ९७ ॥
तब शरीरका ढांचा पार्थ । पूर्ण रूपसे सुन सर्वथा ।
होता ऐडीसे लेकर माथा- । तक स्वयंभू जैसे ॥ ९८ ॥
यह तू जान अर्जुन । मूलबंधका लक्षण ।
वज्रासन भी है गौण । इसका नाम ॥ ९९ ॥
ऐसा आधार मूल पड़ता । उतरनेका मार्ग ढूंढता ।
तब है ऊर्ध्व गतिको पकड़ता । संकुचित अपान ॥ २०० ॥
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
सहज कर संपुट । वाम चरणमें बैठ ।
बाहुमूल दीखें ऊठ । सहज रूपसे ॥ १ ॥
उभरे हुए भुज मूलमें । मस्तक रखना स्थिरतामें ।
किवाड जैसे नेत्र द्वारमें । चाहते लगने ॥ २ ॥
ऊपरके पलक मिटते । नीचेके पलक हैं फैलते ।
जिससे अर्धोन्मिलिन होते । नेत्रद्वय ॥ ३ ॥
शरीर सम-रेखामें रखना स्थिर निश्चल ।
रख नासाग्रमें दृष्टि कभी न देखना कहीं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी १७०