ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
वह फिर सागर पारका देखता । स्वर्ग लोकका भी विचार सुनता ।
चींटीका मनोगत भी है जान लेता । सहज भावसे ॥ ६९ ॥
पवनाश्वपर भी चढता । उदक पर वह चलता ।
ऐसी सिध्दियां प्राप्त करता । प्रसंग रूप ॥ २७० ॥
जो प्राणका हाथ पकडकर । गगनकी सीढियां बनाकर ।
सुषुम्नाका जीना चढकर । आयी हृदयमें ॥ ७१ ॥
वह कुंडलिनी जगदंबा । चैतन्य चक्रवर्तीकी शोभा ।
उसने विश्व बीजका कोंब । छायामें लिया ॥ ७२ ॥
आकार वह शून्य लिंगका । आवरण है परमात्माका ।
आसरा है जो खुला प्राणका । जन्मभूमिस ॥ ७३ ॥
ऐसी जो वह कुंडलिनी । हुई है हृदय-वासिनी ।
तब अनाहतकी ध्वनी । करती है ॥ ७४ ॥
शक्तिके तनमें चिपकनेसे । बुध्दिमें चैतन्य आया है जैसे ।
उसने ध्वनी सुनी है हौलेसे । अनाहतकी ॥ ७५ ॥
पोखरमें उस नादके । रुप दीखे नाद चित्रके ।
प्रणव रूप आकारके । रेखा लेखन ॥ ७६ ॥
करनेसे इसकी कल्पना । कल्पनासे इसको जानना ।
किंतु कल्पनाका मन लाना । कहांसे अब ॥ ७७ ॥
भूल गया मैं अर्जुन । नाश न होता पवन ।
जिससे है “ख” गगन । गूंजाता वह ॥ ७८ ॥
अनाहतकी उस घन गर्जनासे । गूंज उठता है हृदयाकाश जैसे ।
ब्रह्म-स्थानके महाद्वार हैं उससे । खुलते हैं सहज ॥ ७९ ॥
वहां कमल गर्भाकार अर्जुन । महदाकाश रहता अन्य जान ।
वहां रहता कर अर्ध भोजन । अतृप्त चैतन्य ॥ १८० ॥
सदनमें उस हृदयाकाशके । वास कुंडलिनी-परमेश्वरीके ।
अर्पण करती अपने तेजके । कौर चैतन्यको ॥ ८१ ॥
शाक सह वह बुध्दिके । देकर कौर हाथके ।
द्वैतको न देख सके । ऐसा करती ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी : १७६