ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया केशरसे भरा हुआ । सिद्ध रससे ढला हुआ ।
मूर्ति रूप उतरा हुआ । 'शांत-ब्रह्म ॥ ५५ ॥
अथवा आनंद त्रयका लेप । या महा सुखका प्रत्यक्ष रूप ।
या मानो संतोष-तरुका रोप । अति कोमल ॥ ५६ ॥
माना कनक-चंपककी कली । या अमृतसे ढली है पुतली ।
या वह कोमलता ही है खिली । अति कोमल हो ॥ ५७ ॥
ओससे शरद्ऋतुकी । प्रफुल्लता चंद्र-बिंबकी ।
या मूर्ति बैठी तेजकी । आसन पर ॥ ५८ ॥
योगीकी काया तब ऐसी बनती । कुंडलिनी जब चंद्रामृत पीती ।
देख डरता छूने वह देहाकृति । कृतांत भी तब ॥ ५९ ॥
बुढापा तब पीछे हठता । तारुण्यका भी वियोग होता ।
बीता हुआ बालपन आता । योगीका पार्थ ॥ २६० ॥
वयमें देखे तो वह इतनासा । कार्य उसका ब्रह्म पुरुषका-सा ।
धैर्यमें मानो मेरु पर्वत जैसा । होता निरुपम ॥ ६१ ॥
अंकुर ही है कनकद्रुमका । नित्य नूतन रत्नकी कलिका ।
वैसी ही उसकी नखाकृतिका । होता नवदर्शन ॥ ६२ ॥
उसके दांत भी नये उगते । किंतु वे अतिशय नन्हे होते ।
हीरेके कणसे वे चमकते । दुपंक्तियोंमें ॥ ६३ ॥
जैसे माणिकके कण । वे भी हो अणुसमान ।
आते हैं सर्वांगपूर्ण । रोमाग्र जो ॥ ६४ ॥
कर चरण तल । मानो हैं रातोत्पल ।
नयन जो निर्मल । कहूं कैसे ॥ ६५ ॥
मुक्ताके संपूर्ण खिल जानेसे । समेट न सकती शुक्त उसे ।
खुल जाता है फिर बंध जैसे । शुक्ति पल्लवोंका ॥ ६६ ॥
वैसे पलक पल्लवमें न समानेसे । दृष्टिके सर्वव्याप्त हो निकलनेसे ।
लिपट जाती है फिर गगनसे । जो पहले थी ॥ ६७ ॥
तन होता तब कंचनका । हलकापन आता वायुका ।
न होता अंश आप-पृथ्विका । अर्जुन वहां ॥ ६८ ॥
१७५ आत्म-संयमयोग