ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंमूलबंधमें रहा हुआ अपान । ऊर्ध्व आया पाकरके आकुंचन ।
पा करके अध ऊर्ध्व आकुंचन । फूल उठता वह ॥ १४ ॥
क्षुभित हो खौलके उन्मत्त । घेरेमें गरजता सतत ।
मणिपूरकको करे आघात । रह रह कर ॥ १५ ॥
फिर वह अपानका बवंडर । शोधन करता संपूर्ण शरीर ।
बालपनका सडा गला जहर । बाहर करता ॥ १६ ॥
अंदर कहीं नहीं मुड सकता । फिर उदरमें संचार करता ।
वहां वह नाम भी नहीं रखता । कफ पित्तका ॥ १७ ॥
धातुके सागर उलटता । मेदके पर्वतोंको तोडता ।
अंदरकी मज्जा निचोडता । अस्थिगत भी ॥ १८ ॥
नसोंको खुल करता । गात्रोंको ढील करता ।
साधकको भी डराता । डरना नहीं ॥ १९ ॥
रोगोंको उठाकर दिखाता । किंतु उनको मिटा भी देता ।
आप औ' पृथ्वीको सान देता । एक जीव-सा ॥ २२० ॥
एक ओर जब यह होता । वहां जो आसनकी उष्णता ।
करती है शक्तिको जागृत । कुंडलिनीकी ॥ २१ ॥
नागका पिल्ला हो जैसे । स्नान कर कुंकुमसे ।
मुडकर आया जैसे । सेज पर ॥ २२ ॥
ऐसी वह कुंडलिनी । साडेतीन घुमावनी ।
अधोमुख सर्पिनी । सोती रहती जो ॥ २३ ॥
जागृत कुंडलिनी शक्तिका कार्य विवेचन--
कडी जैसी वह विद्युल्लताकी । तह जैसी अग्निकी ज्वालाओंकी ।
सांखलसी चमकीली स्वर्णकी । रहती है पार्थ ॥ २४ ॥
सुव्यवस्थित जो सिकुडी हुई । संकुचित स्थानमें सोई हुई ।
वज्रासनके चिमटेमें फंसी हुई । होती है सावध ॥ २५ ॥
गिरा वहां मानो नक्षत्र टूटकर । या आया स्थानच्युत हो स्वयं भास्कर ।
अथवा तेज बीजमें फूटा अंकुर । प्रकाश रूप ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी १०२