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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 244

तब वह तृप्तिके तोषसे । गरल उगलती मुखसे ।
उस गरलके अमृतसे । जीता प्राण ॥ ४१ ॥
उस अग्निसे निकलता अमृत । करता वह अंतर बाह्य शांत ।
खिलते तब सब गात्र गलित । अर्जुन उसके ॥ ४२ ॥
रुकते हैं नाड़िके स्रोत । नव`विध वायुका द्वैत ।
मिटता और होता मुक्त । शरीर-धर्मसे ॥ ४३ ॥

  • इडा पिंगला एक होती । तीनो गांठे जो छूट जाती ।
    छह्री झल्लियां टूट जाती । षट्चक्रोंकी ॥ ४४ ॥
    अजी ! फिर शशि और भानु । ऐसी कल्पनाका अनुमान ।
    कपास रखके भी पवन । दीखता नहीं ॥ ४५ ॥
    बुद्धिका आकार तब गलता । परिमल जो घ्राणमें रहता ।
    शक्ति संह वह है संचरता । मध्यमामें ॥ ४६ ॥
    ढलता उपरकी ओर । चंद्रामृतका सरोवर।
    जाता जो बहकर फिर । शक्ति मुखमें ॥ ४७ ॥
    उस शक्तिसे रस भरता । सर्वांगमें वह संचरता ।
    जहांका वहां सगबगाता । प्राण पवन ॥ ४८ ॥
    तपे हुए ढांचेमेंसे । मूम निकलता जैसे ।
    भरती रससे वैसे । ढले हुए ॥ ४९ ॥
    तब शरीरके आकारसे । विद्युल्लता उतरी है जैसे ।
    ऊपर त्वचा आच्छादनसे । ढकी है जो ॥ २५० ॥
    रविपर पड़ता मेघावरण । छिपते हैं तब प्रकाश किरण ।
    फटता है फिर वह आवरण । न रुकता प्रकाश ॥ ५१ ॥
    वैसा ही शुष्क है ऊपर । त्वचावरण तन पर ।
    झडे जैसा वह चोकर । तन परसे ॥ ५२ ॥
    चमकता वह फिर जैसे बिल्लोर । या रत्न बीजमें उग आया अंकुर
    वैसे अवयव कांति शोभा अपार । होती प्रस्फुटित ॥ ५३ ॥
    अथवा संध्या-रागके रंग । लेकरके बनाया है अंग ।
    अथवा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग । आत्माका जो ॥ ५४ ॥
    ज्ञानेश्वरी १७४