ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ
पृष्ठ 244, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 244
तब वह तृप्तिके तोषसे । गरल उगलती मुखसे ।
उस गरलके अमृतसे । जीता प्राण ॥ ४१ ॥
उस अग्निसे निकलता अमृत । करता वह अंतर बाह्य शांत ।
खिलते तब सब गात्र गलित । अर्जुन उसके ॥ ४२ ॥
रुकते हैं नाड़िके स्रोत । नव`विध वायुका द्वैत ।
मिटता और होता मुक्त । शरीर-धर्मसे ॥ ४३ ॥
- इडा पिंगला एक होती । तीनो गांठे जो छूट जाती ।
छह्री झल्लियां टूट जाती । षट्चक्रोंकी ॥ ४४ ॥
अजी ! फिर शशि और भानु । ऐसी कल्पनाका अनुमान ।
कपास रखके भी पवन । दीखता नहीं ॥ ४५ ॥
बुद्धिका आकार तब गलता । परिमल जो घ्राणमें रहता ।
शक्ति संह वह है संचरता । मध्यमामें ॥ ४६ ॥
ढलता उपरकी ओर । चंद्रामृतका सरोवर।
जाता जो बहकर फिर । शक्ति मुखमें ॥ ४७ ॥
उस शक्तिसे रस भरता । सर्वांगमें वह संचरता ।
जहांका वहां सगबगाता । प्राण पवन ॥ ४८ ॥
तपे हुए ढांचेमेंसे । मूम निकलता जैसे ।
भरती रससे वैसे । ढले हुए ॥ ४९ ॥
तब शरीरके आकारसे । विद्युल्लता उतरी है जैसे ।
ऊपर त्वचा आच्छादनसे । ढकी है जो ॥ २५० ॥
रविपर पड़ता मेघावरण । छिपते हैं तब प्रकाश किरण ।
फटता है फिर वह आवरण । न रुकता प्रकाश ॥ ५१ ॥
वैसा ही शुष्क है ऊपर । त्वचावरण तन पर ।
झडे जैसा वह चोकर । तन परसे ॥ ५२ ॥
चमकता वह फिर जैसे बिल्लोर । या रत्न बीजमें उग आया अंकुर
वैसे अवयव कांति शोभा अपार । होती प्रस्फुटित ॥ ५३ ॥
अथवा संध्या-रागके रंग । लेकरके बनाया है अंग ।
अथवा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग । आत्माका जो ॥ ५४ ॥
ज्ञानेश्वरी १७४