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सर्वकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

२७।२२ ] तण्हावग्गो [ ३५७
मुक्त हूँ, ( विमल ज्ञानको ) अपने ही जानकर ( मैं अब )
किसको ( अपना गुरु ) बतलाऊँ ?
जेतवन सक्क देवराज
३५४-सब्बदानं धम्मदानं जिनाति
सब्बं रसं धम्मरसो जिनाति ।
सब्बं रतिं धम्मरती जिनाति
तण्हक्खयो सब्बदुक्खं जिनाति ॥२१॥
( सर्वदानं धर्मदानं जयति
सर्वं रसं धर्मरसो जयति ।
सर्वां रतिं धर्मरतिर्जयति
तृष्णाक्षयः सर्वदुःखं जयति ॥ २१ ॥ )
अनुवाद—धर्मका दान सारे दानोंसे बढ़कर है, धर्मरस सारे रसोंसे
प्रबल है, धर्ममें रति सब रतियोंसे बढ़कर है, तृष्णाका
विनाश सारे दुःखोंको जीत लेता है ।
जेतवन ( अपुत्रक श्रेष्ठी )
३५५-हनन्ति भोगा दुम्मेधं नो चे पारगवेसिनो ।
भोगतण्हाय दुम्मेधो हन्ति अञ्ञे'व अत्तनं ॥२२॥
( घ्नन्ति भोगा दुर्मेधसं न चेत् पारगवेषिणः ।
भोगतृष्णाया दुर्मेधा हन्त्यन्य इवात्मनः ॥ २२ ॥ )
अनुवाद—( संसारको ) पार होनेकी कोशिश न करनेवाले दुर्बुद्धि
( पुरुष ) को भोग नष्ट करते हैं, भोगकी तृष्णामें पड़कर
(वह) दुर्बुद्धि परायेकी भाँति अपने हीको हनन करता है ।