धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ ] धम्मपद [ २४।१२
तस्मात् तृष्णां विनोदयेद्
भिक्षुराकांक्षी विरागमात्मनः ॥१०॥)
अनुवाद—तृष्णाके पीछे पड़े प्राणी बँधे खरगोशकी भाँति चक्कर
काटते हैं; इसलिए भिक्षुको चाहिए कि वह अपने वैराग्यकी
इच्छा रख, तृष्णाको दूर करे ।
वेणुवन विभन्तक (भिक्षु)
३४४—यो निब्बनथो वनाधिमुत्तो वनमुत्तो वनमेव धावति ।
तं पुग्गलमेव पस्सथ मुत्तो बन्धनमेव धावति ॥११॥
(यो निर्वाणार्थी वनाऽधिमुक्तो
वनमुक्तो वनमेव धावति ।
तं पुद्गलमेव पश्यत मुक्तो
बन्धनमेव धावति ॥११॥)
अनुवाद—जो निर्वाणकी इच्छा वाला (पुरुष) वन (=तृष्णा) से
मुक्त हो, वनसे सुमुक्त हो, फिर वन (=तृष्णा) ही
की ओर दौड़ता है, उस व्यक्तिको (वैसे ही) जानो
जैसे कोई (बन्धन) से मुक्त (पुरुष) फिर बन्धन ही
की ओर दौड़े ।
जेतवन बन्धनागार
३४५—न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा यदायसं दारुजं पब्बजञ्च ।
सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ॥१२॥
(न तद् दृढं बन्धनमाहुर्धीरा
यद् आयसं दारुजं पार्वजं च ।