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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

२६

दीन्हि सिंघासन औ तुरगू । पथ लाइ तुम्ह रायि फरगू ॥४
उतरे आईं पौंमन के अवासा । मँगता मिलया आइ जिह पासा ॥५
पूनेठैं रात सपूरन सूते, फूलहिं सेज पिछाइ ' ।६
पास लुपुध सुअँग एक आधा, अउतहिं चाँदहि खाइ ' ॥७

पाठान्तर—मनेर प्रति —
शीर्षक—बाज कत्ने लोरक राब रा बाजी मतुम (रायत लोरकका निवेदन)
इस प्रतिमें पंक्ति ४ नहीं है । उसके स्थानपर पाँचवी पंक्ति है । पाँचवी
पंक्तिक स्थानपर एक नयी पंक्ति है ।
१—मुनहु राऊ । २—रइ चले सो गोप तुम्हारा । ३—हमारैठ । ४—
रा० उतर सुनि बीरा दीन्हा । ५—सीस चढाइक लोरक कीन्हा । ६—
यह पंक्ति नहीं है । ७—बा० । ८—अथवा (लिपिक 'बात' क बाद
'अलिफ' लिखना भूल गया है ।) —मंगता आइ मिल जिह पासा ।
इसके आगे पाँचवी पंक्तिके रूपम नयी पंक्ति है—बीकहि कछू दाय क
देइ । जस कीरत आपु कहँ बढ़इ ॥ ९ —मइ । ११—अवति संज
बिठाइ । १२—म —पास हुपुध सुअँग न मानी चाँदह खाइ अधाइ ।
टिप्पणी—पंक्ति ४ और कड़बक ३३१ की पंक्ति २ एक समान हैं । सम्भवतः यह
पुनरुक्ति लिपिकके प्रमादका परिणाम है ।

३३१
( मनेर १६३ (१) ब )
दास्तान बेहोश शुदने चाँदा बेमुकर्ररबे खुदने मार
( साँपके काटते ही चाँद का मूर्छित हो जाना)

डँसतहिं चाँद भइ अँधियारी । पंग भरत बिसँभर गइ भारी ॥१
खबरी खाइ चला फुफकारी । लोर बीर सुनि लागि गुहारी ॥२
पेट पवान लोर कत गहा । तम टेक्स्रि जस ठाउ न अहा ॥३
पार सुअँग लोर को आवा । चाँद मुई लोरक घबरावा ॥४
डारक बाँभन छत जगायउ । घर घर फहही फिरइ खायउ ॥५
निकर सुरु उप अँधवा, परा धरहिं पर सोक ।६
तिरिया पुरुख ऊपर किया, तिह बिधि दीन्ह बियोग ॥७

२७
१३४
(सुमेर १६६अ)
शब्दान कर्दन लोरक अज खोये चाँदा
(चाँदके बिरहमें लोरक)
सात देवस लगि सरग ढफारा। सोक मँझर भान बिसियारा ॥१
राहु केतु यह देखत आहा। सुरज सनेह पाउँ न अहा ॥२
सुक्र बिरस्पति दोउ बुलाये। चाँद क छितवत गरह दुहुँ आये।३
यहु महि छंकर मारि अटामहु। चाँद मोर पिय आजु बियावहु ॥४
गगहा भिगा कीन्हा पै घरी। भै सँग आगो होइ गिरी ॥५
सुरज क रोवत घरैँ, और नखत को आइ ।६
नदिक झार सरग सब जरै, अउर धरति को आइ ॥७
१३५
(सुमेर १६६ब)
एज्मो इस्तहोबारी कर्दने लोरक
(लोरुकका विलाप)
रैन माँग परकाहू सूर। जैँ र सुनौ सो धाहहिं आवा ॥१
तन्त्र न मन्त्र न औखद मूरा। और सहेलिहूँ पन्हन तोरा ॥२
लोरक पीर बहु फारन करइ। धाहि कपारै कुन्त दै मरइ ॥३
बिहिसंगित जेउँ सम घर भारू। तिहि बिन कस अब जीउँ अधारू॥४
चन्दन काटि कै चितइ रची। आन आग तिह ऊपर सची ॥५
तैं बैसन्दर बारी, कसै धरि सरियाइ ।६
इपी गुनी एक आनाँ, चाँदा लीन्हि जियाइ ॥७
टिप्पणी—(१) जैँ—जिसने। धाहहिं—रोता हुआ।
(२) पन्हन—कंचन।
(५) बैसन्दर (स वैश्वानर> प्रा बइस्साणर, बरत्ताणर>बैताँदर)—
अग्नि। बारी—ज्वाला। सरियाइ—सजाकर।
(७) शुनी (गुणी)—गारुड़ी सर्पवैद्य। लीन्हि—लिया।

२७१
३३६
( मनेर १६७भ )
दास्तान आमदने गारुड़ी न गुफ्तने मन्तर बर चांदा
( गारुड़ीका जाकर चाँदपर मन्त्र फूँकना )
रूपन लागि मन्त्र उँह कही । सुनतहि लोग अचम्भै रही ॥१
भरि एक रात चाँद हुत डसी । डसतहि मुई न बिसफर बसी ॥२
अगनित गुनी सबै चलि आवा । होई अकारन मरन न पावा ॥३
बिपतैं जीउ न काहुँ माई । डसतहि मुयई परट पर आई ॥४
अब सो गुनी मन्त्र एक बोली । सुन पावा इसराफस टोली ॥५
देख गुनी मन चिन्ता, अखेतैं मन्त्र एक बार ।६
गुरु कै बचन सँभारउँ, जीउ देइ करतार ॥७
३३७
( मनेर १६७ब )
दास्तान जिन्दाशुदने चाँदाका बेफरमाने मुरादारा
( ईश्वरेच्छासे चाँदाका जीवित होना )
पिरम मन्त्र जो गारुड़ पढ़ा । बँफर लहर सुन चाँदहि चढ़ा ॥१
कर कगन अमरन सभ दीन्हा । औ सो गारुड़ माँगि कै लीन्हा ॥२
हरदी समत चले फिर आयी । कीन्हि सिघासन चाँद भलाई ॥३
दुँहु के मन कै पूवी आसा । करहिं बहुत मन भोग बिलासा ॥४
अलखनिरंजन आदि बियातइ । दई क लिखा सो मानुस पावइ ॥५
भरम दरम सभ सोही, चाँदा ओ बीउँ संसार ।६
तुम्ह मुई तुम्हहुत जिउ देवेतैं, मरत न लागत बार ॥७
टिप्पणी—(१) गारुड (स गारुडिक)—विषवैद्य सरपका मन्त्र जाननेवाला ।
(३) बिलासा—देखिये टिप्पणी १५२।६ ।
(५) अलख निरंजन—(नाथ पंथियोंकी भाषामे) ईश्वर । आदि—निश्चय ।
दई—ईश्वर, भाग्य ।

१७२
(६) दरब (द्रव्य)—धन ।
(७) बार—विलम्ब, देर ।
३३८-३४३
(अनुपलब्ध । सम्भवतः निम्नलिखित कड़वक इस बीचके हैं।)
[ १ ]
( बम्बई ३१ )
जंग कर्द गोरक बा अमीरपान व पूज्यानान व बाजीउफ़तन्द व बाज़ीगुरीख्तन
( गोरकका अहीरों और महलियोंसे लड़ना कुछ मारे गये कुछ भाग गये )
सभ महलियों गिरे घरू आनी । नियरे मीचु दसी दइ आनी ॥१
धँस बीर कोप्या सब जीउ आन । ओही धनुष परो गिउ आन ॥२
जो सँभारे सो तस मारा । को रोवइ कइ करइ पुकारा ॥३
एक महँ होइ उठे सोमहाई । बहु मारे बहु गये पराइ ॥४
आतहिं मरहिं ब्यान नहिं पारैं । आगें मास पाछें निहारैं ॥५
धीबो रहम पहेलिया, तिहकौं मीचु घटान ।६
कउवा चील्ह सा(भाग) मा, जम्बुक गीध अधान ॥७
मूल पाठ—भुग (बे हे गाफ) ।
[ २ ]
( बम्बई ३२ )
बाजे जंग शुजायस्त रवान शुदने चाँदा व गारक तरफ हरदी
( चाँद और गोरकका युद्ध क्षेत्रसे हरदीकी ओर रवाना होना )
रकत कँहूँनी उबे गँधाई । चला छोर छोड़िहूँ सो ठाँई ॥१
पुनि बीर ओडन कर लीन्हा । पुरुख दिसा तब पाँवत कीन्हा ॥२
करि कै खेती साझर घाती । चौरासी सत्त निंदरा मूती ॥३
रुण्ड मुण्ड मँह मेदिन पारा । बहु रोवैं बहु करहिं पुकारा ॥४
बैंतरत नदी बो भइ पनबारा । डाकिन आगिन उतरहिं पारा ॥५

चलो सो बनखंड लोरक, बसेउ विपिन बन जाइ ।६
पाकर रूख देख फर, तिह तर रहे लुभाइ ॥७
३४४
(रीसेंड्स ३५९; बम्बई ३३)
मौंदने लोरक व चाँदा शब दर बयाबाँ व मार खुर्दने चाँदा रा जेरे दरख्त
(रात्रिके समय चाँद और लोरकका वृक्षके नीचे रुकना और
चाँदाको साँपका डँसना)
चलत चलत जो भइ गइ साँझा । कीन्हि बसेरा बनखंड माँझा ॥१
पाकर रूख देखि छितनारी । तिहिं तर बसे पुरुख औ नारी ॥२
सेइ मूँज सुख सेज डलाई । सूता सुरुज चाँद गियँ लाई ॥३
बँधवें जोन' मयठ अँधियारा । पाछिल रात होत भिनसारा ॥४
सिंहिस्त बिसहर दीन्हि दिखाई । चाँदहिं डसिकै गयउ लुकाई ॥५
अस सुकुमार लहर जो आई, खात' गयी मुरझाइ ।६
एक बोल पै बोलसि चाँदा, लोरहि सोवत जगाइ ॥७
पाठान्तर—बम्बई प्रति—
शीर्षक—शब रफ़्तने राह शब दर बामद व कुरुद बामदन्द । जेर दरख्त पाकर ब मार कसीद चाँदा रा (मार्गमें रात्रि होजाने पर रुककर पाकड़के वृक्षके नीचे सो रहना और साँपका चाँदाको डसना)।
१—अधवें जोन्ह । २—म । ३—चाँदहि । ४—सति । ५—ओ कइरंहि । ६—कार्टेन्हि । ७—एक बोल पै बोली चाँदें सुता लोर जगाइ ।
टिप्पणी—(१) बसेरा—निवास । माँझा—मध्य बीच ।
(२) पाकर—पीपलकी जातिका एक वृक्ष । रूँख—वृक्ष । छितनारी—घना ।
(४) पाछिल—पिछला । भिनसारा—सुबह ।
(५) सन—उस समय । बिसहर—साँप ।
(६) सुकुमार—सुकुमार, कोमल ।
(७) लहर—विषका प्रभाव ।
(८) खात—खाते ही (सर्पके विषसे प्रभावित होनेको 'लहर खाना' कहते हैं) ।

१७४
३४५
(मधुरकथा)
३४६
(रौतँबूल २६१ : बम्बई ३७)
गिरिया करने लोरक अज बेहोशिये बाँदा
(चाँदो मूछँपर लोरकक विलाप )
छाड़ेउ माइ बाप' महतारी । तजेउँ बियाही मैना नारी ॥१
लोग कुटुंब घर बार बिसारेउँ । देख छाड़ि परदेस सिधारेउँ ॥२
गाँठ ठाँठ पोखर अँबराई । परहरि निसरेउँ कवन उपाई' ॥३
अरब खरब कर लोग न कीन्हेउँ । चाँद सनेह देसन्तर लीन्हेउँ ॥४
विष होइ बाट बात' परी करतारा । न धनि भयउ न मीत पियारा॥५
भइ मात अब आनेउँ, चाँदा तोरें मरन निदान' ।६
जो जिठ जाइ कसा कस देखहि', मैं का करब मधान ॥७
पाठान्तर—बम्बई प्रति—
शीर्षक—तन्हाई व बेकशीए खुद ममूवने लोरक अज बराये चाँदा मुम-
एक शुदन (लोरका अपने अकेलेपन और विवशता पर तड़पना और
चाँदके लिये परेशान होना) ।
१—बाप माइ। २---कवान पाई (काफ मूल आलिफ सून थे, बालिफ
ये धून) सम्भवत बालिफ सून आये पीछे किगर गये हैं। मूलपाठ 'कँवन
उपाई' है। ३—'बात' शब्द यहाँ है। ४-ना। ५- भइ र बात अब
ब्यानहि चाँदा मोर छन होत परान । ६—दैठौ ।
टिप्पणी-(१) परिहरि-परित्याग करके । बिसरेउँ-निकला ।
३४७
(रौतँबूल २६२ बम्बई ३५ सबेर ३६५ख )
पैंजन
(वही)
जीउ पियारा निसर न जाई । पिस न गाँठि मरतेउँ कें खाई' ॥१
मरिहउँ कोइ करुँ सो उपकारा । जीम' खाँड़ इनि मरउँ कटारा ॥२

२०५

चाँद मुयँ कित पावइँ' लोरा । साथ किये सो पहिगै मोरा' ॥३
नैन नीर मरि' सायर पाटी । नाव चढ़ाइ चाँद गुन झटी ॥४
दयों गुसाँई सिरजनहारा । तोहि छाड़ि कस करउँ पुकारा ॥५
जस कीन्हेउँ तस पायउँ, चाँद रहेउँ मन लाइ ।६
जो पाउर मनुसँ चित बाँधि, सो अइसै पछताइ ॥७

पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति—
शीर्षक—(बं ) मने खुद किवा साखने लोरक बज बजये चाँदा
वाकवाये हाले खुद बाव नमूदन् (चाँदाके वियोगमे लोरकका आत्महत्या
करने की बात कहना); (म ) गिरीस्तने लोरक व फरियाद कर्दने ऊ
( लोरक का रोना और फरियाद करना ) ।
१—(ब ) किउ नहि गाँठ जो मरतेउँ खाई, (म ) किस नहि गाँठ
मरब जो खाई । २—(बं ) मरिहउँ कठनै करै उपकार; (म ) माणिहउँ
कठनैउँ के उपकारा । ३—(म ) ओहि । ४—(बं ) पाठब (म )
पाबहि । ५—(ब ) साथ किये सो बहि गै हम नहिं भोरा (म ) सो
कहि ने तोरा । ६—(ब म ) गै । ७—(बं म ) रूपी । ८—(बं
म ) किह । —(म ) खंड पाँव । ९ —(ब ) मनुसे (म )
मनुसहिं । ११—(ब म ) अन्सहिं ।

टिप्पणी—(१) निउर—निकष ।
(४) सायर—सागर, समुद्र । पाटी—भर दिया । गुन—रस्सी ।
(५) कस—किस प्रकार ।
(७) पाउर—पामर, मूख । अइसै—इसी प्रकार ।

३४८
( रीडिंग्स ३५३ : मनेर ३५५अ )
गुफ्तने लोरक बरख्ते पाकर
(लोरकका पाकर वृक्षके प्रति उद्गार)
बैरिन भइ सो पाकर रूखा' । जिंह तर बसें परा महिँ दूखा ॥१
फाटि पेड़ जरि भूर उपारों । डार डार चीर कै पारों' ॥२
सरि रच आग चहूँ दिसि बारों । चाँद लाइ गियँ आपुहिँ जारों ॥३
देस देसन्तर गये मोर लाजा' । सुरुज चाँद कइ निसि लै (माजा)' ॥४

१७६
जो यह पिख और बिरी बाह्रैँ⁷ । नरक कुण्ड मह पुरखा पाड़ैँ⁸ ॥५
पत्त न होइ सत छाड़ें, हानि न होइ फुर कान ।६
तोरें पुभि फोर मञ्जानों⁹, घिय पराइ आन ॥७
मूलपाठ—(४) भागा ।
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—मलामत करने गोरक बान दरख्त रा (गोरखका पेड़की
भर्त्सना करना)
१—करता । २—भादि । ३—डार बार कै बाहली पारौं । ४—भाग ।
५—देख देख मुर बहि गइ गाजा । ६—सूरज चाँबहि के निशि माथा ।
७—अप को फिरित विह और न बारौं । ८—नरक कुण्ड हम पैंदा (?)
पाड़ौं । ९—तोर और बोलर मैझानों ।
टिप्पणी—(१) तूखा—फल कलेवा ।
(२) अरिमूर—जड़ मूल । उपारौं—उखाड़ूँ । डार बार—डाल डाल ।
बारौं—बहाऊँ ।
(३) सरि—चिन्ता ।
(५) पुरखा—पूर्वज ।
(६) फुर—कुछ । कान—लाज, प्रतिष्ठा ।
३४९
(राँचेन्ड्स १६७ : बम्बई ६२ : मनेर १६५क)
गुफ्तने गोरक बर मार रा व तासुक कुर्दैन
(गोरखका सर्पके प्रति उद्गार और खेद)
कारे¹ नाग सत्तुर बटपारे² । मीत³ विछोह कीन्हि हलबारे ॥१
बरु यहिं खावसि बहुत रे कुघाती । काहे देखी हैं मोर संघाती⁴ ॥२
तोरेह ढैंठ आइ जो बसे । पुरुष छाड़ि कित नारी डसे५ ॥३
मन्त्र सक्ति कै सत्तुर चलावा । कैं रे नाग तू गाइन आवा ॥४
कै तों बावनबीर पठावा । छाँद उसहिँ¹¹ नाग होइ आवा ॥५
विहने⁷ कारन मैं¹२ जीव नियारा ' दखतौं मळसन्ताप ।६
विह सेतें बिषपाही, जरबज मारी साँप ॥७

२७७
पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति—
टीका—(बं ) दामाद गुफ्तने लरक बाक्ये हार गुन अन बुझइ चाँदा
अन्देशमन्द (लोरकका मने प्रति उद्गार अन चान्दा किए व्याकुल
होना)। (म) सलामत बदने लोरक ब पटकुआ बदने मार रा (लोरकी
भर्त्सना करना और शाप देना)
१—(सं०) काते। ५—(ब ; म) वरकारे। ३—(बं ) मील। ४—
(बं, म) ह। ५—(बं म०) काइ दोगी मार अघाती। ६—(बं )
पुरुष छाडि मरोहि बल देखै। (म) पुरुष छाडि बल बिगिदि टने।
७ (बं) कै। ८—(सं०, म) पठाबा। —(सं०) बैठ कान तूं
गुलनहि लगा; (म) बैठ कान से गुलन लगा। ९—(बं) तुहि।
११—(बं म) बाँसहि हम। १२—(बं म) जिह। १३—(म)
हौं। १४—(म) नियण्ठ।
टिप्पणी—(१) वरचार—वरभार।
(२) दुआती बुरे कुल्भे रच्छा हुआ। गंवाती—नासी।
(३) डाँड—म्यान।
(४) गाहब—माप।
(५) बाबन बीर—चाँदबा पति।
(६) बिचगाडी—बीस रातामें। असवत—अकारण शत्रुता उत्पन्न करना।
३५०
(रीसंण्ड्म २३५ ; बम्बई ३६ ; मनेर १६२ख)
अस्नान करुन लोरक बम गदहाही चाँदा
(चाँदकी मूर्छापर लोरकका विलाप)
कै रे¹ कुदिन हम पौंयत घरा। कै रे² कलाप³ मैना कर परा ॥१
कै रे⁴ कुलुप जिउ भारी कीन्हों। कै रे⁵ सराप माइ मुहिं दीन्हों ॥२
घरी धरत गा पंडित पुरानाँ। कै हम कुसगुन कीत पयानाँ ॥३
इत पइ भयउँ न चौंट⁷ दुछायतें। कउन पाप दइया में¹⁰ पायउं ॥४
यह रे¹¹ महर जिय नारि अदोसी¹²। कै रे¹³ निपूती चाँदा कोसी ॥५
कै गयउँ कछु दइ मुकरावा¹⁴, दोस सुबरहि लाग। ६
कउन नींद सुम¹⁵ सती¹⁶ चाँदा, सपनें¹⁷ मयउ सुहाग ॥७

१७८
पाठांतर—बम्बई और मनेर प्रति—
शीर्षक—(बं) सदकशीरींवे खुद नमूदन गोरक राख करदेशम्पद शुदन
क्यार औंडा रा (गोरखका बाँदके लिए व्यथित होना और पश्चात्ताप
करना) । (म) याद कदने गोरक साकले बद अख्तर रफटन (गोरखका
दुष्टाहमें यात्रा आरम्भ करनेकी बात याद करना) ।
१—(ब म) र । २—(ब) के र । (म) कै । ३—(म)
कशप । ४—(बं, म) गोरक । ५—(बं म) र । ६—(बं) के र,
(म)—दे । ७—(बं) मुदि । ८—(बं म) कै । ९—(बं) मैं मैं
कुसगुन, (म) के कुसगुन हम । १०—(ब म) चाँद न । ११—
(म) हीं । १२—(ब) महर : (म) पाहिर (?) १३—(ब) चाँद
न बोली (म) चाँध बदोसी । १४—(बं म) कै र । १५—(म)
के केई कहु वर सुकराई; (म) के केहूँ कछु दर सुकराथा । १६—
(ब, म) तुम्ह । १७—(बं म) सुतहू । १८—(म) जसनाहिं ।
टिप्पणी—(१) कै—जातो । कुरिन—अशुभ दिन । पौषत—प्रस्थान । कशप—
दुखसे व्यथित हृदयसे निकला हुआ शाप ।
(२) सराप—शाप । भाई—गई, भाटा ।
(३) बरी—घड़ी । बरत—रखते हुए । गा—गथा 'का' पाठ भी
सम्भव है । उस अवस्था में अर्थ होगा—क्या । कुसगुन—अपशकुन ।
कीत—किया । पयानाँ—प्रस्थान रवानगी ।
(४) इव—इतना । चाँट—चींटी । रहसा—दैव ईश्वर ।
(५) बदोसी—निर्दोष । बिपूनी—सन्तानहीन की । कोपी—
शाप दिया ।
३५१
(रीडिंग्स २६६ : बम्बई ३ । मनेर १२७५)
ऐंजन
(बही)
नाग मेस होइ पनि धरी¹। छोरहि राम अवस्था परी ॥१
रामहिं हनिवन्त भयउ संपाता । सुद्दि न कोइ करु इहँ² विधाता ॥२
मरिहउँ कोई जो करइ उपकारा³। सिरजनहार देबहिं⁴ निस्तारा ॥३
हनिवन्त सीता कइ पसि मारी । लंका खोट खोट कँ जारी ॥४
हौं पुनि चाँद हरी सो पाऊँ । लंका छाड़ि पलँका जाऊँ ॥५

२७९

औखद मूरि चाँद किंह' जियै', ' कोऊ दे बताई' ॥६
सासो पादर" सात सुई, इक इक ढूँढउँ" जाइ ॥७

पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति—
शीर्षक—(बं ) बाकये हाले खुद नमूवने लोरक बंब (१) राम रा
उफ़तादने खुद बराये सीता रा (सीता-इश्कसे राम की जो अवस्था हुई थी
उससे लोरकका अपनी अवस्थाकी तुलना करना) । (म ) फरियाद व
जारी कर्दैन लोरक व गरीबी व तनहाई खुद रा (लोरकका अपनी
विवशता और असहाय अवस्थापर खेद करना) ।
१—(बं ; म ) होइ कै । २—(बं म ) हरी । ३—(बं ) केठवन
(म ) कोठएँ । ४—(ब म ) दूसर न केउ जो करि उपकारा । ५—
(बं ; म ) देहि । ६—(बं ) फिर । ७—(म ) फुनि । ८—(बं ) हौं
जो चाँद हरी सुन पावतौं । ९—(ब ) माबँठौं । १०—(ब ; म ) बिंइँ ।
११—(बं ) जीयइ : (म ) फिरै । १२—(बं ) को केउ बद दैलाइ
(म ) बों कोई देइ देखाइ । १३—(बं ; म ) सुरग । १४—(म )
हेरउँ ।

टिप्पणी— (१) बनि—स्त्री, पत्नी । परी—पड़ा ।
(२) भएउ—हुए । संघाता—साथी सहायक ।
(३) सिरजहार—सृष्टिकर्त्ता ईश्वर । देखहि—दे । बिस्तारा—
फुत्कार ।
(४) बाँट बाँट कै जारी—चुन चुन कर जलाया ।
(५) लंका छाडि पलंका जाऊँ—इस मुहावरेका प्रयोग कुतबन और
जायसीने भी किया है (मिरगाबति १ १३१ पदमावत २०६।३
३५५।३) । भोजपुरी क्षेत्रमें यह मुहावरा आज भी बोल चालमें
प्रचलित है । निकटवर्ती उपलब्धियो छोड़कर किसी दूरस्थ वस्तुके
लिए प्रयास करनेके प्रसंगमे लोग इसे चरितार्थ किया करते हैं ।
प्रस्तुत: प्रसंगमें भाव इससे कुछ भिन्न जान पडता है । असम्भवको
भी सम्भव कर दिखानेकी हिम्मत व्यक्त करनेके लिए कविने इस
मुहावरेका प्रयोग किया है । जिन दिनों इस मुहावरेने रूप धारण
किया उन दिनों जान पडता है लंका जाना भी सुगम न था और
पलंका तो कोई ऐसी जगह थी जहाँ सामान्यतः पहुँचना असम्भव
समझा जाता था । पलंका (तु पाताल लंका>पायाल लंका>
पायालंका>पालंका>पलंका) नामस ऐसा ध्वनित होता है कि
लंका की तरह वह कोई अति दूरवती द्वीप था । हो सकता है

१७८
पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति—
शीर्षक—( ब ) करदबंशिरिये खुद नमूनन गोरक राव अन्वेशमन्द शुदन
बुरई पाँवा रा (गोरकका नौंरके लिए व्यथित होना और पश्चात्ताप
करना)। (म) बाद कर्दने गोरक साखते बद बत्तर रफ्तन (गोरकका
कुसाइतमें यात्रा आरम्भ करनेकी बात याद करना)।
१—(बं, म) र । २—(बं) के र । (म) के। ३—(म)
कशप । ४—(बं, म) भाँवर । ५—(बं, म) र । ६—(ब) कै र,
(म)—के। ७—(ब) मुदि । ८—(ब, म) के । ९—(बं) कै गै
कुसगुन; (म) के कुसगुन हम । १०—(ब, म) बाँटन । ११—
(म) ही । १२—(ब) नहर: (म) पाहिर (?) १३—(ब) पाँव
न वोधी (म) बाँद अकोसी । १४—(बं, म) कै र । १५—(ब)
के नेहूँ कनु बर सुकुराई (म) के नेहूँ कछु बर सुकनाथा । १६—
(ब, म) तुम्ब । १७—(बं, म) रुहाहु । १८—(म) रुपनहिं ।
टिप्पणी—(१) के—घातो। कुदिन—अशुभ दिन। पाँचव—प्रस्थान। कश्यप—
दुःखसे व्यथित हृदयसे निकला हुआ शाप ।
(२) शराप—शाप। माई—माँ माता ।
(३) घरी—घड़ी। धरत—रखते हुए। गा—गया 'का' पाठ भी
सम्भव है। उस अवस्था में अर्थ होगा—क्या। कुसगुन—अपशकुन ।
कीत—किया। पयानाँ—प्रस्थान रवानगी।
(४) इत—इतना। चाँट—चींटी। रुहपा—दैव ईश्वर।
(५) अकोसी—निर्दोष। विवंसी—सन्तानहीन स्त्री। कोसी—
शाप दिया।
३५१
(रीडिंग्स १६६; बम्बई ३०; मनेर १६०ख)
ऐकन
(वही)
नाग मेस होइ' धनि घरी' । छोरहि राम अपस्सा परी ॥१
रामहिं इनिबन्त भयउ संघाता। मुहिं न फोइ बुरु दई' विधाता ॥२
मरिउँउँ कोइ जो करइ उपकारा' । सिरजनहार देयहि निस्तारा ॥३
इनिरन्त मीठा फल धसि मारी । लंका खोंट खोंट कें जारी ॥४
हां पुनि पाँद हरी जो पाऊँ । संका छाड़ि पतंगअ धाऊँ ॥५

२८१
टिप्पणी—(१) भै भैं—चीत्कार कर रोना । मीत—मित्र । होत—था । रई—
ईश्वर । बिछोवा—बिछोह कराया ।
(२) सायर—सागर । पराई—भर गया ।
(३) गहि—पकड़ कर । गुहरावइ—पुकारे ।
(४) जोवा—उत्सुकता पूर्वक देखता रहा ।
(५) बिखम उचार—विष उतारने वाला ।
(६) कूहह—गुहारा ।
(७) जनि—मत न । 'जिन' पाठ भी सम्भव है । उसका भी वही तात्पर्य
है । बोलचालमे दोनों ही रूप प्रचलित हैं ।
३५३
( रौडण्डम् २१० ब ; मनेर १६८ ब )
ऐजन
(वही)
जरम न छूट पिरम कर बाँधा । पिरम खाँड होइ¹ पिस साँधा ॥१
जिहैं यह घोट लागि² सो बानी । कै लोरक कै चाँदा रानी ॥२
कोइ³ न जान दुख काहू केरा । सोइ आन परे जिहँ पीरा ॥३
पिरम झार⁴ जिहँ हिरदैं⁵ लागी । नींद न जान पिवत निसि जागी ॥४
सात सरग जौं बरसहिँ आई । पिरम आग कैसैं⁶ न बुझाई ॥५
चिनग एक जो बाहर मारै, येहि पिरम कै झार । ६
भसम होइ जल धरती, तिल एक सरग पतार⁷ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
पूर्वसन्दी व सोज़े आतिशाने इश्क़ (प्रेमियोंकी व्यथा और प्रेमाग्निका
उल्लेख)
१—पिरम खाँड कहै । २—लागे । ३—गुनी । ४—आनइ धोह ।
५—आँच । ६—हिजरै । ७—नींद जाइ तप तप (?) निसि भागी ।
८—कैसहु । ९—येँहि र । १० —भसम होइ जर रिसन इक धरती
सरग पतार ।

२८
द्वीपान्तर (हिन्द एशिया) के द्वीप-समूहों के किसी द्वीपको पलका
कहते रहे हों। मलयस्थित पेनांगका भी नाम पलंगा हो सकता है।
किन्तु जायसीने पलकामें शिवका निवास बताया है। (२६६।१४)।
सम्भव है शिवके निवास कैलासको फलंका कहते रहे हों। इस
सम्बन्धमें दृश्य है कि एलोराके कैलास मन्दिरके दोनों ओर जो
गुफा-मण्डप हैं उनमेंसे एकको लंका और दूसरेको फलंका कहते हैं।
(७) बादर—बादर आकाश, जहाँ तात्पर्य स्वर्गसे है। भुईं— भूमि।
३५२
(रीडिंग्स २६०अ । बम्बई ३६ । मनेर १३८भ)
प्रेमन
(वही)
संग न साथी में में रोवा। मीत जो होत' सो दई बिछोवा ॥१
आँसू सायर भरा फटाइ। नैनन्हि बनखंड' रोइ बहाइ ॥२
कर गहि' चाँद चाँद गुहरावइ । धुनि धुनि सीस नारि पैं' लायइ ॥३
उठइ न दहि नारि मुख' जोया। नाग' डसे बिस लहरँ' सोया ॥४
गाँउ ठाँउ होइ तहाँ धाऊँ। बिखम उघार गुनी कित पाऊँ ॥५
माइ बाप कर दूलह, दुख न आन कस होइ ।६
सो सर परा सो जानै, दुखी होय अति कोइ ॥७
पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति—
शीर्षक—(ब) अफसोस व जारी गर्दन गोरख व हमराह खुद शायद
(गोरखका दुःखी होकर रोना और अपने कंधेसे होनेरी चर्चा करना)।
(म) दर तनहायगी व गरीरिय खुद गुफ्तन गोरख (गोरखका अपनी
बेरंगी और अकेलेपनका उल्लेख करना)।
१—(म) होता। २—(म) बनखण्डमें। ३—(म) कर धर। ४—
(ब) पायइ; (म) धर धर सीस मार पैं। ५—(ब) न दैहि ओर मुँह
(म) म दइ कार मुँह। ६—(म) साव। ७—(ब) लहर मदि (म)
लहरैहि। ८—(ब) दिह। ९—(ब) परा सा प्यान्या; (म) जौ हर
परै साहि पै पायनि।

२८१
एक परस मड़ि देउर जागेउँ । जोगी भेस होइ भीख मागेउँ ॥४
बरहा मेलि सरग चइ धायउँ । सिर सेटैं खेलि चाँद लै आयउँ ॥५
घोर चोर कर मारत उबरेउँ, चाँद लियउ लुकाइ ॥६
अब ते' धनि बनखंड गै छाड़ेउँ, फिरि घर आयउँ जाइ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दर्दमन्दिये खुद गुफ्तन लोरक दरख्ते मुकाबिल (!) (लोरफका
साम्हनेके पेड़से अपनी व्यथा कहना) ।
इस प्रतिमे पंक्ति ३ और ४ क्रमशः ४ और ३ हैं।
१—देखा । २—कउन सो छेया । ३—कियहुँ । ४—महरा । ५—
फिरम । ६—जोगी भेष भीख पुनि मँगिहूँ । ७— छूटेउँ । ८—त
धनि भित्रठ फुड़ाइ । ९—तैं । १ —आबठँ ।
टिप्पणी—(१) महराई—महता बड़प्पन ।
(५) बरहा—मोटी रस्सी । मेलि—फेंककर ।
३५६
(रौंड्स १६९ : मनेर १४९ब)
दुअम रोज आमदने गुनी व पाय उफ्तादने लोरक बर ऊ रा
(दूसरे दिन गुनीका आना और लोरकका उसके पैरपर गिरना)
एक दिन दुवै रैन सस भई' । चाँद न छूटे गहन जो' गही ॥१
मन चिन्ता कैं² नींद गँवानी । दयी दयी कै रैन बिहानी ॥२
लोरक देख नियर भिनुसारा । चन्दन फाटि कैं चितहिँ³ सँभारा ॥३
चाँद माँध लै सरि पहुंछाई⁴ । नैन नीर तिह आग बुझाई ॥४
फिर जो दीख गुनी एक आवा । मन्त्र बोल औ डाक पठावा ॥५
घालि पाग गियँ अपनें लोरक, परा पाइ सहराइ ॥६
सोवत साँप डसी धनि चाँदा, सो मनि देइँ' जियाइ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दु शबोरोज माँदने चाँदा दर बेहोशी (चाँदका दो दिन रात
मूर्छित रहना)
१—एक दिन दूहर रैन तर भइ । २—स्मु । ३—खर । ४—नियर

१८४
देउ। ५-चितैं। ६-चाँद काढ़ि के सरि पहुँचाई। ७-आनसि
आगि आहि परझाई। ८-पाठ। ९-सुतहिँ। १-नूँ महि देहु।
टिप्पणी-(३) निअर-निकट। भिनुसारा-सवेरा।
(४) सरि-छिप।
(५) शुभी-शुभी गबड़ी विज्जैत। डाक-उका
(६) बाधि-डाककर। पाग-पगड़ी। सहराइ-सीधे लेटकर।
३५७
(रैलेण्ड्स १७ : मनेर १७ अ)
घिरीनी (?) कबूल करने गोरकका मरगुनी रा
(गोरखका गुनीको मिठाई (?) देनेका वादा करना)
हाथ क मूँदरी१ सरग२ कतारा। कान क कुन्डल चौंक३ गियँ हारा ॥१
अउर जो साथ गाँठ है मोरें४। सो पुनि देउँ बिखारी तोरे५ ॥२
कर उपकार कर जो पारसि। पिता मोर जो महि६ निस्तारसि ॥३
तोरें कइँ चाँद जो लइउँ७। इहाँ अरम घेर होइ रहिउँ८ ॥४
जो न होइ एतबार हमारा। बचा बाँधि कर करहु९ पतियारा ॥५
कोने रात यस मेलउँ, कै सतइस सेउ१०।६
जो र असत११ में बोली, चाँद नियर तुम्ह१२ देउ ॥७
पाठान्तर-मनेर प्रति-
शीर्षक-उरीन कबूल करने गोरक हरीने अरथून गर रा (गोरखका
मन्त्र पूँछने बालेको आभूषन देनेका बचन देना)।
१-कुंतरा। २-कमर। ३-फान कुण्डल चौंका। ४-अउर साथ है
गोठी मरैं। ५-देही सब भिखारी तोरें। (बापका असरूज छूट जाने से
भिखारी बन्दहारी परा जाता है)। ६-दैहि। ७-तोर बचन
चांद जो पहई। ८-घर तोर होहिई। ९-पतियार। १०-के कय।
-कातिन वरश यस मेलैं सतसर दाइ तो सेउं। ११-कसिहि (?)
१२-तू।
टिप्पणी-(१) मुंदरी-अँगूठी।
( ) गाँठ-दाम। मोरे-मेरे। भिखारी-(न भिखारी)-विरोध।
(३) निस्तारसि-उद्धार करे।
( ) इतवार-विश्वास। बचा-बचन। पतियारा-विश्वास।

१८५
३५८
( रीबैण्ड्स २०१ : मनेर १७ ब )
मन्तर खान्दीदने गुनी व होशियार शुदने चाँदा
( गुनीका मन्त्रोपचार करना और चाँदाका जीवित होना )
कउन लोग तुम्ह गरुड़ि पूछी । ठाँठ कहु' आँ जातहि' पूछी ॥१
धात गोवार गोषर मोर४ ठाऊँ । घनि चाँदा मँहि लोरक नाऊँ ॥२
गुनी कहा जिन जीउ हुलावसु । धीर बँधहु' अब चाँदहि' पावसु ॥३
बोलि मन्त्र छिरकसि लइ पानी । उतरा बिस चाँद अँगरानी८ ॥४
धाइ लोर घर माँइ उठाई । पिरम पियार सौंपि गियँ लाई ॥५
सरग हुत चाँद उतरि जनु आइ, देख खर बिहसान' ।६
कँवल भाँति मुख बिगसा, दुख जो होत कुँभलान ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—पुरशीदने हकीम बात व नामे लोरक व चाँदा (चिकित्सकका
लोरक और चाँदाका नाम और जाति पूछना)
१—नाँउ कहु । २—जातो । ३—मुर । ४—है । ५—बाँधहु । ६—
चाँदा । ७—पानी । ८—म —चाँदा अँगगरानी । ९—सरगहि चाँद
उतरि जनु, देखित लोर विहसान । १ कुँझलान ।
टिप्पणी—(२) गोवार—ग्वाल ।
३५९
( रीबैण्ड्स २०२ )
होशियार शुदने चाँदा व दादने लोरक गुनी रा जेवर
( चाँदाका उठ बैठना और लोरकका गुनीको आभूषण देना )
हिया सिरान जरत जो अहा । छूटि चाँद निसि गहनँ गहा ॥१
लोरक होत सो आस पियासा । जियइ चाँद मन पूजी आसा ॥२
अभरन अनि फै सम लोरा । तरुवन हाँस आँ सोने खूरा ॥३
इतपुर मोर भाँ कान कै पूरी । मूद भंग और फर्रै क चूरी ॥४
हाथ क करणा सोभन नाँधी । अँगूठी मानिक के फाँठी ॥५

२८४
अनघट बिछवइ पांवर, लौर चाँद फर लीन्हि ।६
अरथ दरप औ खरग कटारा, मान गुनी कहँ दीन्हि ॥७
टिप्पणी— (१) हिया—हृदय । सिराने—शीतल हुआ । बरत—जल रहा ।
कहा—था।
(२) तरकन—तरौना कानका आभूष जिसे तरकी कहते हैं। यह फूलके
आकारका गोल और रवेदार होता है । हाँस—हँसली (सं०—
अंसाह्निका)- गलेका एक आभूषण जो चन्द्राकार होता है और गलेसे
चिपटा रहता है। चूरा—चूड़ी । 'जोरा'(जोड़ा) पाठ भी सम्भव है।
(४) हस्तुर—(सं हस्तपूरक) हाथका कड़ा। जोर—सामने मस्तक
पर लगाया जाने वाला आभूषण । पूरी—पूरी फूलके आकारकी
कील। मूंड मंग—सम्भवतः यह मौली माँगका अशुद्ध रूप है।
मागमें भरी जानेवाली मोतियों की लड़ी। करें—कर (हाथ) का।
(५) बाधी—जब भागमें पहननेका आभूषण । काँढी—कण्ठी कण्ठ में
पहनने का आभूषण।
(६) अनघट—पैरके अँगूठामें पहना जाने वाला आभूषण ।
(७) बिछवई—बिछुआ विछिया । पैरकी उँगलियोंमें पहना जानेवाला
आभूषण जिसे विवाहिता स्त्रियाँ ही पहनती हैं ।
१६०
(रौडैण्डथ ५ ३ मनेर १ ३अ )
आखिर बिसहर सबद कत्थ गुफ़्तन फ़रमूढने मौलाना नषन
( मौलाना नषनक बिसहर पर कुछ कहना )
मौलाना दाउद यह गित गाई । जें रें सुनौ सो गा मुरझाई ॥१
धनि ते सबद धनि लेखनहारा । धनि ते बोल' धनि अरथ बिचारा ॥२
हरषी आठ सो चाँदा रानी। नाग डसी हुत सो महि रखानी' ॥३
तोर कहा मैं यह खड गानतें । कया कबित' के लोग सुनावउँ ॥४
नषन मलिक दुख बात उमारी । सुनहु फान दइ यह गुनियारी ॥५
और कबित मैं फरउँ बनाई, सीस नाइ कर जोर ।६
एक एक जा तुम्ह पूछउ बिभार कहहुतौ सिंह सोर ॥७

२८७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान सिफ़ते मौलाना दाउद व गुफ़्तारे ऊ (मौलाना दाऊद
और उनकी रचनाकी प्रशंसा)
१—दाउद कवि जो चौंशा गाईं । २—र । ३—बोल । ४—आखर ।
५—छाँप उसी हीं सोइ बखानी । ६—काय । ७—सुनाथैँ । ८—मुक्लिक
नयन सुनु बोल हमारी । ९—बनइ । १ —एक एक बोलि मौति अस
फिरवा, कहउँ भो हीरा तोर ।
३६१
( मनेर १७१ ब )
विदभा कर्दने लोरक हकीम रा
( लोरकका चिकित्सकको बिदा करना )
गारुर समुँद चाँद लै चला । तैं हँ बात कहसि अति भला ॥१
बायें दिसि तूँ लोर न जाबसु । दाहिनें बाट बहुत फर पावसु ॥२
पिरम भुलान यह बोल न मानी । भाट चलत सहाइ न आनी ॥३
डांडी के लोरक चाँद चलाई । दाहिनें दिसिवैं दिस्टि मिलाई ॥४
घर आपुन दण्ड छाड़हि कहीं । जहाँ परिरोहि ठाड़े तहाँ ॥५
बार अँधवतैं जाइ सुलाना, लोरक सारगपूर ।६
दिनकर मूँड ऊघावा, राता जैस सिंदूर ॥७
टिप्पणी—(२) फर—फल ।
(४) डाँडी—एक प्रकार की पालकी ।
(५) परिरोहि—मना करें । ठाड़े—खड़ा ।
(६) बार—दिन । अँधवतैं—अन्त होत ही । सुलाना—जा पहुँचा ।
३६२-३७०
( अनुपलब्ध )
अनुमान है कि पञ्जाब प्रतिम प्राप्त निम्नलिखित चार कड़वक इस स्थान के
होंगे। किन्तु उनका क्रम और उचित स्थान निश्चित करना सम्भव नहीं है ।

१८८
(१)
(पंजाब [क])
आइ महावत [ ] अलापा। माइ महावत असपत धावा ॥१
[----] लोरक [----] नाँ। जानु पहरु झाऊ कै बनां ॥२
[ - ] । [ ] ॥३
भट लोग भये असबारा। काढे बेरुफ होइ चमकारा ॥४
चढ़ेहि लोर तैं बाहु परा[ई]। [ ] कें न नहि पड़ा[इ] ॥५
[ ] छाड़ जाहु [ ] ।६
[ ] ॥७

(२)
पंजाब [क]
लोरक हरक खेद भिराई। धीर [ ] ॥१
[ ]र गढ़ै जिह सेस बैसा [रे]। पाठ बेरी [ ] ॥२
[ ] । [ ] ॥३
रमफ बन नान क[ ]बिस मोही। घर नर [घ]हुत न दे[खी] तोही ॥४
घर घर अछे [ ] नाँ मान। चित मन माठ [ - ] ॥५
[ - -- ] ।६
[ -] ।७

(३)
(पंजाब [ख])
[ ] राज मधुबर लोरक रा [ ] (१)
रादा महता एक मन्तर कीन्हा। लोर बुलाइ पान लै दीन्हा ॥१
लोरक काज अन्दारा कीयइ। पयना मोर हरेवहि दीजइ ॥२
बयना पाति आगें अरघायसु। परहितहिं पठया लार फुलायसु ॥३
पाहा कापर खारहिं छीन्दौं। इहवहिं समुदित अंका सीन्दौं ॥४
ताकें सार साहि [----]गवा। पाँइ तिहैं तह क धावा ॥५