चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
माह माँस मो यों धुँधुवाई। लागी सीउ न पीउ तन आइ ॥२
रैन अमासी परी तुसारू। हियें अँगीठी धरा सरारू ॥३
बिरहिन नैन न आग बुझायी। सौर-सुपेती जाड़ न जायी ॥४
अस कै सखी बिगोवउ नाहीं। सेज भई निसि जलहर माँहीं ॥५
अस बरै दह मारे, हींठँ सरहि सुखाइ ।६
पिउ बिरहैं मोर जोबन, फुल जैस कुँभलाइ ॥७
टिप्पणी—(४) सौर-सुपेती—बिछौना बिस्तर।
५४
(पंजाब [प])
बैसियत कदन बाँद पियक माह फागुन पेख सहेन्दिान बुझाइ घोहर
(चाँदा का सहेलियों से फागुण मास में पति-विरह की स्थिति का वर्णन करना)
कहौं सखी माह माँस कै बाता। फरसि रांग सबै घनि राता ॥१
कर गहि गरौं कन्त ले लावइँ। उठ कै पिया सखि सेज बिछावइँ ॥२
तिल दिन भाइ होइ तिलखानी। हौं तिल एक पिय संग न खानी ॥३
रैन डरावन बराबर फारी। घट न आवइ बजर कै भारी ॥४
जागत लोयन आधी राती। पहरेबर पिउ घर सरसहिं राती ॥५
रैन तुसार जनु फट्ठु घोरों, रहीं भू पर गिय लाइ ।६
सौर सुपेती कन्त बिनु, तिल एक बाँभ न जाइ ॥७
टिप्पणी—शीर्षक में फाल्गुन मास का उल्लेख है। कड़बक में माघ मास का वर्णन
है। (१) माह—माघ।
५५
(पंजाब [क])
(फाल्गुन कथन)
फागुन पवन झरहिं बन पाता। रोलहिं फाग जिह घर पिउ (राता०) ॥१
फूल सुहावा कूंज औ करनाँ। बबुल बइठ देखि हइ बरनाँ ॥२
१११
सुन्दर फागुन [- -] री । केस सिंगार क [ --- -] ॥३
जिह रस दीस बन फूले टेसू । हाँ पी पिन भइ डाखन मेसू ॥४
[ ] । [ ] ॥५
[ ] ।६
[ ] ।७
टिप्पणी—उपलब्ध फोटो में शीर्षक और अन्तिम तीन पंक्तियाँ नहीं आयी हैं। तीसरी
पंक्ति भी अत्यन्त अस्पष्ट है।
(१) फागुन पवन—पगुनावट; यह बहुत तेज और बरफीली होती है।
(२) कूब—इसे फारसी में कूजा कहते हैं। आइने अकबरी में इसे गुलाब
के आकृति का फूल कहा गया है। सम्भवत यह मोतिया या बेले का ही
पारसी नाम है। करना (सं कर्ण)—मोनियर विलियम्स के संस्कृत कोष
के अनुसार कण अमलतास और आक (मदार) के पुष्प को कहते हैं।
हिन्दी शब्द सागर में इसे केवड़े की तरह लम्बे किन्तु बिना काँटोंवाला
पौधा कहा गया है और पवाड़ रूपमें सुगन्धित का उल्लेख है। आइने
अकबरी के फूलों की सूची में इसे वसन्त में फूलनेवाला सफेद फूल बताया
गया है।
५६
(पंथाय [प])
( चैत बजन )
चैत नाँग सब क [ ] ५ । [ ] वर होइ सुई [ ] ॥१
जोइ कहीं सब जग होली । [ ] धरती फूली ॥२
नौ खंड फूले फूल सुहाए । [ ] ॥३
ससी बसन्त सब देख [ ] । [ - ] ॥४
डींडर बैस बैसन्दर जरै । [ - -- ] ॥५
[ - - - - ] ।६
[ - ] ।७
टिप्पणी—यह पृष्ठ अत्यन्त जीर्ण अवस्था में है। इसका अधिकांश अंश गायब है।
जो बचा है वह भी उपलब्ध फोटो में अत्यन्त अस्पष्ट है। अतः यहाँ कुछ
अनुमानतः पढ़ा या बैठा दिया गया है। पर इसे एक सामान्य वाचन
ही मानना चाहिये।
१११
५७-६५
( अप्राप्य )
[ सम्भवतः यहाँ शेष नौ महीनों का वर्णन नौ कड़बकों में रहा होगा । ]
६६
( बम्बई २१ )
आमदने बाज़िर दर गोचर व शुनिदन बजारे कस पौंद व
दीदन व आशिक शुदन व उफ़्तादन
( गोचर में बाज़िर का आना और चाँद के महुक के नीचे से जाना
और उसे देख कर मोहित होकर मूर्च्छित होना )
बाज़िर एक फिर्तेंहुत आवा । गोचर फिरै बिहाऊ गावा ॥१
घर घर सुगुति माँग लै खाई । खिन खिन राजदुआरिहिँ जाइ ॥२
दिन एक चाँद मौरहर ठाढ़ी । झाँकसि माँध झरोखा फाड़ी ॥३
तिह खन बाज़िर मूँड़ उघावा । देखसि चाँद झरोखें आवा ॥४
देखतहिँ जनु नौहारहिँ लीन्हा । बिदका चाँद झरोखा दीन्हा ॥५
धरहुत जीउ न आनै फिरगा, काया भई बिनु साँस ।६
नैन नीर दइ मुँह छिरकहिँ, आय लोग तिहिँ पास ॥७
टिप्पणी—(१) बाज़िर—वज्रपानी योगी । बिहाऊ—बिहाग ।
(२) सुगुति—मुक्ति भोजन ।
(३) माँध—हर । झरोखा—(स चक गवाक्ष) महल का वह स्थान या
गोपुर जहाँ बैठ कर राजा प्रजा को दर्शन देते या महल से बाहर
देखते थे; खिड़की । फाड़ी—निगाह कर ।
(४) मूँड़—सर । उघावा—ऊँचा किया ऊपर उठाया ।
(५) नौहारहिँ—डर कर जी उठने को नौहार लेना कहते हैं । बिदका—
बन्द कर दिया ।
६७
( रीईंग्स ३७ )
परसीदने ख़ल्क बाज़िर रा अज हाले बेहोशी
( बाज़िर की मूर्च्छा सुन कर जनता का आना )
कहु बाज़िर तोर बेदन काहा । लोग महाजन पूछत आहा ॥१
पीर कहसि तू मँह पिनानी । औखद मूर देहुँ तिहिँ आनी ॥२
१११
कै जर जाइ कै पेट कै पीरा । कै सिर डाह को उसहुँ कीरा ॥३
कै खर लाग घाम कै झारा । पान पेट तूँ गा बिसँभारा ॥४
कै दरसन काहू कै राता । पिरम भुलान कहसि नहिं बाता॥५
कै तिहँ अरघ गँवावा, मार लीन्ह घटमार ।६
नाउँ न कहसि नहिं ताकै, बाजिर मुरुख गँवार ॥७
टिप्पणी-(१) जर-ज्वर । जाइ-अधिक । सिरडाह-सिरदर्द । कीरा-सर्प ।
(४) खर-तीव्र । घाम-धूप । झारा-गरमी । बिसँभार-बेहोश ।
(६) बटपार-भटमार रास्तेमें यात्रियोंको लूटने वाले ।
६८
(रीफ़्रेन्स १५)
जवाब दादन बाज़िर मर खल्क रा तरीके मुअम्मा
(सांकेतिक ढंगस बाज़िरका जनताको उत्तर)
लोग कहैं यह मुरुख अवानां । कहौं हियारी बूझ सयानां ॥१
बिरिख ऊँच फल'[लाग*] अकासा । हाथ चढ़ै कै नाँही आसा ॥२
गहि भूकत को बाँह पसारे । तरुवर डार धरैं को पारे ॥३
रात देबस राखहिँ रखवारा । नैन भो देखें जाइ सो मारा॥४
उरग डार फिरि देखेंउ रूखा। कँवल फूल मोर हिरदै सूखा॥५
पियर पात अस बन जर, रहेउँ काँप कुँभलाइ ।६
बिरह पवन जो डोलेउ, टूट परेउँ गहराइ ॥७
प्रस्तुत कड़बककी दूसरी तीसरी और चौथी पंक्तियोंको हजरत रुकनुद्दीनने
अपनी पुस्तक लताफ्ते कुद्दूसियामें उद्धृत किया है और उसके साथ अपने पिता
अब्दुलकुद्दूस गंगोहीका किया हुआ उनका फारसी अनुवाद भी किया है। यह
इस प्रकार है :
(२) शजरे बलन्दस्त समर बर समा। किता उम्मीदरस्त बरा दस्ते मा ॥
(३) बह किरा दस्त फराजी कुनद । शाखे पलक दस्त क पाजी कुनद ॥
(४) रोज शव गश्ता निगाहबा कसे । कुश्ता शवद चौँकि बबीनद कसे ॥
पाठान्तर : लताफ्ते कुद्दूसियासे।
१-पर। २-मुवै। ३-बहुस। ४-नैनन देखहि ।
टिप्पणी-(५) उरग-साँप ।
८
११४
६९
(रिफेरन्स १०)
इस्तरहाम नमूदन् बाज़िर पेश गुन्दए शहरे गोबर
(गोबरवासियोंस बाज़िरका प्रश्न)
हौं मारेउँ ईंह गोब तुम्हार। नैन बान हस गयी बिसारे ॥१
रकत न आवा दीस न घाऊ। हियें साल मोर उठै न पाऊ ॥२
कितैं मैं देख पराहेर ठाढ़ी। इत नैन जिउ लै गइ काढ़ी ॥३
कौन बनिज मोर आगें आवा। लाभ न बिसुवा मूर गँवावा ॥४
हौं तुम कहेउँ बोल पतियाहू। जे मारेउँ सिद्धि कहू न काहू ॥५
पूछि देखि विह पामल, रात पीर जो आग। ६
गयो सो जान जिन्ह मेला, फँसो जान बिष लाग ॥७
टिप्पणी—(१) बिसारे—विषाक्त।
७०
(रिफेरन्स १)
गुरीख्तने बाज़िर अज शहर गोबर बेखौफे राव महर
(राव महरके भयस बाज़िरका गोबर नगर छोड़कर भागना)
बाज़िर देखि मीचु मोर आइ। गोबर तजि हौं बाँउ पराई ॥१
कहा दीप महँ नींद न (आवइ)। भूख गयी अन-पानि न भावइ ॥२
जो सो तिरी फिर दिखरायइ। चौहट मीचु नियर होइ आवइ॥३
महर पास जो कहि फोठ खाई। खिन एक भीतर खाल भड़ाई ॥४
बिधना क कहा भिमस्तैं कीन्हा। आनै बाँध कर सास्तो दीन्हा ॥५
चला छाड़ि कै बाज़िर, बसा ओर ठहँ जाइ। ६
बाँद रहे मन भीतर, सँभर सँभर पछताइ ॥७
मूल पाठ—२-भावा।
टिप्पणी—(१) मीचु—मृत्यु।
(२) अन पानि—अन्न-पानी खाना पीना।
१६६
(६) इहँ—ठौर, जगह ।
(७) सँभार-सँभार—स्मरण कर करके ।
७१
( रीडैन्ट्स ३८ )
रसीदन बाज़िर दर शहर व सुरुद कर्दने बाज़िर अन्दर शब व शुनीदने
शब बज बाम
( बाज़िरका एक नगरमें जाकर रातको गाना और छतपरसे
राजाका सुनना )
एक खूँड छाड़ आन खूँड जाई । माँस एक बाज़िर पाट घटाई ॥१
पुनि ओ आइ मयठ पैसारा । पैठि पौंरिया नगर दुआरा ॥२
बात भूझ सब लेतस नाऊँ । भीख माँग खाओं इँह गाँऊँ ॥३
राइ रूपचंद भाँठ सरेखा । नगर राज फिर बाज़िर देखा ॥४
दिवस गयो निसि मयठ उझेरा । बाज़िर फिर कर लेस बसेरा ॥५
तिहँ रात सुहावन, बाज़िर ठोका तार ।६
गाइ गीत चंद्रावल, नगर मयठ झनकार ॥७
टिप्पणी—खूँड—खण्ड देश-विभाग ।
७२
( रीडैन्ट्स ३९ )
दर रोज तलबक्रीदन शब बाज़िर रा व पुरसीदन कैफियते सुरुदे शब
( दूसरे दिन राजाका बाज़िरको बुलवाकर गानेका कारण पूछना )
दिन भा रावँ भाँठ भुलावा । आज रात निसईं कँ गावा ॥१
भाँठ कहा इँहमों क न होई । होइ रजायसु आनौं सोई ॥२
चहुँ दिसि भाँठै वन दौराये । बाज़िर हेर तोह ले आये ॥३
पूछा राउ कौन तोर ठाऊँ । सुर कण्ठ विह दीन्हि गुसाऊँ ॥४
आज रात निसईं तैं गावा । चंद्रावल मन रहराँ लाभा ॥५
गीत नाद सुर कबिस बखानी, कथा कहु गायनहार ।६
मोर मन रैन देवस सुरउ राउ, भूँजसु गाउँ गिसदार ॥७
१२६
टिप्पणी—(२) इहवाँ—यहाँ । रचाबसु—राज्यादेश । आऔं—ले आऊँ ।
(३) हेर टोह—ढूँढ़-खोज कर ।
(७) पिवहार—गीतकार, गायक ।
७३
( रीडिंग्स ४ )
हिकायते दीदने चाँदा बयान करदन पेश राव रूपचन्द
(राव रूपचन्दके सम्मुख चाँदाके दर्शनका उल्लेख)
सुपन क सुनाँ कहउँ हौं काहा । बोलेउँ सोइ जो देखेउँ आहा ॥१
नगर उजैन मोर अस्मानू । विकराजित राजा घरमानू ॥२
चारिउँ भुवन फिरत हौं आवा । गोवर देखेउँ नगर सुहावा ॥३
विहवाँ चाँद तिरि मैं देखी । पायर खीर अहस चित पैठी ॥४
मनहुत अइसहिं मेट न जाई । दिन-दिन होइ अधिक सवाई ॥५
सहदेव महर कर धिय चाँदा, चहुँ भुवन उजियार ।६
मानिक जोत आन बर जरैहि, नागर चतुर अपार ॥७
७४
(रीडिंग्स ४१ ; बम्बई ६)
आशिक शुदने राव बर नामे चाँदा व अस्म बखशीदन बासिर रा
(चाँदाका नाम सुनकर रावका आसक्त होना और बासिरको
घोड़ा देना)
सुन कै चाँद राउ अँगरानाँ । बासिर उभत' नीर ढर आनाँ ॥१
जसको सूत बैठि' उठि बागी । राजा हियँ घटपटी लागी ॥२
जुरी दइ बाजिर कहुँ आनी' । पीठ घाल पाखर सनबानी' ॥३
बासिर कौन देस सो नारी । ठौर कहहु बरु तुमहि बिचारी' ॥४
करन कहत भौ लखन बिसेखी । अछरं रूप सो तिरिया देखी ॥५
मारग कौन फैस बैठारा, साँध छोट कस आह ।६
सहज सिंगार भोग रस, पिंडक, पराक्रम कै चाहि' ॥७
११७
पाठान्तर—बम्बई प्रति—
शीर्षक—शुनीदने राब रूपचन्द नामे चाँदा व पुरसीदने बाज़िर रा सूरते
जेबाइये ऊ (चाँदाका नाम सुनकर राय रूपचन्दकी बाज़िरसे उसके
सौन्दर्यके प्रति जिज्ञासा )।
१—अहत । २—कोइ । ३—गैल । ४—भानीं । ५—सनबानी ।
६—गाँठ कहउ अब ठाँठ बिचारी । ७—करन कहि ओ करन बितेगी ।
८—कौन । —रूप । १ —कस ताह ।
टिप्पणी—(१) चटपटी—छटपटी, उत्सुकता ।
(३) तुरी—(सं तुरंग>तुरग>तुरीय>तुरी) घोड़ा । पाखर = पख्खर,
कवच ।
(५) बितेगी—बिछोह । बजर—अप्सरा ।
(७) पिंइक—पिण्ड शरीर । पराक्रित—प्रकृति, स्वभाव ।
७५
( रीट्सूक्स ४१ )
सिफ़ते फर्के चाँदा गुफ़्तन बाज़िर बर राव रूपचन्द
( राय रूपचन्दसे बाज़िरका चाँदाके माँगका वर्णन )
पहले माँग क कहउँ सोहागू । तिहिं राता जग खेलै फागू ॥१
माँग चीर सर मेंदुर पूरा । रंग चला जनु फानफेजूरा ॥२
दिया जोत रैन जस पारी । कारें सीस दीस रतनारी ॥३
म यह माँग चीर तर दीठी । उवत सूर जनु किरिन पइठी ॥४
माँथ पिराय जोत पँसारा । सगरै देस होइ उजियारा ॥५
राउ रूपचंद बोला, पुनि मई छाँड गाउ ।६
माँग सुनत मन राता, बाज़िर करब बिपाउ ॥७
टिप्पणी—(१) राता—अनुरक्त ।
(२) मेंदुर पूरा = माथे सिन्दूर भरनेको स्त्रियाँ सिन्दूर पूरना कहती हैं ।
फानकेजूरा—कनकधतूरा, धतूरा का एक अच्छा पौधा ।
११८
७६
(रौकेन्ड्स ७३)
किस्तवे मुयेषा चौदा गोयद
(केस वर्णन)
भँवर बरन सो बेनी बारा। जनु बिसहर लर परे मॅडारा ॥१
लोंग फेन मुर [मूँध*] भराये। आनु सेंदुरी नाग सुहाये ॥२
बेनी गूंद जूहि जरमावइ। ल्हर चहहि बिस सतक दहावइ॥३
देखत बिस चढ़हि मंतर न माने। गारुर काइ अनारी जाने ॥४
जूड़ा छोर झार सो नारी। देवसहिँ रात होइ अँधियारी ॥५
डंक चढ़ा सुन राजा, परा लहर मुरझाइ ।६
बात कहत जिह बिस चढ़हि, गारुर काइ कराइ ॥७
टिप्पणी-(१) भँवर—भ्रमर, काला। बरन—वर्ण रंग। बारा—बाल केश।
बिसहर—विषधर, सर्प। लर—लड़ लड़ी, पंक्ति।
(२) सुर—मुंड मूँड सिर।
(४) गारुर—विष वैद्य सर्प के विष को उतारने वाला। काइ—क्या।
(५) जूड़ा—बँधे हुए केश। छोर—खोल कर। झार—झाड़।
७७
(रौकेन्ड्स ७४)
सिफते पेशानी चौदा गोयद
(ललाट वर्णन)
देखि लिलार बिमोहे देवा। लोक सब कुटुंब कीनहिं सेवा ॥१
दूज क चाँद जानु परगासा। कै खर सोभन कसौटी कसा ॥२
बदन पसीज मूँद जो आवहिं। चाँद माँझ जनु नखत दिखावहिं ॥३
मुँह दप सोह न देखी जायी। सरग घूर जनु अवनल आयी ॥४
ससहर रूप भइ उठ रेखा। मैं न अकेलि सम जग देखा ॥५
मोर चड़ा बिस उतरा, रायँ करपट लेत ।६
सुन लिलार उठ बैठो, बाजिर कंचन देत ॥७
१२९
टिप्पणी—(१) छिकार—सलाह।
(२) पर—पखरा, घुड़। सोवन—सुवर्ण, सोना।
७८
(रीडिंग्स ४५८)
( भौंह वर्णन )
भौंहैं धनुक जनु दुइ कर ताने । पंचबान गुन खींच सधाने ॥१
बान बिसार सान दइ सारइ । पारथ जेम अहेरै आवइ ॥२
अरजुन धनुक सरग में देखी । चाँद माँह गुन सोइ बिसेखी ॥३
सर तीखे जिन्ह मार फिरावइ । ठाँर परे सो येगि न जाघइ ॥४
चाँद माँह गुन ऐसें अहा । मूँड न डोल छु गाइ कहा ॥५
मन सिकार कैंद याजिर, धानुक भइ सो नारि ।६
मइझ मिरग भा राजा, मया मोह गमे बिसारि ॥७
टिप्पणी—(१) पंचबान—पंचशर, कामदेव।
(२) बिसार—विषाक्त। सान—शान। दइ—देकर। पारथ—शिकारी।
अहेरै—शिकार को।
७९
( रीडिंग्स ४५९ )
जितने वरमहाय पाढा गोयद
( नेत्र वर्णन )
नैन सरूप मेत महँ कारे । रिउन बिनु घरन होंहि रतनारे ॥१
अम्प फार जनु मोतिन्ह भरे । से दइ भाँह कैं तर धरे ॥२
महझिडोलहि जानु मषुपिया । भै निमि पवन झकारें दिया ॥३
असन समुंद मानिक भर गह्र । गइ याफ घर गाँठ न गह्र ॥४
नैन समुंद अति अरगाहा । बूड़हिं राह न पावहिं पाहा ॥५
आँभर नैन चाँद यस आप, दीगर दिन माह ।६
मरग जापि थद दैमे, गजा पूछहु काह ॥७
१२
८०
( रौवैन्द्स ४६ ब )
सिफते बीनीये चाँदा गोयद
( नासिका वर्णन )
मुँह मँह नाक अइस क सिंगारू । जनु अमरन ऊपर कें हारू ॥१
सुवा नाक ओ लोग सराहा । विहु जाइ अधिक से आहा ॥२
सहज ऊँच पिरिव में सब खानौँ । भाँ सच साकर फरहूँ पखानौँ ॥३
तिलुकफूल अस फूल सुहावा । पदुमिनि नाक माठ वस पावा ॥४
नाक सरूप अइस मैं कहा । बानु धरग सोन कर महा ॥५
बेनाँ परिमल फूल कस्तूरी, सर्ब बास रस लेइ ।६
खिन मुरखि राठ रूपचंद, अरध दरभ सब दइ ॥७
टिप्पणी—(१) अइस—इस प्रकार । क—का ।
(२) सुवा—शुक तोता ।
(४) तिलुक—एक प्रकारका पुष्प । फूल—नाककी फुल्ली नाकमें
पहननेका आभूषण । सम्भवतः साहित्यमें नाकके आभूषणका
यह प्राचीनतम उल्लेख है । मुसलमानी शासनके आरम्भसे
पूर्व नाकके किसी आभूषणकी चर्चा न तो किसी भारतीय
साहित्यमें है और न कलामें ही उसका अंकन पाया जाता है ।
पदुमिनी—पद्मिनी व्यतिरी रानी ।
(६) बेना—सूस करन । परिमल—कई सुगन्धियोंको मिलाकर बनाई
हुई बात विशेष ।
(७) अरथ—अर्थ । दरभ—द्रव्य धन ।
८१
( रौवैन्द्स ४६ ब )
सिफते लबहान चाँदा गोयद
( ओष्ठ वर्णन )
राधा ओ रत अधर निरासी । जनु मनुसैं कै रकत पिआसी ॥१
रुखौ दरेरैं दरेरैं सीखी । रकत पियइ मनुसैं गुन सीखी ॥२
१२१
सहज रात बनु सुरंग पटोरी । और रंगरावी पान सुपारी ॥३
हार डोरिह विह रग राता । तिह रग वाजिर फही सो बाता ॥४
आन निरासा कस लै जीवा । खाँड आन सिह ऊपर पीवा ॥५
अस कै अचरें सुन कै, राजा भा मन मोर ।६
रकत घार तिह तँह, रस घर मारा जोर ॥७
८२
( रीकैन्स ३०७ )
सिकते दन्दान चाँदा गोयद
( दन्त वर्णन )
चौक भये पानहि रंग राता । अतरहिं लाग रहे जनु घाँता ॥१
अधर पहिर जो हँसे कुँवारी । बिजरी लाँक रैन अँधियारी ॥२
मुख भीतर दीसै उनियारा । हीरा दसन करहिं चमकारा ॥३
सोन खाप जानु गड़ घरे । जानु सूरुज कर कोठिला भरे ॥४
दारिउ दाँत देखि रस आसा । मैंबर पंख लागे जिहिं पासा ॥५
समझा राठ रूपचन्द, सुनिफे वचन सुहाठ ।६
भोजन जेवैंत राजहि, लाग दाँत कर घाउ ॥७
टिप्पणी—(१) चौक—(स चतुष्क) आगेके चार दाँत । घाँता—घाँत ।
(४) सोन—सोना सुवर्ण । खाप—हम्मी गुफ्ती । कोठिला—कोठार,
अनाज रखनेका बड़ा पात्र या घर ।
(५) दारिउ—दाड़िम अनार ।
८३
( रीकैन्स ३०८ )
सिफते जुबाने चाँदा गोयद
( रसना वर्णन )
चाँद जीभ मुख अमरित पानी । पान फूल रस पिरम कहानी ॥१
पदुमनि वचन नीदि सुनि आवइ । दुख बरै सुख रैन बिहावइ ॥२
अमरित कुण्ड भयउ मुख नारी । सहज पात रस पहँ पौनारी ॥३
२. चन्दा का रूप-वर्णन व विरह-दशा (कड़वक १०१-२००)
१२६
बाल रँगने आदिके काममें आती है। काँपर—चौडा, किन्तु कम
गहरा कटोरेके आकारका पात्र, जो शुभ अवसरोंपर प्रयोग होता है।
कान्यकुब्ज जातिमें इसका प्रयोग विशेष रूपसे कन्यादानके समय किया
जाता है।
(६) सुहारी—जिसे सामान्यतः पूड़ी (पूरी) कहते हैं वह अवध और
भोजपुर में सोहारी कही जाती है। यहाँ उसी से तात्पर्य है। पर कहीं कहीं
आटे को बेल कर धूप में सुखाने के पश्चात् घी में तली हुई पूरी को
सोहारी कहते हैं।
(७) अथथाह—अगाध !
९०
(रीडींग्स ५१अ)
सिफते पुश्त बाँधा गोयद
( पीठ वर्णन )
पोरहिं पोर पीठ बैसारी। गढ़ी बनाई साँचे ढारी ॥१
कर धूर हीर पात क दोना। पीठ ठाँउ सहज दुइ मोना ॥२
लंक पार अस देइ न आवइ। बाँद धीर मँह मरम दिखावइ ॥३
परें लक घिसेहिं घनों। और टंक पाथर फर गुनों ॥४
फूँकहि टूट होई दुइ आधा। नैन देख मन उपजै साधा ॥५
मूरख होइ जो थर्र न आने, बाहै पथर्र पाठ ।६
कर गुन भये पीठ मा, कुइत फाड़ा राठ ॥७
९१
(रीडींग्स ५१ ब ; पंजाब [कर] )
सिफते रानहा व रफ्तार बाँधा गोयद
( जानु एवं चाल वर्णन )
कदलि कम्म' दाइँ चीर पहिराये। चाँद चलन अपुरुष पर' शये ॥१
औ समताल दीख असि धारा'। दरउ विमोहेँ सरँग पँतारा ॥२
दहि कम्भ मार मन तस लागा। सरभै धरउँ धान कँ नाँगा ॥३
१२७
चोवइँ चाँन देखि पाँ लागहिं । पाप केत परसहिं फर मागहिं ॥४
रूप पुतरि गइ दस नख लावा । तरुवहिं रकत भू सर फलि आवा ॥५
पायि परौं मुख जोऊँ, सो धनि उतर न देइ ।६
सुनत राठैं बिसँमरि गा, मर मर साँसें लेइ ॥७
पाठान्तर—कैथव प्रति—
इस प्रतिकी उपलब्ध फोटोम कुछ स्याहीसे खिली पङ्क्तियाँ अत्यन्त
अस्पष्ट हैं । फलतः श्रीयक और तीसरी पङ्क्तिका पाठ सम्भव न हो
सका । पृष्ठ भ्रष्ट होनेसे पङ्क्तियाँ ५-७ भी अप्राप्य हैं ।
१—रम्म । २—परताप । ३—गद । ४—औ सम्तोक हिय तर अस
धरा । ५—विमोर्दैहि । ६—जोहि । ७—लागी । ८—भागी (पूर्व
पद के अनुसार) । ९—तड़फन ।
९२
( रीकण्डस ५२५ )
सिफ़ते पाव व रफ़्तारे पाँवा
( पग और गति वर्णन )
हँस गँवन ठुम ठुमकत आवइ । चमक चमक धनि पाठ उषावइ ॥१
झनक झनक पाँ धरती धरा । घमक घमक जनु सुगति मरा ॥२
सेल मन्हान सों धाँदा आवइ । आनौ फीनरि भगु उघावइ ॥३
सर सुइ धरतँ चाँद धरि पाऊ । नान हुवै न फाइँउँ गाऊ ॥४
पागै धूर नैन भरि आँजौं । सीम फाड़ि दुइ तरुवा माँजौं ॥५
चलत चाँद चित लागा, मनहुत उतर न काउ ।६
पाँयहि झाय न पहुँचे, हँस हँस रोवइ राउ ॥७
टिप्पणी—(१) उषावइ—उगाती है ।
(३) पौ—पाव, पैर ।
(४) सुई—पृथ्वी । नानहुवै—दुबलेपन से ही ।
(५) धूर—धूलि । आँजौं—अञ्जन की तरह लगाऊँ । तरुवा—हात,
पैर का निचला भाग ।
२१४
१—कबीरैं । २—विह्यो । ३—महिं । ४—अरूपा के नीन्ह ।
५—अस मनुजहि आउ न काहू । ६—ठाव करी पख्व कियाहू ।
७—कहौं । ८—कैंठ ।
टिप्पणी—(१) गिर्व—ग्रीवा, कण्ठ । विझाई—सुघरता ।
(५) हिये—हृदय । सिराउ—ठण्डा हुआ ।
(७) पियासौं—विज्वंस करूँ । प्यासौं—से आऊँ ।
८७
(रौ०पृ०सं० ४१ क)
तियते दो हस्त चौंरा गोपद
(सुवा वर्णन)
सुनहु सुआ दण्ड कहि लै शावठँ । यहँ जग ओ तस कछु न पायठँ ॥१
फदरि रँभ देखउँ वस बाँहँ । जर पौनार बिसेखी माहँ ॥२
इगुर जस सलोनी भीसा । अरु कित पुरुष हथौरिहिं दीसा ॥३
कर भाटू सनु (धर) सारे । बेध सदिस बाअ सिंगारे ॥४
ओर सुआ पुरुष पोसाळ । एको नियर न जियते पाठ ॥५
नउ फल राउत कें, घरे फेर गइ सान ।६
बइ झर लाग अनारी, राजा देय परान ॥७
मूलपाठ—१—बराबर ।
टिप्पणी—(४) दोनों पदोंका पाठ असन्तोषपूर्ण है।
८८
(रौ०पृ०सं० ५ अ; पंजाब [क])
तियते स्तान चौंरा गोपद
(कुच वर्णन)
सान धार हीयें शुन घर । रतन पदारथ मानिक भर' ॥१
सहज मियारा सेंदुर भर । घनहर पर कँदीर पर ॥२
नारंग घनहर उगहिं अपोला । पग न डगी पवन न डोला ॥३
१२५
समुँद भरा जनु लहरैं दिये । पुरइन क रस जस भँवरैं लिये ॥४
मँघेरित हिरदैतें बेल उपाने । साज कछोरा⁴ हिरदेउँ ताने ॥५
कुसुम धीर तर देखेउ, फरे बेल इह भाँति ॥६
राजा खाइ बिसर गै, सुन अस्यन मह सांत ॥७
पाठान्तर—पंजाब प्रति—
इस प्रतिके उपलब्ध फोटोमें लाल स्याहीसे लिखी पंक्तियाँ नहीं
उभरीं जिसके कारण शीर्षक तथा पंक्ति १, ६ और ७ का पाठ ज्ञात
न हो सका । साथ ही पृष्ठ फटा होने के कारण पंक्ति ५ का उत्तर पद
भी उपलब्ध नहीं है ।
इस प्रति में पंक्ति ४ और ५ परस्पर स्थानान्तरित हैं ।
१—जरै । २—भरा । ३—गरे । ४—कचोरी ।
टिप्पणी—(२) सिंघोरा—सिन्दूर रखने का पात्र । अनहर—ज्ञान ।
(४) पुरइन—( सं पुटकिनी ) कमल ।
(५) कचोरा—कटोरा ।
(६) तर—नीचे । फरे—फले ।
८९
( रीजेंट्स ५ ब )
सिस्ते सिस्ते जाँव गोयद
( पेट वर्णन )
पेट कहौं सुन बउधक राजा । ऐपन सान काँपर साजा ॥१
पूरन खाँड सपूरत बोरे । जहवाँ दीसहिं सहसों गोरे ॥२
नानु सुहारी घिरत पकाये । देखत पान फूल पथराये ॥३
नाभी कुण्ड ओ हरखी परा । देखतहिं भूख न पावइ तीरो ॥४
जाँनों अन्त पेट महँ नाही । अँतर क चाँद दीस परछाँहीं ॥५
अति अवगाह बोल अस गाजिर, तामेहि पसि न तीर ।६
सुनके राउ दीर धस तिये, थूह न पावइ तीर ॥७
टिप्पणी—(१) बउधक—मूर अज्ञान । ऐपन—भिगोए हुए चावलमे हल्दी
मिलाकर पीसा हुआ योग, जिसे शुभ अवसरोंपर स्त्रियाँ चोक पूरन,
धाऊ रँगने आदिके काममं आती है। कौपर—चौड़ा, किन्तु कम
गहरा कटोरेके आकारका पात्र, जो शुभ अवसरोंपर प्रयोग होता है।
अग्रबाल जातिमें इसका प्रयोग विशेष रूपसे कन्यादानके समय किया
जाता है।
(३) सुहारी—जिसे सामान्यतः पूड़ी (पूरी) कहते हैं वह अवध और
भोजपुर में सोहारी कही जाती है। यहाँ उसी से तात्पर्य है। पर कहीं कहीं
आटे को बेल कर धूप में सुखाने के पश्चात् घी में तली हुई पूरी को
सोहारी कहते हैं।
(७) अअथाह—अगाध।
९०
(सीरियम ५१भ)
खिरतै पुहुप चौंदा गाबद
(पीठ वर्नन)
धारहिं धाउ पीठ बैसारी। गढ़ी बनाइ साँचे डारी ॥१
कर चूर हीर पात क दोषा। पीठ ठाँउ सहज दुइ मोषा ॥२
तक पार जस देह न आयइ। चाँदु चीर मँह मरम दिखायइ ॥३
परै लंक सिगेरै घनों। और तक पातर कर गुनों ॥४
फूँकहि टूट हाइ दुइ आधा। नैन देख मन उपजै साधा ॥५
मूरग हाइ जो तरै न साने, धाई परैर पाठ ।६
कर गुन भय पीठ भा, दूसस फाड़ा राउ ॥७
९१
(सीरियम ५१ ब; पंजाब [८१])
खिरतै गनदा ब छनार बाँदा गबद
(आपु र्ब चाक बर्नन)
फदरी कम्म दाइ चीर पहिराय। चाँद मलन अपुरुप पर' लाये ॥१
आ गगनान दीग अगि पाग। दए त्रिषाइ मेरंग पैंताग ॥२
दगे फम्म मार मन सम लागा। मरभँ घरउँ गान कें नाँगा ॥३
१२७
चौरहँ' जौन देखि पाँ लागहिँ । पाप केत परसहिँ कर भागहिँ ॥४
रूप पुतरि गइ दस नख लावा । तरुवहिं रकत भू सर बलि भावा ॥५
पायि परौं मुख जोरूँ, सो धनि उतर न देइ ।६
सुनत राठैं बिसँमरि गा, मर मर साँसें लेइ ॥७
पाठान्तर—पंजाब प्रति—
इस प्रतिरी उपलब्ध पोथमे लाल स्याहीते लिखी पंक्तियाँ अत्यन्त
अस्पष्ट हैं। फलतः शीर्षक और तीसरी पक्तिका पाठ सम्भव न हो
सका। पृष्ठ फट जानेसे पंक्तियाँ ५-७ भी अप्राप्य हैं।
१—रस्म । २—फड़ाये । ३—गढ । ४—भौ छभतोलु हिय तर अस
धरा । ५—बिमोहहिं । ६—जाहि । ७—लागी । ८—भागी (पूर्व
पद के अनुसार) । ९—तष्चन ।
९२
( रीसँकडस ५१भ )
सिफते पाय व रफ्तारे चाँदा
( पग और गति वर्णन )
हँस गँवन ठुमठुमकत आवइ । चमक चमक धनि पाउ उघावइ ॥१
झनक झकरू पाँ धरती धरा । घमक घमक अनु सुगवि भरा ॥२
सेल मन्हान सों चाँदा आवइ । बानों छीनरि बेगु उघावइ ॥३
सर सुईं धरउँ चाँद धरि पाऊ । नान हुइँ न फादेउँ गाऊ ॥४
पागेँ धूर नैन भरि अँजीं । जीभ काढि दुइ तरुवा माँजौं ॥५
चलत चाँद चित लागा, मनहुत उतर न फाउ ।६
पाँयहि हाथ न पहुँचे, हँस हँस रोवइ राउ ॥७
टिप्पणी—(१) उघावइ—उठाती है।
(२) पौ—पाव पैर।
(४) सुईं—पृथ्वी। नानहुइँ—क्षुद्रपन म हीं।
(५) धूर—धूलि। आँजीं—अञ्जन की तरह लगाऊँ। तरुवा—तालू,
पैर का निचला भाग।
२१८
९३
( रोकेण्ड्स ५२८ )
सिफत ससोकामदे बाँदा गोयन्द
( शृंगार वर्णन )
लुगु बैस इइ अहि बुठकारी । चन्दन जैफर मिरैं मैंबारी ॥१
सरग पवान लाग मनु आयी । घाइस भैंसीं जाइ उड़ायी ॥२
बाँसपोर हुत मनु घर फोँड़ी । अछरि वइस दस्ति मैं ठाढ़ी ॥३
फोइ पुडुप अस अंग गँधाई । रितु बसन्त चहुँ दिसि फिर आई ॥४
अंग बास नौखण्ड गँधाने । बास केतकी मैंबर लुभाने ॥५
उपेन्दर गोयन्द चैंदरावळ, भरमौं बिसुन मुरारि ।६
गुन गँधरब रिखि देवता, रूप विमोहे नारि ॥७
टिप्पणी—(१) बुठकारी—मूर्तिकारी । जैफर—जायफल । मिरै—मिलाकर ।
(४) फोइ—कुमुदनी ।
(६) गोयन्द—( फारसी ) कहते हैं ।
(७) यह पद ३४ कड़बकमें भी है ।
९४
( रोकेण्ड्स ५३७, पंजाब [७] )
सिफते किरफत बाँदा गोयन्द
( वस्त्र वर्णन )
सुनहु चीर कस पहिर हझौरी । कुँदिया राम सेंदुरिया सारी ॥१
पहिर मघवना औ' कशियारा । चकना चीर चौकरिया सारा ॥२
मुँगिया पटरु अंग चढ़ाई । मबिला छुदरी मर पहिरायी ॥३
मानों चाँद हसँमी रातीं । एकखेंऽछाप (सोइ) गुजरातीं ॥४
दरिया चैंदरीटा जो मुक्राह' । साथ पटोरैं बहुत सिंगारू ॥५
थोला चीर पहिर ओ चासी, मानों जाइ उड़ाइ ।६
देखत रूप विमोहे देवता, फिरहुत अहर[१*] आइ ॥७
१२९
मूलपाठ—(४) सो सोइ ।
पाठांतर—पंजाब प्रति—
इस प्रतिफ़ उपलब्धमे फोटोमें लाल स्याहीसे लिखी पंक्तियों अत्यन्त
अस्पष्ट हैं । जिससे शीर्षक, और पंक्ति १, ६ और ७ का पाठ प्राप्त करना
सम्भव नहीं है ।
१—मुर्कीना २—अरु ३—चकिया ४—जोगवई ५—मदिर ६—सष्ट
७—पाता ८—गुजराता ९—चंदोवा १०—आवा बब्वल ।
टिप्पणी—( १ ) कुंदिवा—इसका उल्लेख पदमावत ( ३२१।२ ) में भी है । यहाँ
वासुदेव शरण अग्रवालने उसका फूँदने लगा हुआ नीवीबन्ध होनेकी
सम्भावना प्रकट की है । किन्तु प्रस्तुत प्रसंगमें यह अनुमान संगत नहीं
है । हमारी समझम यह किसी प्रकारका अंगिया या चोली है । अथवा
यह पद्मनाभ कृत कान्हडदे प्रबन्धमें उल्लिखित फूँदड़ी ( ३।१५३ )
है । फूँदड़ी किसी प्रकारका मूल्यवान वस्त्र या किस्म होने और रत्नोंका
प्रयोग होता था ( कनक मुकामल फूँन्दड़ी ए बिचि रत्न बहन्त ) ।
मॅहूरिया—सिंदूरी रंगकी । सारी—साड़ी ।
( २ ) मघवर्णा—पदमावतमें मघीनारा ( १६९।४ ) और पृथ्वीचन्द्र
चरितम मेघनादा उल्लेख है ( प्राचीन गुर्जर काव्य संग्रह
बड़ोदा १९ पृ १२ ) । सम्भवतः यह वही वस्त्र है जिसे
ज्योतिरीश्वर ठाकुरने अपने वर्णरत्नाकरमें मेघपत्र और मेघडम्बर नामसे
पट्टवस्त्र जातिका उल्लेख किया है । चौदहवीं शतीक विविधकल्पक्रम
भी मेघडम्बर, मेघाडम्बर और मेघावली नामक वस्त्रोंका उल्लेख है
( वणिक समुच्चय सम्पादक श्री जै० संडसरा पृ १४-१५)। मेघडम्बर
साटियोंका उल्लेख प्राचीन बगला साहित्यमें भी प्राय मिलता है ।
इन सबसे अनुमान होता है कि यह आसमानी ( बादली ) रंगका कोई
रेशमी वस्त्र रहा होगा । कधियारा—इस पाठके सम्बन्धमें कुछ निश्चित
नहीं कहा जा सकता । इसे कथारा या गथारउ भी पढ़ा सकता है ।
पर इन नामोंके किसी वस्त्रकी जानकारी कहीं प्राप्त नहीं है ।
चकया—पद्मावतमें भी इसका उल्लेख है (११.३४) । (यहाँ रमऊ
गगार्दजीने उसे चिकवा चुना है । यह पाठ सम्भव है पर हमने उस
पाठ भूलकर ग्रहण नहीं किया है ।) रामचन्द्र शुक्लने इस चौकट
नामक रेशमी वस्त्र बताया है। वर्णरत्नाकर अनुसार विवाहमें
नेगके रूपमें निम्न जातियोंको चमडा चौकट करते थे । चकयाका
उल्लेख यहाँ विवाहके अवसरपर दिये जाने वाले वस्त्रके प्रसंगमें नहीं है।
अतः उस चौकटसे इस वस्त्रकी सही पहचान न सकता । यह
वस्त्र किसी विशिष्ट रूपमें बनाया होगा। शुक्लजीने उसे गहरा