चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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( अप्राप्य )
[ सम्भवतः यहाँ शेष नौ महीनों का वर्णन नौ कड़बकों में रहा होगा । ]
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( बम्बई २१ )
आमदने बाज़िर दर गोचर व शुनिदन बजारे कस पौंद व
दीदन व आशिक शुदन व उफ़्तादन
( गोचर में बाज़िर का आना और चाँद के महुक के नीचे से जाना
और उसे देख कर मोहित होकर मूर्च्छित होना )
बाज़िर एक फिर्तेंहुत आवा । गोचर फिरै बिहाऊ गावा ॥१
घर घर सुगुति माँग लै खाई । खिन खिन राजदुआरिहिँ जाइ ॥२
दिन एक चाँद मौरहर ठाढ़ी । झाँकसि माँध झरोखा फाड़ी ॥३
तिह खन बाज़िर मूँड़ उघावा । देखसि चाँद झरोखें आवा ॥४
देखतहिँ जनु नौहारहिँ लीन्हा । बिदका चाँद झरोखा दीन्हा ॥५
धरहुत जीउ न आनै फिरगा, काया भई बिनु साँस ।६
नैन नीर दइ मुँह छिरकहिँ, आय लोग तिहिँ पास ॥७
टिप्पणी—(१) बाज़िर—वज्रपानी योगी । बिहाऊ—बिहाग ।
(२) सुगुति—मुक्ति भोजन ।
(३) माँध—हर । झरोखा—(स चक गवाक्ष) महल का वह स्थान या
गोपुर जहाँ बैठ कर राजा प्रजा को दर्शन देते या महल से बाहर
देखते थे; खिड़की । फाड़ी—निगाह कर ।
(४) मूँड़—सर । उघावा—ऊँचा किया ऊपर उठाया ।
(५) नौहारहिँ—डर कर जी उठने को नौहार लेना कहते हैं । बिदका—
बन्द कर दिया ।
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( रीईंग्स ३७ )
परसीदने ख़ल्क बाज़िर रा अज हाले बेहोशी
( बाज़िर की मूर्च्छा सुन कर जनता का आना )
कहु बाज़िर तोर बेदन काहा । लोग महाजन पूछत आहा ॥१
पीर कहसि तू मँह पिनानी । औखद मूर देहुँ तिहिँ आनी ॥२