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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

बुद्धचरित
प्रथम सर्ग
भगवान् का जन्म
[ऐक्ष्वाक इक्ष्वाकुसमप्रभावः शाक्येष्वशक्येषु विशुद्धवृत्तः ।
प्रियः शरच्चन्द्र इव प्रजानां नाम बभूव राजा] ॥1.1¹
इक्ष्वाकु-वंश में शुद्धोदन नामक राजा हुआ। वह अजेय शाक्यों का अधिपति था। इक्ष्वाकु के समान
प्रभावशाली था। उसका आचरण पवित्र था। अपनी प्रजा के लिए वह शरच्चन्द्र के समान प्रिय था ॥1॥
[तस्येन्द्रकल्पस्य बभूव पत्नी] दीप्त्या नरेन्द्रस्य समप्रभावा ।
[पद्मेव लक्ष्मीः पृथिवीव धीरा मायेति नाम्नानुपमेव माया] ॥1.2
उस इन्द्र-तुल्य राजा के शची-सदृश रानी थी, जिसकी दीप्ति राजा की शक्ति के समान थी। वह पद्मा के
समान सुन्दरी और पृथ्वी के सदृश धीर थी। अनुपम माया के समान होने के कारण उसका नाम
महामाया हुआ ॥2॥
सार्धं तयाऽसौ विजहार राजा नाचिन्तयद्वैश्रवणस्य लक्ष्मीम् ।
[ततश्च विद्येव समाधियुक्ता गर्भं दधे पापविवर्जिता सा] ॥1.3²
अपनी रानी के साथ विहार करते हुए उस नरपति ने मानो वैश्रवण (कुबेर) के परम ऐश्वर्य का उपभोग
किया। तब वह निष्पाप (रानी) गर्भवती हुई, जैसे समाधि-युक्त विद्या फलवती होती है ॥3॥
प्राग्गर्भधानान्मनुजेन्द्रपत्नी सितं ददर्श द्विपराजमेकं ।
स्वमे विशन्तं वपुरात्मनः सा [न तन्निमित्तं समवाप तापं] ॥1.4
गर्भधारण करने से पूर्व उसने स्वप्न में एक श्वेत गज-राज को अपने शरीर में प्रवेश करते देखा; किन्तु
इससे उसे कुछ कष्ट नही हुआ ॥4॥
[सा तस्य देवप्रतिमस्य देवी गर्भेण वंशश्रियमुद्वहन्ती] ।
श्रमं न लभे न शुचं न मायां गन्तुं वनं सा निभृतं चकाङ्क्ष ॥1.5
उस देव-तुल्य राजा की रानी माया ने अपने गर्भ में अपने वंश की श्री को धारण किया। श्रम, शोक और
माया से मुक्त होकर और विशुद्ध होकर, उसने पावन वन (जाने) की इच्छा की ॥5॥
1- प्रथम सात श्लोक अप्राप्त हैं। इन श्लोकों के जो अंश [ ] कोष्ठ के अन्तर्गत हैं वे जॉन्स्टन-कृत मूलोद्धार हैं
और शेष की रचना अनुवाद के आधार पर हमने की है। 1 'ग' के अन्त में जॉन्स्टन के 'प्रजाम्यः' के स्थान में
हमने 'प्रजानां' कर दिया है।
2- क-या 'प्रियासहायो विजहार राजा'
क-ख या 'सार्धं तयाऽसौ नृपतिश्च रेमे भेजे यथा वैश्रवणस्य लक्ष्मी।'
4 अश्वघोष
[सा लुम्बिनीं नाम वनान्तभूमिं चित्रद्रुमां चैत्ररथाभिरामां] ।
ध्यानानुकूलां विजनामियेव तस्यां निवासाय नृपं बभाषे ॥1.6
ध्यान के योग्य एकान्त वन की इच्छा से, उसने विविध वृक्षों से युक्त चैत्ररथ उपवन के समान सुन्दर
लुम्बिनी वन में चलकर रहने के लिए राजा से कहा ॥6॥
[आर्याशयां तां] प्रवणं च धर्मे [विज्ञाय कौतूहलहर्षपूर्णः ।
शिवात् पुरात् भूमिपतिर्जगाम तत्प्रीतये नापि विहारहेतोः] ॥1.7³
भूपति ने कुतूहल और आनन्द के साथ उसकी धार्मिकता से उसका उत्तम आशय जानकर, उसे प्रसन्न
करने के लिए, न कि विहार करने के लिए, उस सुन्दर नगर को छोड़ा ॥7॥
तस्मिन्वने श्रीमत्ति राजपत्नी प्रसूतिकालं समवेक्षमाणा ।
शय्यां वितानोपहितां प्रपेदे नारीसहस्रैरभिनन्द्यमाना ॥1.8
उस सुन्दर वन में प्रसव-काल समीप देखकर रानी ने वितान-युक्त शय्या का आश्रय लिया। उस समय
हजारों स्त्रियों ने उसका अभिनन्दन किया ॥8॥
ततः प्रसन्नश्च बभूव पुष्यस्तस्याश्च देव्या व्रतसंस्कृतायाः ।
पार्श्वात्सुतो लोकहिताय जज्ञे निर्वेदनं चैव निरामयं च ॥1.9
तब पुष्य नक्षत्र प्रसन्न हुआ और व्रत से पवित्र हुई रानी के पार्श्व से लोक-हित के लिए पुत्र उत्पन्न हुआ;
रानी को न पीडा हुई और न रोग ॥9॥
ऊरोर्यथौर्वस्य पृथोश्च हस्तान्मान्धातुरिन्द्रप्रतिमस्य मूर्ध्नः ।
कक्षीवतश्चैव भुजांसदेशात्तथाविधं तस्य बभूव जन्म ॥1.10
जैसे और्व का जन्म जाँघ से, पृथु का हाथ से, इन्द्र-तुल्य मान्धाता का मस्तक से, कक्षीवान् का काँख से,
वैसे ही उसका जन्म (पार्श्व से) हुआ ॥10॥
क्रमेण गर्भादभिनिःसृतः सन् बभौ च्युतः खादिव योन्यजातः ।
कल्पेष्वनेकेषु च भावितात्मा यः सम्प्रजानन्सुषुवे न मूढः ॥1.11
काल-क्रम से गर्भ से निकलने पर, वह आकाश से गिरे के समान शोभित हुआ; (क्योंकि) वह जन्म मार्ग
से उत्पन्न नही हुआ था। अनेक कल्पों में उसने अपने को पवित्र कर लिया था; अतः वह जागरूक होकर
(स्मृति-संप्रजन्य के साथ) जन्मा, मूढ़ (मूर्ख, बेसुध) होकर नही ॥11॥
दीप्त्या च धैर्येण च यो रराज बालो रविर्भूममिवावतीर्णः ।
तथातिदीप्तोऽपि निरीक्ष्यमाणो जहार चक्षूंषि यथा शशाङ्कः ॥1.12
3- ग-पा० 'भूमिपतिः प्रतस्थे' ।

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ पंक्ति-वार (line-by-line) प्रस्तुत है:

दीप्ति और धीरता में वह भूतलपर अवतीर्ण बाल-सूर्य के समान शोभित हुआ। उस प्रकार अत्यन्त दीप्तिमान्
होनेपर भी, देखे जानेपर, वह चन्द्रमा के समान आँखें हर लेता था ॥12॥
स हि स्वगात्रप्रभयोज्वलन्त्या दीपप्रभां भास्करवन्मुमोष ।
महार्हजाम्बूनदचारुवर्णो विद्योतयामास दिशश्च सर्वाः ॥१.१३
अपने शरीर की जलती प्रभा से उसने भास्कर के समान दीप्त प्रभा को हर लिया। बहुमूल्य-सुवर्ण-सदृश
सुन्दर वर्णवाले (बालक) ने सब दिशाओं को प्रकाशित किया ॥13॥
अनाकुलान्युब्जसमुद्गतानि निष्पेषवद्द्यायतविक्रमाणि ।
तथैव धीराणि पदानि सप्त सप्तर्षितारासदृशो जगाम ॥१.१४
सप्तर्षि-तारा के समान वह सात पग चला, उसने ये लम्बे और अविचल पग धैर्यपूर्वक सीधे उठाकर दृढ़ता
के साथ रखे ॥14॥
बोधाय जातोऽस्मि जगद्धितार्थमन्त्या भवोत्पत्तिरियं ममेति ।
चतुर्दिशं सिंहगतिर्विलोक्य वाणीं च भव्यार्थकरीमुवाच ॥१.१५
और उस सिंह-गति ने चारों ओर देखकर भविष्यवाणी की— "जगत् के हित के लिए ज्ञान अर्जन करने के
लिए मैं जन्मा हूँ, संसार में यह मेरी अन्तिम उत्पत्ति है" ॥15॥
खात्समुस्रुते चन्द्रमरीचिशुभ्रे द्वे वारिधारे शिशिरोष्णवीर्ये ।
शरीरसंस्पर्शसुखान्तराय निपेततुर्मूर्धनि तस्य सौम्ये ॥१.१६
चन्द्र-किरण-सदृश दो जल-धाराएँ, एक शीतल और दूसरी गर्म आकाश से स्रवित हुईं और शरीर स्पर्श कर
सुख देने के लिए उसके सौम्य मस्तक पर गिरीं ॥16॥
श्रीमद्विताने कनकोज्जवलाङ्गे वैडूर्यपादे शयने शयानम् ।
यद्गौरवात्काञ्चनपद्महस्ता यक्षाधिपाः संपरिवार्य तस्थुः ॥१.१७
सुन्दर वितान से युक्त, सुवर्ण से उज्जवल, वैडूर्य मणि के पादवाले शयनपर वह पड़ा हुआ था। उसके
गौरव के कारण यक्षपति-गण अपने हाथों में सुवर्ण कमल लिए हुए उसे चारों ओर घेरकर खड़े
हुए ॥17॥
(अदृश्यरूपाश्च) दिवौकसः खे यस्य प्रभावात्प्रणतैः शिरोभिः ।
आधारयन् पाण्डरमातपत्रं बोधाय जेपुः परमाशिषश्च ॥१.१८
अदृश्य देवताओं ने उसके प्रभाव से शिर झुकाकर आकाश में श्वेत आतपत्र धारण किया और उसकी
बुद्धत्व-प्राप्ति के लिए उत्तम आशीर्वाद दिये ॥18॥
महोरगा धर्मविशेषतर्षार्दुद्वेष्वतीतैषु कृताधिकाराः ।
यमव्यजन् भक्तिविशिष्टनेत्रा मन्दारपुष्पैः समवाकिरंश्च ॥१.१९
जिन्होंने अतीत के बुद्धों की सेवा की थी, उन बड़े-बड़े सर्पों ने धर्मविशेष की प्यास से उसके ऊपर व्यजन
डुलाये और भक्ति के कारण अपनी विलक्षण आँखों से (देखते हुए) मन्दार फूल बरसाये ॥19॥
तथागतोत्पादगुणेन तुष्टाः शुद्धाधिवासाश्च विशुद्धसत्त्वाः ।
देवा ननन्दुर्गितगेऽपि रागे मग्नस्य दुःखै जगतो हिताय ॥१.२०
तथागत के जन्म से सन्तुष्ट होकर, विशुद्ध स्वभाववाले शुद्धाधिवास देव, स्वयं राग-रहित होनेपर भी,
दुःखमय जगत् का (भावी) हित सोचकर, प्रसन्न हुए ॥20॥
यस्य प्रसूतौ गिरिराजकीला वाताहता नौरिव भूश्चचाल ।
सचन्दना चोत्पलपद्मगर्भा पपात वृष्टिर्गगनादनभ्रात् ॥१.२१
उसके जन्म में यह पृथ्वी, जो गिरिराज-रूप कील से स्थिर है, वायु से आहत नाव की भाँति काँपी। मेघ-
रहित आकाश से चन्दन-सुवासित वृष्टि हुई, जिसमे लाल नीले कमल गिरे ॥21॥
वाता ववुः स्पर्शसुखा मनोज्ञा दिव्यानि वासांस्यवपातयन्तः ।
सूर्यः स एवार्थ्यधिकं चकाशे जज्वल सौम्यार्चिरनीरतोऽग्निः ॥१.२२
स्पर्श से सुख देनेवाली मनोहर वायु दिव्य वस्त्रों की वृष्टि करती हुई बहने लगी। वही सूर्य अत्यधिक
चमका। बिना सुलगाये ही आग सौम्य शिखाओं के साथ प्रज्वलित हुई ॥22॥
प्रागुत्तरे चावसथप्रदेशे कूपः स्वयं प्रादुरभूत्सिताम्बुः ।
अन्तः पुराण्यागतविस्मयानि यस्मिन् क्रियास्तीर्थ इव प्रचक्रुः ॥१.२३
आवास-भूमि की उत्तर-पूर्व दिशा में स्वच्छ जल के कूप का आप ही आप प्रादुर्भाव हुआ, जहाँ विस्मित
अन्तःपुर-वासियों ने उसी प्रकार क्रियाएँ कीं, जिस प्रकार तीर्थ में ॥23॥
धर्मार्थिभिर्भूतगणैश्च दिव्यैस्तद्दर्शनार्थं वनमापुपूरे ।
कौतूहलेनैव च पादपेभ्यः पुष्पाण्यकालेऽ(प्यवपातयद्भिः) ॥१.२४
उसके दर्शन के लिए धर्माभिलाषी दिव्य प्राणियों से वह वन भर गया। कुतूहल-वश उन्होंने पेड़ों से
अकाल में भी (फूले) फूल गिराये ॥24॥
भूतैरसौम्यैः (परित्यक्तहिंसे-) र्नाकारि पीडा स्वगणे परे वा ।
लोके हि सर्वाश्च विना प्रयासं रुजो नराणां शमयां बभूवुः ॥1.25⁴
उस समय विघ्नकारी प्राणी एकत्र हुए और उन्होंने एक दूसरे को क्लेश नही दिया। मानव-जाति
के जो कुछ रोग थे सब अनायस ही दूर हो गये ॥25॥
कलं प्रणेदुः मृगपक्षिणश्च शान्ताम्बुवाहाः सरितो बभूवुः ।
दिशः प्रसेदुविमले निरभ्रे विहायसे दुन्दुभयो निनेदुः ॥1.26
मृग और पक्षी ऊँचे स्वर से बोले नहीं और नदियाँ नीरव जल के साथ बहीं। दिशाएँ स्वच्छ
हो गई और आकाश निरभ्र होकर चमका। गगन में देव दुन्दुभियाँ बजीं ॥26॥
4- मूल के अप्राप्त श्लोक 25-40 ग तक की पद्य-बद्ध रचना अनुवाद के आधार पर हमने की है।
बुद्धचरित 5

लोकस्य मोक्षाय गुरौ प्रसूते शमं प्रपेदे जगद्व्यवस्थं।
प्राप्येव नाथं खलु नीतिमन्तं एको न मारो मुदमाप लोके ॥1.27
जगत् के मोक्ष के लिए गुरु का जन्म होनेपर संसार अत्यन्त शान्त हो गया, जैसे कुव्यवस्था
के बीच इसे शासक मिल गया हो। केवल कामदेव को आनन्द नही हुआ ॥27॥
दिव्याद्भुतं जन्म निरीक्ष्य तस्य धीरोऽपि राजा बहुक्षोभमेतः।
स्नेहादसौ भीतिप्रमोदजन्ये द्वे वारिधारे मुमुचे नरेन्द्रः ॥1.28
अपने पुत्र का अद्भुत जन्म देखकर राजा धीर होनेपर भी बहुत क्षुब्ध हुआ और स्नेह के कारण
आनन्द तथा भय से उत्पन्न हुई दो अश्रु-धाराएँ (उसकी आँखों से) बहीं ॥28॥
अमानुषीं तस्य निशम्य शक्तिं माता प्रकृत्या (करुणार्द्रचित्ता)।
प्रीता च भीता च बभूव देवी शीतोष्णमिश्रेव जलस्य धारा ॥1.29$^5$
उष्ण और शीतल जल के मिश्रण से बनी धारा के समान रानी आनन्द और भय से भर गई;
क्योंकि एक ओर उसके पुत्र की शक्ति (प्रभाव) अमानुषी थी और दूसरी ओर उसमें माता की
स्वाभाविक दुर्बलता थी ॥29॥
निरीक्षमाणा भयहेतुमेव ध्यातुं न शोकुः वनिताः प्रवृद्धाः।
पूताश्च ता मङ्गलकर्म चक्रुः शिवं ययाचुः शिशवे सुरौघान् ॥1.30
केवल भय के ही कारणों को देखती हुई विशुद्ध बूढ़ी स्त्रियाँ ध्यान नहीं कर सकीं। अपने को
पवित्र कर तथा भाग्यनिर्माण की क्रियाएँ कर, उन्होंने देवताओं से सौभाग्य के लिए प्रार्थना
की ॥30॥
विपाश्च ख्याताः श्रुतशीलवाग्भिः श्रुत्वा निमित्तानि विचार्य सम्यक्।
मुखैः प्रफुल्लैश्चकितैश्च दीप्तैः भीतप्रसन्नं नृपमेत्य प्रोचुः ॥1.31$^6$
आचरण विद्या और वाग्मिता के लिए प्रसिद्ध ब्राह्मणों ने जब ये लक्षण सुने और उनपर विचार
किया, तब उज्ज्वल, साश्चर्य और प्रसन्न मुखों से उन्होंने राजा से, जो भीत भी था और प्रसन्न
भी, कहा:- ॥31॥
शमेप्सवो ये भुवि सन्ति सत्त्वाः पुत्रं विनेच्छन्ति गुणं न कश्चित्।
त्वत्पुत्र एषोऽस्ति कुलप्रदीपः नृत्योत्सवं त्वद्य विधेहि राजन् ॥1.32$^7$
“भूतलपर मनुष्य अपनी शान्ति के लिए पुत्र को छोड़कर कोई दूसरा गुण नहीं चाहते हैं।
आपका यह प्रदीप आपके वंश का प्रदीप है, अतः आज आनन्द और उत्सव कीजिए ॥32॥
विहाय चिन्तां भव शान्तचित्तो मोदस्व वंशस्तव वृद्धिभागी।
लोकस्य नेता तव पुत्रभूतः दुःखार्दितानां भुवि एष त्राता ॥1.33$^8$
इसलिए पूरे धैर्य के साथ चिन्ता तजिए और प्रसन्न होइये; आपका वंश निश्चय ही उन्नत होगा।
जो आपका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ है, वह दुःख में डूबे जगत् का उद्धार करेगा ॥33॥
दीपप्रभोऽयं कनकोज्ज्वलाङ्गः सुलक्षणैर्यैस्तु समन्वितोऽस्ति।
निधिर्गुणानां समये स गंता बुद्धर्षिभावं परमां श्रियं वा ॥1.34$^9$
सुवर्ण के समान उज्ज्वल और प्रदीप के समान चमकीले इस गुणवान् के लक्षणों के अनुसार,
वह निश्चय ही बुद्धर्षि होगा या पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच चक्रवर्ती सम्राट् ॥34॥
इच्छेद्द्रसौ वै पृथिवीश्रियं चेत् न्यायेन जित्वा पृथिवीं समग्रां।
भूपेषु राजेत यथा प्रकाशः ग्रहेषु सर्वेषु रवेर्विभाति ॥1.35
यदि वह पार्थिव साम्राज्य की इच्छा करे, तो अपने प्रभाव और धर्म के द्वारा पृथ्वी पर सब
राजाओं के ऊपर वह उसी प्रकार स्थित होगा, जिस प्रकार सब ग्रहों के ऊपर सूर्य का
प्रकाश ॥35॥
मोक्षाय चेद्वा वनमेव गच्छेत् तत्त्वेन सम्यक् स विजित्य सर्वान्।
मतान् पृथिव्यां बहुमानमेतः राजेत शैलेषु यथा सुमेरुः ॥1.36$^{10}$
यदि वह मोक्ष की इच्छा करे और वन को जाय, तो अपने ज्ञान और सत्य के द्वारा सब
सम्प्रदायों को जीतकर वह पृथ्वी पर उसी प्रकार स्थित होगा, जिस प्रकार पर्वतों के मध्य गिरी-
राज मेरु ॥36॥
यथा हिरण्यं शुचि धातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः।
तारासु चन्द्रस्तपतां च सूर्यः पुत्रस्तथा ते द्विपदेषु वर्यः ॥1.37$^{11}$
जैसे धातुओं में विशुद्ध सुवर्ण, पर्वतों में मेरु, जलाशयों में सागर, ग्रहों में चन्द्र और अग्नियों में
सूर्य श्रेष्ठ है, वैसे ही मनुष्यों में आपका पुत्र ॥37॥
तस्याक्षिणी निर्निमिषे विशाले स्निग्धे च दीप्ते विमले तथैव।
निष्कम्पकृष्णायतशुद्धपक्ष्मे द्रष्टुं समर्थे खलु सर्वभावान् ॥1.38$^{12}$


$^5$- क-वा 'दृष्ट्वा विशालं तनय-प्रभावं'
ग-वा 'प्रीत्या च भीत्या च बभूव युक्ता'
$^6$- ख-वा 'श्रुत्वा निमित्तानि विचिन्त्य तानि'
$^7$- ख-पा० 'किञ्चत्' के स्थान में 'तेऽन्यं'।
$^8$- ख-पा० 'वृद्धिगामी'।
$^9$- क-पा० 'दीपप्रदीपः' ख-पा० 'विभूषितोऽस्ति'।
$^{10}$- घ-पा० 'यथा हिमाद्रिः'।
$^{11}$- ग-या 'तारासु चन्द्रो दहतां च भानुः'।

6 अश्वघोष

उसकी आँखें निर्निमेष होकर देखती हैं, वे निर्मल और विशाल हैं चमकीली और स्निग्ध भी,
स्थिर और खूब लम्बी काली पपनियोंवाली। उसकी आँखें सब कुछ देख सकती हैं” ॥३४ ॥
कस्मान्तु हेतोः कथितान्भवद्भिः वरानुगुणान् धारयते कुमारः ।
प्रापुर्न पूर्वे मुनयो नृपाश्च राज्ञेति पृष्टा जगदुस् द्विजास्तं ॥1.39
तब राजा ने द्विजों से कहा:- “क्या कारण है उत्कृष्ट गुण, जैसा आप कहते हैं, उसमें देखे
जाते हैं, जब कि ये पहले के महात्मा राजाओं में नहीं देखे गये?” तब ब्राह्मणों ने उन्हें
कहा:- ॥39 ॥
ख्यातानि कर्माणि यशो मतिश्च पूर्वं न भूतानि भवन्ति पश्चात् ।
गुणा हि सर्वाः प्रभवन्ति हेतोः [निदर्शनान्यत्र] च नो निबोध ॥1.40^13 ^14
“राजाओं की बुद्धि, विख्यात कर्म और यश के सम्बन्ध में पहले और पीछे का प्रश्न नहीं है। यह वस्तु-
स्वभाव है कि प्रत्येक कार्य कारण से होता है, अतः हमारे दृष्टान्त आप सुनें ॥40 ॥
यद्राजशास्त्रं भृगुरङ्गिरा वा न चक्रतुर्वंशकरावृषी तौ ।
तयोः सुतौ सौम्य ससर्जतुस्तत्कालेन शुक्रश्च बृहस्पतिश्च ॥१.४१
हे सौम्य, वंश चलानेवाले भृगु और अङ्गिरा नामक ऋषियों ने जिस राजशास्त्र को नही बनाया उसे उनके
पुत्रों ने-शुक्र और बृहस्पति ने-समय बीतनेपर सृजन किया ॥41 ॥
सारस्वतश्चापि जगाद नष्टं वेदं पुनर्यं ददृशुर्न पूर्वे ।
व्यासस्तथैनं बहुधा चकार न यं वशिष्ठः कृतवान्शक्तिः ॥१.४२
(सरस्वती के पुत्र) सारस्वत ने नष्ट हुए वेद को कहा (=व्यक्त किया) जिसे पूर्व के लोगों ने देखा नही,
और व्यास ने इसे कई विभागों में (विभक्त) किया जिसे शक्तिहीन वशिष्ठ ने नही किया ॥42 ॥
वाल्मीकिरादौ च ससर्ज पद्यं जग्रन्थ यन्न च्यवनो महर्षिः ।
चिकित्सितं यच्च चकार नात्रिः पश्चात्तदात्रेय ऋषिज्र्गाद ॥१.४३
पहले पहल बाल्मीकि ने पद्य सृजन किया, जिसे महर्षि च्यवन ने नही बनाया, और जिस चिकित्सा-शास्त्र
को अत्रि ने (सृजन) नही किया उसे बाद को आत्रेय ऋषि ने कहा ॥43 ॥
यच्च द्विजत्वं कुशिको न लेभे तद्गाधिनः सूनुरवाप राजन ।
वेलां समुद्रे सगरश्च दध्रे नेक्ष्वाकवो यां प्रथमं बबन्धुः ॥१.४४
हे राजन्! जिस द्विजत्व को (विश्वामित्र के पितामह) कुशिक ने नही पाया उसे गाधी के पुत्र (विश्वामित्र)
ने प्राप्त किया, और सगर ने सागर की वेला निश्चित की, जिसे शुरु में इक्ष्वाकुओं ने नही बाँधा ॥44 ॥
12- घ-भाव = पदार्थ; दे०- बु० च० 11.41; 12.27
13- ग-पा० 'धर्मा हि' ।
14- श्लोक 25 से 40 ग तक की रचना हमारी है। 40 ध के [ ] कोष्ठ में दो शब्द जौन्स्टन ने रखे हैं।


आचार्यकं योगविधौ द्विजानामप्राप्तमन्यैर्जनको जगाम ।
ख्यातानि कर्माणि च यानि शौरेः शूरादयस्तेष्वबला बभूवुः ॥१.४५
योग-विधि में द्विजों का आचार्य होने का जो पद दूसरों को प्राप्त नही हुआ उसे जनक ने पाया। शौरि ने
जो विख्यात कर्म किये उन्हें करने में शूर आदि असमर्थ हुए ॥45 ॥
तस्मात्प्रमाणं न वयो न वंशः कश्चित्क्वचिच्छ्रेष्ठ्यमुपैति लोके ।
राज्ञामृषीणां च हि तानि तानि कृतानि पुत्रैरकृतानि पूर्वैः ॥१.४६
इसलिए प्रमाण न वयस है न वंश। संसार में कोई भी कहीं भी श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है; क्योंकि
राजाओं और ऋषियों के पुत्रों ने वे काम किये जिन्हें उनके पूर्वजों ने नहीं किया।” ॥46 ॥
एवं नृपः प्रत्ययितैर्द्विजैस्तैराश्वासितश्चाप्यभिनन्दितश्च ।
शङ्कामनिष्टां विजहौ मनस्तः प्रहर्षमेवाधिकमारुरोह ॥१.४७
उन विश्वस्त द्विजों से इस प्रकार आश्वासन और अभिनन्दन पाकर, राजा ने अपने मन में अनिष्ट शङ्का का
त्याग किया और वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥47 ॥
प्रीतश्च तेभ्यो द्विजसत्तमेभ्यः सत्कारपूर्वं प्रददौ धनानि ।
भूयादयं भूमिपतिर्यथोक्तो यायाज्जरामेत्य वनानि चेति ॥१.४८
और प्रसन्न होकर उसने उन श्रेष्ठ द्विजों को धन दिये, (जिससे) वह, उनके कथनानुसार राजा हो और
बुढ़ापे में ही वन को जाय ॥48 ॥
अथो निमित्तैश्च तपोबलाच्च तज्जन्म जन्मान्तकरस्य बुद्ध्वा ।
शाक्येश्वरस्यालयमाजगाम सद्धर्मतर्षार्दसितो महर्षिः ॥१.४९
तब निमित्तों से और तपोबल से जन्मान्त-कर (जन्म-विनाशक) का वह जन्म जानकर महर्षि असित उत्तम
धर्म की प्यास से शाक्य-अधिपति के घर आया ॥49 ॥
तं ब्रह्मविद्ब्रह्मविदं ज्वलन्तं ब्राह्म्या श्रिया चैव तपःश्रिया च ।
राज्ञो गुरुर्गौरवसत्क्रियाभ्यां प्रवेशयामास नरेन्द्रसद्म ॥१.५०
ब्राह्म तेज और तपःश्री से जलते हुए उस श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी को राजगुरु ने गौरव और सत्कार के साथ
राजभवन मे प्रवेश कराया ॥50 ॥
स पार्थिवान्तःपुरसंनिकर्षं कुमारजन्मागतहर्षवेगः ।
विवेश धीरो बलसञ्जयैव तपःप्रकर्षाच्च जराश्रयाच्च ॥१.५१
कुमार के जन्म से आनन्दित होकर वह राजा के अन्तःपुर के समीप गया। अतिशय तपस्या तथा
वृद्धावस्था के कारण वह वहाँ इतना धीर था कि अपने को वन में ही समझ रहा हो ॥51 ॥
ततो नृपस्तं मुनिमासनस्थं पाद्यार्घ्यपूर्वं प्रतिपूज्य सम्यक् ।
निमन्त्रयामास यथोपचारं पुरा वसिष्ठं स इवान्तिदेवः ॥१.५२
बुद्धचरित 7

तब मुनि के बैठने पर, पाद्य और अर्घ्य के साथ उसकी सम्यक् पूजाकर, राजा ने उससे वैसे ही सविनय
निवेदन किया, जैसे प्राचीन समय में अन्तिदेव ने वशिष्ट से ॥५२॥
धन्योऽस्म्यनुग्राह्यमिदं कुलं मे यन्मां दिदृक्षुर्भगवानुपेतः।
आज्ञाप्यतां किं करवाणि सौम्य शिष्योऽस्मि विश्रम्भितुमर्हसीति ॥१.५३
“मैं धन्य हूँ और मेरा यह कुल अनुगृहीत है जो आप मुझे देखने की इच्छा से आये हैं। हे सौम्य, आज्ञा
कीजिए कि मैं क्या करूँ? आपका शिष्य हूँ, मेरे ऊपर विश्वास कीजिए” ॥५३॥
एवं नृपेणोपमन्त्रितः सन्सर्वेण भावेन मुनिर्यथावत्।
स विस्मयोत्फुल्लविशालदृष्टिर्गम्भीरधीराणि वचांस्युवाच ॥१.५४
जब राजा ने इस उचित रीति से समस्त सद्भाव के साथ मुनि से निवेदन किया, तब उसकी आँखें विस्मय
से विकसित तथा विशाल हो गईं और उसने ये गम्भीर और धीर वचन कहे ॥५४॥
महात्मनि त्वय्युपपन्नमेतत्प्रियातिथौ त्यागिनि धर्मकामे।
सत्त्वान्वयज्ञानवयोऽनुरूपा स्निग्धा यदेवं मयि ते मतिः स्यात् ॥१.५५
“आप महात्मा, अतिथि-प्रिय, त्यागी और धर्मार्थी के ही यह योग्य है कि अपने स्वभाव, वंश, ज्ञान और
वयस के अनुरूप आपकी बुद्धि मेरे प्रति ऐसी स्नेहमयी हो ॥५५॥
एतच्च तद्येन नृपर्षयस्ते धर्मेण सूक्ष्मेण धनान्यवाप्य।
नित्यं त्यजन्तो विविधद्वभूवुस्तपोभिराढ्या विभवैर्दरिद्राः ॥१.५६
और, यह वही मार्ग है जिसके द्वारा वे राजर्षि सूक्ष्म धर्म से धन प्राप्त कर, नित्य विधिवत् दान करते हुए,
तप के धनी और धन के दरिद्र हो गये ॥५६॥
प्रयोजनं यत्तु ममोपयाने तन्मे शृणु प्रीतिमुपेहि च त्वम्।
दिव्या मयादित्यपथे श्रुता वाग्बोधाय जातस्तनयस्तवेति ॥१.५७
किन्तु मेरे आने का प्रयोजन है उसे आप सुनिये और आनन्द पाइये। सूर्य के मार्ग में (आकाश-मार्ग में)
मैंने (आपके प्रति कही गई) यह दिव्यवाणी सुनी- “तुझे पुत्र उत्पन्न हुआ है, जो बुद्धत्व प्राप्त
करेगा” ॥५७॥
श्रुत्वा वचस्तच्च मनश्च युक्त्वा ज्ञात्वा निमित्तैश्च ततोऽस्म्युपेतः।
दिदृक्षया शाक्यकुलध्वजस्य शक्रध्वजस्येव समुच्छ्रितस्य ॥१.५८
यह वचन सुनकर, मैंने मनोयोग किया और निमित्तों से बात जान ली। तब इन्द्र की पताका के समान
शाक्य-कुल की उन्नत पताका को देखने की इच्छा से यहाँ आया हूँ” ॥५८॥
इत्येतदेवं वचनं निशम्य प्रहर्षसम्भ्रान्तगतिर्नरैन्द्रः।
आदाय धात्र्यङ्कगतं कुमारं सन्दर्शयामास तपोधनाय ॥१.५९
इस प्रकार यह वचन सुनकर हर्ष के कारण शीघ्रता से राजा ने धाई की गोद से कुमार को लेकर तपस्वी
को दिखाया ॥५९॥

चक्राङ्कपादं स तथा महर्षिर्जालावनद्धाङ्गुलिपाणिपादम्।
सोर्णध्रुवं वारणवस्तिकोशं सविस्मयं राजसुतं ददर्श ॥१.६०
तब उस महर्षि ने राजा के पुत्र को विस्मय के साथ देखा, उसके पाँवों में चक्र के चिह्न थे, अङ्गुलियाँ और
हाथ-पाँव (रेखा-) जालों से भरे थे, भौंहें (घने) बालों से युक्त थीं, मूत्राशय और (अण्ड-) कोश वैसे ही
(भीतर धँसे) थे जैसे हाथी के ॥६०॥
धात्र्यङ्कसंविष्टमवेक्ष्य चैनं देव्यङ्कसंविष्टमिवाग्निसूनुम्।
बभूव पक्ष्मान्तविचञ्चिताश्रुर्निश्वस्य चैवं त्रिदिवोन्मुखोऽभूत् ॥१.६१
देवी की गोद में सोये हुए अग्नि-पुत्र की भाँति धाई की गोद में सोये हुए इस बालक को देखकर महर्षि
की पपनियों पर आँसू आ गये और साँसे लेकर उसने आकाश की ओर मुख उठाया ॥६१॥
दृष्ट्वासितं त्वश्रुपरीप्लुताक्षं स्नेहात्तनूजस्य नृपश्शकम्पे।
सगद्गदं बाष्पकषायकण्ठः पप्रच्छ स प्राञ्जलिरानताङ्गः ॥१.६२
असित की आँखें आँसू से डबडबाई देखकर पुत्र के स्नेह से राजा काँप उठा, उसका कण्ठ वाष्प (के
अवरोध) से दुखने लगा और झुककर हाथ जोड़े हुए, उसने भग्न वाणी में पूछा:- ॥६२॥
अल्पान्तरं यस्य वपुःसुरेभ्यो बहुद्भुतं यस्य च जन्म दीप्तम्।
यस्योत्तमं भाविनमात्थ चार्थं तं प्रेक्ष्य कस्मात्तव धीर वाष्पः ॥१.६३
“जिसके शरीर में देवताओं (के शरीर) से अल्प अन्तर है, जिसका उज्ज्वल जन्म बहुत अद्भुत है, जिसका
भविष्य आप उत्तम कहते हैं, हे धीर उसे देखकर आपको आँसू क्यों? ॥६३॥
अपि स्थिरायुर्भगवान् कुमारः कच्चिन्न शोकाय मम प्रसूतः।
लब्धा कथञ्चित्सलिलाञ्जलिर्मे न खल्विमं पातुमुपैति कालः ॥१.६४
हे भगवन्, कुमार चिरायु तो है? वह मेरे शोक के लिए तो नही जन्मा है? किसी किसी तरह मुझे जो
जलाञ्जलि प्राप्त होनेवाली है उसे पीने के लिए काल तो नही आ रहा है (अर्थात् मरनेपर मुझे जलाञ्जलि
देने के लिए कुमार जीवित तो रहेगा)? ॥६४॥
अप्यक्षयं मे यशसो निधानं कच्चिद्ध्रुवो मे कुलहस्तसारः।
अपि प्रयास्यामि सुखं परत्र सुप्तोऽपि पुत्रेऽनिमिषैकचक्षुः ॥१.६५
मेरा यश-निधान अक्षय तो है? मेरे वंश (-ज) के हाथ में राज्य ध्रुव तो है? सोये रहनेपर भी पुत्र के प्रति
एक आँख खुली रखनेवाला मैं सुखपूर्वक परलोक तो जाऊँगा? ॥६५॥
कच्चिन्न मे जातमफुल्लमेव कुलप्रवालं परिशोषभागि।
क्षिप्रं विभो ब्रूहि न मेऽस्ति शान्तिः स्नेहं सुते वेत्सि हि बान्धवानाम् ॥१.६६
क्या मेरा यह वंशाङ्कुर, जो अभी जन्मा है, बिना फूले ही सूखने को है? हे विभु, शीघ्र कहिये, मुझे शान्ति
नही है; क्योंकि पुत्र के लिए पिता का स्नेह तो आप जानते ही हैं।” ॥६६॥


8 अश्वघोष

[पृष्ठ ९]

वाम स्तम्भ

इत्यागतावेगमनिष्ठबुद्ध्या बुद्ध्वा नरेन्द्रं स मुनिर्बभाषे ।
मा भून्मतिस्ते नृप काचिदन्या निःसंशयं तद्यदवोचमस्मि ॥१.६७
अनिष्ट की आशङ्का से राजा आवेग में आ गया है, ऐसा समझकर मुनि ने कहा—“आप कुछ और न
समझें। मैंने जो कहा है उसमें संशय नहीं है ॥67 ॥
नास्यान्यथात्वं प्रति विक्रिया मे स्वां वञ्चनां तु प्रति विक्लवोऽस्मि ।
कालो हि मे यातुमयं च जातो जातिकक्षयस्यासुलभस्य बोद्धा ॥१.६८
इसके अनिष्ट से मुझे विकार नहीं हुआ है; मैं वंचित हो रहा हूँ, इसीलिए मैं विकल हूँ। मेरे (परलोक)
जाने का यह समय आ गया है, जब कि यह उत्पन्न हुआ है जो जन्म-विनाश के दुर्लभ उपायों को
जानेगा ॥68 ॥
विहाय राज्यं विषयेष्वनास्थस्तीव्रैः प्रयत्नैरधिगम्य तत्त्वम् ।
जगत्ययं मोहतमो निहन्तुं ज्वलिष्यति ज्ञानमयो हि सूर्यः ॥१.६९
विषयों से विरक्त हो, राज्य छोड़, तीव्र प्रयत्नों से तत्त्व को प्राप्त कर, यह ज्ञानमय सूर्य जगत् में मोहरूप
तम को नष्ट करने के लिए प्रज्वलित होगा ॥69 ॥
दुःखार्णवाद्व्याधिविकीर्णफेनाज्जरातरङ्गान्मरणोग्रवेगात् ।
उत्तारयिष्यत्ययमुह्यमानमार्त्तं जगज्ज्ञानमहाप्लवेन ॥१.७०
दुःखरूप सागर से—व्याधि ही जिसका फैला हुआ फेन है, वृद्धावस्था ही जिसकी तरङ्ग है और मरण ही
जिसका प्रचण्ड वेग है—बहते हुए आर्त जगत् को यह ज्ञानरूप महानौका के द्वारा उबारेगा ॥70 ॥
प्रज्ञाम्बुवेगां स्थिरशीलवप्रां समाधिशीतां व्रतचक्रवाकाम् ।
अस्योत्तमां धर्मनदीं प्रवृत्तां तृष्णार्दितः पास्यति जीवलोकः ॥१.७१
प्रज्ञा ही जिसका जल-प्रवाह है, स्थिर शील ही जिसके तट हैं, समाधि ही जिसकी शीतलता है और व्रत
ही जिसके चक्रवाक हैं, उस उत्तम धर्म नदी का वह प्रवर्तन करेगा और तृष्णा से पीड़ित प्राणि-जगत्
(= जीवलोक) उस (के जल) को पीयेगा ॥71 ॥
दुःखार्दितेभ्यो विषयावृतेभ्यः संसारकान्तारपथस्थितेभ्यः ।
आख्यास्यति ह्येष विमोक्षमार्गं मार्गप्रनष्टेभ्य इवाध्वगेभ्यः ॥१.७२
मार्ग से भटके हुए यात्रियों के समान संसाररूप वन के पथ में पड़े हुए लोगों को, जो दुःख से पीड़ित
और विषयों से लिप्त हैं, यह मोक्षमार्ग बतावेगा ॥72 ॥
विदह्यमानाय जनाय लोके रागाग्निनायं विषयेन्धनेन ।
प्रह्लादमाधास्यति धर्मवृष्ट्या वृष्ट्या महामेघ इवातपान्ते ॥१.७३
संसार में विषयरूप इन्धनवाली रागाग्नि से जलते हुए लोगों को यह धर्मवृष्टि से वैसे ही आनन्दित करेगा,
जैसे आतप (गर्मी) के अन्त में (जल-) वृष्टि से महामेघ ॥73 ॥


दक्षिण स्तम्भ

तृष्णार्गलं मोहतमःकपाटं द्वारं प्रजानामपयानहेतोः ।
विपाटयिष्यत्ययमुत्तमेन सद्धर्मताडेन दुरासदेन ॥१.७४
प्राणियों के निकलने के लिए यह उस द्वार को, तृष्णा ही जिसका अर्गल है और मोहरूप अन्धकार ही
जिसके किवाड़ हैं, सद्धर्म के अप्रतिहत उत्तम प्रहार से तोड़ डालेगा ॥74 ॥
स्वैर्मोहपाशैः परिवेष्टितस्य दुःखामिभूतस्य निराश्रयस्य ।
लोकस्य सम्बुध्य च धर्मराजः करिष्यते बन्धनमोक्षमेषः ॥१.७५
बुद्धत्व प्राप्त कर, यह धर्मराज, अपने ही मोह-पाशों से परिवेष्टित, दुःख से अभिभूत, और निराश्रय जगत्
का बन्धन खोलेगा ॥75 ॥
तन्मा कृथाः शोकमिमं प्रति त्वमस्मिन्स शोच्योऽस्ति मनुष्यलोके ।
मोहेन वा कामसुखैर्मदाद्वा यो नैष्ठिकं श्रोष्यति नास्य धर्मम् ॥१.७६
अतः आप इसके लिए शोक न करें; इस मनुष्य-लोक में उसके लिए शोक करना चाहिए जो काम-सुख
से होनेवाले मोह से, या मद से इसका नैष्ठिक धर्म नही सुनेगा ॥76 ॥
भ्रष्टस्य तस्माच्च गुणादतो मे ध्यानानि लब्ध्वाप्यकृतार्थतैव ।
धर्मस्य तस्याश्रवणादहं हि मन्ये विपत्तिं त्रिदिवेऽपि वासम् ॥१.७७
इस पुण्य से भ्रष्ट होकर ध्यान प्राप्त करनेपर भी मैं अकृतार्थ ही हूँ; क्योंकि उसका धर्म नही सुनने के
कारण स्वर्ग-निवास को भी मैं विपत्ति ही मानता हूँ ॥77 ॥
इति श्रुतार्थः ससुहृत्सदारस्त्यक्त्वा विषादं मुमुदे नरेन्द्रः ।
एवंविधोऽयं तनयो ममेति मेने स हि स्वामपि सारमत्ताम् ॥१.७८
यह व्याख्या सुनने पर स्त्री और बन्धुओं के साथ विषाद छोड़कर राजा प्रमुदित हुआ। “मेरा पुत्र ऐसा है"
इससे उसने अपना सौभाग्य समझा ॥78 ॥
आर्येण मार्गेण तु यास्यतीति चिन्ताविधेयं हृदयं चकार ।
न खल्वसौ न प्रियधर्मपक्षः सन्ताननाशात्तु भयं ददर्श ॥१.७९
“ऋषि के मार्ग पर यह चलेगा" इससे उसका हृदय चिन्तित हुआ। निश्चय ही वह ऐसा नही था कि उसे
धर्म का पक्ष प्रिय नही, किन्तु वंश-नाश से होनेवाला भय उसने देखा ॥79 ॥
अथ मुनिरसितो निवेद्य तत्त्वं सुतनियतं सुतविक्लवाय राज्ञे ।
सबहुमतमुदीक्ष्यमाणरूपः पवनपथेन यथागतं जगाम ॥१.८०
तब पुत्र के लिए विकल राजा से पुत्र के सम्बन्ध में तत्त्व को निवेदन कर, असित मुनि वायु-मार्ग से वैसे
ही चला गया जैसे आया था और लोग सम्मानपूर्वक उसका रूप देखते रहे ॥80 ॥
कृतमितिरनुजासुतं च दृष्ट्वा मुनिवचनश्रवणे च तन्मतौ च ।
बहुविधमनुकम्पया स साधुः प्रियसुतवद्विनियोजयाञ्चकार ॥१.८१


बुद्धचरित ९

सच्चा ज्ञान प्राप्त किये हुए उस मुनि (असित) ने अपनी बहिन के पुत्र को देखा और अनुकम्पा-वश प्रिय
पुत्र के समान उसे मुनि (बुद्ध) का वचन सुनने के लिए तथा उसके विचारानुसार चलने के लिए नियुक्त
किया ॥81 ॥
नरपतिरपि पुत्रजन्मतुष्टो विषयमतानि विमुच्य बन्धनानि ।
कुलसदृशमचीकरद्यथावत्प्रियतनयस्तनयस्य जातकर्म ॥१.८२
पुत्र-जन्म से सन्तुष्ट होकर राजा ने भी देश के सभी बन्धनों (=कैदियों) को छोड़ दिया और उस पुत्र-स्नेही
ने पुत्र का जात-कर्म कुल के अनुकूल ही उचित रीति से कराया ॥82 ॥
दशसु परिणतेष्वहःसु चैव प्रयतमनाः परया मुदा परीतः ।
अकुरुत जपहोममङ्गलाद्याः परमभवाय सुतस्य देवतेज्याः ॥१.८३
दस दिन पूरे होनेपर परम प्रसन्न होकर, उस संयमी ने पुत्र के परम कल्याण के लिए जप, होम और
मङ्गल-कर्म आदि के साथ देवयज्ञ किये ॥83 ॥
अपि च शतसहस्रपूर्णसङ्ख्याः स्थिरबलवत्तनयाः सहेमशृङ्गीः ।
अनुपगतजराः पयस्विनीर्गाः स्वयमददात्सुतवृद्धये द्विजेभ्यः ॥१.८४
और भी, एक लाख पयस्विनी गाएँ जो वृद्धा नहीं हुई थीं, जिनके सींग सोने से मढ़े थे, और जिनके बछड़े
दृढ़ बलवान् थे, पुत्र की बढ़ती के लिए स्वयं द्विजों को दीं ॥84 ॥
बहुविधविषयास्ततो यतात्मा स्वहृदयतोषकरीः क्रिया विधाय ।
गुणवति नियते शिवे मुहूर्ते मतिमकरोन्मुदितः पुरप्रवेशे ॥१.८५
उस संयतात्मा ने अपने हृदय को सन्तोष देनेवाली भाँति-भाँति की क्रियाएँ कीं और गुण-युक्त मङ्गल मुहूर्त
नियत होनेपर, प्रसन्न होकर उसने नगर मे प्रवेश करने का विचार किया ॥85 ॥
द्विरदरदमयीमथो महार्हा सितसितपुष्पभृतां मणिप्रदीपाम् ।
अभजत शिविकां शिवाय देवी तनयवती प्रणिपत्य देवताभ्यः ॥१.८६
उस पुत्रवती देवी ने मङ्गल के लिए देवताओं को प्रणाम किया और वह हाथी-दाँत की बनी बहुमूल्य
पालकी पर, जो उजले-उजले फूलों से भरी थी और जिसमें मणि-प्रदीप जल रहे थे, चढ़ी ॥86 ॥
पुरमथ पुरतः प्रवेश्य पत्नीं स्थविरजनानुगतामपत्यनाथाम् ।
नृपतिरपि जगाम पौरसङ्घैर्दिवममरैर्मघवानिवार्च्यमानः ॥१.८७
वृद्धाओं और पुत्र के साथ पत्नी को आगे से पुर में प्रवेश कराकर, राजा भी वहाँ गया। पुरवासियों ने
उसकी उसी तरह पूजा की, जैसे स्वर्ग में (प्रवेश करने पर) इन्द्र की देवताओं ने ॥87 ॥
भवनमथ विगाह्य शाक्यराजो भव इव षण्मुखजन्मना प्रतीतः ।
इदमिदमिति हर्षपूर्णवक्त्रो बहुविधपुष्टियशस्करं व्यधत्त ॥१.८८
महल में प्रवेश करने पर, शाक्य-राज वैसे ही आनन्दित हुआ, जैसे कार्तिकेय के जन्म से शिव। प्रसन्न
मुख होकर "यह करो, यह करो" कहते हुए राजा ने वह सब कराये, जिनके तरह-तरह की बढ़ती और
यश होता है ॥88 ॥
इति नरपतिपुत्रजन्मवृद्ध्या सजनपदं कपिलाह्वयं पुरं तत् ।
धनदपुरमिवाप्सरोऽवकीर्ण मुदितमभून्नलकूबरप्रसूतौ ॥१.८९
राज-कुमार के समृद्धिकारी जन्म से कपिल के नाम का वह नगर जनपद के साथ इस प्रकार प्रमुदित
हुआ, जैसे नलकूबर के जन्म में अप्सराओं से भरा कुबेर का नगर ॥89 ॥
इति बुद्धचरिते महाकाव्ये भगवत्प्रसूतिर्नाम प्रथमः सर्गः ॥१ ॥
द्वितीय सर्ग
अन्तःपुर विहार
आ जन्मनो जन्मजरान्तकस्य तस्यात्मजस्यात्मजितः स राजा ।
अहन्यहन्यर्थगजार्थमित्रैर्वृद्धिं ययौ सिन्धुरिवाम्बुवेगैः ॥२.१
जन्म और जरा के विनाशक उस आत्म-विजयी पुत्र के जन्म (-समय) से वह राजा दिन-दिन धन से, हाथी-
घोड़ों से और मित्रों से उसी तरह बढ़ने लगा, जैसे जल-प्रवाहों से नदी ॥1 ॥
धनस्य रत्नस्य च तस्य तस्य कृताकृतस्यैव च काञ्चनस्य ।
तदा हि नैकान्स निधीनवाप मनोरथस्याप्यतिभारभूतान् ॥२.२
क्योंकि तब धन, विविध रत्न, तथा बने और नही बने सोने की अनेक निधियाँ उसने पाईं, जो मनोरथ के
लिए भी भार-स्वरूप थीं ॥2 ॥
ये पद्मकल्पैरपि च द्विपेन्द्रैर्न मण्डलं शक्यमिहाभिनेतुम् ।
मदोत्कटा हैमवता गजास्ते विनापि यत्नादुपतस्थुरेनम् ॥२.३
हिमालय के मतवाले हाथी, जो पद्म-सदृश गजेन्द्रों द्वारा भी यहाँ नही लाये जा सकते थे, अनायास ही
उसकी सेवा में उपस्थित हुए ॥3 ॥
नानाङ्गचिह्नैर्नवहेमभाण्डैर्विभूषितैर्लम्बसटैस्तथाश्वैः ।
सञ्चुक्षुभे चास्य पुरं तुरङ्गैर्बलेन मैत्र्या च धनेन चाप्तैः ॥२.४
और, नाना चिह्नों नव-सुवर्ण-भाण्डों और भूषणों से युक्त तथा लम्बे केसरवाले घोड़ों से, जो (सैन्य-) बल,
मित्रता एवं धन द्वारा प्राप्त हुए थे, उसका नगर क्षुब्ध हुआ ॥4 ॥¹⁵
पुष्टाश्च तुष्टाश्च तथास्य राज्ये साध्व्योऽरजस्का गुणवत्पयस्काः ।
उदग्रवत्सैः सहिता बभूवुर्बह्व्यो बहुक्षीरदुहश्च गावः ॥२.५
¹⁵- भाण्ड = अश्व-आभरण, घोड़े का अलंकार ।
10 अश्वघोष

उसके राज्य में गाएँ बहुत थीं। वे पुष्ट व सन्तुष्ट, साध्वी और निर्मल, उत्तम तथा बहुत दूध देनेवाली और
उन्नत बछड़ों से युक्त थीं ॥5॥
मध्यस्थतां तस्य रिपुर्जगाम मध्यस्वभावः प्रययौ सुहृत्त्वम्।
विशेषतो दार्ढ्यमियाय मित्रं द्वावस्य पक्षावपरस्तु नास ॥२.६
उसका शत्रु मध्यस्थ (= निष्पक्ष), मध्यस्थ मित्र, और मित्र विशेषतः दृढ़ हो गया। उसके दो ही पक्ष रहे,
तीसरा पक्ष (शत्रु) नही रहा ॥6॥
तथास्य मन्दानिलमेघशब्दः सौदामिनीकुण्डलमण्डिताभ्रः।
विनाश्मवर्षाशनिपातदोषैः काले च देशे प्रवर्ष देवः ॥२.७
और उसके लिए (वृष्टि-) देव ने, जिनके बादल विद्युन्मण्डल से मण्डित थे, मन्द अनिल और मेघ-गर्जन के
साथ अश्म-वर्षा और वज्रपात के दोषों के बिना ही (उचित) समय और स्थान पर वृष्टि की ॥7॥
रुरोह सस्यं फलवद्यथर्तु तदाकृतेनापि कृषिश्रमेण।
ता एव चास्यौषधयो रसेन सारेण चैवाभ्यधिका बभूवुः ॥२.८
(अति) कृषि-श्रम किये बिना ही फल-युक्त सस्य उचित ऋतु में बढ़ा। और, उसके लिये वे ही ओषधियाँ
रस एवं सार से खूब भर गईं ॥8॥
शरीरसन्देहकरेऽपि काले सङ्ग्रामसम्मर्द इव प्रवृत्ते।
स्वस्थाः सुखं चैव निरामयं च प्रजज्ञिरे कालवशेन नार्यः ॥२.९
यद्यपि (प्रसव-) काल शरीर के लिए उतना ही सन्देह-जनक (विपत्तिपूर्ण) है जितना कि युद्ध-सङ्घर्ष, तथापि
स्त्रियों ने स्वस्थ रहते हुए, सुखपूर्वक और बिना किसी रोग के समय पर प्रसव किया ॥9॥
पृथग्व्रतिभ्यो विभवेऽपि गर्हे न प्रार्थयन्ति स्म नराः परेभ्यः।
अभ्यर्थितः सूक्ष्मधनोऽपि चार्यस्तदा न कश्चिद्विमुखो बभूव ॥२.१०
व्रतियों को छोड़कर (अन्य) लोगों ने, चाहे उनका विभव कितना ही तुच्छ क्यों न हो, दूसरों से कुछ
नही माङ्गा। और साथ ही कोई भी आर्य (सज्जन), चाहे उसका धन कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो, माङ्गे
जानेपर विमुख नही हुआ ॥10॥¹⁶
नागौरवो बन्धुषु नाप्यदाता नैवानृतो नानृतिको न हिंस्रः।
आसीत्तदा कश्चन तस्य राज्ये राज्ञो ययातेरिव नाहुषस्य ॥२.११
उस समय उसके राज्य में, जैसे नहुष के पुत्र ययाति के राज्य में बन्धुओं का असम्मान करनेवाला,
अदाता, अव्रती, झूठ, और हिंसक कोई नही था ॥11॥¹⁷
उद्यानदेवायतनाश्रमाणां कूपप्रपापुष्करिणीवनानाम्।
चक्रुः क्रियास्तत्र च धर्मकामाः प्रत्यक्षतः स्वर्गमिवोपलभ्य ॥२.१२
धर्म के अभिलाषियों ने स्वर्ग का मानो प्रत्यक्ष दर्शन कर उद्यान, देव-मन्दिर, आश्रम, कूप, पनसाले, पोखर
और उपवन बनाये ॥12॥
मुक्तश्च दुर्भिक्षभयामयेभ्यो हृष्टो जनः स्वर्ग इवाभिरेमे।
पत्नीं पतिर्वा महिषीं पतिं वा परस्परं न व्यभिचेरतुश्च ॥२.१३
दुर्भिक्ष भय और रोग से मुक्ति होने के हर्ष में लोग ऐसे सुखी थे, जैसे स्वर्ग में। पति ने पत्नी के विरुद्ध
या पत्नी ने पति के विरुद्ध सदाचार भङ्ग नही किया अर्थात् दोनों एक दूसरे के प्रति सच्चे रहे ॥13॥
कश्चित्सिषेवे रतये न कामं कामार्थमर्थं न जुगोप कश्चित्।
कश्चिद्धनार्थं न चचार धर्मं धर्माय कश्चिन्न चकार हिंसाम् ॥२.१४
किसी ने रति के लिए काम का सेवन नही किया, किसी ने काम (-सेवन) के लिए धन की रक्षा नही
की। किसी ने धन के लिए धर्माचरण नही किया, किसी ने धर्म के लिए हिंसा नही की ॥14॥
स्तेयादिभिश्चाप्यरिरिभश्च नष्टं स्वस्थं स्वचक्रं परचक्रमुक्तम्।
क्षेमं सुभिक्षं च बभूव तस्य पुरानरण्यस्य यथैव राष्ट्रे ॥२.१५
शत्रुता और चोरी-आदि नष्ट हो गई। उसका राज्य स्वस्थ, स्वतन्त्र, विदेश के शासन से मुक्त, सुखी और
अन्न से भरा था, जैसे प्राचीन काल में अनरण्य का राज्य ॥15॥
तदा हि तज्जन्मनि तस्य राज्ञो मनोरिवादित्यसुतस्य राज्ये।
चचार हर्षः प्रणनाश पाप्मा जज्वल धर्मः कलुषः शशाम ॥२.१६
तब उसके जन्म में उस राजा के राज्य में, जैसे सूर्य-पुत्र मनु के राज्य में, मलिनता मिटी और हर्ष का
संचार हुआ, पाप नष्ट हुआ और धर्म प्रज्वलित हुआ ॥16॥
एवंविधा राजकुलस्य संपत्सर्वार्थसिद्धिश्च यतो बभूव।
ततो नृपस्तस्य सुतस्य नाम सर्वार्थसिद्धोऽयमिति प्रचक्रे ॥२.१७
राजकुल की ऐसी सम्पद् और सब अर्थों की सिद्धि हुई, इसीलिए राजा ने अपने पुत्र का नाम रखते हुए
कहा– “यह सर्वार्थसिद्ध है” ॥17॥
देवी तु माया विबुधर्षिकल्पं दृष्ट्वा विशालं तनयप्रभावम्।
जातं प्रहर्षं न शशाक सोढुं ततो निवासाय दिवं जगाम ॥२.१८
अपने पुत्र का प्रभाव देवर्षि का-सा विशाल देखकर, देवी माया (हृदय में) उत्पन्न हर्ष को न रोक सकी
और रहने के लिए स्वर्ग चली गई ॥18॥
ततः कुमारं सुरगर्भकल्पं स्नेहेन भावेन च निर्विशेषम्।
मातृष्वसा मातृसमप्रभावा संवर्धयामासत्मजवद्बभूव ॥२.१९
¹⁶- व्रती = संन्यास-धर्म के नियम पालन करनेवाले।
¹⁷- अव्रती = धर्म के नियम पालन नहीं करनेवाला।
[बुद्धचरित 11]

तब माता के समान प्रभावशालौ मौसी ने सुर-सन्तान-तुल्य कुमार को वैसे ही भाव और स्नेह से अपने पुत्र
के समान पाला ॥19॥
ततः स बालार्क इवोदयस्थः समीरितो वह्निरिवानिलेन ।
क्रमेण सम्यग्ववृधे कुमारस्ताराधिपः पक्ष इवातमस्के ॥२.२०
तब उदयाचल पर स्थित सूर्य के समान, हवा से प्रेरित अग्नि के समान और शुक्ल-पक्ष के चन्द्रमा के समान
कुमार धीरे-धीरे अच्छी तरह बढ़ने लगा ॥20॥
ततो महार्हाणि च चन्दनानि रत्नावलीश्रौषधिभिः सगर्भाः ।
मृगप्रयुक्तांश्चरथांश्च हैमानानाचक्रिरेऽस्मै सुहृदालयेभ्यः ॥२.२१
वयोऽनुरूपाणि च भूषणानि हिरण्मयान् हस्तिमृगाश्वकांश्च ।
रथांश्च गोपुत्रकसंप्रयुक्तान् पुत्रीश्च चामीकररूप्यचित्राः ॥२.२२
तब उसके लिए लोग बहुमूल्य चन्दन, ओषधियों से भरे रत्न-हार, मृग-युक्त छोटे-छोटे स्वर्ण रथ, वयस के
अनुरूप भूषण, सोने के बने छोटे-छोटे हाथी, मृग और घोड़े, गो-वत्स-युक्त रथ, तथा चाँदी-सोने से रङ्ग-
विरङ्गी पुतलियाँ मित्रों के घरों से ले आये ॥21-22॥
एवं स तैस्तैर्विषयोपचारैर्वयोऽनुरूपै रुपचर्यमाणः ।
बालोऽप्यबालप्रतिमो बभूव धृत्या च शौचेन धिया श्रिया च ॥२.२३
वयस के अनुरूप उन-उन विषयों से इस प्रकार सेवित होता हुआ वह बालक होनेपर भी धैर्य, पवित्रता,
बुद्धि और विभूति में बालक नही था ॥23॥
वयश्च कौमारमतीत्य सम्यक् सम्प्राप्य काले प्रतिपत्तिकर्म ।
अल्पैरहोभिर्बहुवर्षगम्या जग्राह विद्याः स्वकुलानुरूपाः ॥२.२४
कुमारावस्था बीतनेपर, समय पर उसका (उपनयन-) संस्कार विधिवत् हुआ और अपने कुल के अनुरूप
विद्याएँ, जो बहुत वर्षों में सीखी जाती हैं, उसने कुछ ही दिनों में सीख लीं ॥24॥
नैःश्रेयसं तस्य तु भव्यमर्थं श्रुत्वा पुरस्तादसितान्महर्षेः ।
कामेषु सङ्गं जनयाम्बभूव वनानि यायादिति शाक्यराजः ॥२.२५
शाक्य-राज ने महर्षि असित से पहले ही उसका परम कल्याण-प्रद भविष्य सुना था; इसलिए उसने विषयों
में उसकी आसक्ति उत्पन्न की, जिससे वह वन को न जाय ॥25॥
कुलात्ततोऽस्मै स्थिरशीलयुक्तात्साध्वीं वपुर्ह्रीविनयोपपन्नाम् ।
यशोधरां नाम यशोविशालां वामाभिधानां श्रियमाजुहाव ॥२.२६
तब स्थायी शीलवाले कुल से यशोधरा नामक कन्यारूपी लक्ष्मी को उसके लिए बुलाया। वह यशस्विनी
और साध्वी थी। रूप, लज्जा और विनय से युक्त थी ॥26॥
विद्योतमानो वपुषा परेण सनत्कुमारप्रतिमः कुमारः ।
सार्धं तया शाक्यनरेन्द्रवध्वा शच्या सहस्राक्ष इवाभिरेमे ॥२.२७

12 अश्वघोष

सनत्कुमार के समान अत्यन्त सुन्दर आकृति से चमकते कुमार ने शाक्यराज की उस वधू के साथ वैसे ही
रमण किया, जैसे इन्द्र शची के साथ ॥27॥
किञ्चिन्मनः क्षोभकरं प्रतीपं कथं न पश्येदिति सोऽनुचिन्त्य ।
वासं नृपो व्यादिशति स्म तस्मै हर्म्योदरेष्वेव न भूप्रचारम् ॥२.२८
मन को क्षुब्ध करनेवाला कुछ भी प्रतिकूल वह (कुमार) कैसे न देखे-ऐसा सोचकर राजा ने उसके लिए
महलों के भीतर रहने का आदेश दिया, पृथ्वी पर घूमने का नही ॥28॥
ततः शरत्तोयदपाण्डरेषु भूमौ विमानेष्विव रञ्जितेषु ।
हर्म्येषु सर्वर्तुसुखाश्रयेषु स्त्रीणामुदारैर्विजहार तूर्यैः ॥२.२९
तब शरत्काल के मेघ के समान श्वेत तथा पृथ्वी पर उतरे विमानों (=देवप्रासादों) के समान रञ्जित महलों
में, जो सब ऋतुओं में सुखदायी थे, उसने स्त्रियों के उदार तूर्य-वाद्यों से मनोविनोद किया ॥29॥
कलैर्हि चामीकरबद्धकक्षैर्नारीकराग्राभिहतैर्मृदङ्गैः ।
वराप्सरोनृत्यसमैश्च नृत्यैः कैलासवत्तद्भवनं रराज ॥२.३०
जिनके अब्वल सुवर्ण से बँधे थे और जो स्त्रियों की अङ्गुलियों से बजाये जा रहे थे उन मृदङ्गों से, (उनकी)
मधुर ध्वनि से और उत्तम अप्सराओं के नृत्य के समान नृत्य से, वह भवन कैलास के समान शोभित
हुआ ॥30॥
वाग्भिः कलाभिर्ललितैश्च हावैर्मदैः सखेलैर्मधुरैश्च हासैः ।
तं तत्र नार्यो रमयाम्बभूवुर्भ्रूवञ्चितैश्चौन्नितैर्निरक्षितैश्च ॥२.३१
मीठी बोली से, ललित हाथ-भाव से, क्रीड़ापूर्ण मद (=मदत्ता) से, मधुर हाथ से, भ्रू-भङ्गों से और कटाक्षों
से, नारियों ने उसे वहाँ आनन्दित किया ॥31॥
ततः स कामाश्रयपण्डिताभिः स्त्रीभिर्गृहीतो रतिकर्कशाभिः ।
विमानपृष्ठान्न महीं जगाम विमानपृष्ठादिव पुण्यकर्मा ॥२.३२
तब कामोद्दीपन में निपुण तथा रति में दृढ़ स्त्रियों से गृहीत होकर, वह महल पर से भूतल पर नही आया,
जैसे पुण्य कर्मवाला (व्यक्ति) स्वर्ग से (नीचे नही उतरता है) ॥32॥
नृपस्तु तस्यैव विवृद्धिहेतोस्तद्भाविनाथैन च चोद्यमानः ।
शमेऽभिरेमे विरराम पापाद्भजे दमं संविबभाज साधून् ॥२.३३
पुत्र की बढ़ती के लिए और उसके (उत्तम) भविष्य से प्रेरित होता राजा शम में आनन्दित हुआ और पाप
से विरत हुआ, (इन्द्रिय-) दमन का आश्रय लिया और साधुओं के बीच धन बाँटा ॥33॥
नाधीरवत्तामसुखे ससञ्जे न संररञ्जे विषमं जनन्याम् ।
धृत्येन्द्रियाश्वांश्चपलाग्विजिग्ये बन्धूंश्च पौरांश्च गुणैर्जिगाय ॥२.३४

वह अधीर व्यक्ति के समान काम-सुख में आसक्त नहीं हुआ, उसने मातृ-वर्ग (स्त्रियों) से अनुचित अनुराग
नहीं किया (या स्त्रियों के प्रति अत्यधिक क्रोध नहीं किया) धैर्यपूर्वक इन्द्रियरूप चपल घोड़ों का दमन
किया और अपने गुणों से बन्धुओं एवं पुरवासियों को जीता ॥३४ ॥
नाध्यैष्ट दुःखाय परस्य विद्यां ज्ञानं शिवं यत्तु तदध्यगीष्ट ।
स्वाभ्यः प्रजाभ्यो हि यथा तथैव सर्वप्रजाभ्यः शिवमशशंसे ॥२.३५
उसने दूसरे के दुःख के लिए (तन्त्र मन्त्र) विद्या नहीं सीखी, किन्तु जो कल्याण-कारी ज्ञान है उसे
अध्ययन किया; क्योंकि जैसे अपनी प्रजाओं के लिए वैसे ही सब प्रजाओं के लिए उसने कल्याण-कामना
की ॥३५ ॥
भं भासुरं चाङ्गिरसाधिदेवं यथावदार्च तदायुषे सः।
जुहाव हव्यान्यकृशे कृशानौ ददौ द्विजेभ्यः कृशनं च गाश्च ॥२.३६
उसकी आयु के लिए उसने उज्ज्वल ग्रह-मण्डल की, जिसका अधिदेव बृहस्पति है, यथोचित्त पूजा की,
विशाल अग्नि में हवन किया तथा द्विजों को सोना और गाएँ दीं ॥३६ ॥
स्रक्षौ शरीरं पवितुं मनश्च तीर्थाम्बुमिश्रैश्च गुणाम्बुमिश्रैः ।
वेदोपदिष्टं सममात्मजं च सोमं पपौ शान्तिसुखं च हार्दम् ॥२.३७
शरीर को पवित्र करने के लिए तीर्थ के जल से और मन को पवित्र करने के लिए गुणरूप जल से स्नान
किया, वेदविहित सोम (-रस) पिया और साथ ही अपने से ही उत्पन्न हार्दिक शान्ति-सुख की रक्षा
की ॥३७ ॥$^{18}$
सान्त्वं बभाषे न च नार्थवद्यज्जजल्प तत्त्वं न च विप्रियं यत्।
सान्त्वं ह्यतत्त्वं परुषं च तत्त्वं हियाशकन्नात्मन एव वक्तुम् ॥२.३८
उसने प्रिय कहा और व्यर्थ नहीं; सत्य कहा और अप्रिय नहीं; क्योंकि प्रिय असत्य और कठोर सत्य वह
लाज से अपने को भी न कह सका ॥३८ ॥
इष्टेष्वनिष्टेषु च कार्यवत्सु न रागदोषाश्रयतां प्रपेदे ।
शिवं सिषेवे व्यवहारशुद्धं यज्ञं हि मेने न तथा यथा तत् ॥२.३९
कार्यवालों के प्रति, वे इष्ट हों या अनिष्ट उसने अनुराग या द्वेष नहीं किया; कल्याणकारी शुद्ध विवाद
निर्णय का सेवन किया, यज्ञ को वैसा नहीं माना जैसा कि उसे अर्थात् न्याय की पवित्रता को ॥३९ ॥
आशावते चाभिगताय सद्यो देयाम्बुभिस्तर्षमचेच्छिदिष्ट ।
युद्धाहते वृत्तपरश्वधेन द्विद्दर्पमुद्धत्तमबेभिदिष्ट ॥२.४०
आगत आशावान् व्यक्ति की प्यास को दानरूप जल से सद्यः काटा और युद्ध के बिना ही सदाचाररूप
कुठार से शत्रु के असंयत अभिमान को भेदा ॥४० ॥
एकं विनिन्ये स जुगोप सप्त सप्तैव तत्याज ररक्ष पञ्च ।
प्राप त्रिवर्गं बुबुधे त्रिवर्गं जज्ञे द्विवर्गं प्रजहौ द्विवर्गम् ॥२.४१
उसने एक (अपने) को विनीत किया, सात (= राज्य के सात अङ्गों) की रक्षा की, सात (= राजाओं के
सात दोषों) का त्याग किया, पाँच (= पाँच उपायों) की रक्षा की, त्रिवर्ग (= अर्थ-धर्म-काम) को पाया,
त्रिवर्ग (= शत्रु-मित्र-मध्यस्थ) को समझा, द्विवर्ग (= नीति-अनीति) को जाना, और द्विवर्ग (= काम-क्रोध)
को छोड़ा ॥४१ ॥$^{19}$
कृतागसोऽपि प्रतिपाद्य वध्याञ्ज्ञाजीघनन्नापि रुषा ददर्श ।
बबन्ध सान्त्वेन फलेन चैतांस्त्यागोऽपि तेषां ह्यनपाय दृष्टः ॥२.४२
अपराधियों को वध्य प्रतिपादित करके भी नहीं मरवाया, क्रोध से भी नही देखा। उन्हें प्रिय फल से युक्त
किया (= हल्का दण्ड दिया); क्योंकि उन्हें छोड़ने में भी अनीति देखी ॥४२ ॥
आर्षान्यचारीत्परमव्रतानि वैराण्युहासीच्चिरसम्भृतानि ।
यशांसि चापद्गुणगन्धवन्ति रजांस्यहासीन्मलिनीकराणि ॥२.४३
ऋषियों के कठोर व्रतों का आचरण किया, चिर-पोषित शत्रुता छोड़ी, अपने गुणों से सुगन्धित यश पाया,
(मन) मलिन करनेवाली (काम की) धूल झाड़ी ॥४३ ॥
न चाजिहीर्षीद्बलिमप्रवृत्तं न चाचिकीर्षीत्परवस्त्वभिध्याम् ।
न चाविवक्षीद्विषतामधर्मं न चादिधक्षीद्धृदयेन मन्युम् ॥२.४४
उसने (प्रजाओं से) अप्रवृत्त (= अनुचित, अप्रस्तुत) कर लेने की इच्छा नहीं की, पर-वस्तु हरण करना
नही चाहा, शत्रुओं का अधर्म प्रकट करना नही चाहा और हृदय में क्रोध रखना नही चाहा ॥४४ ॥
तस्मिंस्तथा भूमिपतौ प्रवृत्ते भृत्याश्च पौराश्च तथैव चेरुः ।
शमात्मके चेतसि विप्रसन्ने प्रयुक्तयोगस्य यथेन्द्रियाणि ॥२.४५
उस राजा की प्रवृत्ति वैसी होनेपर, भृत्यों और पुरवासियों ने वैसा ही आचरण किया; जिस प्रकार योगारूढ
व्यक्ति का चित्त शान्त और प्रसन्न (= निर्मल) होनेपर, उसके इन्द्रिय भी (वैसे ही शान्त और निर्मल हो
जाते हैं) ॥४५ ॥
काले ततश्चारुपयोधरायां यशोधरायां स्वयशोधरायाम् ।
शौद्धोदने राहुसपत्नवक्त्रो जज्ञे सुतो राहुल एव नाम्ना ॥२.४६
$^{18}$_ "आत्मजं च" की जगह "आत्मजेन" पढ़ें, तो उत्तरार्ध का अर्थ यों होगा— "आत्मज के साथ वेद-विहित
सोम (-रस) पिया और हार्दिक शान्ति-सुख की रक्षा की।"
$^{19}$_ पाँच उपाय, देखिये—सौ० पन्द्रह 61 ।
बुद्धचरित 13

तब समय पर चारु पयोधरवाली तथा अपने (गर्भ में पुत्ररूप) यश को धारण करनेवाली यशोधरा से
शौद्धोदनि (=शुद्धोदन के पुत्र) का राहु-शत्रु (चन्द्र)-सदृश मुखवाला पुत्र उत्पन्न हुआ, (उसका) नाम
राहुल ही (रहा) ॥46॥
अथेष्टपुत्रः परमप्रतीतः कुलस्य वृद्धिं प्रति भूमिपालः।
यथैव पुत्रप्रसवे ननन्द तथैव पौत्रप्रसवे ननन्द ॥२.४७
तब अभिलषित पुत्रवाले राजा को वंश-वृद्धि का पूरा विश्वास हुआ। जैसे वह पुत्र जन्म में आनन्दित हुआ
था, वैसे ही पौत्र-जन्म में आनन्दित हुआ ॥47॥
पुत्रस्य मे पुत्रगतो ममेव स्नेहः कथं स्यादिति जातहर्षः।
काले स तं तं विधिमाललम्बे पुत्रप्रियः स्वर्गमिवारुरुक्षन् ॥२.४८
"मेरे पुत्र को मेरे ही समान पुत्रगत स्नेह किस प्रकार होता होगा" यह सोचकर उसे हर्ष हुआ उस पुत्र-
प्रिय ने मानो स्वर्गारोहण की इच्छा से समय पर उस-उस (धार्मिक) विधि का अवलम्बन किया ॥48॥
स्थित्वा पथि प्राथमल्पिकानां राजर्षभाणां यशसान्वितानाम्।
शुक्लान्यमुक्त्वापि तपांस्यतप्त यज्ञैश्च हिंसारहितैरयष्ट ॥२.४९
कृत-युग के यशस्वी नृप-श्रेष्ठ के पथ में रहते हुए, (गृहस्थाश्रम के) सफेद कपड़ों को नहीं छोड़ते हुए भी
उसने तप किये और हिंसा-रहित यज्ञों से पूजा की ॥49॥
अजाज्वलिष्ठाथ स पुण्यकर्मा नृपश्रिया चैव तपःश्रिया च।
कुलेन वृत्तेन धिया च दीप्तस्तेजः सहस्रांशुरिवोत्सिसृक्षुः ॥२.५०
वह पुण्यकर्मा राज्य और तपस्या की श्री से प्रज्वलित हुआ; (अपने श्रेष्ठ) कुल आचार और बुद्धि से प्रदीप्त
हुआ, जैसे सहस्र किरणोंवाले सूर्य के समान प्रकाश फैलाने की इच्छा कर रहा हो ॥50॥
स्वायम्भुवं चार्चिकमर्चयित्वा जजाप पुत्रस्थितये स्थितश्रीः।
चकार कर्माणि च दुष्कराणि प्रजाः सिसृक्षुः क इवादिकाले ॥२.५१
उस स्थायी लक्ष्मीवाले (राजा) ने पुत्र के जीवन के लिए स्वयम्भू की पूजा की, जप किया और आदि युग
में प्रजा सृजन करने को इच्छुक स्रष्टा के समान दुष्कर कर्म किये ॥51॥$^{20}$
तत्याज शस्त्रं विममर्श शास्त्रं शमं सिषेवे नियमं विषेहे।
वशीव कञ्चिद्विषयं न भेजे पितेव सर्वान्विषयानपश्यत् ॥२.५२
शस्त्र छोड़ा, शास्त्र विचारा, शम का सेवन किया, नियम को सहन किया, संयमी के समान किसी विषय
का सेवन नहीं किया, पिता के समान सब विषयों (=देशों, प्रजासमूह) को देखा ॥52॥
बभार राज्यं स हि पुत्रहेतोः पुत्रं कुलार्थं यशसे कुलं तु।
स्वर्गाय शब्दं दिवमात्महेतोर्धर्मार्थमात्मस्थितिमाचकाङ्क्ष ॥२.५३
उसने राज्य का पुत्र के लिए, पुत्र का कुल के लिए, कुल का यश के लिए पालन किया और यश की
स्वर्ग के लिए, स्वर्ग की अपने लिए, अपने जीवन की धर्म के लिए आकाङ्क्षा की ॥53॥
एवं स धर्मं विविधं चकार सद्भिर्निपातं श्रुतितश्च सिद्धम्।
दृष्ट्वा कथं पुत्रमुखं सुतो मे वनं न यायादिति नाथमानः ॥२.५४
इस प्रकार उसने भाँति भाँति का धर्म किया, सज्जन जिसका पालन करते हैं और जो श्रुति से सिद्ध है,
यह प्रार्थना करते हुए कि "अपने पुत्र का मुख देखकर मेरा पुत्र किसी प्रकार वन को न जाय" ॥54॥
रिरक्षिषन्तः श्रियमात्मसंस्थां रक्षन्ति पुत्रान् भुवि भूमिपालाः।
पुत्रं नरेन्द्रः स तु धर्मकामो ररक्ष धर्माद्विषयेषु मुञ्चन् ॥२.५५
पृथ्वी पर अपनी श्री की रक्षा चाहनेवाले भूपाल अपने पुत्रों की रक्षा करते हैं; किन्तु इस धर्माभिलाषी
राजा ने अपने पुत्र को (इन्द्रिय-) विषयों में छोड़ते हुए उसकी धर्म से रक्षा की ॥55॥
वनमनुपमसत्त्वा बोधिसत्त्वास्तु सर्वे विषयसुखरसज्ञा जग्मुरुत्पन्नपुत्राः।
अत उपचितकर्मा रूढमूलेऽपि हेतौ स रतिमुपसिषेवे बोधिमापन्न यावत् ॥२.५६
अनुपम स्वभाववाले सब बोधिसत्त्व विषय-सुख का रस जानकर, पुत्र उत्पन्न होनेपर, वन को गये; अतः
(राग, द्वेष, मोह को क्षीण करनेवाले) कर्मों के इकट्ठे होने से (कल्याण का) हेतु रूढ़मूल (=सुदृढ़)
होनेपर भी, उसने बुद्धत्व पाने तक विषयों को कुछ-कुछ सेवन किया ॥56॥$^{21}$
इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽन्तःपुरविहारो नाम द्वितीयः सर्गः ॥२॥
तृतीय सर्ग
संवेग-उत्पत्ति
ततः कदाचिन्मृदुशाद्वलानि पुंस्कोकिलोन्नादितपादपानि।
शुश्राव पद्माकरमण्डितानि गीतैर्निबद्धानि स काननानि ॥३.१
तब एक बार उसने गीत-निबद्ध काननों के बारे में सुना, जो मृदु और हरे तृणों से युक्त थे, जिनके पेड़
कोयलों से निनादित थे और जो कमल के पोखरों से मण्डित थे ॥1॥
श्रुत्वा ततः स्त्रीजनवल्लभानां मनोज्ञभावं पुरकाननानाम्।
बहिःप्रयाणाय चकार बुद्धिमन्तर्गृहे नाग इवावरुद्धः ॥३.२
तब स्त्रियों के प्रिय पुर-काननों की मनोहरता सुनकर, घर के भीतर बँधे हाथी के समान उसने बाहर जाने
का विचार किया ॥2॥
ततो नृपस्तस्य निशम्य भावं पुत्राभिधानस्य मनोरथस्य।
स्नेहस्य लक्ष्म्या वयसश्च योग्यामाज्ञापयामास विहारयात्राम् ॥३.३


$^{20}$ _ "पुत्रस्थितये" का दूसरा अर्थ होगा "पुत्र के (घर में ही) रहने के लिए"।
$^{21}$ _ बोधिसत्त्व = बोधि अर्थात् बुद्धत्व प्राप्त करनेवाला प्राणी; वह व्यक्ति, जिसे बुद्धत्व प्राप्त होगा।
14 अश्वघोष

तब पुत्र-नामक उस मनोरथ का विचार सुनकर, राजा से स्नेह, लक्ष्मी और वयस के योग्य विहार-यात्रा की
आज्ञा दी ॥३॥
निवर्तयामास च राजमार्गे सम्पातमार्तस्य पृथग्जनस्य ।
मा भूत्कुमारः सुकुमारचित्तः संविग्नचेता इति मन्यमानः ॥३.४
और, राजमार्ग पर आर्त जनता का निकलना रोक दिया गया, यह सोचते हुए कि सुकुमार मनवाले कुमार
के चित्त में कहीं संवेग न हो जाय ॥४॥
प्रत्यङ्गहीनान्विकलेंद्रियांश्च जीर्णातुरान्दीन् कृपणांश्च दिक्षु ।
ततः समुत्सार्य परेण साम्ना शोभां परा राजपंथस्य चक्रुः ॥३.५
अङ्ग-हीनों, विकलेन्द्रियों, वृद्धों, आतुर आदि लोगों तथा बेचारों को सब ओर परम शान्ति से हटा कर, उन
(राज-पुरुषों) ने राज-पथ की परम शोभा की ॥५॥
ततः कृते श्रीमति राजमार्गे श्रीमान्विनीतानुचरः कुमारः ।
प्रासादपृष्ठादवतीर्य काले कृताभ्यनुज्ञो नृपमभ्यगच्छत् ॥३.६
तब राज मार्ग शोभा-युक्त किया जानेपर, आज्ञा पाकर, श्रीमान् कुमार विनीत अनुचरों के साथ प्रासाद पर
से समय पर नीचे उतरा और राजा के समीप गया ॥६॥
अथो नरेन्द्रः सुतमागताश्रुः शिरस्युपाघ्राय चिरं निरीक्ष्य ।
गच्छेति चाज्ञापयति स्म वाचा स्नेहान्न चैनं मनसा मुमोच ॥३.७
तब राजा ने, जिसे आँसू आ गये थे, पुत्र के शिर को सूंघकर उसे देर तक देखा और “जाओ” कहते हुए
आज्ञा दी, किन्तु स्नेह-वश उसे मन से नही छोड़ा ॥७॥
ततः स जाम्बूनदभाण्डभृद्भिर्युक्तं चतुर्भिर्निवृतैस्तुरङ्गैः ।
अक्लीबविद्वच्छुचिरश्मिधारं हिरण्मयं स्यन्दनमारुरोह ॥३.८
तब वह सुवर्ण आभरण धारण करनेवाले चार शिक्षित तुरंगों से युक्त सुवर्ण-रथ पर सवार हुआ, जिसका
सारथि बलवान्, विद्वान् और पवित्र था ॥८॥
ततः प्रकीर्णोज्ज्वलपुष्पजालं विषक्तमाल्यं प्रचलत्पताकम् ।
मार्गं प्रपेदे सदशानुयात्रश्चन्द्रः सनक्षत्र इवान्तरीक्षम् ॥३.९
तब जिस मार्ग पर उजले फूल बिखरे हुए थे, मालाएँ लटक रही थीं, और पताकाएं फहरा रही थीं उसपर
वह योग्य अनुचरों के साथ आया, जैसे आकाश में नक्षत्रों के साथ चन्द्रमा (आवे) ॥९॥
कौतूहलात्स्फीततरैश्च नेत्रैर्नीलोत्पलार्धैरिव कीर्यमाणम् ।
शनैः शनै राजपंथ जगाहे पौरैः समन्तादभिवीक्ष्यमाणः ॥३.१०
कौतूहल से अति विकसित आँखें, जो आधे-आधे नीले कमलों के समान थीं, जिस राज-पथ पर बिखर
रही थीं उसपर चारों ओर पुरवासियों द्वारा देखे जाते हुए उसने धीरे-धीरे प्रवेश किया ॥१०॥


तं तुष्टुवुः सौम्यगुणेन केचिद्ववन्दिरे दीप्ततया तथान्ये ।
सौमुख्यतस्तु श्रियमस्य केचिद्वैपुल्यमाशंसिषुरायुरश्च ॥३.११
कतिपयों ने उनके सौम्य-गुण के लिए उसकी स्तुति की तथा दूसरों ने दीप्ति के लिए उसकी वन्दना की;
किन्तु उसकी अनुकूलता के कारण कतिपयों ने उसके लिए लक्ष्मी और दीर्घायु कामना की ॥११॥
निःसृत्य कुब्जाश्च महाकुलेभ्यो व्यूहाश्च कैरातकवामनानाम् ।
नार्यः कृशेभ्यश्च निवेशनेभ्यो देवानुयानध्वजवतप्रणेमुः ॥३.१२
बड़े-बड़े कुलों के झुण्ड-के-झुण्ड कुबड़े किरात व वामन तथा छोटे-छोटे घरों से स्त्रियाँ निकल आईं। उन
सबने उसे वैसे ही प्रणाम किया, जैसे (इन्द्र-) देव की ध्वजा को ॥१२॥
ततः कुमारः खलु गच्छतीति श्रुत्वा स्त्रियः प्रेष्यजनात्प्रवृत्तुम् ।
दिदृक्षया हर्म्यतलानि जग्मुर्जनेन मान्येन कृताभ्यनुज्ञाः ॥३.१३
तब “कुमार जा रहा है” यह समाचार नौकरों से सुनकर स्त्रियों गुरु-जन से आज्ञा पाकर, उसे देखने की
इच्छा से प्रासाद-तल पर गईं ॥१३॥
ताः त्रस्तकाञ्चीगुणविघ्निताश्च सुप्तप्रबुद्धाकुललोचनाश्च ।
वृत्तान्तविन्यस्तविभूषणाश्च कौतूहलेनानिभृताः परीयुः ॥३.१४
गिरती करधनी से उन्हें बाधा हुई, सोकर उठने से उनकी आँखें आकुल थीं, समाचार सुनकर उन्होंने गहने
पहने, कौतूहल के कारण अविनीत होकर वे गईं ॥१४॥
प्रासादसोपानतलप्रणादैः काञ्चीरवैर्नूपुरनिस्वनैश्च ।
वित्रासयन्त्यो गृहपक्षिणस्त्वानन्योन्वेवेगांश्च समाक्षिपन्त्यः ॥३.१५
महल के सोपान पर पद-तलों के निनाद से, करधनियों के शब्द से और नूपुरों की ध्वनियों से घरेलू
पक्षियों के झुण्डों को डराती हुई तथा एक दूसरे के वेगपर अपेक्ष करती हुई (वे गईं) ॥१५॥
कासाञ्चिदासां तु वराङ्गनानां जातत्वराणामपि सोत्सुकानाम् ।
गतिं गुरुत्वाज्जगृहुर्विशालाः श्रोणीरथाः पीनपयोधराश्च ॥३.१६
उत्सुक होकर शीघ्रता करनेपर भी उन उत्तम स्त्रियों में से कतिपयों की गति को उनके अपने ही विशाल
नितम्बों और पीन पयोधरों ने रोका ॥१६॥
शीघ्रं समर्थापि तु गन्तुमन्या गतिं निजग्राह ययौ न तूर्णम् ।
ह्रियाप्रगल्भा विनिगूहमाना रहःप्रयुक्तानि विभूषणानि ॥३.१७
शीघ्र जाने में समर्थ होनेपर भी दूसरी ने अपनी चाल को रोक लिया और वह तेजी से नही गई, वह
सङ्कोचशीला एकान्त में पहने गहनों को लाज से छिपाने लगी ॥१७॥
परस्परोत्पीडनपिण्डितानां सम्मर्दसंक्षोभितकुण्डलानाम् ।
तासां तदा सस्वनभूषणानां वातायनेष्ववप्रशो बभूव ॥३.१८

बुद्धचरित 15

१. प्रथम-तृतीय सर्ग: भगवत्प्रसूति, अन्तःपुर-विहार एवं संवेग-उत्पत्ति

परस्पर उत्पीड़ित होती हुई वे इकट्ठी हुईं, एक दूसरे की रगड़ से उनके कुण्डल चञ्चल हुए, उनके गहने
बज रहे थे। अतः उस समय खिड़कियों पर अशान्ति हुई ॥18 ॥
वातायनेभ्यस्तु विनिःसृतानि परस्परायासितकुण्डलानि ।
स्त्रीणां विरेजुर्मुखपङ्कजानि सक्तानि हर्म्येष्विव पङ्कजानि ॥३.१९
खिड़कियों से निकले हुए स्त्रियों के मुख-कमल, जो एक-दूसरें के कुण्डल संक्षुब्ध कर रहे थे, ऐसे शोभित
हुए जैसे महलों में कमल लगे हों ॥19 ॥
ततो विमानैर्युवतीकरालैः कौतूहलोद्घाटितवातयानैः ।
श्रीमत्समन्तान्नगरं बभासे वियद्विमानैरिव साप्सरोभिः ॥३.२०
तब उन विमानों (महलों) से, युवतियों से दन्तुर लगते थे (अर्थात् दाँत निकालकर हँस रह थे) और
कौतूहल से जिनके झरोखे खोल दिये गये थे, वह श्री-सम्पन्न नगर चारों ओर इस प्रकार भासित हुआ
जिस प्रकार अप्सरा-युक्त देव-प्रासादों से स्वर्ग ॥20 ॥
वातायनानामविशालभावादन्योन्यगण्डार्पितकुण्डलानाम् ।
मुखानि रेजुः प्रमदोत्तमानां बद्धाः कलापा इव पङ्कजानाम् ॥३.२१
खिड़कियाँ बड़ी-बड़ी नही होने के कारण जो उत्तम प्रमदाएँ एक दूसरें के गालों पर अपने कुण्डल रक्खे
हुई थीं, उनके मुख ऐसे विराजे, जैसे कमलों के बँधे हुए गुच्छे हों ॥21 ॥
तं ताः कुमारं पथि वीक्षमाणाः स्त्रियो बभुर्गामिव गन्तुकामाः ।
ऊर्ध्वोन्मुखाश्चैनमुदीक्षमाणा नरा बभुर्द्यामिव गन्तुकामाः ॥३.२२
उस कुमार को मार्ग में जाते देखकर स्त्रियों ने मानो (महलों से) पृथ्वी पर आने की कामना की और
ऊपर मुख उठाकर उसे देखते हुए पुरुषों ने मानो आकाश में जाने की कामना की ॥22 ॥
दृष्ट्वा च तं राजसुतं स्त्रियस्ता जाज्वल्यमानं वपुषा श्रिया च ।
धन्यास्य भार्येति शनैरवोचञ्छुद्वैर्मनोभिः खलु नान्यभावात् ॥३.२३
सौन्दर्य और विभूति से चमकते हुए राजा के उस पुत्र को देखकर स्त्रियों ने शुद्ध मन से, निश्चय ही अन्य
भाव से नही, धीरे-धीरे कहा- “धन्य है इसकी भार्या" ॥23 ॥
अयं किल व्यायतपीनबाहु रूपेण साक्षादिव पुष्पकेतुः ।
त्यक्त्वा श्रियं धर्ममुपैष्यतीति तस्मिन् हि ता गौरवमेव चक्रुः ॥३.२४
लम्बी और मोटी बाहुवाला यह कुमार, जो रूप में साक्षात् पुष्पकेतु (कामदेव) के समान है, लक्ष्मी को
छोड़कर धर्म के समीप जायगा - इस प्रकार उन्होंने उसका गौरव ही किया ॥24 ॥
कीर्णं तथा राजपथं कुमारः पौरैर्विनीतैः शुचिधीरवेषैः ।
तत्पूर्वमालोक्य जहर्ष किञ्चिन्मेने पुनर्भावमिवात्मनश्च ॥३.२५
शुचि और धीर वेषवाले विनीत पुर-वासियों से उस प्रकार भरे हुए राज-पथ को पहले पहल देखकर, वह
प्रसन्न हुआ और उसने अपना कुछ पुनर्जन्म सा माना ॥25 ॥
पुरं तु तत्स्वर्गमिव प्रहृष्टं शुद्धाधिवासाः समवेक्ष्य देवाः ।
जीर्णं नरं निर्ममिरे प्रयातुं सञ्चोदनार्थं क्षितिपात्मजस्य ॥३.२६
उस नगर को स्वर्ग के समान प्रसन्न देखकर, शुद्धाधिवास देवों ने एक वृद्ध पुरुष को बनाया कि वह राजा
के पुत्र को (घर से वन को) प्रयाण करने के लिए प्रेरित करे ॥26 ॥
ततः कुमारो जरयाभिभूतं दृष्ट्वा नरेभ्यः पृथगाकृतिं तम् ।
उवाच सङ्गाहकमागतास्थस्तत्रैव निष्कम्पनिविष्टदृष्टिः ॥३.२७
तब कुमार ने जरा (= वृद्धावस्था) से अभिभूत उस पुरुष को जिसकी आकृति (अन्य) पुरुषों से पृथक् थी,
देखा और उसी को निर्निमेष दृष्टि से देखते हुए ध्यान में आकर उसने सारथि से कहाः- ॥27 ॥
क एष भोः सूत नरोऽभ्युपेतः केशैः सितैर्यष्टिविषक्तहस्तः ।
भ्रूसंवृताक्षः शिथिलावनाङ्गः किं विक्रियैषा प्रकृतिर्यदृच्छा ॥३.२८
“हे सारथि, यह कौन पुरुष आया? इसके केश सफेद हैं, हाथ में लाठी है, भौंहों से आँखें ढकी हैं, अङ्ग
ढीले व झुके हैं। क्या यह विकार है? या स्वभाव? या संयोग?” ॥28 ॥
इत्येवमुक्तः स रथप्रणेता निवेदयामास नृपात्मजाय ।
संरक्ष्यमप्यर्थमदोषदर्शी तैरेव देवैः कृतबुद्धिमोहः ॥३.२९
ऐसा कहे जानेपर उस सारथि ने राजा के पुत्र से गोपनीय बात भी निवेदन कर दी, इसमें अपना दोष नही
देखा, उन्हीं देवों ने उसका बुद्धि-मोह जो कर दिया था ॥29 ॥
रूपस्य हन्त्री व्यसनं बलस्य शोकस्य योनिर्निधनं रतीनाम् ।
नाशः स्मृतीनां रिपुरिन्द्रियाणामेषा जरा नाम ययैष भग्नः ॥३.३०
“रूप की हत्या करनेवाली, बल की विपत्ति, शोक की उत्पत्ति (-भूमि) आनन्द की मृत्यु, स्मृति का नाश
करनेवाली, इन्द्रियों का शत्रु यह जरा है, जिसने इसे भग्न कर दिया है ॥30 ॥
पीतं ह्यनेनापि पयः शिशुत्वे कालेन भूयः परिसृप्तमुर्व्याम् ।
क्रमेण भूत्वा च युवा वपुष्मान् क्रमेण तेनैव जरामुपेतः ॥३.३१
बचपन में इसने भी दूध पिया, फिर काल-क्रम से पृथिवी पर पेट के बल चला, क्रम से सुन्दर युवक
हुआ, और उसी क्रम से जरा को प्राप्त हुआ है" ॥31 ॥
इत्येवमुक्ते चलितः स किञ्चिद्राजात्मजः सूतमिदं बभाषे ।
किमेष दोषो भविता ममापीत्यस्मै ततः सारथिरभ्युवाच ॥३.३२
ऐसा कहे जानेपर कुछ विचलित होकर उस राजात्मज ने सारथि से कहा- "क्या यह दोष मुझे भी
होगा?” तब सारथि ने उसे कहाः- ॥32 ॥
आयुष्मतोऽप्येष वयःप्रकर्षो निःसंशयं कालवशेन भावी ।
एवं जरां रूपविनाशयित्रीं जानाति चैवेच्छति चैव लोकः ॥३.३३
16 अश्वघोष

“आप आयुष्मान् की भी यह वृद्धावस्था कालवश निःसन्देह होगी। ऐसी रूप-विनाशिनी जरा को लोग
जानते हैं और इसे चाहते हैं” ॥३३॥
ततः स पूर्वाशयशुद्धबुद्धिर्विस्तीर्णकल्पाचितपुण्यकर्मा ।
श्रुत्वा जरां संविविजे महात्मा महाशनेर्घोषमिवान्तिके गौः ॥३.३४
तब वह महात्मा, पूर्व के विचारों से जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गई थी, और अनेक कल्पों में जिसके पुण्य कर्म
एकत्र हुए थे, जरा को सुनकर वैसे ही संविग्न हुआ, जैसे समीप में महावज्र का शब्द सुनकर गाय ॥३४ ॥
निःश्वस्य दीर्घं स्वशिरः प्रकंप्य तस्मिंश्च जीर्णे विनिवेश्य चक्षुः ।
तां चैव दृष्ट्वा जनतां सहर्षां वाक्यं स संविग्न इदं जगाद ॥३.३५
लम्बी साँसे लेकर, अपना शिर कँपाकर, उस वृद्ध की ओर दृष्टि लगाये हुए, उस जनता को प्रसन्न
देखकर, उस संविग्न ने यह वाक्य कहा:- ॥३५ ॥
एवं जरा हन्ति च निर्विशेषं स्मृतिं च रूपं च पराक्रमं च।
न चैव संवेगमुपैति लोकः प्रत्यक्षतोऽपीदृशमीक्षमाणः ॥३.३६
“इस प्रकार जरा, स्मृति रूप और पराक्रम की बिना भेद-भाव के हत्या करती है; और प्रत्यक्ष ऐसा देखते
हुए भी लोगों को संवेग नही होता ॥३६॥
एवं गते सूत निवर्त्तयाश्वान् शीघ्रं गृहाण्येव भवान्प्रयातु ।
उद्यानभूमौ हि कुतो रतिर्मे जरामये चेतसि वर्तमाने ॥३.३७
ऐसा होनेपर, हे सारथि, घोड़ों को लौटाइये, शीघ्र घर को ही आप चलें; चित्त में जरा का भय रहनेपर
उद्यान-भूमि में मुझे कहाँ से आनन्द होगा?” ॥३७॥
अथाज्ञया भर्तुसुतस्य तस्य निवर्तयामास रथं नियन्ता ।
ततः कुमारो भवनं तदेव चिन्तावशः शून्यमिव प्रपेदे ॥३.३८
अनन्तर उस स्वामि पुत्र की आज्ञा से सारथि ने रथ को लौटाया। तब कुमार उसी महल में पहुँचा, जो
उस चिन्तित के लिए शून्य-सा था ॥३८ ॥
यदा तु तत्रैव न शर्म लेभे जरा जरेति प्रपरीक्षमाणः ।
ततो नरेन्द्रानुमतः स भूयः क्रमेण तेनैव बहिर्जगाम ॥३.३९
“जरा-जरा (क्या है)” इस प्रकार (इसे) परखते हुए जब उसने वहाँ भी शान्ति नहीं पाई, तब राजा की
अनुमति से वह फिर उसी क्रम से बाहर गया ॥३९॥
अथापरं व्याधिपरीतदेहं त एव देवाः ससृजुर्मनुष्यम् ।
दृष्ट्वा च तं सारथिमाबभाषे शौद्धोदनिस्तद्गतदृष्टिरेव ॥३.४०
तब उन्हीं देवों ने रोग से ग्रस्त देहवाले दूसरे मनुष्य का सृजन किया और उसे देखकर शुद्धोदन के पुत्र ने
उसी की ओर दृष्टि किये हुए सारथि से कहा:- ॥४०॥
स्थूलोदरः श्वासचलच्छरीरः स्रस्तांसबाहुः कृशपाण्डुगात्रः ।
अम्बेति वाचं करुणं ब्रुवाणः परं समाश्रित्य नरः क एषः ॥३.४१
“यह कौन मनुष्य है? इसका पेट फूला हुआ है, साँस से शरीर काँप रहा है, कन्धे और बाहुएँ ढीली हैं,
गात दुबला और पीला है। दूसरे का सहारा लेकर करुण स्वर से ‘माँ माँ’ कह रहा है” ॥४१॥
ततोऽब्रवीत्सार्थिरस्य सौम्य धातुप्रकोपप्रभवः प्रवृद्धः ।
रोगाभिधानः सुमहाननर्थः शक्तोऽपि येनैष कृतोऽस्वतन्त्रः ॥३.४२
तब सारथि ने इसे कहा- “हे सौम्य (त्रि-) धातु-प्रकोप से उत्पन्न होकर बढ़ा हुआ यह रोगनामक महा-
अनर्थ है, जिसने इस शक्तिमान् को भी परतन्त्र कर दिया है” ॥४२॥²²
इत्यूचिवान् राजसुतः स भूयस्तं सानुकम्पो नरमीक्षमाणः ।
अस्यैव जातो पृथगेष दोषः सामान्‍यतो रोगभयं प्रजानाम् ॥३.४३
उस मनुष्य की अनुकम्पा के साथ देखते हुए उस नृपात्मज ने पुनः पूछा- “यह दोष केवल इसी को हुआ
है या रोग का भय समान रूप से (सब) प्रजाओं को है?” ॥४३॥
ततो बभाषे स रथप्रणेता कुमार साधारण एष दोषः ।
एवं हि रोगैः परिपीड्यमानो रुजातुरो हर्षमुपैति लोकः ॥३.४४
तब बह सारथि बोला- “हे कुमार, यह दोष साधारण है। इस प्रकार रोगों से परिपीड़ित होता हुआ, कष्ट
से आतुर संसार हर्ष को प्राप्त होता है” ॥४४॥
इति श्रुतार्थः स विषण्णचेताः प्रावेपताम्बूर्भिगतः शशीव ।
इदं च वाक्यं करुणायमानः प्रोवाच किञ्चिन्मृदुना स्वरेण ॥३.४५
यह व्याख्या सुनकर, वह विषण्ण-चित्त (हो गया और) जल-तरङ्ग में पड़ते चन्द्र (-प्रतिबिम्ब) के समान
काँपने लगा और दया से द्रवीभूत होते हुए उसने कुछ मृदु स्वर से यह वाक्य कहा:- ॥४५॥
इदं च रोगव्यसनं प्रजानां पश्यंश्च विश्रम्भमुपैति लोकः ।
विस्तीर्णविज्ञानमहो नराणां हसन्ति ये रोगभयैरमुक्ताः ॥३.४६
“प्रजाओं की यह रोगरूप विपत्ति देखते हुए भी संसार विश्वस्त (=निर्भीक) रहता है। अहो, (कितना)
विशाल अज्ञान है (इन) मनुष्यों का, जो रोग-भय से अमुक्त होकर भी हँस रहे हैं ॥४६॥
निवर्त्यतां सूत बहिःप्रयाणान्नरेन्द्रसद्मैव रथः प्रयातु ।
श्रुत्वा च मे रोगभयं रतिभ्यः प्रत्याहतं सङ्कुचतीव चेतः ॥३.४७
हे सारथि, बाहर जाने से रथ को लौटाइये, यह राज-महल को ही चले। और रोग-भय सुनकर विषयों से
प्रत्याहत मेरा मन सिकुड़-सा रहा है” ॥४७॥


²²- त्रिधातु = कफ, पित्त, वायु।
बुद्धचरित 17

ततो निवृत्तः स निवृत्तहर्षः प्रध्यानयुक्तः प्रविवेश वेश्म।
तं द्विरस्तथा प्रेक्ष्य च सन्निवृत्तं पर्येषणं भूमिपतिश्चकार ॥३.४८
तब हर्ष-रहित होकर वह लौटा, चिन्तित होकर अपने महल में घुसा। और, उसे दो बार उस प्रकार लौटा
देखकर, राजा ने जिज्ञासा की ॥48॥
श्रुत्वा निमित्तं तु निवर्तनस्य सन्त्यक्तमात्मानमनेन मेने।
मार्गस्य शौचाधिकृताय चैव चुक्रोश रुष्टोऽपि च नोग्रदण्डः ॥३.४९
लौटने का कारण सुनकर उसने अपने को उससे परित्यक्त माना। और मार्ग के शौचाधिकारी की भर्त्सना
की, रुष्ट होनेपर भी वह उग्रदण्ड नहीं हुआ अर्थात् कठोर दण्ड नहीं दिया ॥49॥
भूयश्च तस्मै विदधे सुताय विशेषयुक्तं विषयप्रचारम्।
चलेन्द्रियत्वादपि नाम सक्तो नास्मान्विजह्यादिति नाथमानः ॥३.५०
और फिर उस पुत्र के लिए विशेष विषय-सेवन का प्रबन्ध किया, इस आशा से कि- “शायद इन्द्रिय-
चञ्चलता के कारण (विषयों में) आसक्त होकर (यह) हमें न छोड़े” ॥50॥
यदा च शब्दादिभिरिन्द्रियार्थैरन्तःपुरे नैव सुतोऽस्य रेमे।
ततो बहिर्व्यादिशति स्म यात्रां रसान्तरं स्यादिति मन्यमानः ॥३.५१
और जब शब्द आदि इन्द्रिय-विषयों से अन्तःपुर में उसके पुत्र को आनन्द नहीं हुआ, तब (राजा ने) बाहर
यात्रा करने का आदेश दिया, यह समझते हुए कि (इससे कहीं) रुचि-परिवर्तन हो जाय ॥51॥
स्नेहाच्च भावं तनयस्य बुद्ध्वा स रोगदोषानविचिन्त्य कांश्चित्।
योग्याः समाज्ञापयति स्म तत्र कलास्वभिज्ञा इति वारमुख्याः ॥३.५२
और स्नेह से पुत्र का भाव समझकर तथा राग के किन्हीं दोषों का बिना विचार किए ही उसने कलाओं में
निपुण योग्य वारमुख्याँ (= सम्मानित वेश्याओं) को वहाँ (रहने की) आज्ञा दी ॥52॥
ततो विशेषेण नरेन्द्रमार्ग स्वलङ्कृते चैव परीक्ष्यिते च।
व्यत्यस्य सूतं च रथं च राजा प्रस्थापयामास बहिः कुमारम् ॥३.५३
तब विशेषता के साथ राज-मार्ग अलङ्कृत और परीक्षित होनेपर, सारथि एवं रथ को बदलकर राजा ने
कुमार को बाहर प्रस्थान कराया ॥53॥
ततस्तथा गच्छति राजपुत्रे तैरेव देवैर्विहितो गतासुः।
तं चैव मार्गे मृतमुह्यमानं सूतः कुमारश्च ददर्श नान्यः ॥३.५४
जब राजा का पुत्र उस प्रकार जा रहा था, तब उन्हीं देवों ने एक निष्प्राण (व्यक्ति) को बनाया। और,
मार्ग में ढोये जाते उस मरे हुए को सारथि और कुमार ने देखा, दूसरे किसी ने नहीं ॥54॥
अथाब्रवीद्राजसुतः स सूतं नरैश्चतुर्भिर्हियते क एषः।
दीनैर्मनुष्यैरनुगम्यमानो (वि)भूषितश्चाप्यवरुद्यते च ॥३.५५
तब उस राज-कुमार ने सारथि से कहा- “यह कौन है? इसे चार पुरुष लिये जा रहे हैं, दीन मनुष्य इसके
पीछे-पीछे जा रहे हैं, और विशेषता से भूषित होनेपर भी इसके लिए रोया जा रहा है” ॥55॥
ततः स शुद्धात्मभिरेव देवैः शुद्धाधिवासैरभिभूतचेताः।
अवाच्यमप्यर्थमिमं नियन्ता प्रव्याजहारार्थवदीश्वराय ॥३.५६
तब शुद्ध स्वभाववाले शुद्धाधिवास देवों ने जिसका चित्त अभिभूतकर दिया था उस सारथि ने यह अवाच्य
बात भी (उस) पर-श्रेष्ठ से कही:- ॥56॥
बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैर्वियुक्तः सुप्तो विसञ्ज्ञस्तृणकाष्ठभूतः।
सम्वर्ध्य संरक्ष्य च यत्नवद्भिः प्रियाप्रियैस्त्यज्यत एष कोऽपि ॥३.५७
“यह कोई है, जो बुद्धि इन्द्रियों प्राणों और गुणों से वियुक्त, (सदा के लिए) सोया हुआ और सञ्ज्ञा-हीन
है, तथा तृण एवं काष्ठ (के समान) हो गया है। प्रयत्नपूर्वक संवर्धन और संरक्षण करके भी प्रिय (स्व-)
जन इसे छोड़ रहे हैं” ॥57॥
इति प्रणेतुः स निशम्य वाक्यं सञ्चक्षुभे किञ्चिदुवाच चैनम्।
किं केवलोऽस्यैव जनस्य धर्मः सर्वप्रजानामयमीदृशोऽन्तः ॥३.५८
सारथि का वाक्य सुनकर, वह कुछ संक्षुब्ध हुआ और उसे कहा- “क्या यह धर्म केवल इसी मनुष्य का
है या सब प्रजाओं (=जीवों) का अन्त ऐसा ही है?” ॥58॥
ततः प्रणेता वदति स्म तस्मै सर्वप्रजानामिदमन्तकर्म।
हीनस्य मध्यस्य महात्मनो वा सर्वस्य लोके नियतो विनाशः ॥३.५९
तब सारथि ने उससे कहा- “सब प्रजाओं (=जीवों) का यह अन्तिम कर्म है। हीन मध्य या महात्मा का,
संसार में सबका, विनाश नियत है” ॥59॥
ततः स धीरोऽपि नरेन्द्रसूनुः श्रुत्वैव मृत्युं विषसाद सद्यः।
अंसेन संशिष्य च कूबराग्रं प्रोवाच निह्लादवता स्वरेण ॥३.६०
तब धीर होनेपर भी उस राजकुमार को, मृत्यु (की बात) सुनकर, तुरत विषाद हो गया। और कन्धे से
कूबर²³ के अग्रभाग का सहारा लेकर, उसने गम्भीर स्वर से कहा:- ॥60॥
इयं च निष्ठा नियता प्रजानां प्रमाद्यति त्यक्तभयश्च लोकः।
मनांसि शङ्के कठिनानि नृणां स्वस्थास्तथा ह्यध्वनि वर्तमानाः ॥३.६१
“प्रजाओं का यह विनाश नियत है और संसार भय छोड़कर असावधानी कर रहा है। मनुष्यों के मन, मैं
सोचता हूँ, कठोर हैं, क्योंकि (मृत्यु-) मार्ग में रहते हुए वे उस प्रकार सुखी हैं ॥61॥
तस्माद्रथं सूत निवर्तयतां नो विहारभूमेनं हि देशकालः।
जानन्विनाशं कथ मार्त्तिकाले सचेतनः स्यादिह हि प्रमत्तः ॥३.६२


²³ कूबर = रथ का कोई भाग।


18 अश्वघोष

इसलिए, हे सारथि, हमारे रथ को लौटाइये, विहार-भूमि (में जाने) का (यह) देश-काल नही है। अपना
विनाश जानता हुआ (कोई भी) बुद्धिमान् सङ्कट-काल में कैसे असावधान हो सकता है?" ॥६२॥
इति ब्रुवाणेऽपि नराधिपात्मजे निवर्तयामास स नैव तं रथम् ।
विशेषयुक्तं तु नरेन्द्रशासनात्स पद्मषण्डं वनमेव निर्ययौ ॥३.६३
राज-पुत्र के ऐसा बोलते रहनेपर भी उसने रथ को नही लौटाया, किन्तु राजा की आज्ञा से वह पद्मषण्ड
वन को निकल गया, जो विशेषता से युक्त था ॥63॥
ततः शिवं कुसुमितबालपादपं परिश्रमत्रमुदितमत्तकोकिलम् ।
विमानवत्स कमलचारुदीर्घिकं ददर्श तन्नन्दनमिव नन्दनं वनम् ॥३.६४
तब उसने कुसुमित बाल-पादपों, घूमते हुए प्रमुदित मत्त कोकिलों, विमानों, तथा कमलों के सुन्दर पोखरों
से युक्त उस भव्य वन को देखा, जो नन्दन-वन के समान था ॥64॥
वराङ्गनागणकलिलं नृपात्मजस्ततो बलाद्वनमनिनीयते स्म तत् ।
वराप्सरोवृतमलकाधिपालयं नवव्रतो मुनिरिव विघ्नकातरः ॥३.६५
तब श्रेष्ठ स्त्रियों से भरे वन में राजा का पुत्र बलात् ले जाया गया, जैसे श्रेष्ठ अप्सराओं से पूर्ण कुबेर-
प्रासाद में नया व्रतवाला विघ्न-कातर मुनि (बलात् ले जाया जा रहा हो) ॥65॥$^{24}$
इति बुद्धचरिते महाकाव्ये संवेगोत्पत्तिर्नाम तृतीयः सर्गः ॥३॥

चतुर्थ सर्ग

स्त्री-निवारण

ततस्तस्मात्पुरोद्यानात्कौतूहलचलेक्षणाः ।
प्रत्युज्जग्मुर्नृपसुतं प्राप्तं वरमिव स्त्रियः ॥४.१
तब उस नगर-उद्यान से निकलकर कौतूहल से चञ्चल आँखोंवाली स्त्रियों ने राजा के पुत्र की, मानो आये
हुए वर की, अगवानी की ॥1॥
अभिगम्य च तास्तस्मै विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ।
चक्रिरे समुदाचारं पद्मकोशनिभैः करैः ॥४.२
समीप आकर उन्होंने, जिनकी आँखें विस्मय से विकसित हो गईं, पद्मकोश-सदृश हाथों (के सम्पुटों) से
उसका सत्कार किया ॥2॥
तस्थुश्च परिवार्यैनं मन्मथाक्षिप्तचेतसः ।
निश्चलैः प्रीतिविकचैः पिबन्त्य इव लोचनैः ॥४.३


और काम से आकृष्ट चित्तवाली वे (स्त्रियाँ) उसे घेरकर प्रीति से विकसित हुए निश्चल आँखों से उसे मानो
पीती रहीं (अर्थात् उसकी रूप-सुधा का पान करती रहीं) ॥3॥
तं हि ता मेनिरे नार्यः कामो विग्रहवानिव ।
शोभितं लक्षणैर्दीप्तैः सहजैर्भूषणैरिव ॥४.४
उज्ज्वल लक्षणों से, मानो स्वाभाविक भूषणों से, शोभित उस (कुमार) को उन नारियों ने मूर्त कामदेव
माना ॥4॥
सौम्यत्वाच्चैव धैर्याच्च काश्चिदेनं प्रजज्ञिरे ।
अवतीर्णे महीं साक्षाद्गूढांशुश्चन्द्रमा इव ॥४.५
उसकी सौम्यता और धैर्य से कतिपयों ने उसे पृथ्वी पर अवतीर्ण साक्षात् चन्द्रमा माना, जिसकी किरणें
गुप्त थीं ॥5॥
तस्य ता वपुषाक्षिप्ता निगृहीतं जजृम्भिरे ।
अन्योन्यं दृष्टिभिर्हत्वा शनैश्च विनिशश्वसुः ॥४.६
उसके रूप से आकृष्ट होकर, उन्होंने (हाथों से मुँह) पकड़े हुए जँभाई ली और एक दूसरे के ऊपर दृष्टि से
प्रहार कर धीरे-धीरे साँसें लीं ॥6॥
एवं ता दृष्टिमात्रेण नार्यो ददृशुरेव तम् ।
न व्याजह्रर्न जहसुः प्रभावेणास्य यन्त्रिताः ॥४.७
इस प्रकार उन स्त्रियों ने केवल आँखों से उसे देखा और उसके प्रभाव के वश में होकर, वे न (कुछ)
बोलीं, न हँसीं ॥7॥
तास्तथा तु निरारम्भा दृष्ट्वा प्रणयविक्लवाः ।
पुरोहितसुतो धीमानुदायी वाक्यमब्रवीत् ॥४.८
उन्हें उस प्रकार से (कुछ) आरम्भ नहीं करती तथा प्रेमविह्वल देखकर, पुरोहित-पुत्र बुद्धिमान् उदायी ने ये
वचन कहे:– ॥8॥
सर्वाः सर्वकलाज्ञाः स्थ भावग्रहणपण्डिताः ।
रूपचातुर्यसम्पन्नाः स्वगुणैर्मुख्यतां गताः ॥४.९
"तुम सब सब कलाओं में निपुण हो, भाव जानने में निपुण हो, रूप और चतुराई से युक्त हो, अपने गुणों
से मुख्यता को प्राप्त हो ॥9॥
शोभयेत गुणैरेभिरपि तानुत्तरान् कुरून् ।
कुवेरस्यापि चाक्रीडं प्रागेव वसुधामिमाम् ॥४.१०


$^{24}$ विघ्न-कातर = विघ्न (पड़ने के भय) से कातर।

बुद्धचरित 19

इन गुणों से उत्तरकुरुओं को भी शोभित कर सकती हो, कुबेर के उद्यान को भी, इस वसुधा को तो पहले
ही ॥10 ॥$^{25}$
शक्ताश्चालयितुं यूयं वीतरागानृषीनपि ।
अप्सरोभिश्च कलितान् ग्रहीतुं विबुधानपि ॥४.११
तुम लोग वीतराग ऋषियों को भी चलायमान कर सकती हो और अप्सराओं के वशीभूत देवों को भी
आकृष्ट कर सकती हो ॥11 ॥
भावज्ञानेन हावेन रूपचातुर्यसम्पदा ।
स्त्रीणामेव च शक्ताः स्थ संरागे किं पुनर्नृणाम् ॥४.१२
भाव-ज्ञान से, हाव-भाव से, तथा रूप व चतुरता की सम्पत्ति से स्त्रियों को भी अनुरक्त कर सकती हो,
फिर पुरुषों का क्या कहना ॥12 ॥
तासामेवंविधानां वो नियुक्तानां स्वगोचरे ।
इयमेवंविधा चेष्टा न तुष्टोऽस्म्यार्जवेन वः ॥४.१३
ऐसी तुम लोगों में से उनका, जो अपने अपने विषय (= अधिकार-क्षेत्र) में जुट नहीं रही हैं, यह ऐसा
आचरण! तुम लोगों की सरलता से मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ ॥13 ॥
इदं नववधूनां वो हीनिकुञ्चितचक्षुषाम् ।
सदृशं चेष्टितं हि स्यादपि वा गोपयोषिताम् ॥४.१४
तुम लोगों का यह आचरण लाज से आँख मींचनेवाली नव-वधुओं या गोप-स्त्रियों के योग्य है ॥14 ॥
यद्यपि स्यादयं धीरः श्रीप्रभावान्महानिति ।
स्त्रीणामपि महत्तेज इतः कार्योऽत्र निश्चयः ॥४.१५
यद्यपि यह धीर तथा बड़ा ही श्रीमान् और तेजस्वी हो सकता है, स्त्रियों का भी तेज महान् है। इसलिए
इस (विषय) में निश्चय करो ॥15 ॥
पुरा हि काशिसुन्दर्या वेशवध्वा महानृषिः ।
ताडितोऽभूत्पदा व्यासो दुर्धर्षो देवतैरपि ॥४.१६
प्राचीन काल में काशि-सुन्दरी (नामक) वेश्या ने महर्षि व्यास को, जो देवताओं के लिए भी दुर्धर्ष था,
पाँव से मारा ॥16 ॥
मन्थालगौतमो भिक्षुर्जङ्गया वारमुख्यया ।
पिप्रीषुश्च तदर्थार्थं व्यसून्रिरहरत्पुरा ॥४.१७
पूर्वकाल में जङ्घा नामक वेश्या से सम्भोग करने की इच्छा से और उसे प्रसन्न करने की इच्छा से,
मन्थाल गौतम ने उसके धन के लिए लाशों को ढोया ॥17 ॥$^{26}$


गौतमं दीर्घतपसं महर्षिं दीर्घजीविनम् ।
योषित्सन्तोषयामास वर्णस्थानावरा सती ॥४.१८
दीर्घतपस गौतम (नामक) महर्षि को, जो दीर्घकाल तक जीवन धारण कर चुका था, नीच वर्ण व स्थिति
की स्त्री ने सन्तुष्ट किया ॥18 ॥
ऋष्यशृङ्गं मुनिसुतं तथैव स्त्रीष्वपण्डितम् ।
उपायैर्विविधैः शान्ता जग्राह च जहार च ॥४.१९
उसी प्रकार मुनि-तनय ऋष्यशृङ्ग को, जो स्त्रियों (के विषय) में अज्ञानी था, शान्ता विविध उपायों से
पकड़कर ले गई ॥19 ॥
विश्वामित्रो महर्षिश्च विगाढोऽपि महत्तपः ।
दश वर्षाण्यहर्मेने घृताच्याप्सरसा हतः ॥४.२०
महा-तपस्या में अवगाहन करनेपर भी महर्षि विश्वामित्र घृताची अप्सरा के द्वारा हरण किया गया और उस
महर्षि ने उसके साथ (बिताये गये) दश वर्षों को एक दिन माना ॥20 ॥
एवमादीनृषींस्तांस्ताननयन्विक्रियां स्त्रियः ।
ललितं पूर्ववयसं किं पुनर्नृपतेः सुतम् ॥४.२१
इस प्रकार के उन अनेक ऋषियों को स्त्रियों ने विकृत किया। फिर राजा के सुन्दर और तरुण पुत्र का
क्या कहना ॥21 ॥
तदेवं सति विश्रब्धं प्रयतध्वं तथा यथा ।
इयं नृपस्य वंशश्रीरितो न स्यात्पराङ्मुखी ॥४.२२
ऐसा होनेपर विश्वासपूर्वक वैसा प्रयत्न करो जिससे राजा की यह वंश-लक्ष्मी यहाँ से विमुख न हो
जाय ॥22 ॥
या हि काश्चिद्युवतयो हरन्ति सदृशं जनम् ।
निकृष्टोत्कृष्टयोर्भावं या गृह्णन्ति ता तु स्त्रियः ॥४.२३
जो कोई भी युवतियाँ (अपने) सदृश जन का (चित्त) हरण कर सकती है; किन्तु निकृष्ट और उत्कृष्ट के
(मनो-) भाव को जो आकृष्ट करती हैं वे ही (वास्तविक) स्त्रियाँ हैं" ॥23 ॥
इत्युदायिवचः श्रुत्वा ता विद्धा इव योषितः ।
समारुरुहुरात्मानं कुमारग्रहणं प्रति ॥४.२४
उदायी के ये वचन सुनकर (बाण-) विद्ध-सी वे स्त्रियाँ कुमार को आकृष्ट करने के लिए अपने ऊपर
आरूढ़ हुईं (तुल गईं) ॥24 ॥


$^{25}$ - उत्तरकुरु एक वर्गाकार द्वीप है, जो मेरु के उत्तर भाग में स्थित है-अ० को० 3.55
$^{26}$ - भज् + सन् + ड = भिक्षुः। सम्भवतः उस वेश्या के यहाँ जानेवाले धनवान् पुरुषों की धन के लोभ से
हत्या की जाती होगी और मन्थाल गौतम शवों को ढोता होगा। यह श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ता है।

| 20 | अश्वघोष |

ता भ्रूभिः प्रेक्षितैर्हावैर्हसितैर्ललितैर्गतैः।
चक्रुराक्षेपिकाश्चेष्टा भीतभीता इवाङ्गनाः ॥४.२५
भय-भीत सी उन स्त्रियों ने भौंहों, दृष्टि-पातों, हावों, हासों, विलासों और चालों से आकर्षण चेष्टाएँ
कीं ॥25॥
राज्ञस्तु विनियोगेन कुमारस्य च मार्दवात्।
जहुः क्षिप्रमविश्रम्भं मदेन मदनेन च ॥४.२६
राजा के आदेश और कुमार की मृदुता के कारण मद व मदन के वश होकर उन्होंने शीघ्र ही अविश्वास
छोड़ा ॥26॥
अथ नारीजनवृतः कुमारो व्यचरद्वनम्।
वासितायूथसहितः करीव हिमवद्वनम् ॥४.२७
तब स्त्रियों से घिरे कुमार ने वन में विचरण किया, जैसे हथिनियों के साथ हाथी हिमालय के वन
में ॥27॥
स तस्मिन् कानने रम्ये जज्वल स्त्रीपुरःसरः।
आक्रीड इव विभ्राजे विवस्वानप्सरोवृतः ॥४.२८
उस रम्य कानन में स्त्रियों के आगे-आगे जानेवाला वह वैसे ही प्रज्वलित हुआ, जैसे विभ्राज (=वैभ्राज)
उद्यान में अप्सराओं से घिरा विवस्वान् (=देवता या सूर्य) ॥28॥
मदेनावर्जिता नाम तं काश्चित्तत्र योषितः।
कठिनैः पस्पृशुः पीनैः संहतैर्वल्गुभिः स्तनैः ॥४.२९
मद से अनवत कुछ स्त्रियों ने अपने कठिन, पीन, दृढ़ और सुन्दर स्तनों से उसे स्पर्श किया ॥29॥
स्रस्तांसकोमललम्बमृदुबाहुलताबला।
अनृतं स्खलितं काचित्कृत्वैनं सस्वजे बलात् ॥४.३०
झुके हुए कन्धे से कोमलतापूर्वक लटकती मृदु बाहुलताओंवाली किसी अबला ने बनावटी गिरना
दिखाकर उसे बलात् आलिङ्गन किया ॥30॥
काचित्ताम्राधरोष्ठेन मुखेनासवगन्धिना।
विनिशश्वास कर्णेऽस्य रहस्यं श्रूयतामिति ॥४.३१
किसी ने मदिरा गन्ध-युक्त मुख से, जिसका निचला होंठ ताम्रवर्ण का था, उसके कान में धीरे-धीरे कहा—
“रहस्य सुनिये” ॥31॥$^{27}$
काचिदाज्ञापयन्तीव प्रोवाचार्द्रानुलेपना।
इह भक्तिं कुरुष्वेति हस्तसंश्लेषलिप्सया ॥४.३२
गीला अनुलेपवाली किसी ने (उसके) हाथ का स्पर्श पाने की इच्छा से मानो आज्ञा देते हुए कहा—“यहाँ
भक्ति करो” ॥32॥$^{28}$
मुहुर्मुहुर्मदव्याजस्रस्तनीलांशुकापरा।
आलक्ष्येरशना रेजे स्फुरद्विद्युदिव क्षपा ॥४.३३
मद के बहाने बार-बार नीला अञ्चल गिरानेवाली दूसरी स्त्री, जिसकी करधनी कुछ-कुछ दिखाई पड़ती थी,
चमकती बिजलीवाली रात के समान शोभित हुई ॥33॥
काश्चित्कनककाञ्चीभिर्मुखराभिरितस्ततः।
बभ्रमुर्दर्शयन्त्योऽस्य श्रोणीस्तन्वंशुकावृताः ॥४.३४
मुखर सुवर्ण कटि-भूषणों से, महीन कपड़ों से ढँके अपने नितम्बों को दिखाती हुई कोई इधर-उधर
घूमीं ॥34॥
चूतशाखां कुसुमितां प्रगृह्यान्या ललम्बिरे।
सुवर्णकलशप्रख्यान्दर्शयन्त्यः पयोधरान् ॥४.३५
दूसरी (स्त्रियाँ) आम की कुसुमित डाल पकड़कर, सुवर्ण-कलश सदृश अपने स्तनों को दिखाती हुई,
लटकीं ॥35॥
काचित्पद्मवनादेत्य सपद्मा पद्मलोचना।
पद्मवक्त्रस्य पार्श्वेऽस्य पद्मश्रीरिव तस्थुषी ॥४.३६
कोई कमलाक्षी कमल-वन से कमल के साथ आकर कमल-मुख के पास कमल की श्री के समान खड़ी
हुई ॥36॥
मधुरं गीतमन्वर्थं काचित्साभिनयं जगौ।
तं स्वस्थं चोदयन्तीव वञ्चितोऽसीत्यवेक्षितैः ॥४.३७
किसी ने स्पष्ट अर्थ से युक्त मधुर गीत अभिनयपूर्वक गाया, और उस स्वस्थ को दृष्टि-पातों से उत्तेजित
करते हुए माना कहा—“तुम वंचित हो रहे हो” ॥37॥
शुभेन वदनेनान्या भ्रूकार्मुकविकर्षिणा।
प्रावृत्यानुचकारास्य चेष्टितं धीरलीलया ॥४.३८
दूसरी ने लौटकर भौंहरूप तीर खींचनेवाले सुन्दर मुख से इसकी चेष्टा का स्थिर लीला से अनुकरण
किया ॥38॥


$^{27}$- विनिशश्वास = साँसें छोड़ी, वचन से नही कहकर साँसों से कहा अर्थात् इतना धीरे-धीरे कहा कि केवल
साँसें ही सुन पड़ती थीं।
$^{28}$- भक्ति = शोभा के लिए शरीर पर की जानेवाली रेखा-रचना; श्रद्धा, प्रेम।

बुद्धचरित 21

पीनवल्गुस्तनी काचिद्धासाघूर्णितकुण्डला ।
उच्चैरवजहासैनं समामोतु भवानिति ॥४.३९
परिपूर्ण एवं सुन्दर स्तनोंवाली किसी ने, जिसके कुण्डल उसकी हँसी से हिल रहे थे, “आप समाप्त करें,”
यह कहते हुए, जोरों से उसका उपहास किया ॥39 ॥
अपयान्तं तथैवान्या बबन्धुर्माल्यादामभिः ।
काश्चित्साक्षेपमधुरैर्जगृहुर्वचनाङ्कुशैः ॥४.४०
उसी प्रकार दूसरी ने (बाहों से) हटते हुए (कुमार) को मालाओं की डोरियों से बाँधा; किन्हीं ने आक्षेप-
युक्त मधुर वचनरूप अङ्कुशों से उसे रोका ॥40 ॥
प्रतियोगार्थिनी काचिद्गृहीत्वा चूतवल्लरीम् ।
इदं पुष्पं तु कस्येति पप्रच्छ मदविक्लवा ॥४.४१
प्रतियोग (= विरोध) चाहनेवाली किसी ने आम की मञ्जरी लेकर मद से विह्वल होते हुए पूछा- “यह फूल
किसका है?” ॥41 ॥
काचित्पुरुषवत्कृत्वा गतिं संस्थानमेव च ।
उवाचैनं जितः स्त्रीभिर्जय भो पृथिवीमिमाम् ॥४.४२
किसी ने पुरुष के समान गति और आकृति बनाकर उसे कहा- “तुम स्त्रियों द्वारा जीते गये, अब इस
पृथिवी को जीतो” ॥42 ॥
अथ लोलेक्षणा काचिज्जिघ्रन्ती नीलमुत्पलम् ।
किञ्चिन्मदकलैर्वाक्यैर्नृपात्मजमभाषत ॥४.४३
तब नीले कमल को सूँघती हुई किसी चञ्चलाक्षी ने मद से कुछ-कुछ अस्फुट वचनों में राजकुमार से
कहा- ॥43 ॥
पश्य भर्तःश्रितं चूतं कुसुमौर्मधुगन्धिभिः ।
हेमपञ्जररुद्धो वा कोकिलो यत्र कूजति ॥४.४४
“स्वामिन्, मधु-गन्ध-युक्त फूलों से भरे आम को देखिये, जहाँ कोकिल इस प्रकार (निश्चल होकर) कूज
रहा है, जैसे सोने के पिजड़े में बन्द हो ॥44 ॥
अशोको दृश्यतामेष कामिशोकविवर्धनः ।
रुवन्ति भ्रमरा यत्र दह्यमाना इवाग्निना ॥४.४५
कामियों का शोक बढ़ानेवाले इस अशोक को देखिये, जहाँ भौंरे इस तरह गूँज रहे हैं, जैसे आग से जल
रहे हों ॥45 ॥
चूतयष्ट्या समाश्लिष्टो दृश्यतां तिलकद्रुमः ।
शुक्लवासा इव नरः स्त्रिया पीताङ्गरागया ॥४.४६
आम की शाखा से आलिङ्गित होते तिलक-वृक्ष को देखिये, जैसे श्वेतवस्त्रधारी पुरुष पीत अङ्ग-रागवाली स्त्री
से आलिङ्गित हो रहा हो ॥46 ॥
फुल्लं कुरुबकं पश्य निर्भुक्ताक्तकप्रभम् ।
यो नखप्रभया स्त्रीणां निर्भर्त्सित इवानतः ॥४.४७
निचोड़े हुए अलक्तक (= लाख) के समान प्रभावान् कुसुमित कुरुबक को देखिये, जो स्त्रियों को नख-प्रभा
से मानो खूब फटकारा जाकर झुक गया है ॥47 ॥
बालाशोकश्च निचतो दृश्यतामेष पल्लवैः ।
योऽस्माकं हस्तशोभाभिर्लज्जमान इव स्थितः ॥४.४८
पल्लवों से भरे इस बाल अशोक को देखिये, जो हमारे हाथों की शोभा से मानो लजाता हुआ खड़ा
है ॥48 ॥
दीर्घिकां प्रावृतां पश्य तीरजैः सिन्दुवारकैः ।
पाण्डुरांशुकसंवीतां शयानां प्रमदामिव ॥४.४९
तीर पर उत्पन्न होनेवाले सिन्दुवारों से आच्छादित दीर्घिका (जलाशय) को देखिये, जो श्वेत वस्त्र से ढंकी
सो रही प्रमदा के समान है ॥49 ॥
दृश्यतां स्त्रीषु माहात्म्यं चक्रवाको ह्यसौ जले ।
पृष्ठतः प्रेष्यवद्भार्यामनुवर्त्यनुगच्छति ॥४.५०
स्त्रियों का माहात्म्य तो देखिये; वह आज्ञाकारी चक्रवाक जल में अपनी पत्नी के पीछे-पीछे नौकर के
समान जा रहा है ॥50 ॥
मत्तस्य परपुष्टस्य रुवतः श्रूयतां ध्वनिः ।
अपरः कोकिलोऽन्वक्षं प्रतिश्रुत्केव कूजति ॥४.५१
मत्त होकर कूकते कोकिल की ध्वनि सुनिये; दूसरा कोकिल पीछे की ओर प्रतिध्वनि के समान कूब रहा
है ॥51 ॥
अपि नाम विहङ्गानां वसन्तेनाहतो मदः ।
न तु चिन्तयतोऽचिन्त्यं जनस्य प्राज्ञमानिनः ॥४.५२
क्या वसन्त पक्षियों को मद ला सकता है और अचिन्त्य की चिन्ता करनेवाले प्राज्ञ एवं मानी मनुष्य को
नहीं?” ॥52 ॥
इत्येवं ता युवतयो मन्मथोद्दामचेतसः ।
कुमारं विविधैस्तैस्तैरुपचक्रमिरे नयैः ॥४.५३
इस प्रकार काम से उच्छृङ्खल चित्तवाली उन युवतियों ने उन-उन विविध नीतियों से कुमार को (आकृष्ट
करने का) उपक्रम किया ॥53 ॥


22 अश्वघोष

एवमाक्षिप्यमाणोऽपि स तु धैर्यावृतेन्द्रियः ।
मर्तव्यमिति सोद्वेगो न जहर्ष न विव्यथे ॥४.५४
इस प्रकार आकृष्ट किया जानेपर भी, वह धीर-इन्द्रियवाला (= जितेन्द्रिय) “मरना पड़ेगा” इस (विचार) से
उद्वेग-युक्त होकर न आनन्दित हुआ और न व्यथित ॥५४ ॥
तासां तत्त्वेऽनवस्थानं दृष्ट्वा स पुरुषोत्तमः ।
ससं विघ्नेन धीरेण चिन्तयामास चेतसा ॥४.५५
तत्त्व में उसकी स्थिरता न देखकर उस पुरुषोत्तम ने एक ही साथ संविग्न व धीर चित्त से सोचा:- ॥५५ ॥
किं विमा नावगच्छन्ति चपलं यौवनं स्त्रियः ।
यतो रूपेण सम्पत्तं जरा यन्नाशयिष्यति ॥४.५६
“क्या ये स्त्रियाँ यौवन का क्षणिक नही समझ रही हैं? ये उन्मत्त हैं अपने रूप से, जिसे जरा नष्ट कर
देगी ॥५६ ॥
नूनमेता न पश्यन्ति कस्यचिद्रोगसम्पप्लवम् ।
तथा हृष्टा भयं त्यक्त्वा जगति व्याधिधर्मिणि ॥४.५७
निश्चय ही यह किसी को रोग से आक्रान्त नही देखती हैं; (इसलिए) व्याधि-धर्मा जगत् में भय छोड़कर ये
इस प्रकार आनन्दित हैं ॥५७ ॥^२९
अनभिज्ञाश्च सुव्यक्तं मृत्योः सर्वापहारिणः ।
ततः स्वस्था निरुद्विग्नाः क्रीडन्ति च हसन्ति च ॥४.५८
स्पष्ट ही सबको दूर ले जानेवाली मृत्यु से अनभिज्ञ हैं; इसीलिए स्वस्थ और और उद्वेग-रहित होकर ये
खेलती व हँसती हैं ॥५८ ॥
जरां व्याधिं च मृत्युं च को हि जानन्सचेतनः ।
स्वस्थस्तिष्ठेन्निषीदेद्वा शयेद्वा किं पुनर्हसेत् ॥४.५९
जरा, व्याधि व मृत्यु को जानता हुआ कौन बुद्धिमान् स्वस्थ होकर खड़ा हो या बैठे या सोये, फिर हँसे ही
क्यों? ॥५९ ॥
यस्तु दृष्ट्वा परं जीर्णं व्याधितं मृतमेव च ।
स्वस्थो भवति नोद्विग्नो यथाचेतास्तथैव सः ॥४.६०
जो दूसरे को वृद्ध, रोगी या मृत देखकर स्वस्थ रहता है, उद्विग्न नही होता, वह वैसा ही है जैसा कि
अचेतन ॥६० ॥
वियुज्यमाने हि तरौ पुष्पैर्अपि फलैरपि ।
पतति च्छिद्यमाने वा तरुरन्यो न शोचते ॥४.६१
क्योंकि फूलों और फलों से अलग होकर अब (एक) वृक्ष गिरता है या काटा जाता है, तब दूसरा वृक्ष
शोक नही करता है” ॥६१ ॥
इति ध्यानपरं दृष्ट्वा विषयेभ्यो गतस्पृहम् ।
उदायी नीतिशास्त्रज्ञस्तमुवाच सुहृत्तया ॥४.६२
इस प्रकार उसे ध्यानमग्न और निरभिलाप देखकर नीति-शास्त्रज्ञ उदायी ने मित्रता से कहा:- ॥६२ ॥
अहं नृपतिना दत्तः सखा तुभ्यं क्षमः किल ।
यस्मात्त्वयि विवक्षा मे तया प्रणयवत्तया ॥४.६३
“मैं राजा के द्वारा नियुक्त किया गया तुम्हारा योग्य मित्र हूँ, इसलिए प्रेमपूर्वक मैं तुम्हें (कुछ) कहना
चाहता हूँ ॥६३ ॥
अहितात्प्रतिषेधश्च हिते चानुप्रवर्तनम् ।
व्यसने चापरित्यागस्त्रिविधं मित्रलक्षणम् ॥४.६४
अहित से रोकना, हित में लगाना और विपत्ति में नही छोड़ना—मित्र के (ये) तीन लक्षण हैं ॥६४ ॥
सोऽहं मैत्रीं प्रतिज्ञाय पुरुषार्थात्पराङ्मुखम् ।
यदि त्वां समुपेक्षेय न भवेन्मित्रता मयि ॥४.६५
मैत्री की प्रतिज्ञाकर, पुरुषार्थ (=पुरुष के काम) से विमुख हो, यदि मैं तुम्हारी उपेक्षा करूँ, तो मुझमें
मित्रता नही होगी ॥६५ ॥
तद्ब्रवीमि सुहृद्भूत्वा तरुणस्य वपुष्मतः ।
इदं न प्रतिरूपं ते स्त्रीष्वदाक्षिण्यमीदृशम् ॥४.६६
इसलिए मित्र होकर मैं कहता हूँ कि स्त्रियों के प्रति उदारता का यह ऐसा अभाव तुझ सुन्दर तरुण के
अनुरूप नही है ॥६६ ॥
अनृतेनापि नारीणां युक्तं समनुवर्तनम् ।
तद्व्रीडापरिहारार्थमात्मरत्यर्थमेव च ॥४.६७
स्त्रियों के लज्जा-परित्याग तथा अपने आनन्द के लिए असत्यता से भी उनके अनुकूल आचरण करना
उचित है ॥६७ ॥
सन्नतिश्चानुवृत्तिश्च स्त्रीणां हृदयबन्धनम् ।
स्नेहस्य हि गुणा योनिर्मानकामाश्च योषितः ॥४.६८
नम्रता व अनुकूल आचरण स्त्रियों के हृदय के लिए बन्धन हैं; क्योंकि सद्गुण ही स्नेह का उत्पत्ति-स्थान है
और स्त्रियाँ सम्मान चाहती हैं ॥६८ ॥
तदर्हसि विशालाक्ष हृदयेऽपि पराङ्मुखे ।
रूपस्यानुरूपेण दाक्षिण्येनानुवर्तितुम् ॥४.६९


^२९- व्याधिधर्मा = व्याधि जिसका धर्म अर्थात् स्वभाव है ।

बुद्धचरित 23