बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 6, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोकस्य मोक्षाय गुरौ प्रसूते शमं प्रपेदे जगद्व्यवस्थं।
प्राप्येव नाथं खलु नीतिमन्तं एको न मारो मुदमाप लोके ॥1.27
जगत् के मोक्ष के लिए गुरु का जन्म होनेपर संसार अत्यन्त शान्त हो गया, जैसे कुव्यवस्था
के बीच इसे शासक मिल गया हो। केवल कामदेव को आनन्द नही हुआ ॥27॥
दिव्याद्भुतं जन्म निरीक्ष्य तस्य धीरोऽपि राजा बहुक्षोभमेतः।
स्नेहादसौ भीतिप्रमोदजन्ये द्वे वारिधारे मुमुचे नरेन्द्रः ॥1.28
अपने पुत्र का अद्भुत जन्म देखकर राजा धीर होनेपर भी बहुत क्षुब्ध हुआ और स्नेह के कारण
आनन्द तथा भय से उत्पन्न हुई दो अश्रु-धाराएँ (उसकी आँखों से) बहीं ॥28॥
अमानुषीं तस्य निशम्य शक्तिं माता प्रकृत्या (करुणार्द्रचित्ता)।
प्रीता च भीता च बभूव देवी शीतोष्णमिश्रेव जलस्य धारा ॥1.29$^5$
उष्ण और शीतल जल के मिश्रण से बनी धारा के समान रानी आनन्द और भय से भर गई;
क्योंकि एक ओर उसके पुत्र की शक्ति (प्रभाव) अमानुषी थी और दूसरी ओर उसमें माता की
स्वाभाविक दुर्बलता थी ॥29॥
निरीक्षमाणा भयहेतुमेव ध्यातुं न शोकुः वनिताः प्रवृद्धाः।
पूताश्च ता मङ्गलकर्म चक्रुः शिवं ययाचुः शिशवे सुरौघान् ॥1.30
केवल भय के ही कारणों को देखती हुई विशुद्ध बूढ़ी स्त्रियाँ ध्यान नहीं कर सकीं। अपने को
पवित्र कर तथा भाग्यनिर्माण की क्रियाएँ कर, उन्होंने देवताओं से सौभाग्य के लिए प्रार्थना
की ॥30॥
विपाश्च ख्याताः श्रुतशीलवाग्भिः श्रुत्वा निमित्तानि विचार्य सम्यक्।
मुखैः प्रफुल्लैश्चकितैश्च दीप्तैः भीतप्रसन्नं नृपमेत्य प्रोचुः ॥1.31$^6$
आचरण विद्या और वाग्मिता के लिए प्रसिद्ध ब्राह्मणों ने जब ये लक्षण सुने और उनपर विचार
किया, तब उज्ज्वल, साश्चर्य और प्रसन्न मुखों से उन्होंने राजा से, जो भीत भी था और प्रसन्न
भी, कहा:- ॥31॥
शमेप्सवो ये भुवि सन्ति सत्त्वाः पुत्रं विनेच्छन्ति गुणं न कश्चित्।
त्वत्पुत्र एषोऽस्ति कुलप्रदीपः नृत्योत्सवं त्वद्य विधेहि राजन् ॥1.32$^7$
“भूतलपर मनुष्य अपनी शान्ति के लिए पुत्र को छोड़कर कोई दूसरा गुण नहीं चाहते हैं।
आपका यह प्रदीप आपके वंश का प्रदीप है, अतः आज आनन्द और उत्सव कीजिए ॥32॥
विहाय चिन्तां भव शान्तचित्तो मोदस्व वंशस्तव वृद्धिभागी।
लोकस्य नेता तव पुत्रभूतः दुःखार्दितानां भुवि एष त्राता ॥1.33$^8$
इसलिए पूरे धैर्य के साथ चिन्ता तजिए और प्रसन्न होइये; आपका वंश निश्चय ही उन्नत होगा।
जो आपका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ है, वह दुःख में डूबे जगत् का उद्धार करेगा ॥33॥
दीपप्रभोऽयं कनकोज्ज्वलाङ्गः सुलक्षणैर्यैस्तु समन्वितोऽस्ति।
निधिर्गुणानां समये स गंता बुद्धर्षिभावं परमां श्रियं वा ॥1.34$^9$
सुवर्ण के समान उज्ज्वल और प्रदीप के समान चमकीले इस गुणवान् के लक्षणों के अनुसार,
वह निश्चय ही बुद्धर्षि होगा या पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच चक्रवर्ती सम्राट् ॥34॥
इच्छेद्द्रसौ वै पृथिवीश्रियं चेत् न्यायेन जित्वा पृथिवीं समग्रां।
भूपेषु राजेत यथा प्रकाशः ग्रहेषु सर्वेषु रवेर्विभाति ॥1.35
यदि वह पार्थिव साम्राज्य की इच्छा करे, तो अपने प्रभाव और धर्म के द्वारा पृथ्वी पर सब
राजाओं के ऊपर वह उसी प्रकार स्थित होगा, जिस प्रकार सब ग्रहों के ऊपर सूर्य का
प्रकाश ॥35॥
मोक्षाय चेद्वा वनमेव गच्छेत् तत्त्वेन सम्यक् स विजित्य सर्वान्।
मतान् पृथिव्यां बहुमानमेतः राजेत शैलेषु यथा सुमेरुः ॥1.36$^{10}$
यदि वह मोक्ष की इच्छा करे और वन को जाय, तो अपने ज्ञान और सत्य के द्वारा सब
सम्प्रदायों को जीतकर वह पृथ्वी पर उसी प्रकार स्थित होगा, जिस प्रकार पर्वतों के मध्य गिरी-
राज मेरु ॥36॥
यथा हिरण्यं शुचि धातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः।
तारासु चन्द्रस्तपतां च सूर्यः पुत्रस्तथा ते द्विपदेषु वर्यः ॥1.37$^{11}$
जैसे धातुओं में विशुद्ध सुवर्ण, पर्वतों में मेरु, जलाशयों में सागर, ग्रहों में चन्द्र और अग्नियों में
सूर्य श्रेष्ठ है, वैसे ही मनुष्यों में आपका पुत्र ॥37॥
तस्याक्षिणी निर्निमिषे विशाले स्निग्धे च दीप्ते विमले तथैव।
निष्कम्पकृष्णायतशुद्धपक्ष्मे द्रष्टुं समर्थे खलु सर्वभावान् ॥1.38$^{12}$
$^5$- क-वा 'दृष्ट्वा विशालं तनय-प्रभावं'
ग-वा 'प्रीत्या च भीत्या च बभूव युक्ता'
$^6$- ख-वा 'श्रुत्वा निमित्तानि विचिन्त्य तानि'
$^7$- ख-पा० 'किञ्चत्' के स्थान में 'तेऽन्यं'।
$^8$- ख-पा० 'वृद्धिगामी'।
$^9$- क-पा० 'दीपप्रदीपः' ख-पा० 'विभूषितोऽस्ति'।
$^{10}$- घ-पा० 'यथा हिमाद्रिः'।
$^{11}$- ग-या 'तारासु चन्द्रो दहतां च भानुः'।
6 अश्वघोष